भारतकोश
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चन्दायन (मुल्ला दाऊद - प्राचीनतम अवधी सूफी-प्रेमाख्यान सटीक)

Chandayan of Mulla Daud with Hindi Commentary

मुल्ला दाऊद (१३७९ ई.) / डॉ. परमेश्वरीलाल गुप्त द्वारा

DevanagariAwadhipublished520 पृष्ठ

३१९ ४—चाँदै हरखी। ५—चाँद। ६—को पै देखत चाँद को रामेरउँ । ७—कारमुरी के खरग डिखावेउँ। ८—दाइ मैं। ९—दीन्हौं। ४४७ (रीडिंग्स ३२१ ; बम्बई ५०) गुफ़्तगूए खुद नमूदन् चाँदा ब पैहानत करद्ने मैना (चाँदका अपनी बड़ाई और मैनाका अपमान करना) चाँद आपुन कियत बड़ाई। मैनहि पूछत रही लजाई ॥१ भोल पतोल भइ सुठाई¹। कहसि न चाँद कहाँ सँ² आई ॥२ परकी चाँदें झझ उषावा³। भा झझ अस दाउद गावा ॥३ तब उठि लारक आपु जनावा। मैनाँ रह[स⁴] लारेवो पावा⁵ ॥४ सोरफ चाँद⁶ तस कँ हरखी। जूसन फारन फिर न फरकी ॥५ घरि सात पाँच कइँ भोरुसि, मैना⁷ जाइ सँभारि ।६ आज रात मैनैं⁸ घर बामौं⁹, दाहिक हूँ¹⁰ पारि ॥७ पाठान्तर—बम्बई प्रति— शीर्षक—गुफ़्तगू व एल्फिदम सुद शुफ्तन चाँदा व शनाख्तने मिन्द व बज़ बर्दन चाँदा (चाँदका अपनी प्रशंसा करना; मैनाका उसे पहचान लेना और झगड़ना) । इस प्रतिमे पंक्ति ४ नहीं है। उसके स्थानपर पंक्ति ७ है और पंक्ति ५ के स्थानपर एक नयी पंक्ति है। —कवत वकत भइ सुन्दाई। १—हुत । ३—उगावा । ४—भई। यह पंक्ति नहीं है। ६—चाँदहि। ७—हरषी। ८—चाँदा जूसे न फिरि न फहकी । —मैनाँद । ९ —मै बहि। ११—उठव । १२ राउदेवै करा सातवीं पंक्ति के स्थानपर नयी पंक्ति इस प्रकार है—भवहु तमुझ महि रही जगाइ। आपुन घर कँ कीन्ह बड़ाई ॥

१३३ ४४८ ( रीक्युल्स ३९२ : बम्बई ५८ ) दर शब रफ़्तने लोरक दर ख़ानये मैना व दिल खुश करदन ऊ ( लोरकका रात्रिमें मैनाके घर आना और मनोविनोद करना ) मैना घेरिहिं१ ले अन्हवाइ । मूँगिया सारि२ आन पहराइ ॥१ दुसरैं पाट नो पँसारसि३ । मुख तँबोल चख काजर सारसि ॥२ पदरीं इट जनु अनीस नीभरा४ । देख सुरुज चाँदा भीमरा५ ॥३ रात बाह कें नारि मनाइ । चाँदा चाह अधिक तँ पाइ ॥४ पहुल दुख जो नारि पखानों । राखसि मान लौर जम जानों ॥५ कइसि सुरुज धनि चाँदा, अस फन देउतहिं दोस६ । ६ इम मना जेंठ तरह, रहहि चाँद परास७ ॥७ पाठान्तर—बम्बई प्रति— शीर्षक—गुफ़्त बादने कनीज़गान मर मैना रा व कस्कने ख़ास आबा गन व दर ख़ाना शुदन (दासियोंका मैनाको महला कर वस्त्र पहराना और मन बहलाव करना) । १—धरी । २—नारी । ३—ण बहि पंगारी । ४—गारी । ५—अहिन निसरा । ६—सुरुज तब चाँदहिं दिखरा । ७—ठा । ८—चोदाँइ पाइ अधिक पैमाइ । —पहिल । ९—कइसि सुरज धनि चाँदहि ण में कीता दोस । १०—इमार षाँह इम तरह, रहतु चाँद परास ॥ ४४९ ( रीक्युल्स ३९३ ) गबर सुनानीदन आरुफ़ दर हजरे गाबर बज आमदन गु० ( लोरकका अपने आनेका समाचार गाबर भेजना ) गाररौँ अपवस पान जनाइ । भैंसों गगरभि नाहि मँसाइ ॥१ अजपी क घर गनिन गइ । रागि गुहार पान अस भइ ॥२ भा अमरार पाए दउराबा । तरफ गुनि क भ्रमन आवा ॥३

३२४ दठर खाँड अभगी सर दीन्हौं । ठाठर टूटि लोर तिह चीन्हौं ॥४ वोहि उठि कै भये अँकवारा । [ - ] कै मैं तौं मारा ॥५ काहि लागि तूँ हाँकसु, उठहु आपुन पर आउ । ६ आगें दइ लोरक खेतस, छाहि पूत तुम्ह पाउ ॥७ ४५० ( रीफ़न्सूल १२२ ) दर रसीदने आमदने लोरक ब खाने मादर उफ्तादन ( लोरकका अपने घर आकर माँके पैर पड़ना ) चढ़ तुरी लोर घर आवा । पायँ लागि के माइ मनावा ॥१ नित कहि अस पूत न कीजइ । भूरि माइ कँ दुख न दीजइ ॥२ खोलिन बहुतें डोल आनी । चाँदा मैना दोनौं रानी ॥३ पायँ परी अँकवारी घरी । काजर सेंदुर दोऊ फरी ॥४ अगिन परबार क रमोइ बघारा । कोठा बारी सेज सँबारा ॥५ चाँद सुरुज औ मैनाँ, बरस सहस भा राज । ६ गावहिं गीत सहेलियाँ, गोबर मघावा आज । ७ टिप्पणी—(४) काजर—काजल । सेंदुर—सिन्दूर । ( ) बघारा—छौंका बघारा । कोठा—अट्टालिका । बारी—घर । ४५१ ( रीफ़न्सूल १२५ ) पुरसीदन लारक मादर रा व जवाब दादन मादर ( लोरकका माँस पूछना और माँका उत्तर देना ) लारक पूसहि कहु मई माई । कित धनि मैनाँ कितहुव भाई ॥१ तारैँ पाउ आपन आवा । बैनी मैना गाड़ी लावा ॥२ अजबी कर गगर उठ भारा । बैथी मैना आइ छुड़ारा ॥३

