भारतकोश
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चन्दायन (मुल्ला दाऊद - प्राचीनतम अवधी सूफी-प्रेमाख्यान सटीक)

Chandayan of Mulla Daud with Hindi Commentary

मुल्ला दाऊद (१३७९ ई.) / डॉ. परमेश्वरीलाल गुप्त द्वारा

DevanagariAwadhipublished520 पृष्ठ

२४१ नपुंसक होनेके कारण तुम्हारा चन्द्रानी पर कोई अधिकार नहीं। वास्तवमें मैं उसका पति हूँ। तदनन्तर दोनोंमें घनघोर युद्ध छिड़ गया। बाबन तीखे बाणोंसे जोर पर प्रहार करने लगा और जोर उन बाणोंको काटने लगा। बाणोंकी मारसे जोरका शरीर जर्जर हो उठा फिर भी उसने गर्वसे बाबनको ललकारा कि घर आकर अपने जीवनकी रक्षा करो। इतनेमें बाबनके एक बाणकी चोटसे वह मूर्च्छित हो गया। चन्द्रानी इस युद्धको बड़ी कातरताके साथ देख रही थी। सारथी मित्रकंठने देखा कि लड़ाईमें बाबनको जीतना कठिन है तो उसने छलसे काम लेनेका निश्चय किया। चन्द्रानीके वस्त्रका एक खण्ड बाणमें बाँधकर उसने बाबन पर छोड़ा। बाबन को अपनी पत्नीकी याद आ गयी और उसने सोचा कि कदाचित वह स्वयं उस पर बाण चला रही है। उसका हाथ रुक गया। इतनेमें मित्रकंठने जोरकी मूर्च्छा दूर की। जोर उत्तेजित होकर पुनः बाबन पर टूट पड़ा। फिर दोनोंमें युद्ध छिड़ गया। जोरने ब्रह्मास्त्र साधा और बाबनको मार गिराया। गिरते-गिरते बाबनने जोरकी वीरताकी बड़ाईकी और अनुरोध किया कि वह चन्द्रानीको अपनी पत्नीके रूपमें ग्रहणकर उसके माता पिताकी सहायता करे। जोर-चन्द्रानी का रथ आगे बढ़ा। दोनों थक गये थे। उन्होंने विश्राम करने का निश्चय किया। शूरने रथ एक पेड़के नीचे रोक दिया। घूम फिरकर सरोवरके पास एक निर्मल स्थान देखा। मित्रकंठने घोड़ोंको पानी पिलाया। सब लोगोंने भोजन किया। पश्चात् जोरके सीने पर सिर रखकर चन्द्रानी सो गयी। जोर भी झपकियाँ लेने लगा। दैव दुर्विपाकसे एक सांपने आकर चन्द्रानी का डंश किया। चन्द्रानी केवल यही कह सकी—अरे शूर, तू क्या कर रहा है! देख नाग मुझे मारे डाल रहा है। विष तेजीसे चढ़ने लगा। मित्रकंठ ओर शूर घबरा उठे। मित्रकंठने कहा— आप यहीं रहें मैं औषधि लेने जाता हूँ। मित्रकंठके जाते ही चन्द्रानी निस्पन्द हो गयी। अपनी प्रेमिकाकी यह अवस्था देख शूर विलाप करने लगा। वह बार बार उसके रूप और गुणोंकी चर्चा करता। उसे पानेके लिए उसने जो जो प्रयत्न किये थे, उन सबका वह बखान करने लगा। मित्रकंठको वनमें औषधि नहीं मिली। उसने सोचा चन्द्रानी अब तक मर गयी होगी। उसके मरते ही शूर का प्राण जाना निश्चित है। बिना जोरके मेरा भी जीना किसी तरह सम्भव नहीं है। यह सोचकर मित्रकंठ पानीमें कूद पड़ा। उसी समय एक योगी आया। उसने मित्रकंठ को पानीसे निकाला और आत्म हत्या करनेका कारण पूछा। उसने सब कहानी कह सुनायी। योगी उसे लेकर शूर और चन्द्रानी के पास पहुँचा। चन्द्रानी मर चुकी थी। शूर उस तपस्वीकी औषधि बेकार समझकर स्वयं भी मरनेको तैयार हुआ। मित्रकंठने शूरका धीरज देते हुए तपस्वीकी पूजा करनेका अनुरोध किया और बताया कि मरे हुए एक राज-पुत्रका मुनिके मंत्रसे जीवनदान मिल चुका है।

१४४ यह सुन कर लोरने उस योगीकी पूजाकी और उससे चन्द्रालीके प्राणदानके बदले अपना सर्वस्व देनेका वादा किया। योगीने कहा—मुझे धन दौलत का लोभ नहीं। प्राणों की बात हो बारह बरस तक तुम दोनों मेरी पास रहकर सेवा करना। लोरने तपस्वीकी बात मान ली। योगीने तत्काल नागका आह्वान किया जो स्वयं वहाँ उपस्थित हो गया। उस नागकी महिम्यासे चन्द्राली जीवित हो उठी और उसे पुनः अपना रूप मिल गया। चन्द्रालीके जीवित होते ही योगी अन्तर्ध्यान हो गये। इसी बीचमें गोहारीके राज्य महराका पता चला कि बावनबीर मारा गया। उसे यह भी पता चला कि मरते समय बावनने उन दोनोंको पति पत्नी रूपमें देखनेकी इच्छा प्रकटकी है। राजाने अपनी सेना सुसज्जितकी और वनमें पहुँचा। सेनाको देखकर लोरने मित्रकूटसे पूछा कि किसकी सेना है। जब उसने बताया कि शायद गोहारी राजा अपने भागनेका बदला लेने आया है तो लोर युद्धके लिए तैयार हो गया। मित्रकूटने कहा—ऋषि प्रभावसे विजय निश्चित है। आपकी बात तो अलग मैं सब शत्रुओंको परास्त करनेकी हिम्मत रखता हूँ। यह कहकर मित्रकूटने रथ चलाया ही था कि एक बूढ़ा ब्राह्मण लोरके पास आया और आकर बोला—गोहारीके राजाने मुझे आपके पास भेजा है और कहलाया है कि आप वापस चलकर सबकी रक्षा करें। लोरन चन्द्रालीके अनुरोधपर उसकी बात मान ली। इस तरहसे लोर पुनः गोहारी देश लौटकर राजाके मरनेके बाद वहाँका राजपाट चलाने लगा। ✕ ✕ ✕ इधर मैना अपने पतिके विरहमें सन्तप्त हो रही थी। वह धर्म कर्म और पूजा में रत रहती। उसके सतीत्वकी प्रशंसा सुनकर नरेन्द्र राजाके पुत्र छावनकुमार अधार्मिक उद्देश्यसे बनियेके वेशमें आया। अपनी कार्य सिद्धिके लिए उसने रत्ना मालिनसे सहायता मांगी। मालिन धनके लोभमें यह कार्य करनेको तैयार हो गयी। वह मालिन मैनाके पास पहुँची और बोली—मैं तुम्हारी बचपनकी धाय हूँ। मैनाने उसकी बातपर विश्वासकर उसकी आवभगतकी और उसे अपने पास रख लिया। वहाँ रहकर वह मालिन मैनाको बहकानेके लिए तरह तरहकी कथाएँ कहती और उसे विरहावस्था त्यागकर किसी प्रेमीको अपनानेको प्रेरित करती। पर मैना अपने पति प्रेममें रत थी। वह अपने सतसे टलनेको तैयार न हुई। इसी प्रसंगमें बारहमासा आता है। मालिन अनुरोधका यत्न करके छलके पथसे उसे भ्रष्ट करना चाहा किन्तु मैना अपने पथसे विचलित नहीं हुई। इस प्रसंगके समाप्त होते ही दौलत काजी कृत रचना समाप्त हो जाती है। बादकी कथा आलाओलने इस प्रकार समाप्त की है— मैनापर अपना प्रभाव न पड़ते देख मालिन सम्भवतः हताश होने लगी। जब मालका बयान समाप्त होते होत मैना बुढ़ीको पहचान जाती है और उसका मुँह काला कराकर गधेपर चढ़ाकर निकाल बाहर कराती है—

