चन्दायन (मुल्ला दाऊद - प्राचीनतम अवधी सूफी-प्रेमाख्यान सटीक)
Chandayan of Mulla Daud with Hindi Commentary
मुल्ला दाऊद (१३७९ ई.) / डॉ. परमेश्वरीलाल गुप्त द्वारा
५ कहूँ ! मैंने चार स्वप्न देखे । कल रात जब हम वनम पुगे तो एक सिद्ध बाबा किसने हम दोनोंका मिलन कराया । मैंने उनका पैर पकड़ लिया और बोली कि जबतक जीवित रहूँगी तुम्हारी सेवा करूँगी । तब उसने आशीर्वाद देकर कहा कि लोरक तू मेरा भाई है । रास्ते में एक टूंटा योगी है । उधर चाँदाको मत ले जाना । लेकिन अगर तुझ पर कोई कष्ट आये और टूंटा चाँदाको अपहरण कर ले जाय तो ईश्वर का स्मरण कर मुझे स्मरण करना । यह कहकर सिद्ध उठ कर चला गया । (१३०-१७४) ४६—स्वस्थ होकर लोरक और चाँदा पुनः आगे बढे और चार दिन चलनेके बाद एक नगरमें पहुँचे । चाँदाको एक मन्दिरमें बैठाकर लोरक नगरमें खाने-पीनेका सामान लाने गया । टूँडा योगीने चाँदाको देखा और उसके पास आकर सिंगी मार दिया । चाँदा बेसुध हो गयी और उसके पीछे चल पड़ी । जब लोरक लौटकर आया तो मन्दिरको चाँदसे शून्य पाया । वह चाँदाके वियोगमें रोने लगा । रात भर वह चाँदा को खोजता रहा पर वह न मिली । दूसरे दिन वह जगह-जगह चाँदाको पूछता फिरा । एक जगह उसे पता चला कि शामको टूँडेके साथ एक स्त्री जा रही थी । टूँडेको खोजते खोजते उसे एक नगरमें पता लगा कि टूँडेके साथ स्त्री आयी है । लपककर लोरकने उसे जा पकड़ा । लेकिन टूँडेने जब आँख दिखायी तो लोरक भाग चला । तभी उसे सिद्धका वचन स्मरण हो आया । स्मरण करते ही सिद्ध उसके पृष्ठ पर खड़ा हुआ । अब लोरक और टूँटेमें झगडा होने लगा । दोनों ही चाँदाको अपनी पत्नी बताने लगे । चाँदा गूँगी बनी यह सब देखती रही । सिद्धने तब कहा कि तुम आपसमें क्यों लड़ रहे हो । सभाके पास चलकर फैसला करा लो । और तब चारों आदमी—टूंडा लोरक चाँदा और सिद्ध सभामें पहुँचे । यहाँ लोरक और टूँडा दोनों ने अपनी-अपनी बात कहकर चाँदाको अपनी पत्नी बताया । पर दोनोंमेंसे किसीके पास कोई साक्षी न था । सभाने कहा कि चाँदासे पूछो कि वह क्या कहती है । पर टूँडेने ऐसा मन्त्र पढ़ दिया था कि चाँदाको कुछ स्मरण नहीं रह गया था ! (१७५ १८४) (सभाने किस प्रकार लोरकके पक्षमें निर्णय दिया यह वृत्त अनुपलब्ध है)। ४७—इन सब संकटोंपर विजय प्राप्त कर अन्तमें लोरक और चाँदा हरदी पहुँचे । प्रातः काल जिस समय वे हरदीकी सीमामें घुस रहे थे, उसी समय वहाँका राजा सेउत शिकारके लिए बाहर आ रहा था । उसने उन्हें देखा और उनका परिचय प्राप्त करनेके लिए नाई भेजा । नाईने उन्हें एक स्थानपर लाकर ठहराया और उनका परिचय प्राप्त कर लिया । तब राज सेउतने लोरकको बुलवाया और आनेका कारण पूछा । फिर उसका भरपूर सम्मान दिया और नाना प्रकारकी सामग्री उसे भेंट की । दोनों वहाँ आनन्दपूर्वक रहने लगे । (१८४ १९०) ४८—उधर मैना दिन रात लोरकके वापस आनेकी प्रतीक्षा करती हुई रोती रही । एक दिन उसने सुना कि नगरमें सात दिनोंसे कोई टाँड (व्यापारियोंका समूह) आया हुआ है । उसने अपनी साससे कहा कि पता लगाइये वे कहाँसे आये हैं । तब सोखिनने उनके नायक सिरकनको अपने घर बुलवाया और उससे पूछा कि
५१ कि टाँड कहाँसे आ रहा है, क्या वनिज उसने लाद रखा है और कहाँ जायगा ? फिर उसका नाम-धाम कुटुम्ब-परिवारकी बात पूछी और अपनी व्यथा उसे कह सुनायी। यह सुनकर कि टाँड हरदीपाटन जायेगा, लोरिकिन खूब रोयी और मैना आकर उसके पाँवोंपर गिर पड़ी और बताया कि उसके पति लोरकको चाँद भगाकर पाटन ले गयी है। उसने अपनी सारी व्यथा कह सुनाई (कविने विरह व्यथाका वणन बारहमासाके रूपमें किया है)। मैना और लोरिकिन दोनोंने सिरजनसे लोरकके पास जाने और उससे उनकी दीन दुःखीकी अवस्था कहने और वापस आनेका आग्रह करनेका अनुरोध किया। (४१७-४१९) ४९-सिरजन मैनाका सन्देशा लेकर चला और चार मासमें हरदीपाटन जा पहुँचा। लोरकके घरका पता लगाकर वहाँ गया और अपने आनेकी सूचना भेजी। उस समय लोरक सो रहा था। द्वारपालोंने सूचना दी कि बाहर एक पण्डित आकर