तोहि महरहिं नाऊ चलाबा। माँकर कहैं अस बोल पठावा ॥४ कहा लोर इँह देस परानों। हरदीपाटन जाइ तुलानों ॥५ भये धीर हँ माँकर, मारि गाइ लै जाह। ६ ऐसे धीर कितहु पेइ पाये, सेंवरू राभ गवाह ॥७ ४५२ ( बम्बई ६ : रौकेण्ड्स १९९ ) सुनीदन माँकर वै पियते रफ्तने लोरक व आमदन बास्कर व कुश्तन सेंवरू व बुदने भौंए गाव ( लोरक के आने का समाचार सुनकर माँकर का सर्कश्य थाना और सेंवरू को मारकर गाय ले जाना ) सुनि कै माँकर फटक चलावा। मोहों कँवरुहिं मारइ धावा¹ ॥१ बहुत² फटक सेंउँ³ माँकर आवा। एकसर कँवरू फिरिं (वहिं) काहा ॥२ कँवरुहि नाउ हँकारह आवा⁴। राजा कापर तिह पहिरावा ॥३ राजा पहँ ता सेंवरू आवा⁵। भरि कर माँकर सेंवरू मरावा ॥४ दइकेँ पूत अस पहिँ मपठं⁶। परु हँसी फाडी गोठहिं गयउ ॥५ एक दुख महि सोरा, दूसर महि कर लाग । ६ देखम रोइ के फफरों, [रात आइ सभ⁷] आग ॥७ मूलपाठ—२—३रि (षाकर स्थान पर डाफ लिप्त जान कारण यह पाठ है)। पाठाग्त —रौकण्ड्स प्रति— शीर्षक—पेषन (वही) । इस प्रतिमें पंक्ति ३ ४ और ५ क्रमशः ५ ३ और ४ है। १-कँवर मारन आवा । २—बहुक । ३—सँहँ । ४—इक कँवरू परर इंद (!) काहा । ५—कँवरू मार नागस बुलाथा । ६—राजा पैह कँवरु धरि आवा । ७—काँगर माकर कँवरू मराया । ८—अल मुख पूत महि बर भयउ । —फाडि म गाउ । ९ —एक दुख पूरे महि लारा दूसर कहि क जो लाग ।

११६ टिप्पणी—(२) कटक चलावा—सेना रवाना किया। 'कटक चलि भाषा' अर्थात् कटक (उड़ीसामें एक प्रसिद्ध स्थान) से चलकर आया, पाठ भी सम्भव है। बाहाँ—लोर कथाओंके अनुसार बाहों में लोरकका भाई कँवर जिसे लोककथाओंमें मैवर भी कहा गया है, रहता था और वहाँ उसकी गाय भैंसोंका बाड़ा था। (६) एकसर—अकेला। (७) गोडहिं—गायोंका। (७) बेकरो—(वा वेरन्ना)—किसीके वियोगमें लिपट कर रोना चिल्लाना। ४५३-१ (अनुपलब्ध)

परिशिष्ट

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१ दौलतकाज़ी कृत सति मैना उ लोर-चन्द्रानी दौलतकाज़ी अराकान नरेश थिरि-सु थम्मा (श्री सुधर्मा) (१६२२-१६३८ ई.) की राजसभाके कवि थे। उन्होंने वहाँके प्रधानमन्त्री अशरफ खाँके आदेशपर 'सति मैना उ लोर चंद्रानी' नामक बँगला काव्यकी रचना की। इस ग्रन्थके सम्बन्धमें उन्होंने लिखा है कि इस कहानीको मूलतः साधनने ठेठ चौपाई और दोहोंमें कहा था। लेकिन प्रधानमन्त्री अशरफ खाँकी सभामें कुछ लोग ऐसे हैं जो गोहारी भाषा नहीं समझते। इसलिए अशरफ ख़ान उनसे उसे बंगला भाषा और पाञ्चाली (बंगलाका एक अत्यन्त प्रचलित और लोकप्रिय छन्द) छन्दमें कहनेका आदेश दिया। तदनुसार उन्होंने इसकी रचना आरम्भ की। पर वे उसे पूरा न कर सके। उनके मृत्युके पश्चात् श्री चन्द्र सुधर्म (१६५२-१६८४-) के शासन कालमें उनके प्रधानमन्त्री सुलेमानके आदेशसे एक दूसरे राजकवि आलाओलने उसे पूरा किया। यह काव्य पहले 'सती मैना' नामसे हमीदी प्रेस कलकत्तासे प्रकाशित हुआ था। कुछ वर्ष हुए उसे सतेन्द्र घोषालने विश्वभारती (शान्तिनिकेतन) से प्रकाशित साहित्य प्रकाशिका (खण्ड १) में 'कवि दौलतकाज़ीर सती मयना ओ लोर चन्द्रानी' शीर्षकसे सुसम्पादित रूपमें प्रकाशित किया है। इसमें लोर और चन्द्रानीकी प्रेमकथाका वर्णन इस प्रकार है :- मैनावती नामक एक राजकन्या थी, जिसका विवाह लोर नामक युवकसे हुआ था जो अत्यन्त वीर और निर्भीक था। वह अपनी पत्नी को छोड़कर नगर-नगर, वन-वन घूमने लगा। उसके साथ नगरके सभी युवक हो गये। लोर एक नगरमें चला गया वहाँ महल बनाकर केलि-कुतूहलमें घरबारोंको भूल गया। इधर लोरके वियोगमें मैना अत्यन्त दुःखी रहने लगी। वह पुरुष जातिकी कठोरताकी निन्दा करती हुई उसके विरहमें अपना समय व्यतीत करने लगी। एक समय लोर अपनी सभामें बैठा था और नाच-गान हो रहा था तभी उसे खबर मिली कि एक योगी उससे मिलने आया है और पूछने पर वह कोई जवाब नहीं देता। उसके एक हाथमें सोनेका घड़ा और दूसरे हाथमें एक चित्रपट है जिसपर एक नारीका चित्र अंकित है। उसे ही वह एकटक देखता रहता है। लोरने योगीको तत्काल सभामें आनेका आदेश दिया। योगी राजसभामें आते ही मूर्छित हो गया। जल छिड़क कर उसे होशमें लाया गया। उस अपने पास बैठाकर लोरने उससे निर्जन