३८५ पश्चात् मैनाकी विरह-व्यथा अत्यंत दुस्सह हो उठती है । उसे धैर्य देनेके लिए उसकी सखी एक लम्बी कहानी कहती है। कहानी सुनकर मैनाको धैर्य मिलता है। इस प्रकार बारह बरस बीत गये। तब मैनाने लोरके पास एक वृद्ध ब्राह्मण को भेजा। ब्राह्मण अपने साथ एक पक्षी रखकर लोर के पास गया। राजसभामें उस पक्षीने लोरक सम्मुख मैनाकी विरह वेदना व्यक्त की। पश्चात् लोर विह्वल हो गया और मैनाके पास जानेकी तैयारी की और चन्द्रानीको साथ लेकर वह मैनाके पास आ गया। दोनों रानियोंके साथ-सुखभोग करता हुआ आयुपूर्ण होनेपर लोरकी मृत्यु हुई । दोनो पत्नियां उसके साथ सती हो गयीं ।

२ साधन कृत मैना-सत साधन कृत मैना-सतकी रचना कब हुई इस सम्बन्धमें अभी कुछ निश्चित नहीं कहा जा सकता; पर इतना तो निश्चित है कि वह सोलहवीं शताब्दीके मध्यसे पूर्व की रचना है। यह रचना आज दो रूपोंमें उपलब्ध है। १-चतुर्भुजदास निगम कृत मधु-मालतीके कुछ पाठोंमें यह रचना स्वतन्त्र स्वरूप अन्तर्भुक्त है। इस रूपमें प्राप्त मैना-सत की सूचना माताप्रसाद गुप्तने १९५४ में अवन्तिका में दी थी। पश्चात् मधु-मालतीके दो प्रतियोंके आधारपर हरिहर निवास द्विवेदीने १९५८ में मैना-सतका एक संस्करण प्रकाशित किया है। इसके अनुसार कथा इस प्रकार है- परनापुरीके अनूपरि जातिके महाजनोंमें नाहन (नौरन) नामके एक महाजन थे। मैना उनकी रूपवती पत्नी थी। एक समय वहाँके महाजनोंने व्यापारके निमित्त परदीप जानेका निश्चय किया उनके साथ नाहन (नौरन) भी जानेको उद्यत हुआ। उसकी पत्नी मैनाने रोकनेकी चेष्टा की। नाहन (नौरन) उसे समझा बुझाकर यह आश्वासन देकर कि वह एक वर्षमें लौट आयेगा परदीप चला गया। पतिकी अनुपस्थितिमें मैना सब आमोद प्रमोद त्यागकर उदास रहने लगी। गंगापार पुरवर देशपर किसी राजाका साठिन नामक लम्पट पुत्र था। उसने एक दिन आखेट के लिए जाते समय मैनाको अपनी अट्टालिकापर बैठे देख लिया और उसपर आसक्त हो गया। उसे प्राप्त करनेके निमित्त उसने अपने मित्रसे परामर्श किया और उसके परामर्शसे रतना नामक मालिनको बुलाकर मैनाको पथभ्रष्ट करनेको कहा। मालिनने इस कार्यको पूरा करनेका बीड़ा उठाया। मालिन सारी तैयारी करके मैनाके महलमें पहुँची। उसने मैनाको अनेक उप- हार भेंट किये और कहा कि मैं तुम्हारी बचपनकी धाय हूँ। तुम्हें सिने खूब सिखाया है। तुम्हारी ममतासे आकृष्ट होकर तुम्हारे पास आयी हूँ। मैनाने उसकी बातपर विश्वास कर लिया और उसका आदर सत्कार किया। इस प्रकार विश्वास जमानेके पश्चात् मालिनने मैनासे मलिन वेशमें रहनेका कारण पूछा। मैनाने उस अपने मलिन रहनेका कारण पतिका विदेश गमन बताया जो कपटी मालिनने उसमें सहानुभूति प्रकट की और आँसू बहाये। फिर सहानुभूतिके भारमें वह प्रतिरात उस मालकी लावण्य वणन कर मैनाको उसके शृंगारका स्मरण दिलाने और उस सर्व वय विचलित करनेकी चेष्टा करने लगी।

मैना उसकी बातोंका निरन्तर प्रतिकार करती और पर-पुरुषपर दृष्टिपात न करनेका निश्चय दृढ़तासे प्रकट करती रही। इस प्रकार बारह महीने बीत गये। तब दूतीने आकर मैनाको उसके पतिके लौट आनेकी सूचना दी। थोड़े दिनों पश्चात् जब मैनाका पति घर आ गया तब उसने शृंगार किया और अपने पतिके साथ आनन्द- विहार करने लगी। इस बीच मैनाको कुटनी मालिनकी याद आयी और उसने उसका सिर मुंडाकर कालापीला मुखकर गधेपर चढ़ा कर नगरमें घुमाया। पश्चात् उसे नदी पार निकाल बाहर किया। २—साधन कृत मैना-सतकी कुछ ऐसी प्रतियाँ उपलब्ध हैं जिनका अन्य किसी कथासे सम्बन्ध नहीं है। स्वतन्त्र रचनाके रूपमें प्राप्त प्रतियाँ फारसी और नागरी दोनों लिपियों में पायी जाती हैं। इन प्रतियों में जो कथा है उसमें मधु-मालतीमें समाहित कथांक समान आरम्भ नहीं है। उक्त कथाका आरम्भ साठन कुँबर नामक नागरिक धूर्त द्वारा पतिव्रता मैनाको वशमें करनेके लिए रतना मालिनको भेजनेके प्रसंगसे होता है। आगेका वर्णन लगभग दोनों रूपोंमें समान है। अर्थात् साठन कुँवर द्वारा भेजे जानेपर रतना मालिनने मैनाके पास जाकर अपना परिचय मायके रूपमें दिया और मैनाने उसका आदर सत्कार किया। पश्चात् मालिन ने उसके मलिन वेशके प्रति सहानुभूति प्रकट करते हुए प्रति मास कामोद्दीपक स्थितिका वर्णन करते हुए परपुरुषके साथ सम्पर्क स्थापित करनेके लिए उकसाना आरम्भ किया। मैना उसकी बातोंका निरन्तर प्रतिकार करती रही। बारह महीने पश्चात् मैनाने उसकी बातोंसे चिढ़कर उसका सिर मुँडाकर उसका मुख काला पीला कराकर गधे पर बैठाकर निकाल बाहर किया। इस प्रकार इसमें मधु-मालतीमें समाहित अन्त वाला अंश भी नहीं है। मैना-सतक कृत रूपमें मैना मालिनके वार्तालाप-प्रसंगसे ज्ञात होता है कि वह मैनाके पतिका नाम लोरक है। उसे महरी चाँदा नामक बेटी भगा ले गयी है अथवा उनके साथ भाग गया है। सौतके साथ पतिके भाग जानेपर मैना अनुभव करती है कि उसके साथ अन्याय किया गया है। फिर भी उसे इसका मलाल नहीं है। अपनी सौतकी चेरी बनकर रहनेको तैयार है। मैना-सतका जो स्वतन्त्र रूप है उसी तरहकी एक रचना फारसीमें भी पायी जाती है उसे हुमीरी नामक सूफी कविने 'इसमतनामा' शीर्षकसे १०१८ (१६०८ ई०) में जहाँगीरके शासनकालमें प्रस्तुत किया था। उसमें कथा इस प्रकार है—

१ एक सचित्र प्रति मनेर शरीफ (पटना) के पुस्तकालय में है। उसे सैयद हसन असकरीने 'माआसिर' (पटना) के अंक १९ और २० में प्रकाशित किया है। एक दूसरी प्रति के चार पृष्ठ प्रिंस आफ वेल्स म्यूजियम बम्बई और एक पृष्ठ राष्ट्रीय संग्रहालय नई दिल्ली में है। दो प्रतियों को अगरचन्द नाहटाने हिन्दी त्रैमासिक नागरीपत्रिका (अंक १९५) में और एक प्रति को रूपनारायणने ओरिएन्टल कॉलेज पत्रिका लाहौरमें प्रकाशित किया है। एक अन्य सचित्र प्रति भी मिली है जो नागरी प्रचारिणी सभा, काशी में है। २ दृष्टव्य एक दुर्लभ प्रति मौलाना आजाद विश्वविद्यालय के पुस्तकालय में है।

