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चन्दायन (मुल्ला दाऊद - प्राचीनतम अवधी सूफी-प्रेमाख्यान सटीक)

Chandayan of Mulla Daud with Hindi Commentary

मुल्ला दाऊद (१३७९ ई.) / डॉ. परमेश्वरीलाल गुप्त द्वारा

DevanagariAwadhipublished520 पृष्ठ

१. गोवर नगर वर्णन व लोरिक-चन्दा प्रथम दर्शन (कड़वक १-१००)

१८ जे लगि पड़े सो अमरंपरी जायी (जायेगा) परनइँ माँउ मँगर तिहूँ खायी (खायेंगे) जो जन जान कहहु संवारी (कहना) भविष्यत् कालकी सर्वनाम क्रियाका रूप उक्ति-व्यक्ति-प्रकरणमें एइव अथवा 'अवइ' मिलता है। यथा—पइब, करब, करव घरब। चन्दायनेमें इन रूपका प्रयोग हुआ है। यथा— जो तुम पर बहु बनिक चलाउब भैंसा बह मैं गोहन आउब कउव बार हम हारब पुम मैं पठउब भविष्यत् कालकी विधि क्रियाका रूप उक्ति-व्यक्ति-प्रकरणमें करेसु, पढेसु है। चन्दायनेम इस क्रियाका रूप है— पार्ये राग कें सिरजन माँ कैंप आपि सुनायहु होव देव उठान वीर बूझा मिस घर धायहु सिरजब भक हिय समायहु पाटम देस हूँ झोर न जायसि । उपर्युक्त उदाहरणोंसे स्पष्ट है कि चन्दायनेकी भाषा उक्ति-व्यक्ति-प्रकरणकी भाषासे सर्वथा भिन्न है। यदि उक्ति-व्यक्ति-प्रकरणकी भाषा अवधी है तो चन्दायने की भाषा अवधी नहीं है। चन्दायनेकी भाषाके प्रसङ्गमे श्याम मनोहर पाण्डेयने एक अन्य काव्य रोडा कृत राउल वेलकी चर्चा की है। यह खंडित काव्य एक शिलाफलकपर अंकित और प्रिंस आव वेल्स म्यूजियम बम्बईमें सुरक्षित है। इसका एक पाठ माताप्रसाद गुप्तने हिन्दी अनुशीलनमे प्रकाशित किया है और उसे ग्यारहवीं शताब्दीकी रचना बताया है और उसकी भाषाको दक्षिण कोसली कहा है।¹ श्याममनोहर पाण्डेयने इस आधारपर यह मत प्रकट किया है कि 'अब हम सरलतापूर्वक कह सकते हैं कि दक्षिण कोसलीमें जो अवधीका एक रूप है ग्यारहवीं शताब्दीमें काव्य- रचना हो रही थी।' हमें खेदके साथ कहना पडता है कि दोनों ही विद्वानोंके ये मत नितान्त निराधार हैं। राउल वेलको ग्यारहवीं शताब्दीकी रचना माननेका कोई आधार नहीं है। यह तेरहवीं शताब्दीके आसपासकी रचना है। उसकी भाषा दक्षिण कोसली है इसके लिए माताप्रसाद गुप्तने कोई प्रमाण उपस्थित नहीं किये हैं। इस काव्यमें विभिन्न प्रदेशोंकी स्त्रियोंका रूप वर्णन है और जिस प्रदेशकी स्त्रीका जिस रूपमे वर्णन है उसमें १ हिन्दी अनुशीलन वर्ष ११ अंक १-२ १९५ पृ. १२। २ मध्ययुगीन प्रेमाख्यान पृ. २६ ।

उस प्रदेशकी भाषाके कुछ शब्द-रूपों और क्रियाओका प्रयोग कविने किया है। इस प्रकार इस काव्यमं किसी एक भाषाका स्वरूप नहीं है। यदि इसी तथ्यको स्वीकार करें कि काव्यकी भाषा किसी एक प्रदेशकी भाषा है तो भी यह नहीं कहा जा सकता कि उसकी भाषा दक्षिण कोसली है। यह शिलालेख मध्य प्रदेश—धारसे प्राप्त हुआ है दक्षिण कोसलसे उसका किसी प्रकार कोई सम्बन्ध नहीं है। श्याममनोहर पाण्डेयकी यह धारणा कि दक्षिण कोसली अवधीका एक पूर्व रूप है, भाषा विज्ञान और इतिहास दोनों दृष्टिसे अन्धताका परिचायक और हास्या- स्पद है। प्राचीन इतिहासमें दक्षिण कोसल उस प्रदेशका नाम है जो आजकल छत्तीस- गढ़के नामसे अभिहित किया जाता है। छत्तीसगढ़ी भाषाका अवधीके साथ किसी प्रकारका नैकट्य है, यह कहना कठिन है। चन्दायनेकी भाषाको अवधी सिद्ध करनेके लिए राउल वेलकी भाषाको अवधीके पूर्व रूपका नमूना नहीं माना जा सकता। साथ ही यह तथ्य भी भुलाया नहीं जा सकता कि राउल वेलकी भाषाका चन्दायनेकी भाषाके साथ एक दृढ़का सादृश्य है। राउल वेलकी वर्तमान कालिक क्रियाएँ—भावइ, छड़ीवइ आदि चन्दायनेकी वर्तमानकालिक क्रिया आवइ, भावइ, सुहावइक अत्यन्त निकट हैं। यह इस बातका द्योतक है कि राउल वेल और चन्दायनेकी भाषाका निकट सम्बन्ध है और उनकी भाषा प्रादेशिक न होकर देशके विस्तृत भागमें प्रचलित भाषाका रूप है। चन्दायनेकी भाषाके व्याकरणकी गहराईसे अध्ययन किये जानेकी आवश्यकता है। तभी भाषाके सम्बन्धमें कुछ निश्चयपूर्वक कहा जा सकता है। पर यह कार्य ग्रन्थके शुद्ध पाठ उपस्थित किये जानेपर ही सम्भव है। सामान्य रूपेण जो कुछ हम देख और समझ सके हैं उसके आधारपर हमारी धारणा है कि दाउदने अपने काव्यके लिए ऐसी भाषाको अपनाया था जो अपभ्रंश साहित्यकी शब्द-परम्परासे विकसित होकर व्यापक रूपसे देशके विस्तृत भू-भागम प्रचलित थी। यदि वह काव्य विस्तृत क्षेत्रमें बोली नहीं तो समझी अवश्य जाती थी। चन्दायनेमं संस्कृत शब्दोंका प्रयोग बहुत ही कम है उसमें प्राकृत आर अपभ्रंशसे देशज रूपमे ढले शब्दोंका ही बाहुल्य है। सुम्मरन विचक्खन आदि शब्दोंका प्रयोग इस काव्यमें अपभ्रंश परम्पराके अवशेषाके रूपमें देखा जा सकता है। चन्दायनेके शब्दोंका हिन्दीके अनेक प्राचीन काव्योंके साथ तुलनात्मक अध्ययनसे ऐसा ज्ञात होता है कि इस काव्यका उनके साथ निकट का सम्बन्ध है। इसका अथ यह नहीं कि कवि अरबी फारसीके प्रभावसे अछूता है। उसने इन भाषाओँ से भी शब्द लिये हैं पर वे ऐसे हैं जो सम्भवतः भारत-भूमिकी बोलचालकी भाषामें पूर्णतः खप गये थे। फिर भी कहीं-कहीं इन शब्दोंका प्रयोग विचित्र अथवा बेमेल प्रतीत होता है। यथा— मैना उत्तर सो पीर सुनावा ४१।१ (ब्राह्मणके लिए पीरका प्रयोग)। विहँसे साहम राज बराबर ४२१।१ (तीतरके लिए साहम [शोभन])।