३४ धनम आनेका कारण पूछा और जानना चाहा कि उसके हाथमें किसका चित्रपट है। उसपर अंकित नारी चित्रकी ओर राजाका चंचल चित्त आकृष्ट हो गया था। बागीने बताया-पश्चिम देशमें गोहारी नामक राज्य है। वहाँके राजाका नाम महरा है। उसका एक आमात्य है जिसका नाम बाबनबीर है। वह अत्यन्त बली है। उसकी वीरताके कारण ही राजा सुखपूर्वक राज करता है। उसकी पत्नी महराकी राजकुमारी परम रूपवती है। उसका नाम चन्द्राली है। उसके रूपकी चर्चा देश देशान्तर तक फैली हुई है। उसे देखनेके लिए दूर दूरसे राजा महाराजा गोहारी देशमें आते हैं। सब वैभव होते हुए भी चन्द्रालीका पति बाबनबीर कामाग्निसे बंचित है। जब भी बाबनबीर चन्द्रालीके पास जाता तो वह और उसकी सखियाँ उसकी बड़ी सेवा करतीं और काम भोगके लिए प्रेरित करतीं। किन्तु वह उस पर तनिक भी ध्यान नहीं देता। एक दिन चन्द्रालीकी धायने बाबनको अपनी पत्नीके साथ रात्रि गमनके लिए आवाहन किया। उस दिन बाबन आया और चन्द्रालीके साथ उसका सम्भाष भी हुआ। किन्तु उसने सारी रात्रि सोनेमें ही बिता दिया और सबेरा होते ही वह धनको चला गया। उसके चले जाने पर चन्द्राली विलाप करने लगी। उसने अपनी माँसे जाकर कहा कि अब वह एकाकिनी रहेगी। अगर उसे पुनः उसके पतिसे मिलानेका यत्न किया गया तो वह जहर खाकर जान दे देगी। फलतः उसकी माँने राजासे कहकर उसके लिए एक बहुत बड़ा भव्य सजाया महल बनवा दिया और उसकी देखरेखके लिए अनेक सुन्दरियों नियुक्त कर दीं। नये महलमें जानेसे पूर्व चन्द्राली अपनी सखियोंके साथ देवायतनमें गयी। वहाँ उसके रूपदर्शनके लिए छोटे बड़े सब एकत्र हुए। मैं भी उस दिन वहाँ समाधिस्थ बैठा था। उसके रूपको देखते ही मैं संशा हीन हो गया और तभी से मैं भ्रान्त होकर घूम रहा हूँ। तीन दिन की मूछाके बाद जब मुझे ध्यान हुआ तो मैंने लोगों से कहा कि देवी ने मुझे साक्षात दर्शन दिया है। यह सुनकर लोग हँसे और उन्होंने मुझे मूर्ख कहा। उन्होंने बताया कि जिसे मैंने देखा वह राजकुमारी चन्द्राली था। उसका ध्यान थिर सम्भ न जानकर मैंने इस चित्रपटको अपने साथ रख छोड़ा है। यहाँ आकर मैंने देखा कि आप उस रूपवतीसे मिलनेके अधिकारी हैं। चन्द्रालीके रूपकी कहानी सुनकर शाह हसन मिलनेको विकल हो उठा। पाही उस महराकी राजधानी में चलनेको सहमत हो गया। मन्ना तेशराकी गदी और टने सवार भार गोहारी अञ्चलमें पहुँचा। जब महराको शाहके आनेकी बात ज्ञात हुई तो उसने उसकी बड़ी आवभगत की और बहुत सी वस्तुएं भेंट कीं। गोहारी देशमें छ मास तक रहने पर भी शाहको चन्द्रालीके दर्शन न हुए। उसे ज्ञात हुआ कि पाहाणी एक दुर्लघ्य विजन स्थानमें रहती है। वहाँ परिन्देके पर तक भाग बनते हैं। सालमें दो बार राजा दशदिगन्त के नृपोंका निमन्त्रण करता है और उस अवसर पर चन्द्रालीको देखनके लिए दूर देशके राजा वहाँ आते हैं। जब यह अवसर आया और सब राजा

१४१ लोग राजसभामे एकत्र हुए तो लोर भी वहाँ गया। चन्द्रातीने झरोखेसे लोरको देखा। लोर पर दृष्टि पड़ते ही वह अचेत हो गयी और उसकी सखियाँ घबरा उठीं। सभा भंग हो गयी और उपस्थित लोग अपने अपने निवास स्थानको चले गये। लोरको चन्द्रातीका दर्शन न हो सका और वह उसके वियोगमें व्याकुल हो उठा। इधर चन्द्रातीने जबसे लोरको देखा तबसे उसने सखियों से मिलना जुलना बंद कर दिया। वस्त्राभूषण त्याग दिये। दिन-दिन उसका शरीर क्षीण होने लगा। सखियोंको कुमारीकी इस दशाका कारण ज्ञात न हो सका। जब चन्द्रातीकी धायसे यह सब न देखा जा सका तो एक दिन उसने उसकी वेदनाका कारण पूछा। उसने यह भी आश्वासन दिया कि यदि वह कारण बता दे तो चाहे जिस तरह हो उसे दूर करेगी। बहुत कहने सुनने पर चन्द्रातीने अपने मनकी व्यथाका कारण प्रकट की और अपने प्रेमीसे मिला देनेकी प्रार्थनाकी। यह सुनकर धायने कहा—यह तो सहज बात है। तुम अपने पितासे राजाओंको पुनः निमंत्रित करनेका अनुरोध करो। तदनुसार चन्द्रातीने अपने पितासे अनुरोध किया और उसने सब राजाओको निमन्त्रित किया। सब राजालोग एकत्र हुए। पानफूलसे उनका सत्कार किया गया। धायने इस बीच सभामें एक दर्पण भिजवा दिया। दर्पण इतना आकर्षक था कि उसे देखनेके लिए सभामें एकत्र लोग उसके निकट आने लगे। जैसे ही लोर उस दर्पणके पास आया, धायने सरकाके चन्द्राती को द्वारपर खड़ा कर दिया और उसका प्रतिबिम्ब दर्पणमें जा पड़ा। चन्द्रातीके प्रतिबिम्बको देखते ही लोर मूच्छित हो गया। लोग उसे उठाकर उसके शिबिरमें ले गये पर ये मूर्छित होनेके कारण न जान सके। होश आनेपर लोर विरह वेदनासे व्यग्र हो उठा। उधर चन्द्रातीकी भी अवस्था बिगड़ने लगी। धायने उससे धैर्य रखनेको कहा और लोरके शिबिरमें गयी। द्वारपालने लोरको सूचना दी कि एक वृद्धा मिलने आयी है। लोरने उसे बुलाया। आनेपर उसने वृद्धासे उसका पता ठिकाना पूछा। वृद्धाने अपना नाम मन्दोदरी बताया और व्यवसाय वैद्यक। यह सुनकर लोरने कहा—तुम मेरी चिकित्सा नहीं कर सकती। तब बातचीतमें धायने चन्द्रातीका नाम लिया और उठकर जाने लगी। लोरने उसे तत्काल रोका और अपने मनकी व्यथा कह सुनायी। उसे सुनकर धायने कहा—तुम्हें तो प्रेम-रोग है। उसकी औषधि मेरे पास नहीं है। उसकी औषधि तो एकमात्र प्राण प्यारी का मिलन ही है। चन्द्रातीका पति बावनवीर बड़ा ही सर्वेश्वर आदमी है। सुनेगा तो मार डालेगा। लोरके बहुत अनुनय विनय करनेपर धायने कहा—अच्छा तुम योगेश्वर रूप धारण कर देवरूपान चलो। वहीं तुम्हारी प्रेयसीसे तुम्हारी भेंट होगी। यह कहकर धाय चन्द्रातीके पास लौट आयी और चन्द्रातीसे अवसर देखकर देवस्थान जानेका कहा। एक दिवस आनेपर चन्द्राती सखियोंके साथ देवस्थान गयी और वहाँ