१४८ हिन्दुस्तानके एक राजाके एक लड़की थी जिसका नाम मैना था । वह अत्यन्त रूपवती थी साथ ही पतिव्रता भी थी । उसका विवाह राज्यने लोरक नामक एक सुन्दर युवकसे कर दिया था । उससे मैनाका अत्यन्त घनिष्ट प्रेम था । लेकिन लोरकने राज- कुमारी मैनाको छोड़कर चाँद नामक एक अन्य सुन्दरीसे सम्बन्ध स्थापित कर लिया और मैनाको त्यागकर चाँदाके साथ किसी अन्य नगरको चला गया ! मैना पतिके वियोगमें व्यथित रहने लगी । इसी बीच मैनाके सौन्दर्यकी प्रशंसा सुनकर साधन नामक एक आचारभ्रष्ट आशिक मिजाज नौजवान मैनापर मुग्ध हो गया और रात दिन राजकुमारीके महलका चक्कर लगाने लगा । एक दिन अकस्मात् उसने मैनाको अपनी अट्टालिकापर खड़ा देख लिया । उसके सौन्दर्यको देखते ही वह मूर्च्छित हो गया । साधनने मैनाको प्राप्त करनेको एक बुढ़िया कुट्टनीको नियुक्त किया । वह धूर्त बुढ़िया एक दिन फूलोंका गुलदस्ता लेकर मैनाके पास पहुँची और मैनाके मनमें यह विश्वास पैदा कर दिया कि वह उसकी धाय है और उसने शैशवावस्थामें उसे दूध पिलाया था । जब उस धूताने देखा कि मैना उसके झांसेमें फँस गयी है तो उसने अपना काम आरम्भ किया । उसने मैनासे उसके दुःख दर्दका हाल-चाल पूछा । मैनाने उसे लोरकके प्रति अपनी विरहव्यथा कह सुनायी । यह सुनकर कुट्टनीने इस बातको लोरककी बेवफाई और गद्दारी बताकर मैनाको उसकी ओरसे विरक्त करनेकी चेष्टा की और सलाह दी कि वह किसी अन्य व्यक्तिसे प्रेम कर यौवनका आनन्द उठाये । यह भी कहा कि साधन तुम्हारा प्रेमी है वह तुम्हारी प्रेमाग्निमें जल रहा है । यदि लोरक चाँदाके साथ यौवनका आनन्द उठा रहा है तो तुम भी साधनको अपनाओ । किन्तु मैनाने लोरकके प्रेमको भुलाने और साधनसे प्रेम करनेकी सलाहको ठुकरा दिया । कुट्टनीने अपनी चेष्टा जारी रखी और एक साल तक प्रयत्न करती रही । प्रति मास चतुरी विशेषताओंको व्यक्त कर मैनाको कामोत्तेजित करनेकी चेष्टा करती और चाहती मैना साधनकी इच्छा पूरा करे । किन्तु मैना कुट्टनीकी बातोंमें नहीं आयी और एक साल बीत गया । इसी बीच अकस्मात लोरककी प्रेयसी चाँदाकी मृत्यु हो गयी और वह मैनाके पास पुनः वापस आ गया । दोनोंका फिर मिलन हुआ । इसीलीने अन्तमें अपनी इस कथाको ईश्वरीय प्रेम सम्बन्धी प्रतीक कहा है । उसके अनुसार लोरक ईश्वरका प्रतीक है जिससे प्रेम करना चाहिए; मैना मानवीय आत्मा है जो ईश्वरकी प्रेमी है साधन शैतान है जो ईश्वरके प्रेमसे आत्माको विरत कर देना चाहता है कुट्टनी मानवीय वासनाओंकी प्रतीक है जो इन्द्रओंकी ओर आकृष्ट करके शैतानके काम में सहायक होती है ।

गवासीकृत मैना-सतवन्ती

गवासी दक्खिनी हिन्दीके एक सुप्रसिद्ध कवि हैं। ये मुहम्मद कुतुबशाहके शासनकाल (१६११–१६२६ ई०) में गोलकुण्डा आये और वहाँ उन्हें राजाश्रय प्राप्त हुआ। अब्दुल्ला कुतुबशाह (१६२६–१६७२ ई०) के गद्दीपर बैठनेपर वे राजकवि घोषित किये गये। राजनयिक रूपमें गवासी शासक और उसके दरबारियोंके बीच लोकप्रिय तो थे ही साथ ही समय-समयपर जटिल समस्याओंके सुलझानेमें भी शासकको सलाह दिया करते थे। वे गोलकुण्डके राजदूतके रूपमें बीजापुर भेजे गये और अपने उस पदको उन्होंने योग्यतासे निभाया।

गवासीने गज़ल और मरसियोंके अतिरिक्त कुछ कथात्मक काव्य भी लिखे हैं, जिनमें मैना-सतवन्ती नामक मसनवी भी है। अभी तक यह प्रकाशित है। इसकी अनेक हस्तलिखित प्रतियाँ विभिन्न पुस्तकालयोंमें उपलब्ध हैं।¹ हैदराबादके आसफ़िया पुस्तकालयकी एक प्रतिसे इस कथा-काव्यके कुछ अंश श्रीराम शर्माने दक्खिनीका पद्य और गद्यमें उद्धृत किया है। उनके द्वारा प्रस्तुत कथाके अधूरे रूपको ही हिन्दीके आलोचकोंने लोरक चन्दाकी प्रेम-कथाका दक्खिनी रूप मानकर अनेक प्रकारकी कल्पनाएँ प्रस्तुत की हैं। वस्तुतः यह कथा लोरक-चन्दाकी प्रेम कथापर आधारित न होकर साधन कृत मैना-सत अथवा हमीदीकृत अस्मतनामाका ही एक स्वतन्त्र रूप है। कविने उस कथाको अपने ढंगपर इस प्रकार उपस्थित किया है—

किसी नगरमें बालाकूबर नामक राजा था। उसकी एक अत्यन्त रूपवती पुत्री थी जिसका नाम चोदा था। उसी राज्यमें लोरक नामक एक ग्वाला रहता था।

  • लोरकके सम्बन्धमें इस काव्यके कुछ प्रतियोंमें कहा गया है कि वह किसी धनीका बेटा था और उसका विवाह मैना नामक राजकुमारीसे हुआ था और दोनोंमें परस्पर प्रगाढ़ प्रेम था। दैवदुर्विपाकसे वे निर्धन हो गये। निदान लोरक अपना नगर छोड़कर दूसरे नगरमें जाकर पशु चरानेका काम करने लगा।

एक दिन जब लोरक गाय चराकर वापस आ रहा था तो चोदाकी दृष्टि उसपर पड़ी। उस रूपवान्पर चोदा उसपर आसक्त हो गयी। उसने उसे अपने निकट


¹ आसफ़िया पुस्तकालय (हैदराबाद) में तीन, सालारजंग पुस्तकालय (हैदराबाद) में तीन, इण्डिया आफिस पुस्तकालय (लन्दन) में दो और एशियाटिक सोसाइटी (कलकत्ता) के पुस्तकालयमें इसकी एक प्रति है। बम्बई विश्वविद्यालय के पुस्तकालयमें भी सम्भवतः इसकी एक प्रति है।