१९ ईश्वर गोविन्द चन्द्रावत (कड़ाके लिये पारसी मिया गोविन्द) छन्द योजना सूफी कवियोंके हिन्दी प्रेमाख्यानक काव्योंके सम्बन्धमें हिन्दीके विद्वानोंका एक मत है कि उनकी रचना दोहे और चौपाइयोंमें हुई है। यही मत वासुदेवशरण अग्रवालने पदमावतके सम्बन्धमें व्यक्त किया है, किन्तु उनका ध्यान इस तथ्यकी ओर भी गया है कि जहाँ पदमावतकी चौपाई-छन्द मात्रा और तुक दोनों दृष्टियोंसे नियमित है, वहीं दोहोंके विषयमें यह बात खरी नहीं उतरती। दोहा एक मात्रिक छन्द है, जिसकी गणना अर्ध-सम जातिके छन्दोंमें की जाती है। इसके पहले और तीसरे चरणोंमें तेरह-तेरह मात्राएँ और दूसरे और चौथे चरणमें ग्यारह-ग्यारह मात्राएँ होती हैं। पहले और तीसरे पादकी तुक नहीं मिलती। दूसरे और चौथे चरणोंकी तुक मिलती है। किन्तु जायसीके सैकड़ों ऐसे दोहे हैं, जिनके पहले और तीसरे चरणोंमें यह नियम खरा नहीं उतरता। उनमें तेरहकी जगह सोलह मात्राएँ पायी जाती हैं। इसका उन्होंने यह कहकर समाधान कर लिया है कि दोहेके अनेक भेदोंमेंसे यह भी एक मान्य भेद हिन्दी काव्यमें उस समय स्वीकृत था जिसकी परम्परा मुल्ला दाऊदके समयसे जायसीके कालतक अवश्य विद्यमान थी।१ वस्तुतः यह बात नहीं है। हमारे साहित्यकारोंका ध्यान इस तथ्यकी ओर नहीं जा सका है कि सूफी कवियोंने अपनी रचना पद्धति अपभ्रंश काव्योंसे प्राप्त की है और उन्होंने अपने काव्योंका संयोजन कड़वकोंके रूपमें किया है। स्वयंभूने अपने स्वयम्भू छन्दसम्में कड़वककी जो परिभाषा दी है उसके अनुसार प्रत्येक कड़वकके शरीरमें आठ वमक और अन्तमें एक धत्ता होता है जिसे हुवा दुवई अथवा बडनिका कहते हैं। प्रत्येक वमकमें १६-१६ मात्राओंवाले दो पद होते हैं। हेमचन्द्रने अपने छन्दोनुशासनमें इसी तथ्यको तनिक भिन्न ढंगसे कहा है। उनके मतानुसार कड़वकके शरीरमें ४-४ पंक्तियोंके चार रुन्ध अर्थात् पंक्तियाँ होती हैं। सोलह मात्राओं वाले पदोंकी बात केवल सिद्धान्त रूप है; कवियोंने सोलह मात्राओं वाले पदोंके अतिरिक्त पन्द्रह मात्रा वाले पदोंका भी व्यवहार प्रचुर मात्रामें किया है। अतः कड़वकमें प्रयुक्त होने वाले पद साधारणतया तीन रूपमें पाये जाते हैं:— १. पध्दिका—सोलह मात्राओंका पद। इसमें अन्तिम चार मात्राओंका रूप लघु गुरु लघु (जगण) होता है। २. मदनक—सोलह मात्राओंका पद। इसमें चार मात्राएँ गुरु, लघु, लघु (भगण) होती हैं। कहीं-कहीं इसका दो गुरु रूप भी पाये जाते हैं। १. पदमावत, सं०सं०, पृ. २-३९, प्राक्कथन पृ० १२।

१७ ३ पारणक-पन्द्रह मात्राओंका पद । इसमे तीन मात्राएँ लघु होती हैं। कहीं कहीं लघु गुरु रूप भी मिलता है। आठ यमकों वाली बात भी केवल सिद्धान्त रूप है। उपलब्ध अपभ्रंश काव्यों के कड़बकोंमे ६ से लेकर २० २५ यमक तक पाये जाते हैं। ये इस बातके द्योतक हैं कि कवियोंने आठ यमकों वाला नियम कभी भी कठोरताके साथ पालन नहीं किया। घत्ताके द्विपदी, चतुष्पदी अथवा षट्पदी होनेका विधान है पर अधिकांश घत्ता चतुष्पदी ही पाये जाते हैं। घत्ताक प्रत्येक पद सात मात्राओं से लेकर सत्रह मात्राओंके हुआ करते थे। पदोंकी व्यवस्थाके अनुसार घत्ताके तीन रूप कहे गये हैं-(१) समसम (२) अर्धसम और (३) अन्तरसम। समसम घत्तामें चारों पदोंकी मात्राएँ समान होती हैं और मात्राओंकी संख्याके अनुसार सर्वसम घत्ताके नौ रूप कहे गये हैं। अर्धसम घत्तामें प्रथम दो पदोंकी मात्राएँ एक समान और अन्तिम दो पदोंकी मात्राएँ पहले दो पदोंसे भिन्न किन्तु परस्पर समान होती हैं। मात्राओंकी संख्या-गणनाके अनुसार अर्धसम घत्ताके ११ रूप बताये गये हैं। अन्तरसम घत्तामे प्रथम और तृतीय पदोंकी और द्वितीय और चतुर्थ पदोंकी मात्राएँ समान होती थीं और वह प्रघादबद्ध होता था। अन्तरसम घत्ताके भी मात्रा-भेदसे ११ रूप होते थे। इस प्रकार घत्ताके रूपमें १२१ छन्द रूपोंके प्रयोगका विधान अपभ्रंशके पिंगल शास्त्रोंमे पाया जाता है। इन तथ्याको यदि ध्यानमें रखकर चन्दायनेके छन्दोंकी परखकी जाय तो स्पष्ट ज्ञात होगा कि दाऊदने कड़बकका रूप अपनाया है और उसके शरीरमें पाँच यमक रखे हैं और अन्तमें एक घत्ता दिया है। उसके सभी यमक सोलह मात्राओं वाले नहीं हैं कुछ पन्द्रह मात्राओं वाले भी हैं। चन्दायनेमे प्राप्त दोनों प्रकारके यमकोंके कुछ उदाहरण इस प्रकार हैं :- सोलह मात्राएँ (बदनक) १-कंक पार अस दूँह न आवइ । चाँद सौर मँह भरम दिखावइ ॥-१।३ × × × ओइ बान देखि पाँ कगहि । पाप केत चरनहिं कर नागहिं ॥-२३।४ २-सुन्दर सोंज अरे के हीरा। चहुँ दिशि बैठि विचारथ बीरा ॥-१५।१ पन्द्रह मात्राएँ (पारणक) करै कंक बिसरेकी अर्ना । और कंक पातर कर गुर्ना ॥-२।४ इसी प्रकार दाऊदने घत्ताके भी अनेक रूपोंका प्रयोग अपने काव्यमें किया है। उनके कुछ रूप इस प्रकार हैं :-

१८ १—११ ११ मात्राएँ— सेतु कसीस रोचन भार बांठ चर झांकें । सोवे बेचि घड़ाइ मोंविह मांग भरारें ॥ १३६ (२) ११, १२ मात्राएँ— जे बस लाय समान सरबस बरन के ठेवे । और पाँखि जे मारें हाथन ताँकें को कैवे ॥ १५४ (३) १२ ११ मात्राएँ— सिद्ध पुरुष गुन आगर देखि कुमाने झांकें । कहत सुजत अस आवैं, ह्वैवि फल देजी झांकें ॥ २ (४) १३, ११ मात्राएँ— बरष बरष बोर नौहह, गिलत न भावइ काउ । अन घन पाट पटोर भल, कौतुक भूका राउ ॥ ३१ (५) १६ ११ मात्राएँ— फाँड फिरोबी शाल सुरहुरी दैदै लोग बिसाह । हीर पटोर औ अरु कापड किन पावै सब व्याह ॥ २८ (६) १६ १२ मात्राएँ— गीत बाइ सुर कबित कहामी कथा कहहु गानबहार । मोर मन रँग रँगस सुख राख मूँखसि गर्व गिरहार ॥ ७२ (७) १७ ११ मात्राएँ— तिन संजोग बाजिर सर कोन्हों चौहठ मा परछाइ । राजा हियें व्यय सब बारे, तिक-तिक जरै बुझाइ ॥ ८५ इन व्यवस्थित मात्राओंवाले धत्ताके अतिरिक्त कुछ धत्ता ऐसे भी हैं जिनके चारों चरणोंकी मात्राओंमें भिन्नता है । यथा— ११ १३ १२ ११ मात्राएँ— सहस कराँ सुरजर्क रहे चाँदरा कित छाइ । घोरह कहाँ चाँद कै नई अमावस आइ ॥ १४० इस प्रकार मात्रा भेदसे युक्त धत्ताके अनेक रूप चन्दायणमें देखे जा सकते हैं जिनमें चरणोंकी मात्राओंमें परस्पर कोई साम्य नहीं है; पर उनका उल्लेख यहाँ जान बूझकर नहीं किया जा रहा है । उनपर ग्रन्थकी एक आध अन्य प्रतियोंके प्राप्त होने और उनके तुलनात्मक अध्ययन के पश्चात् ही विचार करना उचित होगा । जो सामग्री उपलब्ध है उससे यह स्पष्ट प्रतीत होता है कि चन्दायणमें

