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चन्दायन (मुल्ला दाऊद - प्राचीनतम अवधी सूफी-प्रेमाख्यान सटीक)

चन्दायन (मुल्ला दाऊद - प्राचीनतम अवधी सूफी-प्रेमाख्यान सटीक)

Chandayan of Mulla Daud with Hindi Commentary

मुल्ला दाऊद (१३७९ ई.) / डॉ. परमेश्वरीलाल गुप्त द्वारा

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२४१ नपुंसक होनेके कारण तुम्हारा चन्द्रानी पर कोई अधिकार नहीं। वास्तवमें मैं उसका पति हूँ। तदनन्तर दोनोंमें घनघोर युद्ध छिड़ गया। बाबन तीखे बाणोंसे जोर पर प्रहार करने लगा और जोर उन बाणोंको काटने लगा। बाणोंकी मारसे जोरका शरीर जर्जर हो उठा फिर भी उसने गर्वसे बाबनको ललकारा कि घर आकर अपने जीवनकी रक्षा करो। इतनेमें बाबनके एक बाणकी चोटसे वह मूर्च्छित हो गया। चन्द्रानी इस युद्धको बड़ी कातरताके साथ देख रही थी। सारथी मित्रकंठने देखा कि लड़ाईमें बाबनको जीतना कठिन है तो उसने छलसे काम लेनेका निश्चय किया। चन्द्रानीके वस्त्रका एक खण्ड बाणमें बाँधकर उसने बाबन पर छोड़ा। बाबन को अपनी पत्नीकी याद आ गयी और उसने सोचा कि कदाचित वह स्वयं उस पर बाण चला रही है। उसका हाथ रुक गया। इतनेमें मित्रकंठने जोरकी मूर्च्छा दूर की। जोर उत्तेजित होकर पुनः बाबन पर टूट पड़ा। फिर दोनोंमें युद्ध छिड़ गया। जोरने ब्रह्मास्त्र साधा और बाबनको मार गिराया। गिरते-गिरते बाबनने जोरकी वीरताकी बड़ाईकी और अनुरोध किया कि वह चन्द्रानीको अपनी पत्नीके रूपमें ग्रहणकर उसके माता पिताकी सहायता करे। जोर-चन्द्रानी का रथ आगे बढ़ा। दोनों थक गये थे। उन्होंने विश्राम करने का निश्चय किया। शूरने रथ एक पेड़के नीचे रोक दिया। घूम फिरकर सरोवरके पास एक निर्मल स्थान देखा। मित्रकंठने घोड़ोंको पानी पिलाया। सब लोगोंने भोजन किया। पश्चात् जोरके सीने पर सिर रखकर चन्द्रानी सो गयी। जोर भी झपकियाँ लेने लगा। दैव दुर्विपाकसे एक सांपने आकर चन्द्रानी का डंश किया। चन्द्रानी केवल यही कह सकी—अरे शूर, तू क्या कर रहा है! देख नाग मुझे मारे डाल रहा है। विष तेजीसे चढ़ने लगा। मित्रकंठ ओर शूर घबरा उठे। मित्रकंठने कहा— आप यहीं रहें मैं औषधि लेने जाता हूँ। मित्रकंठके जाते ही चन्द्रानी निस्पन्द हो गयी। अपनी प्रेमिकाकी यह अवस्था देख शूर विलाप करने लगा। वह बार बार उसके रूप और गुणोंकी चर्चा करता। उसे पानेके लिए उसने जो जो प्रयत्न किये थे, उन सबका वह बखान करने लगा। मित्रकंठको वनमें औषधि नहीं मिली। उसने सोचा चन्द्रानी अब तक मर गयी होगी। उसके मरते ही शूर का प्राण जाना निश्चित है। बिना जोरके मेरा भी जीना किसी तरह सम्भव नहीं है। यह सोचकर मित्रकंठ पानीमें कूद पड़ा। उसी समय एक योगी आया। उसने मित्रकंठ को पानीसे निकाला और आत्म हत्या करनेका कारण पूछा। उसने सब कहानी कह सुनायी। योगी उसे लेकर शूर और चन्द्रानी के पास पहुँचा। चन्द्रानी मर चुकी थी। शूर उस तपस्वीकी औषधि बेकार समझकर स्वयं भी मरनेको तैयार हुआ। मित्रकंठने शूरका धीरज देते हुए तपस्वीकी पूजा करनेका अनुरोध किया और बताया कि मरे हुए एक राज-पुत्रका मुनिके मंत्रसे जीवनदान मिल चुका है।