१६ बुलाया और उसपर अपना प्रेम प्रकट किया और अपने साथ किसी दूसरे देश भाग चलनेको कहा। लोरकने अपनी पत्नीके पतिव्रत और सौंदर्यकी चर्चा करते हुए उसे छोड़कर चलनेमें अपनी असमर्थता प्रकट की। उसने राजकुमारी-वैभव और अपनी दरिद्रता की तुलना करके अपनेको सर्वथा अयोग्य सिद्ध करनेकी भी चेष्टा की। पर चाँदा न मानी। उसने नाना प्रकारकी बातें करके लोरकको अपने साथ भाग चलनेको राजी कर ही लिया। तदनुसार दोनों प्रेमी नगर छोड़कर भाग गये। राजाने जब यह समाचार सुना तो वह बहुत हँसा। उसने एक दिन मैनाको अपनी अट्टालिकापर खड़ा देखा था। तभीसे वह उसके प्रति आसक्त हो रहा था। उसने सोचा कि अच्छा हुआ कि लोरक भाग गया अब मैनाको प्राप्त करनेका अच्छा अवसर है। फलतः एक चतुर कुटनीको बुला भेजा और मैनाको छह मासके भीतर वशमें करके अपने सामने उपस्थित करनेको कहा। कुटनीने इस कामको करना प्रसन्नतापूर्वक स्वीकार किया। तदनन्तर वह कुटनी रोती हुई मैनाके पास पहुँची और बोली—मैने तुझे बचपनमें दो बरस तक दूध पिलाया था। अब मेरे कोई नहीं रहा। इसलिए तुम्हारे पास आयी हूँ। मैनाने यह सुनकर उसके पाँव छुए और कहा—मेरा जो प्राण प्यारा पति था वह छोड़कर चला गया। नाते रिश्तेके लोग भी नहीं हैं मैं भी अकेली हूँ। अच्छा हुआ जो तुम आ गयीं। कुटनी यह सुनते ही कि लोरक मैनाको छोड़कर भाग गया है फूट-फूटकर रोने और लोरकको कोसने लगी। मैनासे कुटनीका कोसना सुना न गया। बोली—उन्हें बुरा भला मत कहो। वे मेरे साजन हैं। कुटनीने कहा—तू अभी पन्द्रह बरस की है। तू बड़ी नादान है। अभी तो तेरे खाने पीने और आनन्द करनेके दिन हैं। लोरक ठहरा मूर्ख गँवार। वह हीरा क्या परखना जाने। तू घबरा मत। मैं तेरे लिए दूसरा रूपवन्त लाऊँगी। यह सुनते ही मैनाके तनमें आग लग गयी। कुटनीसे बोली—तू तो बदनामी कराने वाली बात कर रही है। स्त्रीको अपना सत बनाये रखना चाहिये। इच्छाओं और वासनाओंको दबाना अपने हाथमें है। कुटनी बोली—मैने तुझे दूध पिलाया था। अगर तेरे माँ-बाप होते तो आज वे मेरी कद्र करते। दुनियामे बूढ़ोंकी अक्लसे काम लेना चाहिए न कि उनपर गुस्सा करना चाहिए। सिकन्दर जब यात्रापर निकला था तो वह अपने साथ बूढ़ोंको ले गया था। उसने उन्हींकी अक्लसे संसार जीता। मुझे क्या करना है। तेरा पति अगर चाँदाको लेकर आया तो तेरे सर सौत आ बैठेगी। वह तुझे दासी बनावेगी और दिन रात लड़ाई करेगी। फिर कुटनीने दृष्टान्त देते हुए कहा—किसी नगरमें एक विद्यार्थी था। उसके

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दो स्त्रियों थीं। एक स्त्री नीचे रहती थी और दूसरी कोठेपर रहती थी। एक दिन रातम जब सिपाही घरपर नहीं था, एक चोर घरमें घुसा। उसने जैसे ही सीढ़ीपर पैर रखा, आवाज हुई। दोनों स्त्रियोंने सुना, समझा उनका पति सौतके पास आ रहा है। दोनों निकल आयीं। अँधेरेमें उन्होंने चोरको ही पति समझ लिया। वस्तुतः ऊपर वालीने उसके सरके बाल पकड़ लिये और ऊपर खींचने लगी। नीचेवालीने चोरको ऊपर जाते देखा। वह उसका पैर पकड़ कर अपनी ओर खींचने लगी। इसी तरह खींचातानी हो ही रही थी कि सिपाही घर लौटा। उसने चोरको देखा और पकड़ लिया और बादशाहके सामने ले गया। वहाँपर चोरने बताया कि किस तरह दो औरतोंने अपना पति समझकर उसकी मरम्मत की है। सौत बहुत बुरी चीज है। यह एक म्यानमें दो तलवारकी तरह है। मैनाने कहा—माँ-बापका जो सुख मिलना चाहिए था, वह तो मुझे मिला ही नहीं। ससुरालमें भी और नदी को सुख दे। किस्मतम जो लिखा है वही होगा। अगर सूरज-चाँद भी मेरे सामने आयें तो वह लोरकके सामने तुच्छ हैं। तू सौतका डर दिखाती है। अगर सौत आये तो क्या हुई। चाँदा आकर भले ही कलह करे। मैं तो बाहर उसकी बड़ाई ही करूँगी। इस प्रकार मैना और दूतीमें निरन्तर विवाद चलता रहा। दूती मैनाको विच- लित करनेकी चेष्टा करती और मैना सतीत्वमे दृढ़ निष्ठा प्रकट करती। दोनों अपनी अपनी बात दृष्टान्त दे देकर कहतीं। इस प्रकार छ मास बीत गये और दूती मैना को डिगा न सकी। निदान हार मानकर वह राजाके पास लौट गयी और अपनी असमर्थता प्रकट की। राजाने उससे कहा कि तू एक बार फिर चल कर चेष्टा कर। आज आधी रातको स्वयं दूतीके साथ मैनाके घर पहुँचा और एक कोनेमें छिप रहा। दूती मैनाके पास फिर पहुँची और बोली—तेरी ममताके कारण ही मैं फिर लौट आयी हूँ। आज वह फिर उससे तरह तरहकी प्रलोभन भरी बात करने लगी। पर वह मैनाको डिगा न सकी। राजाने जब देखा कि मैनाका सतीत्व अडिग है तो वह बाहर निकल आया और बोला—तू मेरी माँ है मैं तेरा बेटा हूँ। पश्चात् उसने लोरकको बुला भेजा। चाँदाने जब सुना तो वह बहुत प्रसन्न हुई और दोनों वापस लौट आये। राजाने चाँदाका लोरकके साथ विवाह कर दिया। मैना यह देखकर बहुत प्रसन्न हुई और तीनों सुखपूर्वक रहने लगे। राजाने कुटनीका सिर मुंडाकर नगरसे निकाल बाहर किया।

४ लोरक-चाँदसे सम्बद्ध लोक-कथाएँ लोरक-चाँदकी कथा पूर्वी उत्तर प्रदेश बिहार और मध्य प्रदेशके पूर्वी अंचलके विभिन्न प्रदेशोंके लोक जीवनमें काफी प्रसिद्ध है। किन्तु उसके रूपमें पर्याप्त विविधता पायी जाती है। हम यहाँ भोजपुरी प्रदेश मिजापुर, भागलपुर, मिथिला छत्तीसगढ़ तथा रानाङ परगनामें प्रचलित लोक-कथाओंको एकत्रितकर रहे हैं। हमारा विचार अवधमें प्रचलित कथा रूप भी देनेका था किन्तु प्रयत्न करनेपर भी हमें वह प्राप्त न हो सका। इन लोक कथाओंके साथ चन्दायनकी कथाका तुलनात्मक अध्ययन उपयोगी और मनोरंजक होगा। भोजपुरी रूप लोरक-चाँदकी लोक प्रचलित कथाका जो भोजपुरी प्रदेशमें लोरिकी चनैनी, लोरिकायन आदि नामोंसे प्रचलित है और पवांरेके रूपमें विशेष रूपसे अहीरोंमें गायी जाती है अब तक कोई इसका प्रमाणित रूप प्रकाशमें नही आया है। आरा निवासी महादेवसिंहने इस पवांरेके एक बहुत बड़े अंशको अपने साँचेमें ढालकर प्रकाशित किया है। इसका पूर्व अंश उन्होंने तीन खण्डोंमें लोरिकायन नामसे प्रस्तुत किया है जो दूबनाथ पुस्तकालय कलकत्तासे प्रकाशित हुआ है। तीसरे खण्डके अतमें उन्होंने सूचना दी है कि आगेका बयान जांनबाका उद्धार मगाकर देखें। जांनबाका उद्धार लोरिकायनकी कथाके ही क्रममें है और वह माधव पुस्तकालय वाराणसीसे प्रकाशित हुइ है। इस खण्डके अन्तमें आगेका हाल नेउरपुरकी लड़ाईमें देखनेको कहा गया है। किन्तु यह खण्ड सम्भवतः प्रकाशित नही हुआ है। अतः कथाका अन्तिम अंश अनुपलब्ध है। इस सूत्रसे लोरक-चाँदकी कथाका जो भी अंश प्राप्त है, वह विस्तृत है। संक्षेपमें वह इस प्रकार है— बारह कोसमें विस्तृत गौरा नामक एक नगर था। वहाँ एक अहीर दम्पति रहता था। पतिको नाम बुद्धूवे और पत्नीका नाम हुइहुन्दन था। उनके कोई संतान न थी। उसी नगरमें तसरु और शिवचरन नामक दो अनाथ अहीर बालक थे। उनकी दयनीय अवस्थासे द्रवित होकर बुद्धूने तसरुको अपने घर ले आया और शिवचरनको पिपरीपुरका राज्य माली गवरा जो ख्यातिका गुलाम' या अपने यहाँ के अक्सर वही जानेवाली इस जाति की सुअर पालनेका काम करती है।