३४१

उसने योगी वेश धारी सोरठो देखा । सोरठकी नजर बचानेके लिए उसने अपने गलेकी रत्नमाला तोड़ दी । सब रत्न गिरपर पड़े । सभी सखियाँ रत्न बटोरनेम लग गयीं और दोनों प्रेमी प्रेमिका एक टक एक दूसरेको निहारते रहे । जब सखियोंने रत्न उठाकर सिरोकर उसे दिया तो उन लेकर चन्द्राणी वहाँसे हट आयी और देवीकी पूजा कर घर गयी । शारन अब चन्द्राणीसे मिलनेका पूरा निश्चय कर लिया और चन्द्राणीक सुलभ महल तक पहुँचनेका उपाय सोचकर एक कमन्द बनवायी रातमें वह महलक पीठ आ पहुँचा । भार पहरेदारोंकी निगाह बचाकर उसने चन्द्राणीक महल पर कमन्द फेका । सखियाने तत्काल कमन्द उखाड़ दी । लेकिन सोर हताश नहीं हुआ । उसने पुनः कमन्द फेकी और कमन्द छतसे आकर अटक गयी । सखियोंने उसे फिर उखाड़ दिया । सोरन देवगणोंकी प्राथना करके तीसरी बार कमन्द फेकी और इस बार उसका नुकीला अंश छतमें जाकर पूरी तरहसे बैठ गया । यह देखकर कि सोरका पौरुष काम कर गया चन्द्राणीकी सखियोंने उसे हरानेकी दूसरी तरकीब सोची। उन्होंने एक ही तरहकी चार सेजें विछायीं । तीन सखियोंने चन्द्राणीके वस्त्र पहन लिये और पञ्चाङ्गोंको मोड़कर चारों चार शय्या पर सो गयीं । सोर जब ऊपर पहुँचा तो उसने वहाँ एक ही तरहकी शय्या पर एक ही तरह की वेशभूषामें चार युवतियोंको सोता पाया । वह सोचमें पड़ गया कि चन्द्राणीको कैसे पहचाना जाय । वह चारों सेजोंका ध्यानपूर्वक निरीक्षण करने लगा । उसने देखा कि कुमारोकी दीप्याके अधोभागका बन्धन तो पुराना है और शेषका नया । तत्काल वह चन्द्राणीकी दीप्या पहचान गया । सखियों अपना हार मानी गया देखकर उसकी परिचयामें लग गयीं । इस प्रकार सोर और चन्द्राणीका मिलन हुआ । दूसरे दिन उसी प्रकार सोर चन्द्राणीसे मिला । उस दिन चन्द्राणीने बताया कि उसका पति-सावनवीर कलसे लौटने वाला है । यदि उसे इस रहस्यका पता लग गया तो बिना मारे नहीं छोड़ेगा । चन्द्राणी यह कहकर विलाप करने लगी । सोर ने उसे धीरज बँधाया । कहा-डरने की कोई बात नहीं । सावनक आनेसे पहले ही मैं तुम्हें यहाँसे निकाल ले जाऊँगा । वह चन्द्राणीको महलसे निकाल लाया और रथ पर बैठाकर सारथी निष्कण्टके रथको बन मार्गसे ले चलनेको कहा ताकि सावनका पता न लग सके । सार और चन्द्राणीके भाग जानेका समाचार जब राजा-रानीको मिला तो वे विलाप करने लगे । सावनको जब ज्ञात हुआ कि सार उसकी पत्नीको भगा ले गया है तो वह क्रोध और अपमानसे क्षुब्ध होकर सेनाके साथ सार-चन्द्राणीकी झाड़में लगा । खोजते-खोजते उसने सार-चन्द्राणीको ढूँढ निकाला और सोरका धिक्कारते हुए उसने उस पर चोरीका दोष लगाया और युद्धके लिए ललकारा । सारने उत्तर दिया—

२४१ नपुंसक होनेके कारण तुम्हारा चन्द्रानी पर कोई अधिकार नहीं। वास्तवमें मैं उसका पति हूँ। तदनन्तर दोनोंमें घनघोर युद्ध छिड़ गया। बाबन तीखे बाणोंसे जोर पर प्रहार करने लगा और जोर उन बाणोंको काटने लगा। बाणोंकी मारसे जोरका शरीर जर्जर हो उठा फिर भी उसने गर्वसे बाबनको ललकारा कि घर आकर अपने जीवनकी रक्षा करो। इतनेमें बाबनके एक बाणकी चोटसे वह मूर्च्छित हो गया। चन्द्रानी इस युद्धको बड़ी कातरताके साथ देख रही थी। सारथी मित्रकंठने देखा कि लड़ाईमें बाबनको जीतना कठिन है तो उसने छलसे काम लेनेका निश्चय किया। चन्द्रानीके वस्त्रका एक खण्ड बाणमें बाँधकर उसने बाबन पर छोड़ा। बाबन को अपनी पत्नीकी याद आ गयी और उसने सोचा कि कदाचित वह स्वयं उस पर बाण चला रही है। उसका हाथ रुक गया। इतनेमें मित्रकंठने जोरकी मूर्च्छा दूर की। जोर उत्तेजित होकर पुनः बाबन पर टूट पड़ा। फिर दोनोंमें युद्ध छिड़ गया। जोरने ब्रह्मास्त्र साधा और बाबनको मार गिराया। गिरते-गिरते बाबनने जोरकी वीरताकी बड़ाईकी और अनुरोध किया कि वह चन्द्रानीको अपनी पत्नीके रूपमें ग्रहणकर उसके माता पिताकी सहायता करे। जोर-चन्द्रानी का रथ आगे बढ़ा। दोनों थक गये थे। उन्होंने विश्राम करने का निश्चय किया। शूरने रथ एक पेड़के नीचे रोक दिया। घूम फिरकर सरोवरके पास एक निर्मल स्थान देखा। मित्रकंठने घोड़ोंको पानी पिलाया। सब लोगोंने भोजन किया। पश्चात् जोरके सीने पर सिर रखकर चन्द्रानी सो गयी। जोर भी झपकियाँ लेने लगा। दैव दुर्विपाकसे एक सांपने आकर चन्द्रानी का डंश किया। चन्द्रानी केवल यही कह सकी—अरे शूर, तू क्या कर रहा है! देख नाग मुझे मारे डाल रहा है। विष तेजीसे चढ़ने लगा। मित्रकंठ ओर शूर घबरा उठे। मित्रकंठने कहा— आप यहीं रहें मैं औषधि लेने जाता हूँ। मित्रकंठके जाते ही चन्द्रानी निस्पन्द हो गयी। अपनी प्रेमिकाकी यह अवस्था देख शूर विलाप करने लगा। वह बार बार उसके रूप और गुणोंकी चर्चा करता। उसे पानेके लिए उसने जो जो प्रयत्न किये थे, उन सबका वह बखान करने लगा। मित्रकंठको वनमें औषधि नहीं मिली। उसने सोचा चन्द्रानी अब तक मर गयी होगी। उसके मरते ही शूर का प्राण जाना निश्चित है। बिना जोरके मेरा भी जीना किसी तरह सम्भव नहीं है। यह सोचकर मित्रकंठ पानीमें कूद पड़ा। उसी समय एक योगी आया। उसने मित्रकंठ को पानीसे निकाला और आत्म हत्या करनेका कारण पूछा। उसने सब कहानी कह सुनायी। योगी उसे लेकर शूर और चन्द्रानी के पास पहुँचा। चन्द्रानी मर चुकी थी। शूर उस तपस्वीकी औषधि बेकार समझकर स्वयं भी मरनेको तैयार हुआ। मित्रकंठने शूरका धीरज देते हुए तपस्वीकी पूजा करनेका अनुरोध किया और बताया कि मरे हुए एक राज-पुत्रका मुनिके मंत्रसे जीवनदान मिल चुका है।