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१२, ११ मात्रावाले पद्योका जिसे दोहा भी कहा जा सकता है बहुत ही कम प्रयोग हुआ है। उसमें १२, ११ और १६ ११ मात्रावाले पद्य प्रमुख हैं और अधिक मात्रामे मिलते हैं। रचना-व्यवस्था मुसलमान कवियों द्वारा रचित हिन्दी प्रेम-गाथा काव्योंके सम्बन्धमें रामचन्द्र शुक्लने इस बातकी ओर ध्यान आकृष्ट किया है कि इनकी रचना बिल्कुल भारतीय चरितकाव्योंकी सर्ग-बद्ध शैलीपर न होकर फारसी मसनवियोंके ढंगपर हुई है, जिनमें कथा सर्गों या अध्यायोंमें विस्तारके हिसाबसे विभक्त नहीं होती, बराबर चली जाती है, केवल स्थान-स्थानपर घटनाओं या प्रसंगोंका उल्लेख शीर्षक रूपमें रहता है। मसनवीके लिए साहित्यिक नियम तो केवल इतना ही समझा जाता है कि सारा काव्य एक ही मसनवी छन्दमें हो पर परम्परा के अनुसार उसमें कथारम्भके पहले ईश्वर स्तुति पैगम्बरकी वन्दना और उस समयके राजा (शाहेवक्त) की प्रशंसा होनी चाहिए। ये बातें पद्मावत, इन्द्रावत, मिरगावती इत्यादि सबमें पायी जाती है। तुर्की मसनवियोंके सम्बन्धमें गिब्बका कथन है कि मसनवीका आरम्भ अल्लाहकी वन्दनासे होता है। तदनन्तर उसमें रसूलकी वन्दना होती है और उनके मेराजका उल्लेख रहता है। पश्चात् समसामयिक शासक अथवा किसी अन्य महान व्यक्तिकी स्तुति की जाती है। और फिर पुस्तकके लिखनेके कारणपर भी प्रकाश डाला जाता है। लगभग यही बातें पारसी मसनवियोंमें भी पायी जाती हैं। निजामीने अपने लैला मजनूँमें हम्द शीर्षकसे ईश्वरका गुणगान किया है और फिर नातके अन्तर्गत रसूलकी प्रशंसा है और उनके मेराजका उल्लेख है। तदनन्तर कविने पुस्तक लिखनेके कारणपर प्रकाश डाला है और अपने पीरकी चर्चाकी है। अन्तमें अपने पुत्रको नसीहत दी है। खुसरो-शीरींमें भी निजामीने क्रमशः ईश्वरकी प्रशंसा रसूलकी नात शाहेवक्तको दुआ और पुस्तक लिखनेका कारण दिया है। इसी प्रकार अमीर खुसरोने भी खुदाकी तारीफ रसूलकी नात मेराजके बयान शेख निजामुद्दीनके गुणगान शाहेवक्त—अलाउद्दीन खिलजीकी प्रशंसा कर तथा पुस्तक लिखनेका कारण बताकर अपनी पुस्तक मजनूँ-लैलाका आरम्भ किया है। खुसरोके शीरीं फरहादमें भी यही बातें पायी जाती है। जामीने यूसुफ जुलेखा और फैजीने नल-दमनका भी आरम्भ इसी प्रकार किया है। फिरदौसीके शाहनामेंमें भी ये सभी बातें उपलब्ध हैं। मुसलमान कवियों द्वारा रचित हिन्दी प्रेमाख्यानक काव्योंका भी प्रारम्भ उपर्युक्त मसनवियोंके समान ही हुआ है। दाउदने चन्दायनमें ईश्वर और पैगम्बर की वन्दनाकर चार यारोंका उल्लेख किया है, फिर शाहेवक्त—फीरोजशाह तुगलककी प्रशंसाकर अपने गुरुकी वन्दनाकी है और अपने आश्रयदाताका वर्णनकर ग्रन्थ रचनाक

सम्बन्धमें कहा है। कुतुबनकी मिरगावतके जो अंश उपलब्ध हैं, उनसे ज्ञात होता है कि उसका भी प्रारम्भ ईश्वरकी वन्दनासे हुआ है। मंझनने भी मधु-मालतीमें हम्द, नात, रसूलके चार यारों शाहेवक्तकी स्तुति करते हुए काव्यका रचना-काल तथा अपना संक्षिप्त परिचय दिया है। मलिक मुहम्मद जायसी आदि परवर्ती कवियोंने भी इसी परम्पराको ग्रहण किया है। अरबी-फारसीके मसनवियों और हिन्दी प्रेमाख्यानक काव्योंकी ये समानताएँ रामचन्द्र शुक्लके कथनको पुष्ट करती हुई यह कहनेको विवश करती हैं कि मुसल- मान कवियोंने अपने काव्योंमें इस परम्पराको अरबी-फारसी मसनवियोंको देखकर ही अपनाया होगा। पर साथ ही इस बातकी भी उपेक्षा नहीं की जा सकती कि ये बातें केवल अरबी-फारसी मसनवियोंकी परम्परामें सीमित नहीं हैं। भारतीय काव्य-परम्परा भी इन बातोंसे भली प्रकार परिचित रहा है। अरबी-फारसी मसनवियों और हिन्दी प्रेमाख्यानक काव्योंकी लगभग वे सभी बातें जैन अपभ्रंश-काव्यमें पायी जाती हैं। प्रायः सभी जैन अपभ्रंश काव्योंका आरम्भ 'जिन'की वन्दनासे होता है। किसी- किसीम जिन-वन्दनाके बाद सरस्वतीकी भी वन्दना पायी जाती है। तदनन्तर उनमें समकालिक शासकका उल्लेख, कविका आत्म-परिचय और आश्रयदाताकी चर्चा है और रचनाका कारण बताया गया है। उदाहरण स्वरूप पुष्पदन्त कृत महापुराण, स्वयंभू कृत पउमचरित और श्रीधर कृत पासनाहचरिउ देखा जा सकता है। हिन्दी प्रेमाख्यानक काव्योंके सम्बन्धमें फारसी मसनवियोंकी जिस दूसरी विशेषताकी ओर लोगोंका ध्यान गया है, वह है उनमें पायी जानेवाली प्रस्तोरी सूक्तियों। निजामी, अमीर खुसरो, जामी, फैजी सभीने अपनी मसनवियोंमें प्रसङ्ग के अनुकूल शीर्षक दिये हैं। ठीक उसी ढंगके शीर्षक चन्दायमकी सभी फारसी प्रतियोंमें प्रत्येक कड़वकके ऊपर दिये गये हैं और अन्य काव्योंकी प्रतियोंमें भी पाये जाते हैं। अतः इसमें भी इन कवियोंका फारसी मसनवियोंका अनुकरण परिलक्षित होता है। पर इसी ढंगके शीर्षक अपभ्रंश काव्योंमें भी पाये जाते हैं। संस्कृत साहित्य शास्त्रके अनुसार किसी महाकाव्यमें कमसे कम आठ सर्ग होने चाहिए जो न तो बहुत छोटे हों और न बहुत बड़े। इस प्रकारका सर्गबन्ध हिन्दी प्रेमाख्यानक काव्योंमें न होनेसे यह मान लिया गया है कि ये फारसी मसनवियोंके अनुकरणपर रचे गये हैं, जहाँ सर्ग जैसा कोई विभाजन नहीं मिलता। किन्तु इस धारणामें भी कोई विशेष बल नहीं है। यह बात न भूलनी चाहिए कि अपभ्रंशमें सर्गहीन काव्योंकी कमी नहीं है। हिन्दी प्रेमाख्यानक काव्योंका रूप उन काव्योंसे किसी भी रूपमें भिन्न नहीं है। हिन्दी प्रेमाख्यानक काव्योंके कथा-वस्तु सचमुच भारतीय हैं और वे भारतीय कथानक रूढ़ियोंपर ही आधारित हैं। उनमें कहीं भी अरबी या फारसी प्रभाव नहीं मिलता। ऐसी स्थितिमें यह समझना कठिन है कि इन कवियोंने अपने काव्यके बाह्य रूपके लिए भारतीय काव्योंसे इतर कहींसे प्रेरणा प्राप्तकी।

४१ कथा-वस्तु चन्दायनमें कथाका आरम्भ १८वें कड़वकसे होता है। उसकी कथा इस प्रकार है — १—गोबर महरका स्थान था। (यह सूचना देकर कविने गोबरके अमराइयों, सरोवर, मन्दिर, खोंट बुंग, नगर निवासिया, सैनिकों, बाजार-हाट, बाजीगरों, राज दरबार और महल आदिका वर्णन किया है।) (१८ ३१) २—राव महर के चौरासी रानियाँ थीं। उनमें फूलरानी पट्टमहादेवि (प्रधान रानी) थीं। (३२) ३—सहदेव (राव महर)के घर चाँदने जन्म लिया। धूमधामसे उसकी छठी मनायी गयी। बारहवें महीने महरकी बेटीकी प्रशंसा क्षार-समुद्र भाभार, गुजरात, तिरहुत, अवध और बदायूँ तक फैल गयी और राजाके पास चाँदसे विवाह करनेके संदेश आने लगे। जब चाँद चार बरसकी हुई तो बींत (अथवा जेठ) ने नाइ-ब्राह्मण डुलाकर अपने बेटे बावनसे चाँदका विवाह कर देनका सन्देश सहदेवके पास भेजा। उन्होंने जाकर सहदेवको यह सम्बन्ध स्वीकार करनेको समझाया और सहदेवने विवाह करना स्वीकार कर लिया। बारात आयी बावनके साथ चाँदका विवाह हो गया और दान दहेज देकर लोग चले गये। (३३ ४४) ४—विवाहको हुए बारह बर्ष बीत गये। चाँद पूर्ण यौबना हो गयी पर उसका पति छोटा होने कारण कभी उसकी शैय्यापर सोने नहीं आया। इससे वह शोकाकुल रहने लगी। उसकी काम व्यथाके विलापको उसकी ननदने सुना और जाकर अपनी माँसे कहा। यह सुनकर महरि (चाँदकी सास) दौड़ी हुई उसके पास आयी और उसे समझाने लगी। चाँदने सासकी बातोका उत्तर दिया। सासने क्रुद्ध होकर तत्काल मैके भेज देनेकी बात कही। अब चाँदको उस घरमे रहना दूभर लगने लगा। उसने ब्राह्मण बुलाकर अपने पिताके पास कहलाया कि भाईको पालकी कहारके साथ भेजकर मुझे शीघ्र बुला लें। ब्राह्मणने आकर चाँदकी बात महरसे कही और महरने तत्काल आदमीको भेजकर उसे बुला लिया। (४५-५१) ५—चाँद मैके लौट आयी। लोगोंने उसे महण धुलाकर उसका शृङ्गार किया। सखी-सहेलियाँ उसे देखने आयीं। वे हँसती हुई चाँदको बाहर लिवा ले गयीं और चौरहरपर ले जाकर उससे पति-सहवासके सुख-भोगकी बातें पूछने लगीं। चाँदने उन्हें अपनी काम-व्यथा कह सुनायी। (यह सम्भवतः बारहमासाके रूपमें व्यक्त किया गया है, पर वह केवल संक्षिप्त रूपमें ही प्राप्त है।) (५२-६६) ६—कहींसे गोबरमे एक बाजिर (मजहबी साधू) आया और वह गाता और भीख माँगता नगरमे घूमनेमे लगा। एक दिन चाँद अपने चौरहरपर खड़ी होकर झरोखे से झाँक रही थी कि उस बाजिरने अपना सिर ऊपर उठाया और चाँदको झरोखेपर देखते ही वह मूर्च्छित हो गया। लोग उसके चारों ओर जमा हो गये और उसके मुँहपर