१५१ गया । सबरू कुन्दकुचेके घर बड़े लाड़-प्यारसे पलने लगा । जब वह कुछ बड़ा हुआ तो भैंस चराने बोहा जाने लगा । बोहामें एक अखाड़ा था जिसका गुरु मितारजरुस नामक धोबी था । भैंस चराते-चराते सबरू उस अखाड़ेमें सम्मिलित हो गया और कुश्ती लड़ने लगा । एक दिन कुन्दकुच अपनी दालानमें बैठा हुआ था, तभी एक साधूने आवाज दी—तुम्हारे बाल-बच्चे कुशलसे रहें । मुझे भूख लगी है, कुछ भोजन कराओ । यह सुनकर कुन्दकुचेने कहा—महाराज ! बाल-बच्चे तो मेरे हुए ही नहीं, कुशलसे कौन रहेगा ? साधूने यह सुनकर कहा—तुम तो बड़े भाग्यवान हो । आश्चर्य है अब तक तुम्हें कोई सन्तान नहीं हुई । अच्छा, तुम शिवजी पूजन करो, तुम्हारी मनोकामना शीघ्र पूरी होगी । तुम्हार प्रतापी पुत्र जन्म लेगा उसका यश संसार गायेगा । तुम उसका नाम लोरिक मनियार रखना । तदनुसार पति पत्नी दोनों मनोयोगसे शिवकी अराधना करने लगे । कुछ दिनों पश्चात् शिवने प्रसन्न होकर वर दिया—तुम्हारे महाबली पुत्र होगा । उससे लड़ने वाला संसारमें कोई न होगा । जब वह जन्म लेगा तो सवा हाथ धरती उठ जायगी । तदनुसार समय आनेपर कुन्दकुरनके गर्भसे लोरिकने जन्म लिया । पाँच बरसकी आयुमें लोरिक पाठशाला पढ़ने भेजा गया । वहाँ वह एक ही वर्षमें पढ़ लिखकर सब प्रकार योग्य हो गया । जब वह दस वर्षका हुआ तो वह एक दिन सँवरूके साथ बोहा गया । वहाँ सँवरू आदिको अभ्यास करते देखकर लोरिकने भी गुरु मितारजरुसको अपना चेल बनानेको कहा । मितारजरुसने समझाया— अभी तो तुम बच्चे हो अखाड़ेकी कठिनाइयों नहीं जानते । यदि तुम्हारा तनिक भी अनिष्ट हुआ तो कुन्दकुचे राउल मेरी दुर्दशा कर डालंग । लोरिकने शिष्य बनानेके लिए हठ पकड़ लिया और बोला—जब तक आप मुझे शिष्य नहीं बनायेंगे मैं गौरा लौटकर नहीं जाऊँगा । लोरिकका इस प्रकार हठ करत देखकर मितारजरुसको जब और कुछ न सूझा तो बोले—अस्सी अस्सी मनके मुँगरा (गदा) रखे हुए हैं। यदि तुम इन्हें उठा लो तो मैं तुम्हें अपना शिष्य बना लूँगा । अखाड़ेमें चार मुँगरा (गदा) रखे हुए थे । जिनमें दो अस्सी अस्सी मनके, तीसरा चौरासी मनका और चौथा अठ्यासी मनका था । अस्सी मन वाला एक मुँगरा मैंगवा (बटुआ) पमार भाँजता था चौरासी मन वाला मुँगरा दिलबर और अठ्यासी मन वाला मुँगरा सँवरू भाँजता था । और अस्सी मन वाले दोनों मुँगराँको मितारजरुस अपने दोनों हाथोंमें लेकर मांजते थे । मितारजरुसकी बात सुनकर लोरिक तत्काल उठ खड़ा हुआ और अखाड़ेमें रखे चारों मुँगराको पुष्प समान उठाकर आकाशमें फेंक दिया और जब वे नीचे आये उन्हें दोनों हाथोंमें पुनः पकड़ लिया । फिर चारों मुँगराको दोनों हाथ में लेकर भाँजने लगा । यह देखकर मितारजरुस आश्चर्य चकित ६३

१६४ हो उठे। अब तक उस देहातमें उनका जोड़ देने वाला कोई न था ! अब उसे नोरिक जोड़ देने वाला मिल गया ! फिर क्या था दोनों परस्पर जोड़ करने लगे। एक दिन भितारखण्ड अपनी ससुराल सुरौली गये। वहाँ उन्होंने बड़े अभिमानसे लोगोंको कुश्ती लड़नेके लिए ललकारा। लेकिन जब राजा बामदेवके बेटे माहिलने उन्हें उठाकर फेंक दिया तो वे खिसिया गये। अपनी झप मिटानेके लिए बोले—गौरामें मेरे दो बेटे हैं उन्हीं से तुम्हारी बहन मवाधिनका विवाह करा कर तुम्हारा गर्व चूर करूँगा। माहिलने सुनकर कहा—मेरी बहनसे विवाह करने वाले किसी वीरने अभी तक जन्म नहीं लिया है। उसका छ बार जन्म हुआ और हर बार वह कुमारी ही मर गयी। उससे वही विवाह कर सकता है जो मुझे जीत ले। अब तक जो भी उससे शादी करनेकी इच्छासे आये उन्हें मारकर सुरौलीमें गाड़ दिया। तुम क्या धोथी बघारते हो ! भितारखण्डने कहा—समय आनेपर देखा जायगा। और वह अपने, घर लौट आये। जब मवाधिन सयानी हुई तो उसके पिता बामदेवने समस्त सम्बंधीको अपनी बेटीसे विवाह करनेके लिए आमन्त्रित किया। पर किसीने उसका निमन्त्रण स्वीकार नहीं किया। तब बामदेवको चिन्ता हुई। पिताको चिन्तित देख माहिलने कहा—सुना है गौरामें दो लड़के हैं उनका नाम तो मुझे मालूम नहीं। लेकिन भितारखण्ड उनसे भली भाँति परिचित हैं। आप उनके पास पत्र लिखकर नाईके हाथ भेजिये। देखिये, वे क्या कहते हैं। बेटेकी बात सुनकर बामदेवने भितारखण्डके नाम पत्र लिखा। माहिलने एक अलग पत्र लिखा जिसमें व्यंग्यके साथ लिखा—तुम्हारी बातपर हम टीका भेजते हैं। जिस शानसे तुम शादी करानेको कह गये थे, देखना है वह शान तुम कहाँ तक रखते हो। पत्र लेकर नाई भितारखण्डके पास पहुँचा। पत्र पढ़कर भितारखण्डने नाईसे कहा—कुद्रुकूबेरा घर पूछते हुए चले जाओ और उनसे कहना कि सुरौलीसे बड़े लड़केका टीका लेकर आया हूँ। तदनुसार नाइ कुद्रुकूबेरा पता पूछता हुआ उनके घर पहुँचा और अभिवादन करके अपने आनेका अभिप्राय कह सुनाया। कुद्रकूंने बामदेवकी दुष्टतासे परिचित था । अतः सुरौलीका नाम सुनते ही वह बहुत क्रुद्ध हुआ और नाईसे चले जानेको कहा। जब नोरिकको यह बात ज्ञात हुई तो उसने अपने पिताको समझाया। और किसी प्रकार टीका स्वीकार करनेको राजी किया। कुद्रकूबेने संवधका तिलक स्वीकार कर लिया और सुरौली लौटकर नाईने बामदेवको इसकी सूचना दी। कुद्रकूबेने अपने सारे सगे-सम्बन्धियोंको आमन्त्रित किया और हाथीकी बाजा