१४४ यह सुन कर लोरने उस योगीकी पूजाकी और उससे चन्द्रालीके प्राणदानके बदले अपना सर्वस्व देनेका वादा किया। योगीने कहा—मुझे धन दौलत का लोभ नहीं। प्राणों की बात हो बारह बरस तक तुम दोनों मेरी पास रहकर सेवा करना। लोरने तपस्वीकी बात मान ली। योगीने तत्काल नागका आह्वान किया जो स्वयं वहाँ उपस्थित हो गया। उस नागकी महिम्यासे चन्द्राली जीवित हो उठी और उसे पुनः अपना रूप मिल गया। चन्द्रालीके जीवित होते ही योगी अन्तर्ध्यान हो गये। इसी बीचमें गोहारीके राज्य महराका पता चला कि बावनबीर मारा गया। उसे यह भी पता चला कि मरते समय बावनने उन दोनोंको पति पत्नी रूपमें देखनेकी इच्छा प्रकटकी है। राजाने अपनी सेना सुसज्जितकी और वनमें पहुँचा। सेनाको देखकर लोरने मित्रकूटसे पूछा कि किसकी सेना है। जब उसने बताया कि शायद गोहारी राजा अपने भागनेका बदला लेने आया है तो लोर युद्धके लिए तैयार हो गया। मित्रकूटने कहा—ऋषि प्रभावसे विजय निश्चित है। आपकी बात तो अलग मैं सब शत्रुओंको परास्त करनेकी हिम्मत रखता हूँ। यह कहकर मित्रकूटने रथ चलाया ही था कि एक बूढ़ा ब्राह्मण लोरके पास आया और आकर बोला—गोहारीके राजाने मुझे आपके पास भेजा है और कहलाया है कि आप वापस चलकर सबकी रक्षा करें। लोरन चन्द्रालीके अनुरोधपर उसकी बात मान ली। इस तरहसे लोर पुनः गोहारी देश लौटकर राजाके मरनेके बाद वहाँका राजपाट चलाने लगा। ✕ ✕ ✕ इधर मैना अपने पतिके विरहमें सन्तप्त हो रही थी। वह धर्म कर्म और पूजा में रत रहती। उसके सतीत्वकी प्रशंसा सुनकर नरेन्द्र राजाके पुत्र छावनकुमार अधार्मिक उद्देश्यसे बनियेके वेशमें आया। अपनी कार्य सिद्धिके लिए उसने रत्ना मालिनसे सहायता मांगी। मालिन धनके लोभमें यह कार्य करनेको तैयार हो गयी। वह मालिन मैनाके पास पहुँची और बोली—मैं तुम्हारी बचपनकी धाय हूँ। मैनाने उसकी बातपर विश्वासकर उसकी आवभगतकी और उसे अपने पास रख लिया। वहाँ रहकर वह मालिन मैनाको बहकानेके लिए तरह तरहकी कथाएँ कहती और उसे विरहावस्था त्यागकर किसी प्रेमीको अपनानेको प्रेरित करती। पर मैना अपने पति प्रेममें रत थी। वह अपने सतसे टलनेको तैयार न हुई। इसी प्रसंगमें बारहमासा आता है। मालिन अनुरोधका यत्न करके छलके पथसे उसे भ्रष्ट करना चाहा किन्तु मैना अपने पथसे विचलित नहीं हुई। इस प्रसंगके समाप्त होते ही दौलत काजी कृत रचना समाप्त हो जाती है। बादकी कथा आलाओलने इस प्रकार समाप्त की है— मैनापर अपना प्रभाव न पड़ते देख मालिन सम्भवतः हताश होने लगी। जब मालका बयान समाप्त होते होत मैना बुढ़ीको पहचान जाती है और उसका मुँह काला कराकर गधेपर चढ़ाकर निकाल बाहर कराती है—

३८५ पश्चात् मैनाकी विरह-व्यथा अत्यंत दुस्सह हो उठती है । उसे धैर्य देनेके लिए उसकी सखी एक लम्बी कहानी कहती है। कहानी सुनकर मैनाको धैर्य मिलता है। इस प्रकार बारह बरस बीत गये। तब मैनाने लोरके पास एक वृद्ध ब्राह्मण को भेजा। ब्राह्मण अपने साथ एक पक्षी रखकर लोर के पास गया। राजसभामें उस पक्षीने लोरक सम्मुख मैनाकी विरह वेदना व्यक्त की। पश्चात् लोर विह्वल हो गया और मैनाके पास जानेकी तैयारी की और चन्द्रानीको साथ लेकर वह मैनाके पास आ गया। दोनों रानियोंके साथ-सुखभोग करता हुआ आयुपूर्ण होनेपर लोरकी मृत्यु हुई । दोनो पत्नियां उसके साथ सती हो गयीं ।

