चन्दायन (मुल्ला दाऊद - प्राचीनतम अवधी सूफी-प्रेमाख्यान सटीक)
Chandayan of Mulla Daud with Hindi Commentary
मुल्ला दाऊद (१३७९ ई.) / डॉ. परमेश्वरीलाल गुप्त द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३१९ ४—चाँदै हरखी। ५—चाँद। ६—को पै देखत चाँद को रामेरउँ । ७—कारमुरी के खरग डिखावेउँ। ८—दाइ मैं। ९—दीन्हौं। ४४७ (रीडिंग्स ३२१ ; बम्बई ५०) गुफ़्तगूए खुद नमूदन् चाँदा ब पैहानत करद्ने मैना (चाँदका अपनी बड़ाई और मैनाका अपमान करना) चाँद आपुन कियत बड़ाई। मैनहि पूछत रही लजाई ॥१ भोल पतोल भइ सुठाई¹। कहसि न चाँद कहाँ सँ² आई ॥२ परकी चाँदें झझ उषावा³। भा झझ अस दाउद गावा ॥३ तब उठि लारक आपु जनावा। मैनाँ रह[स⁴] लारेवो पावा⁵ ॥४ सोरफ चाँद⁶ तस कँ हरखी। जूसन फारन फिर न फरकी ॥५ घरि सात पाँच कइँ भोरुसि, मैना⁷ जाइ सँभारि ।६ आज रात मैनैं⁸ घर बामौं⁹, दाहिक हूँ¹⁰ पारि ॥७ पाठान्तर—बम्बई प्रति— शीर्षक—गुफ़्तगू व एल्फिदम सुद शुफ्तन चाँदा व शनाख्तने मिन्द व बज़ बर्दन चाँदा (चाँदका अपनी प्रशंसा करना; मैनाका उसे पहचान लेना और झगड़ना) । इस प्रतिमे पंक्ति ४ नहीं है। उसके स्थानपर पंक्ति ७ है और पंक्ति ५ के स्थानपर एक नयी पंक्ति है। —कवत वकत भइ सुन्दाई। १—हुत । ३—उगावा । ४—भई। यह पंक्ति नहीं है। ६—चाँदहि। ७—हरषी। ८—चाँदा जूसे न फिरि न फहकी । —मैनाँद । ९ —मै बहि। ११—उठव । १२ राउदेवै करा सातवीं पंक्ति के स्थानपर नयी पंक्ति इस प्रकार है—भवहु तमुझ महि रही जगाइ। आपुन घर कँ कीन्ह बड़ाई ॥