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पानी छिड़कने लगे। उन्होंने उससे इस प्रकार मूर्च्छित हो जानेका कारण पूछा। उसने उत्तरमें घुमा फिराकर चाँदके सौन्दर्य वर्णन और उसके प्रति अपनी आसक्तिकी बात बतायी। फिर राय महरके भयसे वह गोबर नगर छोड़कर चला गया। (६६-७०) ७—बाजिंद एक मास तक इधर उधर घूमता रहा फिर वह एक नगरमें पहुँचा। (हमारे पास उपलब्ध सामग्रीमें इस नगरका नाम नहीं है पर बीकानेर प्रतिमें कदाचित् उसका नाम राजापुर बताया गया है।) एक दिन रातको जब बाजिंद चाँदके विरहका गीत गा रहा था तब राजा रूपचन्दने उसे सुना और उसे बुलवाया। (७१-७९) ८—बाजिन्दने आकर राजा रूपचन्दसे कहा—'उज्जैन मेरा स्थान है, जहाँका राजा विक्रमादित्य बड़ा धर्मनिष्ठ है। मैं चारों भुवन घूमता हुआ गोबरक सुन्दर नगरमें पहुँचा। वहाँ मैंने चाँद नामक एक स्त्री देखी जो मेरे मनमें पत्थरकी लकीर बनकर समा गयी है। उसकी टीस मेरे मनमें दिन-दिन सवाई होती जा रही है। यह सुनकर रूपचन्दके मनमें चाँदके रूप-गन्ध विस्तारके साथ जाननेकी जिज्ञासा जागी और उसने बाजिन्दका सम्मान कर उससे चाँदका रूप विस्तारके साथ कहनेका अनुरोध किया। तब बाजिंदने चाँदकी मांग केश ललाट, भौंह नैन नासिका बाज़ू दाँत जिह्वा कान सिंग ग्रीवा भुजा कुच पेट पीठ, बाहु, पग और गति आकार, वस्त्र और आभूषन सबका विस्तारके साथ वर्णन किया। (७१-९५) —चाँदके रूप-वर्णनको सुनकर रूपचन्दने बँगको सेना तैयार करनेका आदेश दिया और सेनाने कूच किया। (कविने यहाँ रूपचन्दकी सेनाके हाथी घोड़ी आदिका कथन किया है।) मार्गमें अपशकुन हुए पर उसने उनकी तनिक भी परवाह न की और गोवर नगरको जाकर घेर लिया। (९६-१०३) ९ —रूपचन्दकी सेनाके आनेसे गोबर नगरम आतंक फैल गया। तब महर सहदेवने राजा रूपचन्दके पास दूत भेजा कि वे पता लगायें कि उसने किस कारण घेरा डाला है और उसका आदेश क्या है। दूत आकर रूपचन्दके पास उपस्थित हुए। राजाने दूतोंकी बात सुनकर कहा कि चाँदका मेरे साथ तत्काल विवाह कर दो। दूतोंने रूपचन्दको समझानेकी चेष्टा की पर वह न माना और दूतोंपर क्रुद्ध हुआ और चले जानेको कहा। दूतोंने लौटकर रूपचन्दकी माँग कह सुनायी। तब महर सहदेवने अपने साथियोंसे परामर्श किया। कुछ लोगोंने तो कहा कि चाँदको दे दीजिए। कुछको चाँदकी माँगकी बात सुनकर क्रोध आ गया। अन्ततोगत्वा रूपचन्दसे लोहा लेनेका निश्चय हुआ और युद्धकी तैयारी होने लगी। (यहाँ कविने महरके अस्त्र, अश्वारोही धनुर्धर, रथ हाथी आदिका कथन किया है)। (१०३-११६) १० —दूसरे दिन रूपचन्द दुर्गकी ओर बढ़ा और महर भी युद्धके लिए बाहर निकलकर आया। युद्ध आरम्भ हुआ। महरके प्रमुख योद्धा मारे गये। यह देखकर भटने महरसे कहा कि आपके पास ऐसे वीर नहीं हैं जो रूपचन्दके सैनिकोंको परास्त कर सकें। आप तत्काल लोरिकका बुलावा भेजिये। (११७-१२१)

१२-तब महरने भाटसे कहा कि तुम्हीं दौड़कर लोरकके पास जाओ और उसे बुला लाओ। भाट तत्काल घोड़ेपर सवार होकर लोरकके पास पहुँचा और महरका सन्देश कह सुनाया। सुनते ही लोरक युद्धमें जानेके लिए तैयार हो गया। यह देखकर उसकी पत्नी मैना उसके सामने आकर खड़ी हो गयी और युद्धमें जानेसे उसे रोकने लगी। लोरकने कहा- मुझे युद्धमें जानेके लिए तिलक लगाकर आशीर्वाद दो कि मैं बाँठा (रूपचन्दका एक वीर) को मारकर घर आऊँ। मैं लौटकर तुम्हें सोनेके गहने बनवा दूँगा और मोतियोंसे तेरी माँग भराऊँगा। तब पत्नीने विदा दी और लोरक अखपीक पर गया। अखपीसे युद्ध-कौशलकी दीक्षा लेकर वह महरके पास पहुँचा। महरने उसे पानक तीन बीड़े दिये और कहा कि तुम जीतकर आओगे तो तुम्हें सुसज्जित घोड़ा भेंट करूँगा। (१२१ १२७) १३- लोरक अपनी सेना लेकर युद्ध क्षेत्रकी ओर चला। उसकी सेना देखकर रूपचन्द भयभीत हो गया और दूत भेजकर कहलाया कि एक-एक वीर आपसमें लड़े तो अच्छा हो। महरने उसकी बात मान ली तदनुसार दोनों ओरके वीर एक-एक कर सामने आकर लड़ने लगे। अन्तमें रूपचन्दकी ओरसे बाँठा आगे आया और महरने उसका सामना करनेके लिए लोरकको भेजा। युद्धमें बाँठा हार गया। फिर लोरक और रूपचन्दमें युद्ध हुआ और वह हारकर भाग खड़ा हुआ। लोरकने उसका पीछा किया और उसे भगा दिया। (१२८ १४१) १४- युद्ध जीतकर महर गोबर पहुँचा और लोरक वीरको बुलाकर उसे पान का बीड़ा दिया और हाथीपर बैठाकर उसका जुलूस निकाला। रानियाँ धौरहरपर खड़ी होकर उसे देखने लगीं। ब्राह्मणोंने लोरकको आशीर्वाद दिया गोवरमें आनन्द मनाया जाने लगा। (१४४) १५- चाँद भी अपनी दासी बिरस्पतको लेकर धौरहरके ऊपर गयी और उससे लोरकको दिखानेको कहा। बिरस्पतने उसे दिखाया। लोरकको देखते ही चाँद विकल होकर मूर्छित हो गयी। बिरस्पतने उसके मुखपर पानी छिड़का और बोली कि अपनेको सम्हालो। जो तुम्हारे मनमें है उसे कहो मैं उसे रात बीतते ही पूरा करूँगी। (१४५ १४८) १६- दूसरे दिन प्रातःकाल जब बिरस्पत आयी तो चाँदने कहा- जिसे मैंने कल देखा उसे या तो मेरे घर बुलाओ या मुझे उसके निकट ले चलो। बिरस्पतने कहा कि मैं लोरकको अपने घर बुलानेका उपाय तुम्हें बताती हूँ। तुम अपने पितासे गोवर के नागरिकोंको ब्योनारपर बुलानेके लिए कहो। यह सुनते ही चाँद महरके पास गयी और बोली कि मैने मनौती मानी थी कि जब मेरे पिता रण जीतकर आयेंगे तब सब लोगोंको निमंत्रित कर भोजन कराऊँगी। चाँदकी बात सुनते ही महरने भाट बुलाकर सारे गोवरमें ब्योनारका निमंत्रण भेज दिया और नाई दसों दिशामें जाकर निमंत्रण दे आय। महरने बहेलियोंको शिकार करने और बारियोंको पत्ते लानेके लिए भेजा।