२ साधन कृत मैना-सत साधन कृत मैना-सतकी रचना कब हुई इस सम्बन्धमें अभी कुछ निश्चित नहीं कहा जा सकता; पर इतना तो निश्चित है कि वह सोलहवीं शताब्दीके मध्यसे पूर्व की रचना है। यह रचना आज दो रूपोंमें उपलब्ध है। १-चतुर्भुजदास निगम कृत मधु-मालतीके कुछ पाठोंमें यह रचना स्वतन्त्र स्वरूप अन्तर्भुक्त है। इस रूपमें प्राप्त मैना-सत की सूचना माताप्रसाद गुप्तने १९५४ में अवन्तिका में दी थी। पश्चात् मधु-मालतीके दो प्रतियोंके आधारपर हरिहर निवास द्विवेदीने १९५८ में मैना-सतका एक संस्करण प्रकाशित किया है। इसके अनुसार कथा इस प्रकार है- परनापुरीके अनूपरि जातिके महाजनोंमें नाहन (नौरन) नामके एक महाजन थे। मैना उनकी रूपवती पत्नी थी। एक समय वहाँके महाजनोंने व्यापारके निमित्त परदीप जानेका निश्चय किया उनके साथ नाहन (नौरन) भी जानेको उद्यत हुआ। उसकी पत्नी मैनाने रोकनेकी चेष्टा की। नाहन (नौरन) उसे समझा बुझाकर यह आश्वासन देकर कि वह एक वर्षमें लौट आयेगा परदीप चला गया। पतिकी अनुपस्थितिमें मैना सब आमोद प्रमोद त्यागकर उदास रहने लगी। गंगापार पुरवर देशपर किसी राजाका साठिन नामक लम्पट पुत्र था। उसने एक दिन आखेट के लिए जाते समय मैनाको अपनी अट्टालिकापर बैठे देख लिया और उसपर आसक्त हो गया। उसे प्राप्त करनेके निमित्त उसने अपने मित्रसे परामर्श किया और उसके परामर्शसे रतना नामक मालिनको बुलाकर मैनाको पथभ्रष्ट करनेको कहा। मालिनने इस कार्यको पूरा करनेका बीड़ा उठाया। मालिन सारी तैयारी करके मैनाके महलमें पहुँची। उसने मैनाको अनेक उप- हार भेंट किये और कहा कि मैं तुम्हारी बचपनकी धाय हूँ। तुम्हें सिने खूब सिखाया है। तुम्हारी ममतासे आकृष्ट होकर तुम्हारे पास आयी हूँ। मैनाने उसकी बातपर विश्वास कर लिया और उसका आदर सत्कार किया। इस प्रकार विश्वास जमानेके पश्चात् मालिनने मैनासे मलिन वेशमें रहनेका कारण पूछा। मैनाने उस अपने मलिन रहनेका कारण पतिका विदेश गमन बताया जो कपटी मालिनने उसमें सहानुभूति प्रकट की और आँसू बहाये। फिर सहानुभूतिके भारमें वह प्रतिरात उस मालकी लावण्य वणन कर मैनाको उसके शृंगारका स्मरण दिलाने और उस सर्व वय विचलित करनेकी चेष्टा करने लगी।

मैना उसकी बातोंका निरन्तर प्रतिकार करती और पर-पुरुषपर दृष्टिपात न करनेका निश्चय दृढ़तासे प्रकट करती रही। इस प्रकार बारह महीने बीत गये। तब दूतीने आकर मैनाको उसके पतिके लौट आनेकी सूचना दी। थोड़े दिनों पश्चात् जब मैनाका पति घर आ गया तब उसने शृंगार किया और अपने पतिके साथ आनन्द- विहार करने लगी। इस बीच मैनाको कुटनी मालिनकी याद आयी और उसने उसका सिर मुंडाकर कालापीला मुखकर गधेपर चढ़ा कर नगरमें घुमाया। पश्चात् उसे नदी पार निकाल बाहर किया। २—साधन कृत मैना-सतकी कुछ ऐसी प्रतियाँ उपलब्ध हैं जिनका अन्य किसी कथासे सम्बन्ध नहीं है। स्वतन्त्र रचनाके रूपमें प्राप्त प्रतियाँ फारसी और नागरी दोनों लिपियों में पायी जाती हैं। इन प्रतियों में जो कथा है उसमें मधु-मालतीमें समाहित कथांक समान आरम्भ नहीं है। उक्त कथाका आरम्भ साठन कुँबर नामक नागरिक धूर्त द्वारा पतिव्रता मैनाको वशमें करनेके लिए रतना मालिनको भेजनेके प्रसंगसे होता है। आगेका वर्णन लगभग दोनों रूपोंमें समान है। अर्थात् साठन कुँवर द्वारा भेजे जानेपर रतना मालिनने मैनाके पास जाकर अपना परिचय मायके रूपमें दिया और मैनाने उसका आदर सत्कार किया। पश्चात् मालिन ने उसके मलिन वेशके प्रति सहानुभूति प्रकट करते हुए प्रति मास कामोद्दीपक स्थितिका वर्णन करते हुए परपुरुषके साथ सम्पर्क स्थापित करनेके लिए उकसाना आरम्भ किया। मैना उसकी बातोंका निरन्तर प्रतिकार करती रही। बारह महीने पश्चात् मैनाने उसकी बातोंसे चिढ़कर उसका सिर मुँडाकर उसका मुख काला पीला कराकर गधे पर बैठाकर निकाल बाहर किया। इस प्रकार इसमें मधु-मालतीमें समाहित अन्त वाला अंश भी नहीं है। मैना-सतक कृत रूपमें मैना मालिनके वार्तालाप-प्रसंगसे ज्ञात होता है कि वह मैनाके पतिका नाम लोरक है। उसे महरी चाँदा नामक बेटी भगा ले गयी है अथवा उनके साथ भाग गया है। सौतके साथ पतिके भाग जानेपर मैना अनुभव करती है कि उसके साथ अन्याय किया गया है। फिर भी उसे इसका मलाल नहीं है। अपनी सौतकी चेरी बनकर रहनेको तैयार है। मैना-सतका जो स्वतन्त्र रूप है उसी तरहकी एक रचना फारसीमें भी पायी जाती है उसे हुमीरी नामक सूफी कविने 'इसमतनामा' शीर्षकसे १०१८ (१६०८ ई०) में जहाँगीरके शासनकालमें प्रस्तुत किया था। उसमें कथा इस प्रकार है—

१ एक सचित्र प्रति मनेर शरीफ (पटना) के पुस्तकालय में है। उसे सैयद हसन असकरीने 'माआसिर' (पटना) के अंक १९ और २० में प्रकाशित किया है। एक दूसरी प्रति के चार पृष्ठ प्रिंस आफ वेल्स म्यूजियम बम्बई और एक पृष्ठ राष्ट्रीय संग्रहालय नई दिल्ली में है। दो प्रतियों को अगरचन्द नाहटाने हिन्दी त्रैमासिक नागरीपत्रिका (अंक १९५) में और एक प्रति को रूपनारायणने ओरिएन्टल कॉलेज पत्रिका लाहौरमें प्रकाशित किया है। एक अन्य सचित्र प्रति भी मिली है जो नागरी प्रचारिणी सभा, काशी में है। २ दृष्टव्य एक दुर्लभ प्रति मौलाना आजाद विश्वविद्यालय के पुस्तकालय में है।

