चन्दायन (मुल्ला दाऊद - प्राचीनतम अवधी सूफी-प्रेमाख्यान सटीक)
Chandayan of Mulla Daud with Hindi Commentary
मुल्ला दाऊद (१३७९ ई.) / डॉ. परमेश्वरीलाल गुप्त द्वारा
पृष्ठ 378, कुल 520 में से
संदर्भ में पढ़ेंमैना उसकी बातोंका निरन्तर प्रतिकार करती और पर-पुरुषपर दृष्टिपात न करनेका निश्चय दृढ़तासे प्रकट करती रही। इस प्रकार बारह महीने बीत गये। तब दूतीने आकर मैनाको उसके पतिके लौट आनेकी सूचना दी। थोड़े दिनों पश्चात् जब मैनाका पति घर आ गया तब उसने शृंगार किया और अपने पतिके साथ आनन्द- विहार करने लगी। इस बीच मैनाको कुटनी मालिनकी याद आयी और उसने उसका सिर मुंडाकर कालापीला मुखकर गधेपर चढ़ा कर नगरमें घुमाया। पश्चात् उसे नदी पार निकाल बाहर किया। २—साधन कृत मैना-सतकी कुछ ऐसी प्रतियाँ उपलब्ध हैं जिनका अन्य किसी कथासे सम्बन्ध नहीं है। स्वतन्त्र रचनाके रूपमें प्राप्त प्रतियाँ फारसी और नागरी दोनों लिपियों में पायी जाती हैं। इन प्रतियों में जो कथा है उसमें मधु-मालतीमें समाहित कथांक समान आरम्भ नहीं है। उक्त कथाका आरम्भ साठन कुँबर नामक नागरिक धूर्त द्वारा पतिव्रता मैनाको वशमें करनेके लिए रतना मालिनको भेजनेके प्रसंगसे होता है। आगेका वर्णन लगभग दोनों रूपोंमें समान है। अर्थात् साठन कुँवर द्वारा भेजे जानेपर रतना मालिनने मैनाके पास जाकर अपना परिचय मायके रूपमें दिया और मैनाने उसका आदर सत्कार किया। पश्चात् मालिन ने उसके मलिन वेशके प्रति सहानुभूति प्रकट करते हुए प्रति मास कामोद्दीपक स्थितिका वर्णन करते हुए परपुरुषके साथ सम्पर्क स्थापित करनेके लिए उकसाना आरम्भ किया। मैना उसकी बातोंका निरन्तर प्रतिकार करती रही। बारह महीने पश्चात् मैनाने उसकी बातोंसे चिढ़कर उसका सिर मुँडाकर उसका मुख काला पीला कराकर गधे पर बैठाकर निकाल बाहर किया। इस प्रकार इसमें मधु-मालतीमें समाहित अन्त वाला अंश भी नहीं है। मैना-सतक कृत रूपमें मैना मालिनके वार्तालाप-प्रसंगसे ज्ञात होता है कि वह मैनाके पतिका नाम लोरक है। उसे महरी चाँदा नामक बेटी भगा ले गयी है अथवा उनके साथ भाग गया है। सौतके साथ पतिके भाग जानेपर मैना अनुभव करती है कि उसके साथ अन्याय किया गया है। फिर भी उसे इसका मलाल नहीं है। अपनी सौतकी चेरी बनकर रहनेको तैयार है। मैना-सतका जो स्वतन्त्र रूप है उसी तरहकी एक रचना फारसीमें भी पायी जाती है उसे हुमीरी नामक सूफी कविने 'इसमतनामा' शीर्षकसे १०१८ (१६०८ ई०) में जहाँगीरके शासनकालमें प्रस्तुत किया था। उसमें कथा इस प्रकार है—
१ एक सचित्र प्रति मनेर शरीफ (पटना) के पुस्तकालय में है। उसे सैयद हसन असकरीने 'माआसिर' (पटना) के अंक १९ और २० में प्रकाशित किया है। एक दूसरी प्रति के चार पृष्ठ प्रिंस आफ वेल्स म्यूजियम बम्बई और एक पृष्ठ राष्ट्रीय संग्रहालय नई दिल्ली में है। दो प्रतियों को अगरचन्द नाहटाने हिन्दी त्रैमासिक नागरीपत्रिका (अंक १९५) में और एक प्रति को रूपनारायणने ओरिएन्टल कॉलेज पत्रिका लाहौरमें प्रकाशित किया है। एक अन्य सचित्र प्रति भी मिली है जो नागरी प्रचारिणी सभा, काशी में है। २ दृष्टव्य एक दुर्लभ प्रति मौलाना आजाद विश्वविद्यालय के पुस्तकालय में है।