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चन्दायन (मुल्ला दाऊद - प्राचीनतम अवधी सूफी-प्रेमाख्यान सटीक)

चन्दायन (मुल्ला दाऊद - प्राचीनतम अवधी सूफी-प्रेमाख्यान सटीक)

Chandayan of Mulla Daud with Hindi Commentary

मुल्ला दाऊद (१३७९ ई.) / डॉ. परमेश्वरीलाल गुप्त द्वारा

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३ २ इस प्रकार तीन शब्द या शब्द-खण्ड हैं जो 'के वया के' पढ़े जा सकते हैं । उन्हें 'वैप दिया क' भी पढ़ सकते हैं । पहला पाठ अर्थ- हीन है । दूसरे पाठका अर्थ होगा—'हवसकी व्यथाको' । इस अर्थके साथ पाठ ग्रहण किया जा सकता है । जो भी हो, पाठ सन्दिग्ध है । (३) हरबइ—(स० स्मृ धातुका प्रा० यात्वादेश हरइ) याद करती है चिन्तन करती है; सोचती है । भास बेआसी—बिना आशाके आशा । निरासी—निराश । (५) पुरावइ—व्यतीत करती है । बचनहर—शब्द । ३९९ (रीसेंण्ड्स ५८३ : बम्बई ४८) पुरखीदने सोझिन सिरमन य पुरखीदने अरुवारे गोरक (झोझिनका सिरजनसे गोरककी खबर पूछना) दीदी सुनउ सुनी एक बाता । आवा ठाँव कहा दोसौ साता ॥१ केंरें आइ सेंकट¹ कें मेला । पूछहु आन कवन मुँह खोला² ॥२ झोझिन नायक परहि³ पुछावा । पूछसि ठाँव कहाँ⁴ हुत आवा ॥३ कउन मनिज लादेते⁵ पर परधाना । कउन रात⁶ तुम्ह देत⁷ पयाना ॥४ कउन लोग घर कहाँ तुम्हारा । कउन नाँउ किंह कुटुंब हँकारा⁸ ॥५ आसा सुषुधैं पूछउँ, को परदेसी आइ ।६ मोर धार परबस बिरोधा, सुखहिं जाहि को पाइ⁹ ॥७ पाठान्तर—बम्बई प्रति— शीर्षक—सुनीदने मैना व झोझिन कि कसी ताजस्यान अस तरफे हरदौं आमद (मैना और झोझिनका सुनना कि हरदौरी ओरसे कोई वणिक आया है) । १—कौंदे सैंकट आइ । २—पूछेउ ठाँव कवन मुखं लेग । ३— मन्दिर । ४—कहवाँ । ५—वाषो । ६—रेत । ७—दैत । ८— हमारा । ९—आसा षड़पै हीं हुत, पूछउ को परदेशी आड । ⁹ —पाठ । टिप्पणी—(१) दीदी—मैनाने यहाँ अपनी सासको 'दीदी' सम्बोधित किया है जो असाधारण है । कड़वक ४६ में मैनाकी ननदने अपनी माँके लिए इस