खड़ा है। सुनते ही लोरक बाहर आया और ब्राह्मणको प्रणाम किया। ब्राह्मणने उसे आशीर्वाद दिया और फिर बैठकर पोथी देखकर राशि आदिकी गणना की और बोला कि तुम्हारा राजपाट गोवरमें है और तुम मैनाके पति हो। छल तुमने भूमिमें डालकर चाँदको आकाशमें चढ़ा रखा है। (४२०-४२४) ५०-मैनाका नाम सुनते ही लोरकका हृदय भरराने लगा। पूछा मैनाकी बात तुमने कहाँ सुनी और चाँदकी बात तुमसे किसने कही ? तुम कहाँसे आये हो ? तुम्हें किसने हरदीपाटन भेजा ? तुम तो परदेशी नहीं, स्वदेशी जान पड़ते हो। हाँ, अगर मैनाका कुशल-क्षेम मिले तो तुम्हारे पैरोंकी धूलि अपने शीशपर लगाऊँ। तब सिरजनने उसे उसके घरकी सारी दुरवस्था कह सुनायी। मैनाकी दुरवस्था सुनकर लोरक रोने लगा और उसके लिए व्याकुल हो उठा। बात करते-करते शाम हो गयी पर ब्राह्मणकी बात समाप्त न हुई। लोरकने सिरजनको स्नान कराकर भोजन कराया और दो लाख दाम (ताँबेका एक सिक्का) और हजार नेव सामग्री भेंट की और कहा कि कल चलूँगा। तुम भी मेरे साथ चलो। (४२४-४३१) ५१-सिरजन की बात सुनकर चाँद का मुख एक दम मलीन हो उठा। उसने समझ लिया कि लोरक अब अपने घर लौट चलेगा। उसने उस रात कुछ नहीं खाया और वह उदासी ही सो रही। (४३२) ५२-दूसरे दिन लोरक पाटनके रायके बुलाने पर उनके पास गया और घरसे आया सन्देशा बताया और अपने मनकी विकलता प्रकट की। तत्काल राजाने उनके जानेकी तैयारी कर दी और साथमें कुछ सैनिक भी कर दिये जो उसे गोवर पहुँचा आयें। चाँदने हरदीसे न जानेके लिए लोरकको समझाने बुझानेकी चेष्टाकी पर लोरकने उसकी एक न सुनी। चाहाको छोड़कर वह गोवरकी ओर चल पड़ा। (४३६-४३५) ५३-जैसे शाम वह गोवर के निकट पहुँचा और वह पड़ाव लोगे लोग वह गया तो देखकर आनन्दित लोरिकने ? घर जाकर सूचना दी कि लोरई राय मैना लेकर
५२ जा रहा है। जब तक वह यहाँ तक आवे, तुम लोग तैयार हो जाओ। यह सुनते ही गोवर नगरमें खलबली मच गयी। सब लोग अपनी अपनी फिक्र करने लगे। लेकिन मैनाको ऐसा लगा कि लोरक आ रहा है। उसने अपनी सास सोधिनसे कहा कि रात बीतते बीतते लोरकका कुछ न कुछ समाचार मिलेगा। रातको उसने लोरकके आनेका स्वप्न देखा है। (४१५-४१९) ५४-सुबह लोरकने माली बुलाया और गोवर जानेको कहा। और कहा कि यह मत कहना कि लोरकने भेजा है। अगर कोई पूछे तो कहना कि अपने आप आया हूँ। तदनुसार मालीने डोलचीमें फूल भर लिये और गोवरमें घर-घर डोल फिरा। फूलोंको देखते ही मैना रो उठी। बोली—फूल उसीको शोभा देता है जिसका पिय घर पर हो। मेरा पति तो परदेशमें बिराज रहा है। मुझे फूल पान कुछ अच्छा नहीं लगता है। फिर वह मालीसे पूछने लगी कि तुम कहाँसे आये हो ? इन फूलोंके बासमें तो मुझे लोरक जान पड़ता है। लगता है लोरकने ही तुम्हें भेजा है। माली बोला—मैं तो परदेशी हूँ और गोवर नगर देखने चला आया। मैंने अब तक तुम्हारे जैसा विरह किसीमें नहीं देखा। तुम अगर दूध लेकर बागमें आओ तो लोरकका समाचार मिलेगा वहीं उससे भेंट होगी। सुबह हुई और मैना अपनी दस सहेलियोंको साथ लेकर दूध कलसी लिये हुए बागमें पहुँची। दही खरीदनेके लिए लोरकने उन अहीरीनोंको बुलाया और मैनाको पहचान कर चाँदसे कहा कि जो सबसे पीछे आ रही है उसका दूध दही लेकर उसे दस गुना दाम देना और विदाईमें सोना चाँदी जैसा समझना देना। तदनुसार चान्दने दूध दही लेकर दाम दिलाया और उन सब दूध वालियोंका सीस सिंसौरा लेकर मौय मरवाया। उसने सिंदूर चन्दन किया पर मैनाने अपना शृंगार नहीं करने दिया। बोली—सिंदूर वह करे जिसका पति हो। मेरा पति तो हरदीमें सो रहा है। जब तक वह मुझे दबो हुए है तब तक मुझे इसकी इच्छा नहीं है। ऐसी कह कर वह अपना दुःख प्रकट करने लगी। जब मैना जाने लगी तो लोरकने रोक लिया और छेड़छाड़ कर उससे रातका भेद लेना चाहा। मैना बिगड़ उठी और क्रुद्ध होकर घर चली गयी। (४२०-४४५) ५५-दूसरे दिन सुबहको फिर अहीरीनें लोरकके शिविरमें गयीं। चाँदने सबको बैठाकर भीतर बुलाया और लोरककी करनी पूछने लगी। मैनाने कहा कि बारह महीने हुए वह चाँदको लेकर भाग गया। अगर कहीं चाँद मिलै तो उसका मुँह काला कर नगर भरमें फिराऊँ। यह सुन चाँद अपनी बड़ाई करने लगी। मैना भाँप गयी और लज्जित होकर चुप रही। लेकिन बातों बातोंमें बात बढ़ गयी और मैना चाँद दोनों परस्पर उल पड़ीं। तब लोरक वहाँ आया और उसने अपनेको प्रकट किया। मैना प्रसन्न हो उठी। लोरकने चाँदको डाँटा और दासियोंको आदेश दिया कि वे जाकर मैनाका शृंगार करें। उसे देखकर लोरक चाँदको भूल गया। रातको