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(कविने यहाँ शिकारियों द्वारा लाये पशु-पक्षियों तथा भोजन-सामग्री तरकारी, पकवान, चावल, रोटी आदिका विस्तारपूर्वक वर्णन किया है।) (१४९-१६०) १७—नागरिक लोग महरके घर आये और ज्योनारपर बैठे। तब चाँद शृंगार कर भौंहरपर आकर खड़ी हुई। उसे देखकर लोरक खाना भूल गया। उसके लिए भोजन विषवत हो गया। पर लोटते ही वह चारपाईपर पड़ गया। यह देखकर उसकी माँ लोरिकिन विलाप करने लगी। कुटुम्बी जन आदि एकत्र हुए, पण्डित, वैद्य सयाने बुलाये गये। सभीने कहा कि उसे कोई रोग नहीं है। वह काम-विद्ध है। (१६१-१६५) १८—बिरहपत बाजार गयी तो उसके कानोंमें लोरिकिनका करुण विलाप पड़ा। वह उसके घर पहुँची और रोनेका कारण पूछा। लोरिकिनने लोरककी दुरवस्था कह सुनायी। सुनकर बिरहपतने पूछा कि तुम्हारा रोगी कहाँ है, मैं उनके रोगकी औषधि जानती हूँ। लोरिकिन उसे लोरकके पास ले गयी। बिरहपतने उनके अंग-अंगको देखा फिर बोली—मैं महरके भण्डारकी भण्डारी और चाँदकी धाय हूँ। मैं बुलानेपर आयी हूँ; आँख खोलकर अपनी बात कहो। चाँदका नाम सुनते ही लोरक चैतन्य हो गया और बोला कि लज्जाके कारण अपनी व्यथा नहीं कह सकता। यह सुनकर लोरिकिन अलग जा खड़ी हुई और तब लोरकने अपने मनकी व्यथा बिरहपतसे कह सुनायी। बिरहपतने इस बातको भूल जाने को कहा। लोरक उसके पाँव पकड़कर चाँदसे मिलन करा देनेका अनुरोध करने लगा। बिरहपत द्रवित हो उठी और बोली कि तुम शरीरमें भस्म लगाकर जोगी बन कर मन्दिरमें चलकर बैठो। वहाँ दर्शनके लिए चाँद आवेगी तुम सचेष्ठान देखते रहना। यह कहकर बिरहपत बाहर निकली। निकलते ही लोरिकिनने उसके पैर पकड़ लिये। बिरहपत ने कहा कि तुम्हारा रोगी अच्छा हो गया है। नहा-धोकर पूजा करो और लोरकको नहला-धुलाकर उसपर कुछ धन न्योछावर कर उसे शहर भेज दो। यह कहकर वह चाँदके पास लौट गयी। (१६६-१७३) १९—बिरहपतके कथनानुसार लोरक जोगी बनकर मन्दिरमें जा बैठा। वह एक वर्षतक मन्दिरकी सेवा और चाँदके प्रेमकी कामना करता रहा। कार्तिकमें जब दीवाली का पर्व आया तब चाँद अपनी सखियोंको लेकर दीवाली खेलने जाने लगी। रास्तेमें उसका हार टूट गया और मोती बिखर गये। तब बिरहपतने चाँदसे कहा कि तुम मन्दिरमें चलकर आराम करो। ये सखियाँ हार हीरोकर लायेंगी। यह सुनकर चाँद मन्दिरके भीतर चली गयी। धाय (बिरहपत)ने मन्दिरके भीतर झाँककर कहा कि इस मन्दिरमें एक महात्मा आये हुए हैं, उनके देखते ही सारे पाप भाग जाते हैं। चाँदने उस महात्माके पास जाकर शीश नवाया। जोगी चाँदको देखते ही मूर्छित हो गया। चाँद मन्दिरसे बाहर निकल आयी और बिरहपतके पूछनेपर जोगीकी स्थिति कह सुनायी। इतनेमें सहेलियोंने हार पिरोकर दिया और चाँदने उसे गलेमें पहन लिया। तब बिरहपत बोली कि शाम हो रही है अभी घर चलो घरपर महरि बाट देख रही होंगी। (१७४-१८१)

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२ —चाँदको देखकर मूच्छित होनेके पश्चात् होशमें आनेपर लोरक विलाप और अपनी स्थितिपर खेद प्रकट करने लगा। तब मन्दिरके देवताने बताया कि अप्सराओं का एक समूह आया था। उन्हींमेंसे एकको देखकर तुम मूच्छित हो गये। (१८२ १८४) २१—उधर चाँदने बिरहपतको बुलाकर अपनी व्याकुलता दूर करनेको कहा। तब बिरहपतने मन्दिरमें बैठे जोगीकी ओर संकेत किया। चाँदने उसे मजाक समझा। बोली—जिस दिनसे लोरकको देखा है, वह मेरे मन बस गया है। मैं उसकी हूँ और वही मेरा पति है। तब बिरहपतने बताया कि वही लोरक तो तेरा भिखारी है और तेरे दर्शनके निमित्त ही तो वह योगी बना बैठा है और तुझे देखते ही मूच्छित हो गया था। तब चाँद बिरहपतसे बोली—तूने नहीं बताया कि मन्दिरम लोरक है। नहीं तो उसके योग्य मैं भक्ति-मुक्ति करती। उसके फूल भरे बचन सुनती। खैर, तुम जाकर कहो कि अब वह अपना मरम और कन्था उतार दे। बिरहपत पान-मिठाइ लेकर मन्दिरमें गयी और लोरकसे जोगीका वेश त्यागकर घर जानेको कहा। लोरक बागी वेश त्यागकर अपने घर गया और बिरहपतने आकर यह सूचना चाँदको दी। (१८४-१९१) २२—घर आकर लोरक चाँदके विरहमें स्थिर न रह सका और बार-बार मन्दिर की ओर जाता और चाँदके लिए रोता रहता। सारे दिन वह बन नगरम घूमता रहता और रातको गोवरमें आता—कदाचित् एक क्षणके लिए चाँद दिखाइ दे जाय। उधर चाँद भी लोरकके वियोगमें छटपटाती रहती। उसकी समझमें ही नहीं आता कि लोरक से किस प्रकार मिलाप हो। अन्तमें उसने एक दिन बिरहपतको लोरकके पास भेजा। बिरहस्त लोरकको साथ लाकर चाँदके चौखरका मार्ग दिखा गयी। (१९२ १९८) २३—लोरकने बाजार जाकर पाट खरीदा और उसका तीस हाथ लम्बा एक बरहा (मोटा रस्सा) तैयार किया। उसमें बीच-बीचमें गाँठें लगायी और ऊपर एक अँकुरा बाँधा। उसे देखकर मैनाने पूछा कि यह बरहा क्या होगा तो लोरकने कहा कि एक भैंस बिगडैल हो गयी है उसे बाँधूँगा ! (१९९) २४—भादोंकी घोर अँधेरी रातमें लोरक बरहा लेकर चला। मगर अँधेरेमें उसे कुछ पता ही नहीं चलता था कि चाँदका आवास किधर है। इतनेमें बिजली कौंधी और लोरकने उसे पहचान कर बरहेको जोरौसे ऊपर फेंका। बरहा जब ऊपर पहुँचा तो उसकी आवाजसे चाँद जागी और अँकुरीको बीरममैसे लगा देखा। उसने नीचे झाक कर देखा तो लोरकको खडा पाया। उल्हास उसने अँकुरी निकालकर बरहेका नीचे गिरा दिया। लोरक बार-बार बरहा ऊपर फेंकता और हर बार चाँद हँसकर उसे नीचे गिरा देती। जब उसने अनुभव किया कि लोरक परेशान हो गया है और अब यदि कुछ करती हूँ तो वह नाराज होकर चला जायगा और फिर कभी न आयेगा तो वह अपने कियेपर पछताने लगी। जब फिर बरहा ऊपर आया तो दौड़कर उसने उसे पकड लिया और उसे खींचकर खम्भेत्तक लायी। जब लोरकको रस्सीके सहारे ऊपर आते देखा तो वह चुपचाप चारपाईपर जाकर लेट गयी। लोरकने ऊपर आकर चाँदका

४६ शयनागार देखा । (यहाँ कविने चीसगड़ीकी चित्रकारी, सुगन्ध, शय्या आदिका वर्णन किया है ।) (२ १०) २५—लोरकने चाँदाको जगाया । और तब चाँद और लोरकमें ठण्ड-उत्तपकी बात हुई । पहले तो चाँदने लोरकको धिक्कारा फिर उठकर अपना प्रेम प्रकट किया और अन्तमें दोनों हँसी मजाक और केलि-क्रीडामें रत हो गये । (२ ८-२१५) २६—सुबह हुई तो चाँद भयभीत हुई और इसके पूर्व कि दासियाँ आवें, उसने लोरकको शय्याके नीचे छिपा दिया । जब दासियाँ मुँह धोनेके लिए पानी लेकर आयीं तो उन्हें चाँदकी अस्त-व्यस्त अवस्था देखकर समझते देर न लगी कि 'सँवर फूलपर बैठा था' । चाँदने बात बनानेकी चेष्टा की कि रातको बिल्ली कमरेमें घुस आयी थी और मेरे ऊपर कूद पड़ी । उसके नख लग गये । वह तो भाग गयी, लेकिन रातभर मुझे नींद नहीं आयी । विरहस्तने जाकर महरिको सूचना दी कि चाँद रातमें बिल्लीके कूदनेके कारण डर गयी है । चलकर कोई उपाय कीजिए । सुनते ही माता पिता सब लोग जमा हो गये । चाँद और लोरक दोनों मन ही मन भयभीत होने लगे । किसी किसी तरह शाम हुई और चाँदने लोरकको बाहर निकाला और प्रतिज्ञाकी कि मैं तुम्हारी विवाहिता सदृश हूँ और तुम मेरे विवाहित पति हो । यह कहकर लोरकको विदा किया और उसे रास्ता दिखाने नीचे आयी । लोरक महलसे निकलकर तेजीसे चला । इतनेमें द्वारपाल लाँघा और पदचाप सुनकर बाहर आया । चाँदने उससे कहा कि मैं फूल छूनेके लिए बाग देखनेको फेरी लगाने आयी हूँ । (२१६-२३१) २७—चाँद अपने नौहरमें पहुँचकर विचार करने लगी कि वह दिन कब आवेगा जब लोरकसे फिर भेंट होगी । राशि गणना करनेपर उसे ज्ञात हुआ कि अब उससे उस दिन मिलना होगा जिस दिन वह उसे गङ्गा पारकर हरदी ले जायेगा । (२३६) २८—लोरक जब घर पहुँचा तो मैनाने पूछा कि तुमने रात कहाँ बितायी किस स्त्रीके साथ भोग विलास किया । लोरकने हँसकर बात टाल दी और कहा कि राजा पाश दलनेमें सारी रात बीत गयी । (२३४) २९—महर और महरिको ज्ञात हो गया कि रातमें महलमें कोई पुरुष आया था । फिर यह बात दास-दासियों नाई-बारीके मुखसे गाँवभरमें घर घर फैल गयी । मैना के कानमें भी उसकी भनक पड़ी । सुनते ही वह अत्यन्त व्यथित हो उठी । मैना की यह अवस्था देखकर पण्डितने उससे उसका कारण जानना चाहा और उसकी बात सुनकर उसे समझानेकी चेष्टाकी । लोरकको भी कुछ आभास मिला कि बात मैनापर प्रकट हो गयी है । तब वह उससे प्रेम भरी बातें करने लगा । मैना क्रुद्ध हो उठी; दोनोंमें कहा सुनी हुई । पण्डितने बीचमें पड़कर मामला शान्त किया । ( १५ २४०) ३ —पण्डितने चाँदसे कहा कि असाढ की दूजको मयावीका पर्व आ रहा है । उस दिन लोग खाण्डार करके सोमनाथ की पूजा करें तो तुम्हारी मनोकामना पूरी