प्राप्त कर सात सौ वीरोंकी बारात लेकर लोरिक चला। जगह-जगह रुकती हुई बारात डइनियाडिह पहुँची। वहाँ बाराती लोग रुके और खा-पीकर सो गये। लोरिकने व्यवस्था की कि पहले पहरमें बुडडूके, दूसरे पहरमें मितारजरुआ, तीसरे पहरमें सँवरू पहरा देंगे। और वह स्वयं चौथे पहरमें पहरेपर रहेगा। बामदेवको जब बारात आनेकी सूचना मिली तो उसने फुलिया डाइनको सारी बारातको मार डालनेका आदेश दिया। फुलिया डाइन कन्हिमा पहाड़पर पहुँची। उस समय बुडडूकेका पहरा था। उसके कठोर पहरेमें अपनी दाल गलती न देख वह दूसरे पहरेकी प्रतीक्षा करने लगी। बुडडूकेके पहरेके बाद मितारजरुआ और संवरूके पहरे में भी उसका कोई दाँव न लगा। अन्तमें लोरिकका पहरा आया। लोरिकको देखकर फुलिया डाइन और भी घबरायी। उसे लगा कि उसका मनोरथ सिद्ध न होगा। जब आकाशमें लाली दिखाई देने लगी तो लोरिकने सोचा कि सबेरा हुआ चाहता है अब डरकी कोई बात नहीं है और वह बारातसे कुछ दूर जाकर सो रहा। बस फुलिया डाइनको मौका मिला और उसने ऐसा जादू मारा कि सारी बारात पत्थर बन गयी। केवल वरदानके कारण केवल लोरिक बच रहा। जब लोरिककी नींद टूटी तो वह सारी बारातको पत्थर बना देखकर बहुत पछताया और विलाप करने लगा। अन्तमें निराश होकर उसने देवीका स्मरणकर अपना सर काटकर चढ़ाना चाहा। देवीने तत्काल प्रकट होकर उसका हाथ पकड़ लिया। बोली—तुम इतनेमें घबरा गये! अभी तो आगे बहुत सी कठिनाइयाँ आयेंगी। फिर लोरिकको समझा बुझाकर कहा कि सुरीहली बाजारकी चौमुहानेपर जाकर उत्तम पुकार करो। तुम्हारी पुकार सुनकर कोई न कोई सहायतार्थ फिर अवश्य आएगा। तदनुसार लोरिक सुरीहली चौमुहानेपर आकर चिल्लाने लगा। लोरिककी यह करुण पुकार सुनकर मनसागिन उसका फल लायी और करुण क्रन्दनका कारण पूछने लगी। लोरिकने उठकर सब हाल कह सुनाया। उसकी बातें सुनकर वह उसपर तरस आयी और बारातपर एक दृष्टि दौड़ायी। उस समय बन्ध्या डाइन भी वहाँ चक्कर दे रही थी। मनसागिनने हाथमें फुस लेकर मन्त्र पढ़कर मारना शुरू की। दोनों युद्ध चालू हो गया दोनों ओरसे लाठी चली। मनसागिन घायल होकर भाग खड़ी हुई। लोरिकने मनसागिनके पास कहा—आज तो मैं बहुत हारा। ऐसी नींद कभी नहीं आती थी। लोरिक बोला—हे भौंर तुम्हारी सुसकता सुनकर। और अपनी घटना कह सुनायी। तब विसाहूने कहा कि मनसागिन जिस रास्तेसे यहाँ पहुँचा है वहींपर जाओ। उसे पकड़ लाना। लोरिकने चलकर मनसागिनको पकड़ लिया तथा उनकी व्यथाको भी सुना।

३५६ लोरिकने उत्तर दिया-गौरासे तो यह निश्चय करके आये थे कि ब्याह करके शादी करेंगे और अब यहाँ कायरसी सी बात करते हो ? स्त्रीकी चोरी मर्दोंका काम नहीं है । मैं अपने तेगके बलपर शादी करूँगा । मुझे चोर कहलाना कभी अभीष्ट नहीं । आप लोग मेरे सहारेके लिए पीछे रहिये । मैं अकेले शादी करूँगा । फिर कुछ रुककर बोला-जरा इस सम्बन्धमें मैं भौजी (भाभी) से भी पूछ लूँ, कि वह क्या कहती हैं ! और वह तत्काल मदाकिनके पीछे दौड़ा और सामने आकर उसे भौजी (भाभी) सम्बोधनके साथ नमस्कार किया । मदाकिनने उससे 'भौजी' सम्बोधन करनेका कारण पूछा । लोरिकने बताया तुमसे अपने भाईका विवाह करनेके लिए ही बारात सजाकर लाया हूँ इसलिए मैं तुम्हें 'भौजी' कह रहा हूँ । मदाकिनने कहा-चुप रहो । कहीं मेरे पिताने सुन पाया तो तुम्हें जानते मरवा देंगे । मुझसे विवाह करनेके लिए कितने ही लोग आये पर कोई भी अपने घर वापस न जा सका । कुशल इसीमें है कि गौरा वापस चले जाओ । लोरिकने तमककर उत्तर दिया-भौजी ! मेरा नाम लोरिक मनियार है ! बिना विवाह किए गौरा वापस जानेका नहीं । अब तक तुमसे विवाह करनेके लिए कितने लोग भी आये थे मर्द नहीं थे भेड़ थे । भेड़ बकरी पाकर तुम्हारे पिताने उन्हें काट डाला । इस बार उन्हें मर्दसे पाला पड़ेगा । मदाकिन बोली-देवर मेरे ! तुम्हारी सूरत अवर्णनीय है । मेरी बात मानो । जाकर डोला (पालकी) ले आओ और मुझे लेकर गौरा भाग चलो । वहीं चलकर शादी करना । मेरे पिता भुडम बहुत मक्कार हैं । वे अपना पराया कुछ भी नहीं पहचानते । उनसे तुम जीत न सकोगे । लोरिक बोला-भौजी ! तुम्हारा विवाह किये बिना मैं गौरासे नहीं जाऊँगा । तुम्हें इस प्रकार ले चलूँगा तो मेरी हँसी होगी । स्त्री-पुरुष सभी कहेंगे कि लोरिक शक्तिहीन था, नारी चुराकर ले गया । अतः बिना लँगवरका विवाह किये मैं गौरा नहीं जाता । यह कहकर लोरिक लौट पड़ा और बारात लेकर मुटोरीकी सीमापर पहुँचा । मुडबुडेने भीतारजइल्फ द्वारा बारात आनेकी सूचना बामदेवको भेज दी । जब भीताने बामदेवसे यह समाचार कहा तो उत्तर मिला-जब तक युद्धमें हम हार न यों शादी नहीं की जा सकती । यह सुनते ही भीता अगार हो गया और बोला- ठीक है । तुम्हारा गर्व हम निश्चय ही चूर्ण करेंगे । उसने लौटकर लोरिकसे सारी बात कह सुनायी । लोरिक भी यह सुनकर आग बबूला हो गया । युद्धकी तैयारी करने लगा । बामदेवन अपने बड़े मल्लिनको बुलाकर लोहा लनेकी तैयारी करनेका आदेश

३६७ दिया। माहिलने तत्काल साठ हजार सेना तैयारकी और वहाँ जा पहुँचा, जहाँ लोरिकका पड़ाव पड़ा था। दोनों पक्षोंमें खूब घमासान युद्ध हुआ। अन्तमें बामदेव पराजित हुआ और वह लोरिकके चरणोंमें गिर पड़ा। लोरिकने क्रुद्ध होकर उसके कान काट लिये। बामदेव हाथ जोड़कर अनुनय करने लगा—मेरी जान मत लीजिये। तब लोरिकने उसे जीवित छोड़ दिया और हाथ-पैर बाँधकर उसे बारातके साथ सुपौली ले चला। इस प्रकार पराजित होकर बामदेवने सँवरूका विवाह मदा सिनके साथ कर दिया। बाराती वर-वधूके साथ गौरा वापस लौट आये। × × × अगोरिया नगरमें मञ्भगित नामक दुसाध जातिका राजा राज करता था। उसने इस बातकी घोषणा कर रखी थी कि राज्यमें जिस किसीकी भी लड़की सुन्दर होगी उससे मैं विवाह करूँगा। चमारोंको उसने आदेश दे रखा था कि जिस किसीके यहाँ लड़की जन्म ले, उसकी सूचना उसे तत्काल दी जाय। उसके राज्यमें एक महरा मनिधार रहते थे। उनके यहाँ भादोंकी अष्टमीको उनकी पत्नी पद्मावती कोखसे एक लड़कीने जन्म लिया। उसका नाम उन्होंने मंजरी रखा। बरही होनेके पश्चात् नाल काटने आयी हुई भगहिन (चमारिन) जब अपने घर जाने लगी तो पद्माने उसे सब प्रकारसे सन्तुष्ट कर अनुरोध किया कि मेरे लड़की होनेकी बात किसीसे मत कहना। राजा मञ्भगितको अगर यह सूचना मिलेगी तो वह तत्काल मेरी बेटीको मँगा भेजेगा। चमारिनने उस समय तो 'हाँ' कर दिया पर घर पहुँचते ही उसने अपने पतिसे पद्माके लड़की होनेकी बात कह दी और यह भी कहा कि उन्होंने यह बात किसीसे बतानेसे मना किया है। सुनकर चमार बोला—इस बातको तुम दो-चार महीने भले ही छिपा लो किन्तु जिस दिन बच्ची घरसे बाहर निकलेगी उस दिन तो राजाको उसकी सूचना मिल ही जायेगी। और तब वह मुझे बुलाकर पूछेगा। उस समय तुम क्या उत्तर दोगी? तुम्हारे तो दुदण्ड होगी ही, मेरी भी जान जायेगी। अन्ततः उसने तत्काल राजाको सूचना दे दी कि महराके घर लड़की हुई है। राजाने समाचार पाते ही लड़की लानेके लिए सिपाही भेजा। सिपाही द्वारा आदेश सुन कर महरा स्वयं मञ्भगितके दरबारमें पहुँचे और सिपाही भेजनेका कारण पूछा। राजाने जब बताया कि तुम्हारी लड़की लानेके लिए सिपाही गया था तो महराने पूछा—यदि मैं अपनी बेटी अभी आपके पास भेज दूँ तो आप उसके देखभारणकी व्यवस्था किस प्रकार करेंगे। राजाने उत्तर दिया—मैं उसे अपनी रानीका दूध पिलाकर रखूँगा। बड़ी हो जायगी तब मैं उससे विवाह कर लूँगा।

३५८ यह सुनकर महरा मनियारने उत्तर दिया,—यदि रानीके कूसर मेरी बेटी पलेगी तब तो वह आपकी बेटी सरीखी होगी। फिर उससे आप कैसे विवाह करेंगे? यह सुनकर मत्स्यपति अनुत्तर हो गया। महराने कहा—आप बेटीको मेरे पास ही पलने दीजिए। जब वह बड़ी हो जायगी तब मैं अपनी ही जातिके किसी कुलीन, किन्तु निर्धन व्यक्तिसे उसका विवाह कर अपनी जाँघ पवित्र कर दूँग। जब उसकी विदाईका समय आयेगा उस समय मैं आपको सूचित कर दूँगा। आप मंजरीके पतिको पराजित कर उसे अपनी रानी बना लीजिएगा। इस प्रकार आपकी बात और मेरी मर्यादा दोनोंकी ही रक्षा हो जायगी। यह बात मत्स्यपतिको जँच गयी। इस प्रकार महराने उस समय तो परिस्थिति सम्हाल ली। किन्तु ज्यों-ज्यों मञ्जरी बड़ी होने लगी उनकी चिन्ता बढ़ने लगी। गुलाम जातिका राजा हमारी जाति और कुल दोनोंमें आग लगायेगा। वे इस बातके लिए सचेष्ट रहने लगे कि जातिके किसी ऐसे व्यक्तिसे मञ्जरीका तिलक चढ़ाया जाय, जो मोर्चा लेनेमें कुशल हो और राजाका घमण्ड चूर कर सके। जब बेटी घरसे बाहर निकलने लगी तब एक दिन उन्होंने नाई और पण्डितको बुलाकर कहा—मेरी बेटीके योग्य कुँवारा वर ढूँढ़िए; मेरे घरके योग्य धनी घर ढूँढ़िए, मेरे योग्य वैसा सम्बन्धी ढूँढ़िए जो कुलार हो और रानी पद्माके योग्य ऐसी समधिन खोजिये जो पूरी गृहस्थी सम्हालनेवाली हो। यदि इन बातोंमेंसे कोई भी बात कम हो तो वैसे घर तिलक मत चढ़ाइएगा। पण्डितजी सगुनकी सामग्री लेकर नाईके साथ वर ढूँढने निकले। उन्हें वर ढूँढते ढूँढते बारह वर्ष बीत गये पर महराके कथनानुसार कोई घर-वर नहीं मिला। वे लौट आये। महरा अत्यन्त चिन्तित हुए यदि कोई योग्य वर नहीं मिला तो मेरी बेटीकी इज्जत निश्चय ही वह गुलाम लेगा। न जाने विधाताने भाग्यमें क्या लिखा है। एक दिन मञ्जरी अपनी सखी प्रेमा और मोहिनीके साथ अन्य सखियोंके यहाँ खेलने गयी। उस समय तेज हवा बह रही थी। जिसके कारण मञ्जरीके सर पररंगनेकी मिट्टी सखियोंके ऊपर गिरने लगी। इससे वे सब बहुत नाराज हुईं और उसे तरह तरहकी गालियाँ देने लगीं। इससे मञ्जरी बहुत दुःखी हुई और घर आकर कमरेमें भीतरसे दरवाजा बन्दकर चादर तानकर सो रही। जब शाम हुई और दीपक जलानेका समय हुआ तो रानी पद्माको चिन्ता हुई कि अभी तक मंजरी क्यों नहीं आयी। उसे ढूँढ़ने वह सखियोंके घर पहुँची। लपक कर जाकर पूछा। सबने कहा कि वह हमारे यहाँ आयी तो थी पर जल्द ही चली गयी। रानी लौटकर घर आयी तो देखा कि भीतरसे दरवाजा बन्द है। दरवाजा खोलनेकी चेष्टा की पर वह नहीं खुला। हारकर वे बोलीं—बेटी बात क्या है जो आज दरवाजा बन्द करके पड़ी हो। मञ्जरीने बताया कि मैंने खेलने गयी थी, वहाँ सहेलियोंने मुझे गालियाँ दीं।

कहा कि तुम्हारा पिता छतसे निराश हुआ है तुम्हारी माँ पडौसियोंका माठ चुराती है, इसीसे तुम्हारे विवाहके लिए कोई आता नहीं। तुम सोलह सालकी हो गयी और अभी तक कुँवारी ही बनी हो। मंजरीकी बातें सुनकर पद्मा ने बताया-जिस दिन तुम घरसे बाहर निकलने लगी, उसी दिन तुम्हारे पिताने पण्डित और नाईको वर ढूँढनेके लिए भेजा। पण्डितजी बारह वर्ष तक तिलक लेकर घूमते रहे लेकिन तुम्हारे योग्य कोई वर नहीं मिला। अब बताओ कौन सा उपाय किया जाय। उसियोंने तुम्हें झूठा ताना मारा है। यह सुनकर मंजरी बोली- तुम जाकर आरामसे सोओ। मंजरी खाटपर लेटी-लेटी सोचती रही। आधी रात बीतनेपर वह धीरेसे दरवाजा खोलकर महठसे बाहर निकलकर डगारिया शहर पहुँची और कुएँमें डूबनेकी बात सोचने लगी। तभी उसे ध्यान आया कि अगर मैं यहाँ डूबती हूँ तो लोग मेरा नग्न शरीर देखेंगे और मैं स्वर्ग नरक कहींकी भी न रहूँगी। अतः उसने गंगामें डूबकर प्राण तजनेका निश्चय किया और गंगाके किनारे पहुँचकर उसने साडीका फाछ बनाया और आँचलसे अपने स्तन कसकर बाँधे और गंगाके अगाध जलमें कूद पडी। कूदनेसे जो धमाका हुआ उसकी आवाज गंगाके कानोंमें पहुँची, वे सिहुँक उठीं और आसनसे उठकर सोचने लगीं-एक स्त्री मेरे बीच अपना प्राण तज रही है। यदि उसने प्राण तज दिया तो मुझे नरकवास करना होगा। व्याकुल होकर वे ऐसी लहरायीं कि लहरके साथ मंजरी सूखे रेतपर आकर गिरी। अब मंजरी सोचने लगी कि अब मैं अपने प्राण तजूँ तो कैसे। उसकी दृष्टि एक नावपर पडी। वह उसपर चढ गयी और धीरेसे उसकी डोर खोलकर उसे मँझ धारकी ओर ले चली। जहाँ जल अथाह था, वहाँ पहुँचकर वह गंगामें पुनः कूद पडी। जैसे ही इसकी सूचना गंगाको मिली मंजरी जहाँ कूदी थी वहाँ उन्होंने रेतका डीह खडा कर दिया। सूखे हुए रेतपर बैठकर मंजरी अपनी स्थितिपर विलाप करने लगी-सोचकर आयी थी कि गंगा माता मुझे शरण देंगी पर जान पडता है उन्हें मुझसे घृणा है उनके लिए मेरा शरीर भी भार हो रहा है। हे ईश्वर ! अब मेरी क्या गति होगी। मंजरीका रुदन सुनकर गंगा बूढाका रूप धारण कर उसके पास चलीं। रास्ते में उन्होंने भाग्य-माथको लडखडाते हुए अपनी ओर आते देखा। उसे रोककर गंगाने उनका हाल-चाल पूछा। भाग्यने कहा-मैं लँगडी भाग्य हूँ। तुम कौन हो? उन्होंने बताया मैं गंगा हूँ। मेरे पास एक स्त्री प्राण तजने आई हुई है। यह तो बताओ कि उसके भाग्यमें विवाह होना लिखा है या नहीं। भाग्यने उत्तर दिया- इस समय तो मंजरीके लिए सुहाग नहीं जान पडता। अभी मैं इन्द्रके पास जा रही हूँ वहाँसे लौटकर ही मैं कुछ निश्चय पूर्वक बता सकूँगी। गंगा वही बैठ गयीं और भाग्य इन्द्रपुरी पहुँची। उस समय इन्द्र गा रहे थे।

