चन्दायन (मुल्ला दाऊद - प्राचीनतम अवधी सूफी-प्रेमाख्यान सटीक)
Chandayan of Mulla Daud with Hindi Commentary
मुल्ला दाऊद (१३७९ ई.) / डॉ. परमेश्वरीलाल गुप्त द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२११ टिप्पणी—(१) बरे—घट। (२) अगरम—अगणित। (७) छिनार—छिन्नाख; पुंश्चली; व्यभिचारिणी। लोक-भाषामें नारीके प्रति एक अति प्रचलित गाली। २७९ (फील्ड्स २९३) तंबीह्नन चाँदा बिरस्पत रा व फरिस्तादने बर लोरक (चाँदका बिरस्पतको बुझाकर लोरकके पास भेजना) चाँद बिरस्पत सों अस कहा। भासउँ कुछ जो चित महँ अहा ॥१ सरग हुतँ घरि परा उठारू। उठा सबद जग मीत न ककरू ॥२ अब यह बात देस पहिराई। औधी ढाँकी रहहिं लुकाई ॥३ हांबौं सुनतेउँ मोल परावा। जिह डरेउँ सो आग भावा ॥४ अब हा मरिहौं पेट कटारी। कै दुख सहब देस कै गारी ॥५ लोर कहसि बिरस्पत, महिँ लै नगर पराइ।६ आज राति लै निकरो, नतुर मरी मोर बिस खाइ ॥७ टिप्पणी—(५) सहब—सहूँगी। (७) नतुर—नहीं तो; अन्यथा। २८० (फील्ड्स २९४) गुफ्तन बिरस्पत लोरक रा सुखन चाँदा (बिरस्पतका लोरकसे चाँदका सन्देश कहना) आइ बिरस्पत कहा सँदेसू। लोर चाँद लइ [आ°] परदसू ॥१ मागन लाग दइउ घिर आये। पाउम पन्थ न हाँढी आय ॥२ नार गार नद पानि भरि रहे। यह सर्वसार जहाँ लइ अई ॥३ दुहँ लाग घर बादर रनै। दादुर रगहिं घीज लँवरून ॥४ पाउम पन्थ कउन नर पाइ। जीउ डराइ हिय फाण्ड धाई ॥५