चन्दायन (मुल्ला दाऊद - प्राचीनतम अवधी सूफी-प्रेमाख्यान सटीक)
Chandayan of Mulla Daud with Hindi Commentary
मुल्ला दाऊद (१३७९ ई.) / डॉ. परमेश्वरीलाल गुप्त द्वारा
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गवासीकृत मैना-सतवन्ती
गवासी दक्खिनी हिन्दीके एक सुप्रसिद्ध कवि हैं। ये मुहम्मद कुतुबशाहके शासनकाल (१६११–१६२६ ई०) में गोलकुण्डा आये और वहाँ उन्हें राजाश्रय प्राप्त हुआ। अब्दुल्ला कुतुबशाह (१६२६–१६७२ ई०) के गद्दीपर बैठनेपर वे राजकवि घोषित किये गये। राजनयिक रूपमें गवासी शासक और उसके दरबारियोंके बीच लोकप्रिय तो थे ही साथ ही समय-समयपर जटिल समस्याओंके सुलझानेमें भी शासकको सलाह दिया करते थे। वे गोलकुण्डके राजदूतके रूपमें बीजापुर भेजे गये और अपने उस पदको उन्होंने योग्यतासे निभाया।
गवासीने गज़ल और मरसियोंके अतिरिक्त कुछ कथात्मक काव्य भी लिखे हैं, जिनमें मैना-सतवन्ती नामक मसनवी भी है। अभी तक यह प्रकाशित है। इसकी अनेक हस्तलिखित प्रतियाँ विभिन्न पुस्तकालयोंमें उपलब्ध हैं।¹ हैदराबादके आसफ़िया पुस्तकालयकी एक प्रतिसे इस कथा-काव्यके कुछ अंश श्रीराम शर्माने दक्खिनीका पद्य और गद्यमें उद्धृत किया है। उनके द्वारा प्रस्तुत कथाके अधूरे रूपको ही हिन्दीके आलोचकोंने लोरक चन्दाकी प्रेम-कथाका दक्खिनी रूप मानकर अनेक प्रकारकी कल्पनाएँ प्रस्तुत की हैं। वस्तुतः यह कथा लोरक-चन्दाकी प्रेम कथापर आधारित न होकर साधन कृत मैना-सत अथवा हमीदीकृत अस्मतनामाका ही एक स्वतन्त्र रूप है। कविने उस कथाको अपने ढंगपर इस प्रकार उपस्थित किया है—
किसी नगरमें बालाकूबर नामक राजा था। उसकी एक अत्यन्त रूपवती पुत्री थी जिसका नाम चोदा था। उसी राज्यमें लोरक नामक एक ग्वाला रहता था।
- लोरकके सम्बन्धमें इस काव्यके कुछ प्रतियोंमें कहा गया है कि वह किसी धनीका बेटा था और उसका विवाह मैना नामक राजकुमारीसे हुआ था और दोनोंमें परस्पर प्रगाढ़ प्रेम था। दैवदुर्विपाकसे वे निर्धन हो गये। निदान लोरक अपना नगर छोड़कर दूसरे नगरमें जाकर पशु चरानेका काम करने लगा।
एक दिन जब लोरक गाय चराकर वापस आ रहा था तो चोदाकी दृष्टि उसपर पड़ी। उस रूपवान्पर चोदा उसपर आसक्त हो गयी। उसने उसे अपने निकट
¹ आसफ़िया पुस्तकालय (हैदराबाद) में तीन, सालारजंग पुस्तकालय (हैदराबाद) में तीन, इण्डिया आफिस पुस्तकालय (लन्दन) में दो और एशियाटिक सोसाइटी (कलकत्ता) के पुस्तकालयमें इसकी एक प्रति है। बम्बई विश्वविद्यालय के पुस्तकालयमें भी सम्भवतः इसकी एक प्रति है।