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उसने मैनाको मनाया और विश्वास दिलाया कि मैं तुम्हें चाँदसे अधिक प्रेम करता हूँ। उसने चाँद के साथ मिलकर रहनेका उससे अनुरोध किया । ( ४४६ ४४८ ) ५६-गोबरमें यह बात फैल गयी कि मैना आगन्तुकके साथ मैत्री रखती है । साम्बिनने यह बात जाकर अजबीसे कहा और गुहार लगायी । अजबी तत्काल घोड़े पर सवार होकर आया और लोरक भी लड़नेके लिए निकल पड़ा । अजबीने दौड़कर गाँड़ा जगया । लेकिन वह बीचमें ही टूट गया । तब लोरकको उसने पहचाना और दोनों एक दूसरेके गले मिले । अजबीने लोरकसे कहा कि इस तरह छिपे क्यों हो; अपने घर चलो । तत्काल लोरक अपने घर आया और माँके पाँव पड़ा । सोखिनने दोनों बहुओं (चाँद और मैना) को बुलाया । दोनों पाँव पड़कर गले मिलीं और तीनों सुखसे रहने लगीं । सारे गोबरमें प्रसन्नता छा गयी । ( ४४९-४५० ) ५७-लोरकने अपनी माँसे पूछा कि मैना कैसे रही कैसे माह रहे । तब साम्बिनने बताया कि तुम्हारे पीछे बावन आया था । उसने मैनाको गालियाँ दीं । अजबीने आकर मैनाको बचाया । तुम्हारे पीछे महरने नाइ भेजकर मौरुकका कहराया कि लोरक देश छोड़कर हरदीपाटन भाग गया है । मौरु अपनी सेना लेकर आया । कँवरने अकेले उसका सामना किया पर वह अकेला क्या करता मारा गया । एक तो तुम्हारा दुख था दूसरा यह दुख लग गया । दिन भर रोती और रात भर जागती रही हूँ । ( ४५१-४५२ ) (इसके आगेका अंश उपलब्ध नहीं है जिससे कथाके अन्तके सम्बन्धमें कुछ नहीं कहा जा सकता । पर अनुमान होता है कि अपनी माँ की कष्ट-कथा सुनकर लोरक अपने शत्रुओँके विनाशमें रत हुआ होगा; पश्चात् अपनी दोनों प्रेयसियोंके साथ सुख पूर्वक जीवन बिताकर स्वर्ग सिधारा होगा ।)
कथा सम्बन्धी भ्रान्त धारणाएँ
चन्दायनकी कथाका उपयुक्त स्वरूप सामने न रहनेके कारण दो अन्य ग्रन्थोंके आधारपर विद्वानोंने कथाके सम्बन्धमें कुछ अद्भुत कल्पनाएँ प्रस्तुत की हैं। कुछ आगे करनेसे पहले उनका निराकरणकर देना उचित होगा । बगला भाषामें सति मैना उ लोर-चन्दानी नामक एक काव्य ग्रन्थ है जिसकी रचना सत्रहवीं शताब्दी में दौलत काजी और अलाओल नामक कवियोंने की थी । प्रकाशकों के कथनानुसार उनका यह काव्य साधन नामक कविकी गोहारी भाषामें किए काव्यका बँगला रूप है। साधन कविके मैना-सत नामक काव्यकी नागरी और फारसी लिपिमें लिखी अनेक प्रतियाँ मिली हैं। साधन कृत मैना-सत और उपयुक्त प्रस्तुत काव्यके वृत्तान्तमें बहुत साम्य है; अतः कहा जा सकता है कि बगला काव्यका आधार मैना-सत ही रहा होगा । पर उभय पुस्तकोंका तुलनाके लिए दोनों के ई सामग्री प्राप्त नहीं जिसे साधार कुछ कहा जा सके । उभय अध्यायोंमे वासुदेव शरण अग्रवालको स्मरण हुई कि यह योग शायद इस चन्दायण पर आश्रित
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होगी।¹ अर्थात उनकी दृष्टिमें दौलत काजीने दाऊदके चन्दायत और साधनके मैना-सतको एकमें जोड़ कर अपने काव्यकी रचना की है, समूचा काव्य साधनकी रचनाका रूपान्तर नहीं है। इस धारणाके फलस्वरूप चन्दायतकी कथाकी कल्पना बँगला लोर-चन्दानी के आधार पर की जाती रही है। परिशिष्टमें हम सति मैना व लोर-चन्दानीकी कथा दे रहे हैं। उसे देखने मात्रसे यह स्पष्ट हो जायेगा कि उक्त बँगला काव्य और चन्दायतके सूक्ष्म लोरक और चाँदाकी प्रेम-कथा होते हुए भी दोनोंके रूप और विस्तारमें इतना अन्तर है कि बँगला काव्यको चन्दायत का रूपान्तर नहीं कहा जा सकता। बँगला काव्यकी कथा चन्दायतकी तुलनामें अत्यन्त संक्षिप्त है। उसमें