११ उन्होंने सूचना करायी। इन्द्रने जगाकर भाग्यको बुलवाया। मान्यने उनसे मंजरी- के सम्बन्धमें पूछा। इन्द्रने अपनी पोथी खोल कर देखा लेकिन उसमें मंजरीके विवाह की बात कहीं नहीं लिखी थी। अतः उन्होंने कहा—गुरु वशिष्ठके पास जाओ। शायद उनकी पोथीमें कुछ लिखा हो। मान्य तब वशिष्ठके पास पहुँचीं। उन्होंने अपनी पोथी खोलकर देखा और बताया कि मंजरीका विवाह पश्चिम देशमें होना लिखा है। वहाँ बायीं ओर सुरहा और दायीं ओर गङ्गा बहती हैं। उसके आगे बेतवा नदी है। वहाँ तीनोंका संगम है वहीं बारह गौसीका गौरा गुजरात नाम प्रदेश है। वहाँ फाफा दूबै नामका एक कनौजी ग्वाल रहता है। उसके दो पुत्र हैं। बड़ेका नाम राँवरु है, उसका ब्याह सुरौलीमें राजा बामदेवकी लड़की मदागिनसे हुआ है। छोटेका नाम लोरिक है, वह अभी कुँवाँरा है। उसीके साथ उसका विवाह होगा। उसकी झापड़ी टूटी हुई है दरवाजा घिरा हुआ है, उसके दरवाजेपर अगोरका पेड़ है। उसीके निकट राजा सहदेव भी रहता है। उसके दरवाजे पर पानी वाला कुँआ है। उसके दालानमें पीतल के खम्भे लगे हुए हैं, उसके दरबारमें सोनेके चँवर लगे हैं और छतपर सोनेके मोर बैठे हुए हैं चौबीसों खिड़कियों और दरवाजे लगे हैं उसके भी एक कुँवारा लड़का है। धोखेसे उसके साथ मंजरीका तिलक न चढ़ जाये, इस बातका ध्यान रखना चाहिए। यह सुनकर मान्य मृत्युलोकमें गयाके पास पहुँचीं और बोली—मंजरीका विवाह लिखा हुआ है। यह सुनकर गयाने कहा—तुम मेरे साथ चलो। वे दोनों मंजरीके पास आयीं और उसके निकट बैठकर उससे उसका दुःख पूछने लगीं। मंजरीने कहा—तुम लोग मेरा दुःख पूछकर क्या करोगी ? उन्होंने उत्तर दिया—हो सकता तो हम तुम्हारा दुःख दूर करनेमें सहायक हों। तब मंजरीने अपनी सारी विपत्ति कथा कह सुनायी। सुनकर गया तो चुप रही लेकिन मान्यने उसका आँचल खींच कर उस पर वे सारी बातें लिख दीं जो वशिष्ठने उनसे कही थीं। फिर वे दोनों उठी और थोड़ी दूर जाकर अन्तर्ध्यान हो गयीं। उनके चले जाने पर मंजरी अपने आँचलकी ओर देखने लगी। उस पर गौराका सारा वृतान्त लिखा पाकर वह बहुत प्रसन्न हुए और अपने घर लौट आयी। सुबह होने पर वह माँके पास गयी और बोली—कहनेमें तो खराब होता है, लेकिन बिना कहे हुए कार्यकी सिद्धि भी नहीं हो सकती। आप कहती हैं कि सारे ब्राह्मण देश भरमें खोजकर परेशान हो गये मेरे योग्य कोई वर ही नहीं मिला। लेकिन मेरे योग्य वर है। अगर आप कहें तो मैं उसका पता बताऊँ। यह सुनकर पद्मा बोली—अगर तुमने अपने मनका कोई वर पसन्द कर लिया

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१६२ जाऊँगा। जब वहाँ पहुँच जाऊँगा तो वहाँसे मैं गुल्लीको पीछेकी ओर मारूँगा। बस आप अशोकके पेड़के नीचे रुक जाइयेगा। इतना कहकर लड़केने गुल्लीपर चम्पा मारा और मारते कूबड़ेके घरकी ओर बढ़ा। शिवचन्द भी अपने आदमियोंके साथ उसके पीछे-पीछे चले। कूबड़ेके दरवाजेपर पहुँचते ही लड़केने गुल्लीको पलटकर चम्पा मारा और मारता-मारता अपने स्थानपर लौट आया। इस तरह शिवचन्दने कूबड़ेके घरका पता पा लिया। वस्तुतः यह वैसा ही था जैसा मकरीने उन्हें बताया था। उत्तम कूबड़े व्यास घरसे बाहर निकले और देखा कि कुछ आदमी अशोकके नीचे खड़े हैं। पास आकर पूछा—आपका मकान कहाँ है और आप किधर जा रहे हैं। शिवचन्द ने अपना अभिप्राय कह सुनाया। शिवचन्दकी बात सुनकर कूबड़े प्रसन्न हो गये और तिलकवालोंके ठहरनेका प्रबन्ध करने लगे। फटा कम्बल और बोरोका पुआल डालकर अशोकके नीचे बिछा दिया। और फूटे घड़ेमें पानी भार हुया डुब्बा हुका लाकर रख दिया। शिवचन्दसे बोले—हाथ पैर धोकर जलपान कीजिये। मैं लड़केको बुलाता हूँ। अगर वह आपको पसन्द आये तो आप तिलक चढ़ाइये। शिवचन्दने कहा—बिना लड़का देखे मैं कुछ न करूँगा। यह सुनकर कूबन अपनी पत्नीको बेटोंको बुला लानेके लिए भेजा। माँकी बात सुनकर सँवरू नौरिक और सितारजारण तीनों दरवाजे ओर चल पड़े। जब घर पहुँचे तो तिलकवाले उन तीनोंका बड़े ध्यानसे देखने लगे। तीनों एक ही शदीके लग रहे थे अतः उन्होंने कूबड़ेसे कहा—मुझे तीनों ही आदमी एकसे जान पड़ते हैं। इसलिए मैं लड़केको पहचान नहीं रहा हूँ। तब कूबैने उनका परिचय कराया। शिवचन्दको लड़का पसन्द आ गया और उन्होंने तिलक चढानेका निश्चय किया। कूबड़ेने गाँव भरका निमन्त्रण भेज दिया। जब इसकी सूचना राजा सहदेवको मिली तो उन्होंने चतुभा डुगावरा बुलाकर यह ढिंढोरा पिटवा दिया कि जो कोई कूबड़ेके घर जायेगा उसके लड़के बच्चाकी गालमें भूख भर दिया जायेगा। ढिंढोरा सुनकर घर घरमें निस्तब्धता व्याप्त होने लगा। यह सुनकर सँवरू बहुत क्रुद्ध हुआ और बोला—इच्छा तो होती है कि सहदेवके गालमें घूंस मारकर उस मार डालूँ; लेकिन गुर्गीके असनपर कुचक्र स्थिति पैदा नहीं करना चाहता इसीसे मुझे चुप रह जाना पड़ता। दूसरे वह अपना राजा है नहीं तो अभी उसका सिर काट डालता। इस प्रकार खिन्न होकर घर सारी व्यवस्था करने लगा। उसने सितारजारनकी शादी पनवैयाँको बुलाया। मरदयी की ओर भी गुलरायन वगैरह गहना बुलाकर गहना पहनाया। सारी व्यवस्था हो जानेपर तिलकवान आंगन में आकर बैठे और पुरोहितने तिलककी सारी परम्परा की। शिवचन्दने तिलकका सारा सामान कूबड़ेके रखवाया। स्त्रियाँ मिलकर हार-श्रृंगार करने लगीं। उनकी सहायताके लिए स्वर्गसे रूपवान परियां भी आ गयीं और वे भी गाने लगीं। चारों दिशाओं में राग उड़ाती ऊंचे