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चन्दायन (मुल्ला दाऊद - प्राचीनतम अवधी सूफी-प्रेमाख्यान सटीक)

चन्दायन (मुल्ला दाऊद - प्राचीनतम अवधी सूफी-प्रेमाख्यान सटीक)

Chandayan of Mulla Daud with Hindi Commentary

मुल्ला दाऊद (१३७९ ई.) / डॉ. परमेश्वरीलाल गुप्त द्वारा

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कहा कि तुम्हारा पिता छतसे निराश हुआ है तुम्हारी माँ पडौसियोंका माठ चुराती है, इसीसे तुम्हारे विवाहके लिए कोई आता नहीं। तुम सोलह सालकी हो गयी और अभी तक कुँवारी ही बनी हो। मंजरीकी बातें सुनकर पद्मा ने बताया-जिस दिन तुम घरसे बाहर निकलने लगी, उसी दिन तुम्हारे पिताने पण्डित और नाईको वर ढूँढनेके लिए भेजा। पण्डितजी बारह वर्ष तक तिलक लेकर घूमते रहे लेकिन तुम्हारे योग्य कोई वर नहीं मिला। अब बताओ कौन सा उपाय किया जाय। उसियोंने तुम्हें झूठा ताना मारा है। यह सुनकर मंजरी बोली- तुम जाकर आरामसे सोओ। मंजरी खाटपर लेटी-लेटी सोचती रही। आधी रात बीतनेपर वह धीरेसे दरवाजा खोलकर महठसे बाहर निकलकर डगारिया शहर पहुँची और कुएँमें डूबनेकी बात सोचने लगी। तभी उसे ध्यान आया कि अगर मैं यहाँ डूबती हूँ तो लोग मेरा नग्न शरीर देखेंगे और मैं स्वर्ग नरक कहींकी भी न रहूँगी। अतः उसने गंगामें डूबकर प्राण तजनेका निश्चय किया और गंगाके किनारे पहुँचकर उसने साडीका फाछ बनाया और आँचलसे अपने स्तन कसकर बाँधे और गंगाके अगाध जलमें कूद पडी। कूदनेसे जो धमाका हुआ उसकी आवाज गंगाके कानोंमें पहुँची, वे सिहुँक उठीं और आसनसे उठकर सोचने लगीं-एक स्त्री मेरे बीच अपना प्राण तज रही है। यदि उसने प्राण तज दिया तो मुझे नरकवास करना होगा। व्याकुल होकर वे ऐसी लहरायीं कि लहरके साथ मंजरी सूखे रेतपर आकर गिरी। अब मंजरी सोचने लगी कि अब मैं अपने प्राण तजूँ तो कैसे। उसकी दृष्टि एक नावपर पडी। वह उसपर चढ गयी और धीरेसे उसकी डोर खोलकर उसे मँझ धारकी ओर ले चली। जहाँ जल अथाह था, वहाँ पहुँचकर वह गंगामें पुनः कूद पडी। जैसे ही इसकी सूचना गंगाको मिली मंजरी जहाँ कूदी थी वहाँ उन्होंने रेतका डीह खडा कर दिया। सूखे हुए रेतपर बैठकर मंजरी अपनी स्थितिपर विलाप करने लगी-सोचकर आयी थी कि गंगा माता मुझे शरण देंगी पर जान पडता है उन्हें मुझसे घृणा है उनके लिए मेरा शरीर भी भार हो रहा है। हे ईश्वर ! अब मेरी क्या गति होगी। मंजरीका रुदन सुनकर गंगा बूढाका रूप धारण कर उसके पास चलीं। रास्ते में उन्होंने भाग्य-माथको लडखडाते हुए अपनी ओर आते देखा। उसे रोककर गंगाने उनका हाल-चाल पूछा। भाग्यने कहा-मैं लँगडी भाग्य हूँ। तुम कौन हो? उन्होंने बताया मैं गंगा हूँ। मेरे पास एक स्त्री प्राण तजने आई हुई है। यह तो बताओ कि उसके भाग्यमें विवाह होना लिखा है या नहीं। भाग्यने उत्तर दिया- इस समय तो मंजरीके लिए सुहाग नहीं जान पडता। अभी मैं इन्द्रके पास जा रही हूँ वहाँसे लौटकर ही मैं कुछ निश्चय पूर्वक बता सकूँगी। गंगा वही बैठ गयीं और भाग्य इन्द्रपुरी पहुँची। उस समय इन्द्र गा रहे थे।