चन्दायन (मुल्ला दाऊद - प्राचीनतम अवधी सूफी-प्रेमाख्यान सटीक)
Chandayan of Mulla Daud with Hindi Commentary
मुल्ला दाऊद (१३७९ ई.) / डॉ. परमेश्वरीलाल गुप्त द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१ दौलतकाज़ी कृत सति मैना उ लोर-चन्द्रानी दौलतकाज़ी अराकान नरेश थिरि-सु थम्मा (श्री सुधर्मा) (१६२२-१६३८ ई.) की राजसभाके कवि थे। उन्होंने वहाँके प्रधानमन्त्री अशरफ खाँके आदेशपर 'सति मैना उ लोर चंद्रानी' नामक बँगला काव्यकी रचना की। इस ग्रन्थके सम्बन्धमें उन्होंने लिखा है कि इस कहानीको मूलतः साधनने ठेठ चौपाई और दोहोंमें कहा था। लेकिन प्रधानमन्त्री अशरफ खाँकी सभामें कुछ लोग ऐसे हैं जो गोहारी भाषा नहीं समझते। इसलिए अशरफ ख़ान उनसे उसे बंगला भाषा और पाञ्चाली (बंगलाका एक अत्यन्त प्रचलित और लोकप्रिय छन्द) छन्दमें कहनेका आदेश दिया। तदनुसार उन्होंने इसकी रचना आरम्भ की। पर वे उसे पूरा न कर सके। उनके मृत्युके पश्चात् श्री चन्द्र सुधर्म (१६५२-१६८४-) के शासन कालमें उनके प्रधानमन्त्री सुलेमानके आदेशसे एक दूसरे राजकवि आलाओलने उसे पूरा किया। यह काव्य पहले 'सती मैना' नामसे हमीदी प्रेस कलकत्तासे प्रकाशित हुआ था। कुछ वर्ष हुए उसे सतेन्द्र घोषालने विश्वभारती (शान्तिनिकेतन) से प्रकाशित साहित्य प्रकाशिका (खण्ड १) में 'कवि दौलतकाज़ीर सती मयना ओ लोर चन्द्रानी' शीर्षकसे सुसम्पादित रूपमें प्रकाशित किया है। इसमें लोर और चन्द्रानीकी प्रेमकथाका वर्णन इस प्रकार है :- मैनावती नामक एक राजकन्या थी, जिसका विवाह लोर नामक युवकसे हुआ था जो अत्यन्त वीर और निर्भीक था। वह अपनी पत्नी को छोड़कर नगर-नगर, वन-वन घूमने लगा। उसके साथ नगरके सभी युवक हो गये। लोर एक नगरमें चला गया वहाँ महल बनाकर केलि-कुतूहलमें घरबारोंको भूल गया। इधर लोरके वियोगमें मैना अत्यन्त दुःखी रहने लगी। वह पुरुष जातिकी कठोरताकी निन्दा करती हुई उसके विरहमें अपना समय व्यतीत करने लगी। एक समय लोर अपनी सभामें बैठा था और नाच-गान हो रहा था तभी उसे खबर मिली कि एक योगी उससे मिलने आया है और पूछने पर वह कोई जवाब नहीं देता। उसके एक हाथमें सोनेका घड़ा और दूसरे हाथमें एक चित्रपट है जिसपर एक नारीका चित्र अंकित है। उसे ही वह एकटक देखता रहता है। लोरने योगीको तत्काल सभामें आनेका आदेश दिया। योगी राजसभामें आते ही मूर्छित हो गया। जल छिड़क कर उसे होशमें लाया गया। उस अपने पास बैठाकर लोरने उससे निर्जन