चन्दायन (मुल्ला दाऊद - प्राचीनतम अवधी सूफी-प्रेमाख्यान सटीक)
Chandayan of Mulla Daud with Hindi Commentary
मुल्ला दाऊद (१३७९ ई.) / डॉ. परमेश्वरीलाल गुप्त द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें५ कहूँ ! मैंने चार स्वप्न देखे । कल रात जब हम वनम पुगे तो एक सिद्ध बाबा किसने हम दोनोंका मिलन कराया । मैंने उनका पैर पकड़ लिया और बोली कि जबतक जीवित रहूँगी तुम्हारी सेवा करूँगी । तब उसने आशीर्वाद देकर कहा कि लोरक तू मेरा भाई है । रास्ते में एक टूंटा योगी है । उधर चाँदाको मत ले जाना । लेकिन अगर तुझ पर कोई कष्ट आये और टूंटा चाँदाको अपहरण कर ले जाय तो ईश्वर का स्मरण कर मुझे स्मरण करना । यह कहकर सिद्ध उठ कर चला गया । (१३०-१७४) ४६—स्वस्थ होकर लोरक और चाँदा पुनः आगे बढे और चार दिन चलनेके बाद एक नगरमें पहुँचे । चाँदाको एक मन्दिरमें बैठाकर लोरक नगरमें खाने-पीनेका सामान लाने गया । टूँडा योगीने चाँदाको देखा और उसके पास आकर सिंगी मार दिया । चाँदा बेसुध हो गयी और उसके पीछे चल पड़ी । जब लोरक लौटकर आया तो मन्दिरको चाँदसे शून्य पाया । वह चाँदाके वियोगमें रोने लगा । रात भर वह चाँदा को खोजता रहा पर वह न मिली । दूसरे दिन वह जगह-जगह चाँदाको पूछता फिरा । एक जगह उसे पता चला कि शामको टूँडेके साथ एक स्त्री जा रही थी । टूँडेको खोजते खोजते उसे एक नगरमें पता लगा कि टूँडेके साथ स्त्री आयी है । लपककर लोरकने उसे जा पकड़ा । लेकिन टूँडेने जब आँख दिखायी तो लोरक भाग चला । तभी उसे सिद्धका वचन स्मरण हो आया । स्मरण करते ही सिद्ध उसके पृष्ठ पर खड़ा हुआ । अब लोरक और टूँटेमें झगडा होने लगा । दोनों ही चाँदाको अपनी पत्नी बताने लगे । चाँदा गूँगी बनी यह सब देखती रही । सिद्धने तब कहा कि तुम आपसमें क्यों लड़ रहे हो । सभाके पास चलकर फैसला करा लो । और तब चारों आदमी—टूंडा लोरक चाँदा और सिद्ध सभामें पहुँचे । यहाँ लोरक और टूँडा दोनों ने अपनी-अपनी बात कहकर चाँदाको अपनी पत्नी बताया । पर दोनोंमेंसे किसीके पास कोई साक्षी न था । सभाने कहा कि चाँदासे पूछो कि वह क्या कहती है । पर टूँडेने ऐसा मन्त्र पढ़ दिया था कि चाँदाको कुछ स्मरण नहीं रह गया था ! (१७५ १८४) (सभाने किस प्रकार लोरकके पक्षमें निर्णय दिया यह वृत्त अनुपलब्ध है)। ४७—इन सब संकटोंपर विजय प्राप्त कर अन्तमें लोरक और चाँदा हरदी पहुँचे । प्रातः काल जिस समय वे हरदीकी सीमामें घुस रहे थे, उसी समय वहाँका राजा सेउत शिकारके लिए बाहर आ रहा था । उसने उन्हें देखा और उनका परिचय प्राप्त करनेके लिए नाई भेजा । नाईने उन्हें एक स्थानपर लाकर ठहराया और उनका परिचय प्राप्त कर लिया । तब राज सेउतने लोरकको बुलवाया और आनेका कारण पूछा । फिर उसका भरपूर सम्मान दिया और नाना प्रकारकी सामग्री उसे भेंट की । दोनों वहाँ आनन्दपूर्वक रहने लगे । (१८४ १९०) ४८—उधर मैना दिन रात लोरकके वापस आनेकी प्रतीक्षा करती हुई रोती रही । एक दिन उसने सुना कि नगरमें सात दिनोंसे कोई टाँड (व्यापारियोंका समूह) आया हुआ है । उसने अपनी साससे कहा कि पता लगाइये वे कहाँसे आये हैं । तब सोखिनने उनके नायक सिरकनको अपने घर बुलवाया और उससे पूछा कि