चन्दायन (मुल्ला दाऊद - प्राचीनतम अवधी सूफी-प्रेमाख्यान सटीक)
Chandayan of Mulla Daud with Hindi Commentary
मुल्ला दाऊद (१३७९ ई.) / डॉ. परमेश्वरीलाल गुप्त द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें५१ खोल पिटारा झपर देखे । अभरन अछरन आहँ पिसेखे ॥४ घेर लोग भरा घर बारू । जस चाहत तस दीन्ह करतारू ॥५ चाँद सुरुज मन रहँसे, तिल तिल करहिं बढ़ाउ ।६ एक समो गोवर हुँत आये, हरदींपाटन रहाउ' ॥७ पाठान्तर—बम्बई प्रति— शीर्षक—सखावत कर्दने लोरक बराय फुकरा दर शहर (नगरम लोरक का फकीरो (?) को दान देना) । इस प्रतिम पंक्ति ३ के पद पीछे-आगे हैं । १—एक सी । २—जोराँइँ । ३—सिह । ४—सने । ५—होग । ६—पुनि । ७—कीन्हि । ८—घरी फेर । ९—भाठ । टिप्पणी—(१) टँका—टंका चाँदीका एक सिक्का जो दिल्ली-सुल्तानोंक समयमे प्रचलित था । पीरै (फारसी-पीर)—ब्राह्मण । झाकि—निछावर करके । भाड—नाई, हज्जाम । (२) थानों—पहनावा । (३) बस्तर—वस्त्र । (७) समो—समय । ३९८ ( बम्बई १८ ) बयान कर्दैन पुरखारिये मैना ( मैनाके दुःखका वर्णन ) निसि दुख भैनहि रोइ बिहाई । सभ दिन रहैं नैन पँथ लाई ॥१ मकु लोरक इहिं मारग आवइ । फे फे[रि*]आफे आपु जनावइ ॥२ निसि दिन झुरपइ आस बजासी । रोइ रोइ खिन खिन होइ निरासी ॥३ लोर लोर कहि दिन पुरावइ । अउर पधनहर मुइँदि न आवइ ॥४ छपते असुदी रैन बिहाइ । जस मछरी बिनु नीर झुरसाइ ॥५ बिरह सँताई मना, अँहि परि दिन औ रात ।६ सभ लीन्हेइ दुख लोरगैं फेरा, बिरहा कीन्हि भैपात॥७ टिप्पणी— (६) मकु—कदाचित् शायद । फे फे [रि ] आफे—यह अनुमानित किन्तु संगत पाठ है । मूलमें फार वे पे है य, भाँर फार ए,