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होगी। वह दिन आया। सभी जातिकी स्त्रियाँ पूजा करने चलीं। चाँद भी अपनी रूपेशियाको लेकर मन्दिर गयी देवताकी पूजा की और मनोती मानी कि यदि लोरक पतिके रूपमें प्राप्त हो गया तो आपके कलशको घृतसे भरवाऊँगी। (२५०-२५४) ३१—मैना भी पालकीपर सवार होकर अपनी सखियों सहित मन्दिरम आयी और देवताकी पूजाकी और उन्हें अपनी व्यथा कह सुनायी। पूजा कर जब वह बाहर निकली तो उसके कुम्हलाये हुए रूपको देख चाँदन हँसकर उदासीका कारण पूछा। मैनाने उसका उत्तर दिया और अपने मनका रोष चाँदपर प्रकटकर दिया। फलतः हँसीकी बात उत्तर प्रतिउत्तरमें उत्तरोत्तर गम्भीर होती गयी। चाँद और मैनाम पहले गाली गलौज और फिर मारपीट होने लगी। तब लोरकने आकर उन दोनोंको अलग किया। दोनों ही स्त्रियाँ अपने-अपने घर लौटीं। (२५५-२७४) ३२—मैनाने घर आकर मास्तिनको बुलाया और उसे चाँदकी शिकायत लेकर महरके पास भेजा। मास्तिनने जाकर महरसे चाँदकी सारी बात कही। उसे सुनकर महरि अत्यन्त क्रोधित और क्षुब्ध हुए। (२७१-२७८) ३३—चाँदने बिरस्वत से कहा कि जो कुछ बात ढँकी छिपी थी, वह अब सब लोगों पर प्रकट हो गयी। जिस बातसे मैं डर रही थी वही बात सामने आ गयी। अब तो यही रह गया कि या तो देशकी गालियाँ सुनूँ या फिर कटार भोंककर मर जाऊँ। तुम लोरकसे जाकर कहो कि आज रातको वह मुझे लेकर भाग चले नहीं तो प्रातःकालमें प्राण तज दूँगी। बिरस्तन जाकर लोरकसे चाँदका संदेश कहा। पहले तो लोरक भागनेपर राजी नहीं हुआ पर बादम बिरस्वतके समझाने-बुझानेपर चाँदको ले जानेको तैयार हो गया। पण्डितसे शुभ घड़ी पूछकर उसने आधी रातको चलनेका निश्चय किया। (२७९-२९) (इस अग्राऊ कुछ कडवक अप्राप्य हैं अतः घटनाका स्पष्ट रूप सामने नहीं आता।) ३४—रात हुई तो लोरक आया और वरहा (रस्सी) फेंककर अपने आनेकी सूचना चाँदको दी। चाँद उसकी प्रतीक्षा कर ही रही थी। आभरण मानिक मोती साथ लेकर वह रस्सीके सहारे नीचे उतर आयी। बरसातकी घोर अँधेरी रात्रिमें दोनों चल पड़े। रास्तेम जावन कहा कि हमारे भागनेकी खबर यदि बावनको मालूम हो गयी तो उसके देखते कोई भागकर जा नहीं सकता। वह देखते ही मछलीकी तरह मार डालेगा। लोरकने कहा—तुम मुझे इस तरह मत डराओ। अभीतक मैंने रूपचन्द और बाँठाको मारा है अब बावनकी बारी है। (२९१-२९२) ३५—लोरकके भाग जानेपर उसकी पत्नी मञ्जरी (मैना) उठक अह्र शब्दोंको लेकर रोती रही। (२९३) ३६—लोरक और चाँदने काले वस्त्र पहन लिए। लोरकने अपने दोनों हाथोंमें खाँड और चाँदने अपने हाथमें धनुष लिया और दोनों चल पड़े। डंगवरसे दस कोस दूर पहुँचे और रास्तेको कटवाकर चलने लगे। वहा लोरकका भाई कँवर रहता था। उसने लोरकको आते देखा और उसकी ओर भागा। लेकिन चाँदको पीछे-पीछे

४८ व्याघ्र हैरान ठिठक गया । गोरखने बोला कि तुमने यह बहुत बुरा किया । और वह उसकी भर्त्सना करने लगा । यह सुनकर चाँदेने कंवरूका समझानेकी चेष्टा की तो कंवरू उसकी भी भर्त्सना करन लगा । अन्तमें गोरखने यह कहकर कंवरूसे विदा ली कि कार्तिक मासतक लौट आऊँगा । (२१४ । ) १७—वहाँसे दोनों तेजीके साथ आगे बढे । जब शाम हुई तो गंगाके घाटपर कठिन समझकर पेड़के नीचे सो रहे । सुबह दोनों पाटपर किनारे आये । (बीचके कड़वक अप्राप्य हैं, अतः कथाका क्रम कुछ अस्पष्ट है ।) गोरख एक ओर छिप गया और चाँद तटपर खड़ी होकर अपना प्रदर्शन करने लगी । उसे देखते ही एक मल्लाह निकट आया । चाँदेको अरसेसे देख उसकी उत्सुकता आयी और नाव लेकर उसके पास आया । चाँदेके रूपको देखते ही वह उसपर मुग्ध हो गया और उसे नावपर बैठाकर पार ले चला । गंगाके बीचमें केंवटने उससे पूछा कि तुम कौन हो ? घर कहाँ है ? नदीके आसपास कोई गाँव नहीं है फिर तुम रातको कहाँ ठहरी थीं ! चाँदेने कहा—मैं घरसे रूठकर चली हूँ और रातभर चलकर अकेली ही यहाँतक आयी हूँ । यह बातें हो ही रही थीं कि गोरखने पानीमेंसे सर बाहर निकाला और केवट को पानीमें ढकेलकर स्वयं नावपर सवार होकर चाँदेको लेकर चल पडा । ( १ १५ ७) १८—इतनेमें बाबन आ पहुँचा और केवटसे पूछने लगा—इस रास्ते मेरे दो दास-दासी आये हैं उन्हें तुमने देखा है ! यह सुनकर केवट हँसा और बोला—यहाँ तो एक कुँवर और कुँवरी आये थे । पुरुष छिप गया और स्त्री दिखायी पड़ी । उसकी ओर आकृष्ट होकर मैं वहाँ आया । वे लोग नाव लेकर उस पार गये हैं । लेकिन वे तुम्हारे दास-दासी नहीं हो सकते । इतना सुनते ही बाबन पानीमें कूद पड़ा और गोरखका पीछा किया । जबतक बाबनने नदी पार करे तबतक गोरख छ कोस जा पहुँचा । बाबनने दौड़कर उनका पीछा किया और दस कोसपर उन्हें जा पकड़ा । गोरखपर उसने तीन बाण चलाये पर वे तीनों ही बेकार गये । तब हार मानकर गोरखसे कहकर कि यह स्त्री तुम्हारी हुई बाबन अपने घर लौट गया । ( १ ८ ३१६) १९—बाबन गोबरकी ओर गया गोरख और चाँद आगे बढे । रास्तेमें उन्हें विद्यादानी नामक एक ठग मिला जिसने दानके बहाने स्त्री (चाँद) की माँग की । इसपर गोरखने उसके हाथ और कान काट लिये और उसका मुँह काला कर केथोंमें मेस बाँधकर छोड़ दिया । (कुछ कड़वकोंके प्राप्त न होनेसे यह घटना बहुत अस्पष्ट है।) (३१५ ३१२) २०—विद्याने आकर गोरखके विरुद्ध राज दरबारमे परिवाद किया । राजाने अपने मन्त्रियोंसे परामर्श कर गोरखकी बुलानेके लिए ब्राह्मणोंको भेजा । गोरखने आकर राजासे सारी बात कह सुनायी । सुनकर राजाने उसे घोड़ा आदि देकर सम्मानित किया और कहा कि चाहो तो यहाँ रहो अन्यथा जहाँ इच्छा हो जा सकते हो । गोरख राजासे विदा लेकर चला और एक ब्राह्मणके घर जाकर ठहरा । वहाँ गोरख