हरदी- पाटनके मार्गमें लोरक और चाँदाके सामने आनेवाली विपत्तियों और कठिनाइयों की कोई चर्चा नहीं है। इस कथामें लोरक द्वारा मैनाके परित्यागमें चाँदाका कोई योग नहीं है। लोरक स्वेच्छया वनमें जाकर रहने लगता है और वहाँ वह योगीके मुखसे चन्दानीकी रूप-प्रशंसा सुनता है। चन्दायतमें चाँदाकी रूप-प्रशंसा योगी राजा रूपचन्दके सम्मुख करता है जिसका बँगला ग्रन्थमें कोई उल्लेख नहीं है। बँगला कथामें लोरक योगीसे चन्दानीकी रूप-प्रशंसा सुन कर चन्दानीके पिताके राज्यमें जाता है। वहाँ चन्दानी लोरकको देखती है और लोरक चन्दानीकी छबि दर्पणमें देखता है और दोनों एक दूसरे पर आसक्त होते हैं। तदनन्तर लोरक चन्दानीके महलमें प्रवेश करता है और उसे ले भागता है। चाँदाका पति बामन लोरकसे लड़ने आता है और मारा जाता है। लोरक अपने ससुरके राज्यको जीतता है। लौटते समय चन्दानीको साँप काटता है और उसे एक योगी अच्छा करता है। पश्चात् दोनों सुख पूर्वक राज्य करते हैं। बारह वर्ष पश्चात् मैना लोरकके पास ब्राह्मण भेजती है और तब लोरक लौटता है। इन घटनाओँके वर्णनका ढंग भी चन्दायतसे बहुत भिन्न है। कथाके इस रूपसे लग सकता है कि दौलत काजीके सामने लोरक-चाँदाकी दाऊद कथित कहानी नहीं थी। बहुत सम्भव है जैसा कि दौलतकाजी ने कहा है साधनने भी लोरक-चाँदाकी प्रेम कहानी अपने ढंगपर लिखी हो और वह काव्य हमें पूरे रूपमें उपलब्ध न होकर मैना-सत के रूपमें अंशमात्र ही उपलब्ध हो। माताप्रसाद गुप्तकी धारणा है कि साधन कृत मैना-सत चन्दायतके एक प्रसंगके रूपमें कहा गया है। उनकी धारणाका भी आधार दौलतकाजीका ही बँगला काव्य है। चन्दायतकी बम्बईवाली प्रतिके साथ मैना-सतकेके चार पृष्ठ मिले थे, इस बातको उन्होंने अपने कथनका प्रमाण माना है। पर इस तथ्यको सिद्ध करनेके लिए बम्बई प्रतिका साक्ष्य ग्राह्य नहीं है। मैना-सतके ये चार पृष्ठ स्वयं रूपसे
१. भारतीय साहित्य वर्ष ३ अंक १ पृष्ठ १४४। २. भारतीय साहित्य वर्ष ४ अंक १,२ पृ० ४८।
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बम्बईवाली प्रतिमें चन्दायनेके पृष्ठोंसे अलग अन्तमें थे। किसी एक जिल्दमें दो ग्रन्थोंके खण्डित पृष्ठोंका एक साथ होना कोई नवीन बात नहीं है। मैना-सतकी कथा जिसे हम परिशिष्टमें दे रहे हैं, अपने आपमें इतनी पूर्ण और इस ढंगकी है कि उसे किसी प्रकार चन्दायनेम जोड़ा नहीं जा सकता। जिस परिस्थितिमें साधनने मैना-सतमें बारहमासा दिया है, उसी परिस्थितिमें चन्दायनेमें पहलेसे एक बारहमासा मौजूद है। मैना-सतकी मैना अपने घरमें एकाकी है जिसके कारण वह दूतीको, विश्वास कर अपने पास रख लेती है। चन्दायनेकी मैनाके पास उसकी सास जोखिन मौजूद है। उसके रहते दूतीका मैनाको बहका सकना सम्भव नहीं है। मैना-सत किसी भी प्रकार चन्दायनेमें खप नहीं सकता। अतः यह कहना कि मैना-सत चन्दायनेके प्रसंग रूपमें रचाया गया था गलत है। साथ ही इस प्रसंगमें यह बात भी ध्यान देनेकी है कि मैना-सतके प्रत्येक कड़वकमें साधनके नामकी छाप है। किसी पूर्व रचनामें समावेश करनेके लिए रची गयी सामग्रीमें कोई कवि अपना नाम नहीं देता। यह बात पद्मावतके उन अंशोंको देखनेसे स्पष्ट हो जाती है जिन्हें माताप्रसाद गुप्तने प्रक्षिप्त माना है। दूसरी बात यह है कि मैना सतके प्रत्येक कडवकके आरम्भमें एक सोरठा है, जिसका चन्दायनेमें सर्वथा अभाव है। यदि चन्दायनेमें सम्मिलित करनेके लिए मैना-सतकी रचना हुई होती तो उसमें सोरठोंका कदापि प्रयोग न होता। अतः साधन कृत मैना-सत और दोउल काजी कृत सति मैना व लोर चन्दानीके आधारपर चन्दायनेकी कथा आदिके सम्बन्धमें किसी प्रकारकी कल्पना करना भ्रम उत्पन्न करना मात्र है। कथा-स्वरूप की विशिष्टता चन्दायनेकी कथा अपने किसी भी रूपमें भारतीय कथा-साहित्य—संस्कृत या अपभ्रंश—में नहीं पायी जाती। वह अपने आपमें अनूठी है। इसका सबसे बड़ा अनोखापन इस बातमें है कि यह कथा नायक प्रधान न होकर नायिका-प्रधान है। कथाका आरम्भ नायिकाके जन्मसे आरम्भ होता है और उसके जीवनकी घटनाओंको लेकर ही कथा आगे बढ़ती है। उसके सारे पात्र नायिका चाँदाको केन्द्र बनाकर सामने आते हैं। लोरक जिस इस काव्यका नायक कहा जा सकता है, कहीं भी मुख्य पात्रकी तरह उभरा हुआ प्रतीत नहीं होता। कथामें वह हमारे सामने सहदेव-रूपचन्द युद्धके समय पहली बार सहदेवके सहायक वीरके रूपमें आता है। युद्ध-समाप्तिके पश्चात् यदि चाँद उसकी ओर आकृष्ट न होती तो उसका कोई महत्त्व न होता। सामान्यतः नायक ही नायिकाकी प्राप्तिकी चेष्टा किया करते हैं; किन्तु इस प्रकारकी कोई भी चेष्टा लोरककी ओरसे आरम्भ नहीं होती। नायिका चाँद ही सामान्य नायिकाओंके सामान्य स्वभावके सर्वथा प्रतिकूल लोरकको प्राप्त करनेकी ओर सचेष्ट होती है और युक्तिपूर्वक उसको अपनी ओर आकृष्ट करनेका यत्न करती
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है। लोरक चांदा द्वारा आकृष्ट किये जानेके बाद ही उसकी ओर आकृष्ट होता है। वह चांदाके वियोगमें तड़पता अवश्य है पर उसको प्राप्त करनेके निमित्त स्वयं कोई यत्न नहीं करता। चांदा ही अपनी दासी बिरसतके माध्यमसे उसे अपने निकट बुलानेका उपक्रम करती है और उसे अपने पास बुलाती है। चांदा ही लोरकको साथ लेकर भाग चलनेको प्रेरित करती है। चांदाकी प्रेरणासे ही वह गोवर छोड़कर हरदीकी ओर प्रस्थान करता है। मार्गमें जब बामन उससे लड़ने आता है तो चांदा ही उसे उससे बचनेका उपाय बताती है। मार्गकी कठिनाइयोंमें भी चांदा ही प्रधानता लिये दिखायी पड़ती है। लोरक तो उसका सहायक मात्र लगता है। कहनेका तात्पर्य यह है लोरकका सारा कार्य यन्त्रवत है। उसके कार्योंकी सूत्रधार चांदा है। लोरकसे अधिक निश्चय हुआ रूप मैनाका है उसे हम सरलतासे उप- नायिका या सहनायिका कह सकते हैं। यों तो मैना भी लोरककी तरह ही चांदाके माध्यमसे काव्यमें उभार पाती है; पर उभरनेके पश्चात् वह अपना स्वतंत्र अस्तित्व लेकर काव्यके उत्तरार्धपर छा जाती है। वहाँ भी पुरुष पात्रके रूपमें लोरकका किसी प्रकारका निखरा रूप सामने नहीं आता। चन्दायनमें दूसरी उल्लेखनीय बात यह है कि इसके नायक नायिका और उपनायिका तीनों ही विवाहित हैं। नायिका चांदाका विवाह बावनसे हुआ है जिसका स्थान समूचे काव्यमें नगण्य है। उपनायिका मैना मौर्य नायक लोरककी पत्नी है। भारतीय प्रेमकथाओंमें अधिकांशत: हम नायक-नायिकाके रूपमें अविवाहित युवक युवतियोंको ही पाते हैं। उनके प्रेमकथनकी परिणति विवाहमें होती है और कथा समाप्त हो जाती है। कुछ प्रेम-कथाएँ ऐसी अवश्य हैं जिनमें नायक विवाहित होते हुए भी किसी सुन्दरीके प्रति आकृष्ट होता है और उसे प्राप्त करनेकी चेष्टा करता है। पुरुरवा उर्वशी और दुष्यन्त शकुन्तलाकी कथाएँ इसी ढंगकी हैं। पर भारतीय साहित्यमें ऐसी कोई कहानी नहीं मिलती जिसमें कोई नायिका विवाहित होकर किसी पुरुषके प्रति आकृष्ट हुई हो और उसे प्राप्त करनेकी चेष्टाकी हो। हाँ फारसी प्रेमाख्यानों यथा- लैला मजनूँ, शीरीं-फरहाद आदिकी नायिकाएँ विवाहित पायी जाती हैं; किन्तु उनकी भी कोई नायिका स्वतः किसी पुरुषकी ओर आकृष्ट नहीं होती। पुरुष ही अपनी प्रेमकी तीव्रतासे उसे अपनी ओर खींचनेकी चेष्टा करता है। इन तथ्योंपर ध्यान देनेपर कथाका यह अनोखापन अपने आपमें उभर उठता है। चन्दायनकी कथाका एक अनोखापन यह भी है कि नायिका चांदाको नायक लोरकके मिलने तक ही प्रेम-व्यथा सहन करना पड़ता है। उसके पश्चात् जब नायक लोरक उसके निकट आ जाता है तो उसे अपनी प्रेमिकाके अत्यन्त निकट रहते हुए भी वियोगका दुःख भुगतना पड़ता है। उसकी प्रेमिका बार-बार रूठकर अथवा गांठकर उसे दुःखी बनाती रहती है। इस कथामें विरहका वास्तविक भार तो उपनायिका मैनाको सहना पड़ता है। वह लोरकके विरहमें दिन रात झुरती रहती है। इस कथामें यह भी असाधारण बात देखनेको मिलती है कि सामान्य प्रेम
