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चन्दायन (मुल्ला दाऊद - प्राचीनतम अवधी सूफी-प्रेमाख्यान सटीक)

चन्दायन (मुल्ला दाऊद - प्राचीनतम अवधी सूफी-प्रेमाख्यान सटीक)

Chandayan of Mulla Daud with Hindi Commentary

मुल्ला दाऊद (१३७९ ई.) / डॉ. परमेश्वरीलाल गुप्त द्वारा

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१४१ लोग राजसभामे एकत्र हुए तो लोर भी वहाँ गया। चन्द्रातीने झरोखेसे लोरको देखा। लोर पर दृष्टि पड़ते ही वह अचेत हो गयी और उसकी सखियाँ घबरा उठीं। सभा भंग हो गयी और उपस्थित लोग अपने अपने निवास स्थानको चले गये। लोरको चन्द्रातीका दर्शन न हो सका और वह उसके वियोगमें व्याकुल हो उठा। इधर चन्द्रातीने जबसे लोरको देखा तबसे उसने सखियों से मिलना जुलना बंद कर दिया। वस्त्राभूषण त्याग दिये। दिन-दिन उसका शरीर क्षीण होने लगा। सखियोंको कुमारीकी इस दशाका कारण ज्ञात न हो सका। जब चन्द्रातीकी धायसे यह सब न देखा जा सका तो एक दिन उसने उसकी वेदनाका कारण पूछा। उसने यह भी आश्वासन दिया कि यदि वह कारण बता दे तो चाहे जिस तरह हो उसे दूर करेगी। बहुत कहने सुनने पर चन्द्रातीने अपने मनकी व्यथाका कारण प्रकट की और अपने प्रेमीसे मिला देनेकी प्रार्थनाकी। यह सुनकर धायने कहा—यह तो सहज बात है। तुम अपने पितासे राजाओंको पुनः निमंत्रित करनेका अनुरोध करो। तदनुसार चन्द्रातीने अपने पितासे अनुरोध किया और उसने सब राजाओको निमन्त्रित किया। सब राजालोग एकत्र हुए। पानफूलसे उनका सत्कार किया गया। धायने इस बीच सभामें एक दर्पण भिजवा दिया। दर्पण इतना आकर्षक था कि उसे देखनेके लिए सभामें एकत्र लोग उसके निकट आने लगे। जैसे ही लोर उस दर्पणके पास आया, धायने सरकाके चन्द्राती को द्वारपर खड़ा कर दिया और उसका प्रतिबिम्ब दर्पणमें जा पड़ा। चन्द्रातीके प्रतिबिम्बको देखते ही लोर मूच्छित हो गया। लोग उसे उठाकर उसके शिबिरमें ले गये पर ये मूर्छित होनेके कारण न जान सके। होश आनेपर लोर विरह वेदनासे व्यग्र हो उठा। उधर चन्द्रातीकी भी अवस्था बिगड़ने लगी। धायने उससे धैर्य रखनेको कहा और लोरके शिबिरमें गयी। द्वारपालने लोरको सूचना दी कि एक वृद्धा मिलने आयी है। लोरने उसे बुलाया। आनेपर उसने वृद्धासे उसका पता ठिकाना पूछा। वृद्धाने अपना नाम मन्दोदरी बताया और व्यवसाय वैद्यक। यह सुनकर लोरने कहा—तुम मेरी चिकित्सा नहीं कर सकती। तब बातचीतमें धायने चन्द्रातीका नाम लिया और उठकर जाने लगी। लोरने उसे तत्काल रोका और अपने मनकी व्यथा कह सुनायी। उसे सुनकर धायने कहा—तुम्हें तो प्रेम-रोग है। उसकी औषधि मेरे पास नहीं है। उसकी औषधि तो एकमात्र प्राण प्यारी का मिलन ही है। चन्द्रातीका पति बावनवीर बड़ा ही सर्वेश्वर आदमी है। सुनेगा तो मार डालेगा। लोरके बहुत अनुनय विनय करनेपर धायने कहा—अच्छा तुम योगेश्वर रूप धारण कर देवरूपान चलो। वहीं तुम्हारी प्रेयसीसे तुम्हारी भेंट होगी। यह कहकर धाय चन्द्रातीके पास लौट आयी और चन्द्रातीसे अवसर देखकर देवस्थान जानेका कहा। एक दिवस आनेपर चन्द्राती सखियोंके साथ देवस्थान गयी और वहाँ