लोर चाँद दोनों फूलोंका सेज बिछाकर सोय। रातमें सुगन्धसे आकृष्ट होकर एक साँप आया और चाँदको काट लिया। (१२३-१३२) ४१—साँपके डँसते ही चाँद बेहोश हो गयी। लोरक सात दिनोंतक शोकाकुल होकर विलाप करता रहा। तब एक दिन एक गुनी आया और उसने मन्त्र पढ़ा और चाँद जीवित हो उठी। फिर वे दोनों हरदीकी ओर चले। (१३३-१३७) ४२—(१३८ से १४३ के बीच केवल दो कड़बक उपलब्ध हैं जिनसे वास्तविक घटनाका अनुमान नहीं होता केवल इतना ही पता लगता है कि लोरकको कोई युद्ध करना पड़ा था। उसने शत्रुओंको मार भगाया। पश्चात् दोनों पुनः हरदी- की ओर चले।) ४३—चलते-चलते एक बनखण्डके बीच शाम हो गयी और ये दोनों एक पाकरके पेड़के नीचे रुक गये और खा-पीकर सो रहे। रातमें पुनः साँपमे चाँदको डँस लिया। उसके वियोगमें लोरक घोर विलाप करने लगा। दिन बीता रात हुई और वह रोता ही रहा। दूसरे दिन सुबह लोरकने चिता तैयार की और उसपर चाँदको लेकर बैठ गया। इतनेमें एक गुनी आया। उसे देखकर लोरक उसके पाँवपर गिर पड़ा उसने उससे चाँदको जीवित कर देनेका अनुरोध किया और अपना सर्वस्व देनेको कहा। गुनीने लोरकको आश्वस्त किया और मन्त्र पढ़कर पानी छिड़का। तत्काल चाँद का विष उतर गया और वह उठ बैठी। लोरकने सारे आभूषण उतारकर गुनीको दे दिये। (१४५-१६ ) ४४—गारड़ी जाते हुए चाँद और लोरकसे कहता गया कि पाटन डेरा मत जाना और जाना तो दाहिने रास्तेको अपनाना। लेकिन उन्होंने उसकी बात न मानी और चल पड़े। शाम होते-होते वे सारंगपुर पहुँचे। यहाँ लोरकके साथ क्या बीती यह व्यक्त करनेवाले कड़बक हमें उपलब्ध नहीं हैं। किन्तु राणत सारस्वतने जो कथासार दिया है उसके अनुसार सारंगपुर पहुँच कर लोरकने वहाँके राजा महीपतिके साथ जुआ खेला। (युद्धका वृत्तान्त प्राप्त नहीं है पर लोक-कथाके अनुसार लोरक अपना सब-कुछ हार गया और अन्तमें चाँदको भी दाँवपर लगा दिया और उसे भी हार गया। तब चाँदने अपनी चातुरीसे उन्हें पुनः एक बार खेलनेको कहा और महीपतिको अपने सौन्दर्यपर प्रति ऐसा आकृष्ट कर दिया कि वह खेलकी ओर समुचित ध्यान न दे सका और हार गया।) पश्चात् महीपतिको लोरकने मार डाला। महीपतिके मरने पर उसके भाई अहिपतिने रंग फेर दिया। राणत सारस्वतके दिये हुए कथासारके अनुसार पद्मनी मायासे लोरकका दिग्वाइ देना बन्द हो गया। तब चाँदने वीरतापूर्वक हरको मार डाला। (१६०-१७ ) ४५—महीपति और अहिपतिको पराजित कर चाँद और लोरक आगे चले तो सम्भवतः चाँदको पुनः एक बार सांपने काटा और वह मरकर पुनः जीवित हो उठी। (यह अंश अनुपलब्ध है। उपलब्ध कड़बक १७-४ इस घटनाके घटित होनेका अनु- मान मात्र होता है।) जब वह जीवित होकर उठी तो बोली कि देखो भाई कि पंपा ४

५ कहूँ ! मैंने चार स्वप्न देखे । कल रात जब हम वनम पुगे तो एक सिद्ध बाबा किसने हम दोनोंका मिलन कराया । मैंने उनका पैर पकड़ लिया और बोली कि जबतक जीवित रहूँगी तुम्हारी सेवा करूँगी । तब उसने आशीर्वाद देकर कहा कि लोरक तू मेरा भाई है । रास्ते में एक टूंटा योगी है । उधर चाँदाको मत ले जाना । लेकिन अगर तुझ पर कोई कष्ट आये और टूंटा चाँदाको अपहरण कर ले जाय तो ईश्वर का स्मरण कर मुझे स्मरण करना । यह कहकर सिद्ध उठ कर चला गया । (१३०-१७४) ४६—स्वस्थ होकर लोरक और चाँदा पुनः आगे बढे और चार दिन चलनेके बाद एक नगरमें पहुँचे । चाँदाको एक मन्दिरमें बैठाकर लोरक नगरमें खाने-पीनेका सामान लाने गया । टूँडा योगीने चाँदाको देखा और उसके पास आकर सिंगी मार दिया । चाँदा बेसुध हो गयी और उसके पीछे चल पड़ी । जब लोरक लौटकर आया तो मन्दिरको चाँदसे शून्य पाया । वह चाँदाके वियोगमें रोने लगा । रात भर वह चाँदा को खोजता रहा पर वह न मिली । दूसरे दिन वह जगह-जगह चाँदाको पूछता फिरा । एक जगह उसे पता चला कि शामको टूँडेके साथ एक स्त्री जा रही थी । टूँडेको खोजते खोजते उसे एक नगरमें पता लगा कि टूँडेके साथ स्त्री आयी है । लपककर लोरकने उसे जा पकड़ा । लेकिन टूँडेने जब आँख दिखायी तो लोरक भाग चला । तभी उसे सिद्धका वचन स्मरण हो आया । स्मरण करते ही सिद्ध उसके पृष्ठ पर खड़ा हुआ । अब लोरक और टूँटेमें झगडा होने लगा । दोनों ही चाँदाको अपनी पत्नी बताने लगे । चाँदा गूँगी बनी यह सब देखती रही । सिद्धने तब कहा कि तुम आपसमें क्यों लड़ रहे हो । सभाके पास चलकर फैसला करा लो । और तब चारों आदमी—टूंडा लोरक चाँदा और सिद्ध सभामें पहुँचे । यहाँ लोरक और टूँडा दोनों ने अपनी-अपनी बात कहकर चाँदाको अपनी पत्नी बताया । पर दोनोंमेंसे किसीके पास कोई साक्षी न था । सभाने कहा कि चाँदासे पूछो कि वह क्या कहती है । पर टूँडेने ऐसा मन्त्र पढ़ दिया था कि चाँदाको कुछ स्मरण नहीं रह गया था ! (१७५ १८४) (सभाने किस प्रकार लोरकके पक्षमें निर्णय दिया यह वृत्त अनुपलब्ध है)। ४७—इन सब संकटोंपर विजय प्राप्त कर अन्तमें लोरक और चाँदा हरदी पहुँचे । प्रातः काल जिस समय वे हरदीकी सीमामें घुस रहे थे, उसी समय वहाँका राजा सेउत शिकारके लिए बाहर आ रहा था । उसने उन्हें देखा और उनका परिचय प्राप्त करनेके लिए नाई भेजा । नाईने उन्हें एक स्थानपर लाकर ठहराया और उनका परिचय प्राप्त कर लिया । तब राज सेउतने लोरकको बुलवाया और आनेका कारण पूछा । फिर उसका भरपूर सम्मान दिया और नाना प्रकारकी सामग्री उसे भेंट की । दोनों वहाँ आनन्दपूर्वक रहने लगे । (१८४ १९०) ४८—उधर मैना दिन रात लोरकके वापस आनेकी प्रतीक्षा करती हुई रोती रही । एक दिन उसने सुना कि नगरमें सात दिनोंसे कोई टाँड (व्यापारियोंका समूह) आया हुआ है । उसने अपनी साससे कहा कि पता लगाइये वे कहाँसे आये हैं । तब सोखिनने उनके नायक सिरकनको अपने घर बुलवाया और उससे पूछा कि

५१ कि टाँड कहाँसे आ रहा है, क्या वनिज उसने लाद रखा है और कहाँ जायगा ? फिर उसका नाम-धाम कुटुम्ब-परिवारकी बात पूछी और अपनी व्यथा उसे कह सुनायी। यह सुनकर कि टाँड हरदीपाटन जायेगा, लोरिकिन खूब रोयी और मैना आकर उसके पाँवोंपर गिर पड़ी और बताया कि उसके पति लोरकको चाँद भगाकर पाटन ले गयी है। उसने अपनी सारी व्यथा कह सुनाई (कविने विरह व्यथाका वणन बारहमासाके रूपमें किया है)। मैना और लोरिकिन दोनोंने सिरजनसे लोरकके पास जाने और उससे उनकी दीन दुःखीकी अवस्था कहने और वापस आनेका आग्रह करनेका अनुरोध किया। (४१७-४१९) ४९-सिरजन मैनाका सन्देशा लेकर चला और चार मासमें हरदीपाटन जा पहुँचा। लोरकके घरका पता लगाकर वहाँ गया और अपने आनेकी सूचना भेजी। उस समय लोरक सो रहा था। द्वारपालोंने सूचना दी कि बाहर एक पण्डित आकर खड़ा है। सुनते ही लोरक बाहर आया और ब्राह्मणको प्रणाम किया। ब्राह्मणने उसे आशीर्वाद दिया और फिर बैठकर पोथी देखकर राशि आदिकी गणना की और बोला कि तुम्हारा राजपाट गोवरमें है और तुम मैनाके पति हो। छल तुमने भूमिमें डालकर चाँदको आकाशमें चढ़ा रखा है। (४२०-४२४) ५०-मैनाका नाम सुनते ही लोरकका हृदय भरराने लगा। पूछा मैनाकी बात तुमने कहाँ सुनी और चाँदकी बात तुमसे किसने कही ? तुम कहाँसे आये हो ? तुम्हें किसने हरदीपाटन भेजा ? तुम तो परदेशी नहीं, स्वदेशी जान पड़ते हो। हाँ, अगर मैनाका कुशल-क्षेम मिले तो तुम्हारे पैरोंकी धूलि अपने शीशपर लगाऊँ। तब सिरजनने उसे उसके घरकी सारी दुरवस्था कह सुनायी। मैनाकी दुरवस्था सुनकर लोरक रोने लगा और उसके लिए व्याकुल हो उठा। बात करते-करते शाम हो गयी पर ब्राह्मणकी बात समाप्त न हुई। लोरकने सिरजनको स्नान कराकर भोजन कराया और दो लाख दाम (ताँबेका एक सिक्का) और हजार नेव सामग्री भेंट की और कहा कि कल चलूँगा। तुम भी मेरे साथ चलो। (४२४-४३१) ५१-सिरजन की बात सुनकर चाँद का मुख एक दम मलीन हो उठा। उसने समझ लिया कि लोरक अब अपने घर लौट चलेगा। उसने उस रात कुछ नहीं खाया और वह उदासी ही सो रही। (४३२) ५२-दूसरे दिन लोरक पाटनके रायके बुलाने पर उनके पास गया और घरसे आया सन्देशा बताया और अपने मनकी विकलता प्रकट की। तत्काल राजाने उनके जानेकी तैयारी कर दी और साथमें कुछ सैनिक भी कर दिये जो उसे गोवर पहुँचा आयें। चाँदने हरदीसे न जानेके लिए लोरकको समझाने बुझानेकी चेष्टाकी पर लोरकने उसकी एक न सुनी। चाहाको छोड़कर वह गोवरकी ओर चल पड़ा। (४३६-४३५) ५३-जैसे शाम वह गोवर के निकट पहुँचा और वह पड़ाव लोगे लोग वह गया तो देखकर आनन्दित लोरिकने ? घर जाकर सूचना दी कि लोरई राय मैना लेकर