५७ कथाओंकी तरह नायिका-नायकके मिलनेके पश्चात् इस कथाका अन्त नहीं होता। वरन लोरक-चाँदके मिलनेके पश्चात् कथाका विस्तार होता है। तदनन्तर उपनायिका मैनाकी विरहव्यथासे द्रवित होकर, नायिकाकी बातोंको अनसुनी कर लोरक घर लौटता है। लौटकर भी वह सुख-चैनसे नहीं बैठता। आगे भी कुछ करता है, जिसका पता ग्रन्थके खण्डित होनेके कारण हमें नहीं लगता। इस प्रकार चन्दायन किसी निश्चित शैली अथवा परिपाटीमें बँधी प्रेम-कथा नहीं है। उसका लक्ष्य केवल चाँद और लोरकके रूपाकर्षणकी चरम परिणति दिखाना नहीं है। इसमें चाँद और उसके साथ-साथ लोरकका सम्पूर्ण चरित्र उपस्थित किया गया है। इस दृष्टिसे इसे प्रेमाख्यान कहनेकी अपेक्षा चरित-काव्य कहना अधिक संगत होगा। यदि हमारी धारणाके अनुसार चन्दायन चरित-काव्य है तो चाँद और लोरक का ऐतिहासिक अस्तित्व होना चाहिये। किसी जीवन-वृत्तके कल्पना-प्रसूत होनेकी सम्भा- वना बहुत कम होती है। काव्यके रूपमें उसमें कल्पनाके मिश्रणसे अतिरंजना हो सकती है पर उससे मुख्य पात्रोंकी ऐतिहासिकतामें किसी प्रकारकी कमी नहीं आती। चाँद और लोरकके ऐतिहासिक अस्तित्वसे हमारा यह अभिप्राय यह कभी नहीं है कि उनका उल्लेख हमें ऐतिहासिक अथवा पौराणिक ग्रन्थोंमें मिलना ही चाहिये। हो सकता है चांद और लोरक ऐसे लोगोंमें हों जिनकी कहानी इतिहासकारोंको आकृष्ट नहीं कर पायी फिर भी जन-जीवनकी स्मृतियोंमें उनकी याद बनी रही। आधारभूत लोक-कथा चन्दायनकी कथा लोक-जीवनमें प्रचलित कथाका ही साहित्यिक रूप है, इस बातमें तनिक भी सन्देह नहीं रह जाता जब हम नायक लोरक नायिका चाँद और उपनायिका मैना मंजरीके ताने बानेके साथ बुनी गयी उन लोक कथाओंको देखते हैं जो पूर्वी उत्तर प्रदेश, बिहार, बंगाल और छत्तीसगढ़के प्रदेशोंमें बिखरी मिलती हैं। (इन लोक-कथाओंको हम परिशिष्ट रूपमें संकलित कर रहे हैं।) इन सभी कथाओं का बाह्यरूप एक-सा है केवल यत्र-तत्र आन्तरिक घट- नाओंके रूपमें भिन्नता है; कोई घटना किसी कथामें है किसीमें नहीं। उनके तुलनात्मक अध्ययनसे ऐसा जान पड़ता है कि इन लोक कथाओंके वे सभी तत्त्व जो आज हमें बिखरे मिलते हैं किसी समय एक सूत्र में ग्रथित रहे होंगे। समयके साथ कथाके विस्तृत क्षेत्रमें फैलनेपर कहीं पुराने तत्त्व नष्ट हो गये और कहीं नये तत्त्व आकर जुड़ गये। इस दृष्टिको रखकर जब हम इन लोक-कथाओंके साथ चन्दायनकी कथाका अध्ययन करते हैं तो हमें उसमें लोक कथाओंमें बिखरे प्रायः सभी तत्त्व एक साथ मिल जाते हैं। लोरक-चाँदकी प्रेम कथा दाऊदके समयमें सारी प्रचलित लोक कथा रही होगी इसका अनुमान इस बात से हो सकता है कि उनका उल्लेख मैथिल कवि
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व्यतिरिक्त इस समयावधिको जिनका समय चौदहवीं शताब्दीका पूर्वार्द्ध समझा जाता है सुप्रसिद्ध रचना बयरनाफरमें लोरिकनाय्योक्त रूपमें हुआ है। दाऊदने अपनी कथाको लोक जीवनसे ही ग्रहण किया था यह उनके इस कथनसे भी सिद्ध होता है कि उन्होंने उसे किसी मलिक नयनसे सुनकर काव्यका रूप दिया। यह मलिक नयन कोई सामान्य नागरिक थे अथवा कोई विशिष्ट पुरुष, यह कहा नहीं जा सकता। असकरीने उनके सम्बन्धमें अनुमान करते हुए मुनीस-उल- कुलूब नामक ग्रन्थमें बिहार-निवासी सूफ़ी हुसेन नौशाह तौहीद१ जो चौदहवीं शताब्दीमें हुए थे, जीवन ग्रन्थमें उल्लिखित मौलाना नयनका उल्लेख किया है।२ पर यह कोरा अनुमान है। परशुराम चतुर्वेदीने अलीगढ़से प्रकाशित इस्लामिक कल्चर नामक पत्रिकामें छपे हबीबके किसी निबन्धके हवालेसे लिखा है कि चिराग़- ए-देहली शेख़ नसीरुद्दीनके एक मित्र पटना निवासी नाथू नामक कोई सज्जन थे जिन्होंने उन्हें एक बार उपवासके अवसरपर दो रोटियाँ दी थीं। अतः उनका अनु- मान है कि नाथू दाऊदके समकालिक हो सकते हैं। पर इस अनुमानमें भी कोई तथ्य नहीं है। नसीरुद्दीन दाऊदके गुरु ज़ैनुद्दीनके गुरु थे इस कारण उनके समकालिक नाथू दाऊदके समकालिक कदापि नहीं हो सकते। अभिप्राय और रूढ़ियाँ चन्दायन यद्यपि लोक-कथापर आश्रित प्रेम मिश्रित चरित-काव्य है तथापि उसमें कथा-साहित्यमें पाये जाने वाले अभिप्रायों और रूढ़ियोंकी कमी नहीं