१४८ हिन्दुस्तानके एक राजाके एक लड़की थी जिसका नाम मैना था । वह अत्यन्त रूपवती थी साथ ही पतिव्रता भी थी । उसका विवाह राज्यने लोरक नामक एक सुन्दर युवकसे कर दिया था । उससे मैनाका अत्यन्त घनिष्ट प्रेम था । लेकिन लोरकने राज- कुमारी मैनाको छोड़कर चाँद नामक एक अन्य सुन्दरीसे सम्बन्ध स्थापित कर लिया और मैनाको त्यागकर चाँदाके साथ किसी अन्य नगरको चला गया ! मैना पतिके वियोगमें व्यथित रहने लगी । इसी बीच मैनाके सौन्दर्यकी प्रशंसा सुनकर साधन नामक एक आचारभ्रष्ट आशिक मिजाज नौजवान मैनापर मुग्ध हो गया और रात दिन राजकुमारीके महलका चक्कर लगाने लगा । एक दिन अकस्मात् उसने मैनाको अपनी अट्टालिकापर खड़ा देख लिया । उसके सौन्दर्यको देखते ही वह मूर्च्छित हो गया । साधनने मैनाको प्राप्त करनेको एक बुढ़िया कुट्टनीको नियुक्त किया । वह धूर्त बुढ़िया एक दिन फूलोंका गुलदस्ता लेकर मैनाके पास पहुँची और मैनाके मनमें यह विश्वास पैदा कर दिया कि वह उसकी धाय है और उसने शैशवावस्थामें उसे दूध पिलाया था । जब उस धूताने देखा कि मैना उसके झांसेमें फँस गयी है तो उसने अपना काम आरम्भ किया । उसने मैनासे उसके दुःख दर्दका हाल-चाल पूछा । मैनाने उसे लोरकके प्रति अपनी विरहव्यथा कह सुनायी । यह सुनकर कुट्टनीने इस बातको लोरककी बेवफाई और गद्दारी बताकर मैनाको उसकी ओरसे विरक्त करनेकी चेष्टा की और सलाह दी कि वह किसी अन्य व्यक्तिसे प्रेम कर यौवनका आनन्द उठाये । यह भी कहा कि साधन तुम्हारा प्रेमी है वह तुम्हारी प्रेमाग्निमें जल रहा है । यदि लोरक चाँदाके साथ यौवनका आनन्द उठा रहा है तो तुम भी साधनको अपनाओ । किन्तु मैनाने लोरकके प्रेमको भुलाने और साधनसे प्रेम करनेकी सलाहको ठुकरा दिया । कुट्टनीने अपनी चेष्टा जारी रखी और एक साल तक प्रयत्न करती रही । प्रति मास चतुरी विशेषताओंको व्यक्त कर मैनाको कामोत्तेजित करनेकी चेष्टा करती और चाहती मैना साधनकी इच्छा पूरा करे । किन्तु मैना कुट्टनीकी बातोंमें नहीं आयी और एक साल बीत गया । इसी बीच अकस्मात लोरककी प्रेयसी चाँदाकी मृत्यु हो गयी और वह मैनाके पास पुनः वापस आ गया । दोनोंका फिर मिलन हुआ । इसीलीने अन्तमें अपनी इस कथाको ईश्वरीय प्रेम सम्बन्धी प्रतीक कहा है । उसके अनुसार लोरक ईश्वरका प्रतीक है जिससे प्रेम करना चाहिए; मैना मानवीय आत्मा है जो ईश्वरकी प्रेमी है साधन शैतान है जो ईश्वरके प्रेमसे आत्माको विरत कर देना चाहता है कुट्टनी मानवीय वासनाओंकी प्रतीक है जो इन्द्रओंकी ओर आकृष्ट करके शैतानके काम में सहायक होती है ।

गवासीकृत मैना-सतवन्ती

गवासी दक्खिनी हिन्दीके एक सुप्रसिद्ध कवि हैं। ये मुहम्मद कुतुबशाहके शासनकाल (१६११–१६२६ ई०) में गोलकुण्डा आये और वहाँ उन्हें राजाश्रय प्राप्त हुआ। अब्दुल्ला कुतुबशाह (१६२६–१६७२ ई०) के गद्दीपर बैठनेपर वे राजकवि घोषित किये गये। राजनयिक रूपमें गवासी शासक और उसके दरबारियोंके बीच लोकप्रिय तो थे ही साथ ही समय-समयपर जटिल समस्याओंके सुलझानेमें भी शासकको सलाह दिया करते थे। वे गोलकुण्डके राजदूतके रूपमें बीजापुर भेजे गये और अपने उस पदको उन्होंने योग्यतासे निभाया।

गवासीने गज़ल और मरसियोंके अतिरिक्त कुछ कथात्मक काव्य भी लिखे हैं, जिनमें मैना-सतवन्ती नामक मसनवी भी है। अभी तक यह प्रकाशित है। इसकी अनेक हस्तलिखित प्रतियाँ विभिन्न पुस्तकालयोंमें उपलब्ध हैं।¹ हैदराबादके आसफ़िया पुस्तकालयकी एक प्रतिसे इस कथा-काव्यके कुछ अंश श्रीराम शर्माने दक्खिनीका पद्य और गद्यमें उद्धृत किया है। उनके द्वारा प्रस्तुत कथाके अधूरे रूपको ही हिन्दीके आलोचकोंने लोरक चन्दाकी प्रेम-कथाका दक्खिनी रूप मानकर अनेक प्रकारकी कल्पनाएँ प्रस्तुत की हैं। वस्तुतः यह कथा लोरक-चन्दाकी प्रेम कथापर आधारित न होकर साधन कृत मैना-सत अथवा हमीदीकृत अस्मतनामाका ही एक स्वतन्त्र रूप है। कविने उस कथाको अपने ढंगपर इस प्रकार उपस्थित किया है—

किसी नगरमें बालाकूबर नामक राजा था। उसकी एक अत्यन्त रूपवती पुत्री थी जिसका नाम चोदा था। उसी राज्यमें लोरक नामक एक ग्वाला रहता था।

  • लोरकके सम्बन्धमें इस काव्यके कुछ प्रतियोंमें कहा गया है कि वह किसी धनीका बेटा था और उसका विवाह मैना नामक राजकुमारीसे हुआ था और दोनोंमें परस्पर प्रगाढ़ प्रेम था। दैवदुर्विपाकसे वे निर्धन हो गये। निदान लोरक अपना नगर छोड़कर दूसरे नगरमें जाकर पशु चरानेका काम करने लगा।

एक दिन जब लोरक गाय चराकर वापस आ रहा था तो चोदाकी दृष्टि उसपर पड़ी। उस रूपवान्पर चोदा उसपर आसक्त हो गयी। उसने उसे अपने निकट


¹ आसफ़िया पुस्तकालय (हैदराबाद) में तीन, सालारजंग पुस्तकालय (हैदराबाद) में तीन, इण्डिया आफिस पुस्तकालय (लन्दन) में दो और एशियाटिक सोसाइटी (कलकत्ता) के पुस्तकालयमें इसकी एक प्रति है। बम्बई विश्वविद्यालय के पुस्तकालयमें भी सम्भवतः इसकी एक प्रति है।