५२ जा रहा है। जब तक वह यहाँ तक आवे, तुम लोग तैयार हो जाओ। यह सुनते ही गोवर नगरमें खलबली मच गयी। सब लोग अपनी अपनी फिक्र करने लगे। लेकिन मैनाको ऐसा लगा कि लोरक आ रहा है। उसने अपनी सास सोधिनसे कहा कि रात बीतते बीतते लोरकका कुछ न कुछ समाचार मिलेगा। रातको उसने लोरकके आनेका स्वप्न देखा है। (४१५-४१९) ५४-सुबह लोरकने माली बुलाया और गोवर जानेको कहा। और कहा कि यह मत कहना कि लोरकने भेजा है। अगर कोई पूछे तो कहना कि अपने आप आया हूँ। तदनुसार मालीने डोलचीमें फूल भर लिये और गोवरमें घर-घर डोल फिरा। फूलोंको देखते ही मैना रो उठी। बोली—फूल उसीको शोभा देता है जिसका पिय घर पर हो। मेरा पति तो परदेशमें बिराज रहा है। मुझे फूल पान कुछ अच्छा नहीं लगता है। फिर वह मालीसे पूछने लगी कि तुम कहाँसे आये हो ? इन फूलोंके बासमें तो मुझे लोरक जान पड़ता है। लगता है लोरकने ही तुम्हें भेजा है। माली बोला—मैं तो परदेशी हूँ और गोवर नगर देखने चला आया। मैंने अब तक तुम्हारे जैसा विरह किसीमें नहीं देखा। तुम अगर दूध लेकर बागमें आओ तो लोरकका समाचार मिलेगा वहीं उससे भेंट होगी। सुबह हुई और मैना अपनी दस सहेलियोंको साथ लेकर दूध कलसी लिये हुए बागमें पहुँची। दही खरीदनेके लिए लोरकने उन अहीरीनोंको बुलाया और मैनाको पहचान कर चाँदसे कहा कि जो सबसे पीछे आ रही है उसका दूध दही लेकर उसे दस गुना दाम देना और विदाईमें सोना चाँदी जैसा समझना देना। तदनुसार चान्दने दूध दही लेकर दाम दिलाया और उन सब दूध वालियोंका सीस सिंसौरा लेकर मौय मरवाया। उसने सिंदूर चन्दन किया पर मैनाने अपना शृंगार नहीं करने दिया। बोली—सिंदूर वह करे जिसका पति हो। मेरा पति तो हरदीमें सो रहा है। जब तक वह मुझे दबो हुए है तब तक मुझे इसकी इच्छा नहीं है। ऐसी कह कर वह अपना दुःख प्रकट करने लगी। जब मैना जाने लगी तो लोरकने रोक लिया और छेड़छाड़ कर उससे रातका भेद लेना चाहा। मैना बिगड़ उठी और क्रुद्ध होकर घर चली गयी। (४२०-४४५) ५५-दूसरे दिन सुबहको फिर अहीरीनें लोरकके शिविरमें गयीं। चाँदने सबको बैठाकर भीतर बुलाया और लोरककी करनी पूछने लगी। मैनाने कहा कि बारह महीने हुए वह चाँदको लेकर भाग गया। अगर कहीं चाँद मिलै तो उसका मुँह काला कर नगर भरमें फिराऊँ। यह सुन चाँद अपनी बड़ाई करने लगी। मैना भाँप गयी और लज्जित होकर चुप रही। लेकिन बातों बातोंमें बात बढ़ गयी और मैना चाँद दोनों परस्पर उल पड़ीं। तब लोरक वहाँ आया और उसने अपनेको प्रकट किया। मैना प्रसन्न हो उठी। लोरकने चाँदको डाँटा और दासियोंको आदेश दिया कि वे जाकर मैनाका शृंगार करें। उसे देखकर लोरक चाँदको भूल गया। रातको

५१

उसने मैनाको मनाया और विश्वास दिलाया कि मैं तुम्हें चाँदसे अधिक प्रेम करता हूँ। उसने चाँद के साथ मिलकर रहनेका उससे अनुरोध किया । ( ४४६ ४४८ ) ५६-गोबरमें यह बात फैल गयी कि मैना आगन्तुकके साथ मैत्री रखती है । साम्बिनने यह बात जाकर अजबीसे कहा और गुहार लगायी । अजबी तत्काल घोड़े पर सवार होकर आया और लोरक भी लड़नेके लिए निकल पड़ा । अजबीने दौड़कर गाँड़ा जगया । लेकिन वह बीचमें ही टूट गया । तब लोरकको उसने पहचाना और दोनों एक दूसरेके गले मिले । अजबीने लोरकसे कहा कि इस तरह छिपे क्यों हो; अपने घर चलो । तत्काल लोरक अपने घर आया और माँके पाँव पड़ा । सोखिनने दोनों बहुओं (चाँद और मैना) को बुलाया । दोनों पाँव पड़कर गले मिलीं और तीनों सुखसे रहने लगीं । सारे गोबरमें प्रसन्नता छा गयी । ( ४४९-४५० ) ५७-लोरकने अपनी माँसे पूछा कि मैना कैसे रही कैसे माह रहे । तब साम्बिनने बताया कि तुम्हारे पीछे बावन आया था । उसने मैनाको गालियाँ दीं । अजबीने आकर मैनाको बचाया । तुम्हारे पीछे महरने नाइ भेजकर मौरुकका कहराया कि लोरक देश छोड़कर हरदीपाटन भाग गया है । मौरु अपनी सेना लेकर आया । कँवरने अकेले उसका सामना किया पर वह अकेला क्या करता मारा गया । एक तो तुम्हारा दुख था दूसरा यह दुख लग गया । दिन भर रोती और रात भर जागती रही हूँ । ( ४५१-४५२ ) (इसके आगेका अंश उपलब्ध नहीं है जिससे कथाके अन्तके सम्बन्धमें कुछ नहीं कहा जा सकता । पर अनुमान होता है कि अपनी माँ की कष्ट-कथा सुनकर लोरक अपने शत्रुओँके विनाशमें रत हुआ होगा; पश्चात् अपनी दोनों प्रेयसियोंके साथ सुख पूर्वक जीवन बिताकर स्वर्ग सिधारा होगा ।)

कथा सम्बन्धी भ्रान्त धारणाएँ

चन्दायनकी कथाका उपयुक्त स्वरूप सामने न रहनेके कारण दो अन्य ग्रन्थोंके आधारपर विद्वानोंने कथाके सम्बन्धमें कुछ अद्भुत कल्पनाएँ प्रस्तुत की हैं। कुछ आगे करनेसे पहले उनका निराकरणकर देना उचित होगा । बगला भाषामें सति मैना उ लोर-चन्दानी नामक एक काव्य ग्रन्थ है जिसकी रचना सत्रहवीं शताब्दी में दौलत काजी और अलाओल नामक कवियोंने की थी । प्रकाशकों के कथनानुसार उनका यह काव्य साधन नामक कविकी गोहारी भाषामें किए काव्यका बँगला रूप है। साधन कविके मैना-सत नामक काव्यकी नागरी और फारसी लिपिमें लिखी अनेक प्रतियाँ मिली हैं। साधन कृत मैना-सत और उपयुक्त प्रस्तुत काव्यके वृत्तान्तमें बहुत साम्य है; अतः कहा जा सकता है कि बगला काव्यका आधार मैना-सत ही रहा होगा । पर उभय पुस्तकोंका तुलनाके लिए दोनों के ई सामग्री प्राप्त नहीं जिसे साधार कुछ कहा जा सके । उभय अध्यायोंमे वासुदेव शरण अग्रवालको स्मरण हुई कि यह योग शायद इस चन्दायण पर आश्रित