है। उनका सांगोपांग अध्ययन तो तभी किया जा सकता जब काव्यका पूर्ण रूप हमारे सामने होगा और कथा अपनेमें पूर्ण होगी। फिर भी कुछ अभिप्रायों और रूढ़ियों का तो हम रुख़ देख ही सकते हैं :— (१) क्लीब पति छोड़कर परपुरुषके साथ भाग जाना—अपभ्रंश काव्य रणनेहुरी महाकवि रन्नायणी नामक रानीकी कथा है जिसका पति राजरोगपर काम भोगमें विरत रहता था फलतः रानी कुपित होकर एक सामन्तके साथ भाग गयी। इतिहासमें भी इसी तरहकी एक घटना गुप्तकालमें प्राप्त है जिसकी चर्चा विशाखदत्तने अपने नाटक देवी चन्द्रगुप्तम्में की है। रामगुप्तकी क्लीवताके कारण उसकी पत्नी ध्रुवस्वामिनी चन्द्रगुप्तपर आसक्त हुई और चन्द्रगुप्तने रामगुप्तको मारकर ध्रुवस्वामिनीसे विवाह कर लिया। प्रस्तुत काव्यमें चाँद पतिकी काम-भोगके प्रति उदासीनताके कारण ही नायक आफ़त लोरकपर प्रति आसक्त होती है। (२) नारी द्वारा पुरुषको भगा ले जाना—नारी द्वारा किसी पुरुषको भगा ले जानेकी घटना असामान्य है फिर भी यह भारतीय कथाका एक जाना पहचाना अभिप्राय है। सम्पूर्ण महाभारतमें कुरूराजधानीमें एक प्रसंग है जिसपर एक स्त्री पुरुषको १. बयाज़ हज़रत शाहबाज़िया ३. वही टिप्पणी १ । २. डिस्क्रीप्टिव कैटेलॉग १. १६
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अपहृत कर ले जाती हुई अंकित की गयी है। वर्तमान काव्यम हम चाँडको त्याग करनेके लिए लोरकको प्रेरित करते पाते हैं। (३) रूप-गुण-जन्य आकर्षण—भारतीय प्रेमाख्यानोंम पूर्वानुराग एक मुख्य अभिप्राय है। कथासरित्सागरमें नरवाहनदत्त सखीके मुखसे कपूरसम्भव देशकी राजकुमारी कर्पूरिकाका रूप-गुण सुनकर उसकी ओर आकृष्ट होता है। इसी प्रकार प्रतिष्ठानका राजा पृथ्वीराज बौद्ध भिक्षुके मुखसे मुक्तिपुर द्वीपकी रूपलता नामक कन्या का सौन्दर्य सुनकर उसपर मुग्ध हो जाता है। विक्रमाङ्कदेव चरितम विल्हण चन्द्रलेखाकी प्रशंसा सुन विरह-व्यथासे व्याकुल हो उठता है। ठीक उसी प्रकार इस काव्यम बाजिरके मुखसे चाँदकी रूप-प्रशंसा सुनकर रूपचन्द व्याकुल हो उठता है और उसे प्राप्त करनेकी चेष्टा करता है। (४) अकेले पाकर नायिकाका अपहरण—नायिकाको अकेली छोड़कर किसी कार्यसे नायकके चले जानेपर किसी अन्य व्यक्ति द्वारा उसका अपहरण अनेक भारतीय कथाओंमें पाया जाता है। रामायणमें रामके मृगके पीछे जानेपर रावण द्वारा सीताका अपहरण एक प्रसिद्ध घटना है। प्रस्तुत काव्यमें लोरकके बाजार चले जानेपर मन्दिरमें अकेला पाकर टूँटा द्वारा सम्मोहनकर चन्दाका अपहरण ऐसी ही घटना है। (५) जुएमें पत्नीको दाँवपर लगा देना—जुएमें पत्नीको दाँवपर लगा देना भी भारतीय साहित्यका एक जाना पहिचाना अभिप्राय है। पाण्डवों द्वारा द्रौपदीको दाँवपर हार जानेकी कथा इसका एक प्रसिद्ध उदाहरण है। चन्द्रायानके शेख कयामुद्द नसमें लोरक द्वारा चन्दाको जुएम हारजानेका स्पष्ट उल्लेख है। सम्भवतः दाऊदने भी इसका उल्लेख अपने काव्यमें किया है पर तत्सम्बन्धी अंश अनुपलब्ध होनेसे निश्चय पूर्वक कुछ नहीं कहा जा सकता। (६) पत्नीके सतीत्वकी परीक्षा—पतिसे विलग रही पत्नीके सतीत्वकी परीक्षा रामायणकी एक प्रमुख घटना है। इस काव्यमें भी लोरक हरदीपाटनसे लौटकर मैनाके सतीत्वके परखनेकी चेष्टा करता है। (७) प्रवासी पतिके विरहमें पत्नीका झूरना—प्रवासी पतिके विरहमें दग्ध पत्नियोंकी कथाए अपभ्रंश साहित्यम प्रचुर मात्राम मिलती हैं। यथा—नेमिनाथ फगु, सन्देशरासक, बीसलदेव रास। मैनाका लोरकके वियोगम बिसूरना उसी कोटिका अभिप्राय है। वर्णनात्मकता मौलाना दाऊदने चाँद और लोरकके जीवनमें घटित घटनाओंका जिस रूपमें वर्णन किया है उससे लगता है कि उनका उद्देश्य चाँद और लोरकके चरितके माध्यमसे अपने समयके सामन्तवादी जीवनका यथार्थ चित्रण करना ही रहा है। गोबरसे हरदीपाटन तक विस्तृत पार्श्वमें लोक और जीवनका जो चित्र उन्होंने उपस्थित किया उसमें कहीं भी आदर्शकी झलक दिखाइ नहीं पड़ती।