१६ बुलाया और उसपर अपना प्रेम प्रकट किया और अपने साथ किसी दूसरे देश भाग चलनेको कहा। लोरकने अपनी पत्नीके पतिव्रत और सौंदर्यकी चर्चा करते हुए उसे छोड़कर चलनेमें अपनी असमर्थता प्रकट की। उसने राजकुमारी-वैभव और अपनी दरिद्रता की तुलना करके अपनेको सर्वथा अयोग्य सिद्ध करनेकी भी चेष्टा की। पर चाँदा न मानी। उसने नाना प्रकारकी बातें करके लोरकको अपने साथ भाग चलनेको राजी कर ही लिया। तदनुसार दोनों प्रेमी नगर छोड़कर भाग गये। राजाने जब यह समाचार सुना तो वह बहुत हँसा। उसने एक दिन मैनाको अपनी अट्टालिकापर खड़ा देखा था। तभीसे वह उसके प्रति आसक्त हो रहा था। उसने सोचा कि अच्छा हुआ कि लोरक भाग गया अब मैनाको प्राप्त करनेका अच्छा अवसर है। फलतः एक चतुर कुटनीको बुला भेजा और मैनाको छह मासके भीतर वशमें करके अपने सामने उपस्थित करनेको कहा। कुटनीने इस कामको करना प्रसन्नतापूर्वक स्वीकार किया। तदनन्तर वह कुटनी रोती हुई मैनाके पास पहुँची और बोली—मैने तुझे बचपनमें दो बरस तक दूध पिलाया था। अब मेरे कोई नहीं रहा। इसलिए तुम्हारे पास आयी हूँ। मैनाने यह सुनकर उसके पाँव छुए और कहा—मेरा जो प्राण प्यारा पति था वह छोड़कर चला गया। नाते रिश्तेके लोग भी नहीं हैं मैं भी अकेली हूँ। अच्छा हुआ जो तुम आ गयीं। कुटनी यह सुनते ही कि लोरक मैनाको छोड़कर भाग गया है फूट-फूटकर रोने और लोरकको कोसने लगी। मैनासे कुटनीका कोसना सुना न गया। बोली—उन्हें बुरा भला मत कहो। वे मेरे साजन हैं। कुटनीने कहा—तू अभी पन्द्रह बरस की है। तू बड़ी नादान है। अभी तो तेरे खाने पीने और आनन्द करनेके दिन हैं। लोरक ठहरा मूर्ख गँवार। वह हीरा क्या परखना जाने। तू घबरा मत। मैं तेरे लिए दूसरा रूपवन्त लाऊँगी। यह सुनते ही मैनाके तनमें आग लग गयी। कुटनीसे बोली—तू तो बदनामी कराने वाली बात कर रही है। स्त्रीको अपना सत बनाये रखना चाहिये। इच्छाओं और वासनाओंको दबाना अपने हाथमें है। कुटनी बोली—मैने तुझे दूध पिलाया था। अगर तेरे माँ-बाप होते तो आज वे मेरी कद्र करते। दुनियामे बूढ़ोंकी अक्लसे काम लेना चाहिए न कि उनपर गुस्सा करना चाहिए। सिकन्दर जब यात्रापर निकला था तो वह अपने साथ बूढ़ोंको ले गया था। उसने उन्हींकी अक्लसे संसार जीता। मुझे क्या करना है। तेरा पति अगर चाँदाको लेकर आया तो तेरे सर सौत आ बैठेगी। वह तुझे दासी बनावेगी और दिन रात लड़ाई करेगी। फिर कुटनीने दृष्टान्त देते हुए कहा—किसी नगरमें एक विद्यार्थी था। उसके

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दो स्त्रियों थीं। एक स्त्री नीचे रहती थी और दूसरी कोठेपर रहती थी। एक दिन रातम जब सिपाही घरपर नहीं था, एक चोर घरमें घुसा। उसने जैसे ही सीढ़ीपर पैर रखा, आवाज हुई। दोनों स्त्रियोंने सुना, समझा उनका पति सौतके पास आ रहा है। दोनों निकल आयीं। अँधेरेमें उन्होंने चोरको ही पति समझ लिया। वस्तुतः ऊपर वालीने उसके सरके बाल पकड़ लिये और ऊपर खींचने लगी। नीचेवालीने चोरको ऊपर जाते देखा। वह उसका पैर पकड़ कर अपनी ओर खींचने लगी। इसी तरह खींचातानी हो ही रही थी कि सिपाही घर लौटा। उसने चोरको देखा और पकड़ लिया और बादशाहके सामने ले गया। वहाँपर चोरने बताया कि किस तरह दो औरतोंने अपना पति समझकर उसकी मरम्मत की है। सौत बहुत बुरी चीज है। यह एक म्यानमें दो तलवारकी तरह है। मैनाने कहा—माँ-बापका जो सुख मिलना चाहिए था, वह तो मुझे मिला ही नहीं। ससुरालमें भी और नदी को सुख दे। किस्मतम जो लिखा है वही होगा। अगर सूरज-चाँद भी मेरे सामने आयें तो वह लोरकके सामने तुच्छ हैं। तू सौतका डर दिखाती है। अगर सौत आये तो क्या हुई। चाँदा आकर भले ही कलह करे। मैं तो बाहर उसकी बड़ाई ही करूँगी। इस प्रकार मैना और दूतीमें निरन्तर विवाद चलता रहा। दूती मैनाको विच- लित करनेकी चेष्टा करती और मैना सतीत्वमे दृढ़ निष्ठा प्रकट करती। दोनों अपनी अपनी बात दृष्टान्त दे देकर कहतीं। इस प्रकार छ मास बीत गये और दूती मैना को डिगा न सकी। निदान हार मानकर वह राजाके पास लौट गयी और अपनी असमर्थता प्रकट की। राजाने उससे कहा कि तू एक बार फिर चल कर चेष्टा कर। आज आधी रातको स्वयं दूतीके साथ मैनाके घर पहुँचा और एक कोनेमें छिप रहा। दूती मैनाके पास फिर पहुँची और बोली—तेरी ममताके कारण ही मैं फिर लौट आयी हूँ। आज वह फिर उससे तरह तरहकी प्रलोभन भरी बात करने लगी। पर वह मैनाको डिगा न सकी। राजाने जब देखा कि मैनाका सतीत्व अडिग है तो वह बाहर निकल आया और बोला—तू मेरी माँ है मैं तेरा बेटा हूँ। पश्चात् उसने लोरकको बुला भेजा। चाँदाने जब सुना तो वह बहुत प्रसन्न हुई और दोनों वापस लौट आये। राजाने चाँदाका लोरकके साथ विवाह कर दिया। मैना यह देखकर बहुत प्रसन्न हुई और तीनों सुखपूर्वक रहने लगे। राजाने कुटनीका सिर मुंडाकर नगरसे निकाल बाहर किया।