चन्दायन (मुल्ला दाऊद - प्राचीनतम अवधी सूफी-प्रेमाख्यान सटीक)
Chandayan of Mulla Daud with Hindi Commentary
मुल्ला दाऊद (१३७९ ई.) / डॉ. परमेश्वरीलाल गुप्त द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१२४ समुँद वीर कछु साथ तुम्ह चायहु । गोबर देखि पलटि घर आयहु ॥४ फाँद सिंहासन चाँद चलावा । इन्ह तखियाव फिरे हूँ (आवा) ॥५ बरद सहस एक सिन्धौ भरा । पाटन छाड़ि सींठ ऊतरा ॥५ राहु गरह यस गरहै, चाँदा मुख अँधियार ।६ मीन रासि बन बैरिन, सिरजन कै उपकार ॥७ मूलपाठ—(४) आये । टिप्पणी—(५) सिन्धौ—सैन्धव नमक । ४३४ ( तीर्थखण्ड ३१ ) गुशउने चाँदा लोरक रा ( चाँदका लोरकसे अनुरोध ) सवदु चाँद लोर सों कहा । पलट नीर गंगा नै वहा ॥१ फिरथि साइ सैं मा तोड़ै डोरी । जहवाँ टूटि फुनि तहमों जोरी ॥२ तिह नखोर हा सरग लुकानी । कै सनेह हरदीं तें मानी ॥३ तिह दिन संवर बाच जिह कीन्हे । अब लै गोबर महि दीन्हे ॥४ बास देइ धनि नाठ चढ़ाये । अब गुन फाटि गाँग बहाये ॥५ बहुरि लोर असु हरदी, रँहहिं वरिन दोइ पार ।६ माथा पुरवहु अपनें साँई, बिनवइ दासि तुम्हार ॥७ टिप्पणी—(१) सवदु—गीत पने । नै—समान । (७) पुरवहु—पूरा करो । साँई—स्वामी । बिनवइ—विनय करती है । ४३५ ( तीर्थखण्ड ३१।अ ) जवाव दाइने लोरक सर चाँदा रा ( लोरकका चाँदको उत्तर ) हाँ जानउँ राजा कें जाइ । अपनें हुतें तिह होत पराई ॥१ हौं अस जानउँ बन क जाती । मन न दगउत एकाँ राती ॥२