चन्दायन (मुल्ला दाऊद - प्राचीनतम अवधी सूफी-प्रेमाख्यान सटीक)
Chandayan of Mulla Daud with Hindi Commentary
मुल्ला दाऊद (१३७९ ई.) / डॉ. परमेश्वरीलाल गुप्त द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३५८ यह सुनकर महरा मनियारने उत्तर दिया,—यदि रानीके कूसर मेरी बेटी पलेगी तब तो वह आपकी बेटी सरीखी होगी। फिर उससे आप कैसे विवाह करेंगे? यह सुनकर मत्स्यपति अनुत्तर हो गया। महराने कहा—आप बेटीको मेरे पास ही पलने दीजिए। जब वह बड़ी हो जायगी तब मैं अपनी ही जातिके किसी कुलीन, किन्तु निर्धन व्यक्तिसे उसका विवाह कर अपनी जाँघ पवित्र कर दूँग। जब उसकी विदाईका समय आयेगा उस समय मैं आपको सूचित कर दूँगा। आप मंजरीके पतिको पराजित कर उसे अपनी रानी बना लीजिएगा। इस प्रकार आपकी बात और मेरी मर्यादा दोनोंकी ही रक्षा हो जायगी। यह बात मत्स्यपतिको जँच गयी। इस प्रकार महराने उस समय तो परिस्थिति सम्हाल ली। किन्तु ज्यों-ज्यों मञ्जरी बड़ी होने लगी उनकी चिन्ता बढ़ने लगी। गुलाम जातिका राजा हमारी जाति और कुल दोनोंमें आग लगायेगा। वे इस बातके लिए सचेष्ट रहने लगे कि जातिके किसी ऐसे व्यक्तिसे मञ्जरीका तिलक चढ़ाया जाय, जो मोर्चा लेनेमें कुशल हो और राजाका घमण्ड चूर कर सके। जब बेटी घरसे बाहर निकलने लगी तब एक दिन उन्होंने नाई और पण्डितको बुलाकर कहा—मेरी बेटीके योग्य कुँवारा वर ढूँढ़िए; मेरे घरके योग्य धनी घर ढूँढ़िए, मेरे योग्य वैसा सम्बन्धी ढूँढ़िए जो कुलार हो और रानी पद्माके योग्य ऐसी समधिन खोजिये जो पूरी गृहस्थी सम्हालनेवाली हो। यदि इन बातोंमेंसे कोई भी बात कम हो तो वैसे घर तिलक मत चढ़ाइएगा। पण्डितजी सगुनकी सामग्री लेकर नाईके साथ वर ढूँढने निकले। उन्हें वर ढूँढते ढूँढते बारह वर्ष बीत गये पर महराके कथनानुसार कोई घर-वर नहीं मिला। वे लौट आये। महरा अत्यन्त चिन्तित हुए यदि कोई योग्य वर नहीं मिला तो मेरी बेटीकी इज्जत निश्चय ही वह गुलाम लेगा। न जाने विधाताने भाग्यमें क्या लिखा है। एक दिन मञ्जरी अपनी सखी प्रेमा और मोहिनीके साथ अन्य सखियोंके यहाँ खेलने गयी। उस समय तेज हवा बह रही थी। जिसके कारण मञ्जरीके सर पररंगनेकी मिट्टी सखियोंके ऊपर गिरने लगी। इससे वे सब बहुत नाराज हुईं और उसे तरह तरहकी गालियाँ देने लगीं। इससे मञ्जरी बहुत दुःखी हुई और घर आकर कमरेमें भीतरसे दरवाजा बन्दकर चादर तानकर सो रही। जब शाम हुई और दीपक जलानेका समय हुआ तो रानी पद्माको चिन्ता हुई कि अभी तक मंजरी क्यों नहीं आयी। उसे ढूँढ़ने वह सखियोंके घर पहुँची। लपक कर जाकर पूछा। सबने कहा कि वह हमारे यहाँ आयी तो थी पर जल्द ही चली गयी। रानी लौटकर घर आयी तो देखा कि भीतरसे दरवाजा बन्द है। दरवाजा खोलनेकी चेष्टा की पर वह नहीं खुला। हारकर वे बोलीं—बेटी बात क्या है जो आज दरवाजा बन्द करके पड़ी हो। मञ्जरीने बताया कि मैंने खेलने गयी थी, वहाँ सहेलियोंने मुझे गालियाँ दीं।