यद्यपि कविने उन्हीं घटनाओंकी चर्चाकी है जिनका सीधा सम्बन्ध नायिका नायकके जीवनसे है तथापि उसमें युग-जीवनकी विविधता और विस्तार दोनों ही देखा जा सकता है। घटनाएँ वैयक्तिक होते हुए भी सामाजिक और धार्मिक क्षेत्रोंसे सम्बन्ध बनाये हुए हैं। कविन जिस सूक्ष्मताके साथ पारिवारिक जीवन—कन्या विवाह बाल-केलि खान पान कलह-विवाद गूरज बसन साज-सज्जाका परिचय दिया है, उसी सूक्ष्मताके साथ उसने नगर, बाजार हाट, मन्दिर-देवालय भवन प्रासाद, रीति- रिवाज, ज्योतिष शकुन राशिनक्षत्र युद्ध यात्रा जय-पराजयकी भी चर्चाकी है। सर्वत्र उन्होंने अपनी पैनी दृष्टि और सजग बुद्धिका परिचय दिया है। कहना न होगा कि दाऊदने जीवनको अत्यन्त निकटसे देखा था और मानव मनोविज्ञानका भी सूक्ष्म अध्ययन किया था। उनका ज्ञान कोरा पुस्तकीय न था। उदाहरणके लिए चांदा और लोरककी नोंक झोंक चाँद मैनाके वाग्युद्ध और डायाडावीका जैसा चित्रण उन्होंने किया है हूबहू वैसा ही दृश्य पूर्वी उत्तर प्रदेशके किसी गाँवमें आजसे तीस-पैंतीस वर्ष पूर्व नित्य चरसवाहे देखा जा सकता था। वस्तु व्यंजनाकी तरह ही दाऊद ने मानसिक दशाओंका चित्रण भी मार्मिक ढङ्गसे किया है। प्रेम वियोग, मातृ ममता यात्रा कष्ट, विपत्ति शत्रुता मित्रता वीरता आदिके चित्र स्थान स्थान पर उभरे रूपमें सामने आते हैं। किन्तु कविके काव्य प्रतिभाके दर्शन सबसे अधिक चाँदके रूप-सौन्दर्य और लोरकके विरहकी मनोदशाओं के चित्रणमें पाते हैं। वस्तुतः दाऊदने प्रेम और विरहको ही सर्वाधिक और व्यापक रूपसे चित्रित किया है। इनके चित्रणमें अनुभूतिकी गहराई, सच्चाई तीव्रता सभी कुछ निहित है। कहनेका यह तात्पर्य कभी नहीं है कि दाऊदने जो कुछ कहा है वह सर्वथा मौलिक है। चाँदके रूपका साङ्गोपाङ्ग अर्थात् शिख-नख वर्णन शास्त्रमर्यादाके रूपमें ऋतु-चर्चा आदि शास्त्रीय एवं लोक-परम्परा पर ही आश्रित हैं। उनकी उपमाएँ भी परम्परागत ही अधिक हैं। कविक ध्यान प्रकृतिकी ओर भी गया है और अपने दोथों ही बारहमासाओंमें उद्दीपनके रूपम उसने प्राकृतिक वस्तुओंका उल्लेख किया है। गोचर नगरके वर्णनमें वृक्षों और पुष्पोंकी भी चर्चा की है। पर उन्हें हम सूची मात्र ही कह सकते हैं। हाँ, कामी अलङ्कार विधानमें जहाँ उन्होंने प्रकृतिका [उपयोग किया है वहाँ हम उनके प्रकृति निरी-क्षणकी सूक्ष्मताका परिचय मिलता है। यथा— माँग चार सर सेंडुर पूरा। रंग कसा जनु लागकेतूरा ॥ ५।१ बाँभ बैन सुर बाँब बराने। जानु सँचुरी बाग सुहाने ॥ ७२।२ अन्य चार जनु मोतिहिं भरे। लै कै भौंह के तर धरे ॥ २।२ मुख क सोहाग भाल तिल संगू। पदुम कुसुम सिर बैठ भुजंगू ॥ ८५।२ बरै खंड दिसेकी बचा। और खंड पातर कर गुचा ॥ ९ ।४
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चन्द्रायानमें एक बात, जो विशिष्ट रूपमें देखनेमें आती है, वह यह कि दाऊद ने उसे आध्यात्मिकता और दार्शनिकताके बोझसे सर्वथा मुक्त रखा है। वे कहीं भी, परवर्ती प्रेमाख्यानकारोंकी तरह धार्मिक प्रवजकके रूपमें आत्मा-परमात्मा, साधक और साधनाकी बात करते दिखाई नहीं पड़ते। उन्होंने जो कुछ कहा है, वह लौकिक धरातल पर बैठ कर ही कहा है। वे अपने कथनमें इतने सरल हैं कि उन्हें किसी बात की व्याख्या करने अथवा किसी प्रकारका अपना मत प्रकट करनेकी आवश्यकता बहुत ही कम हुई है। समूचे काव्यमें हम ऐसे केवल तीन ही स्थल ढूँढ़ पाये। हो सकता है एक-आध स्थल और भी हों। इन स्थलों पर भी उन्होंने अपनी बात दो चार पंक्तियोंमें कहकर ही समाप्त कर दी है; और उन्हें भी वे कवि-रूपमें स्वयं अपनी ओरसे नहीं कहते। उन्हें अपने पात्रोंके द्वारा प्रसंग रूपमें ही सामने रखा है। ये पंक्तियाँ हैं— १ सतहिं तरे सायर महि भाषा। बिनु सत बूड़े बाइ न पाषा॥ जिन्हि सत होइ सो लागी तीरा। सत कह इम बूह भैंस वीरा॥ सत गुन प्रीति तीर कह काधा। सत छाड़े गुन छोरि बहाथा॥ सत सँभार तो पावहु थाहा। बिनु सत थाह होइ अवगाहा॥ २१० २ बिरह सोक भार सह लीजा। बिरहैं कहूँ जीठ गरु न कीजा॥ बिरह होइ सुप केरि उतारी। बिरह मसंनी कहा सपारी॥ बिरह सो मूँज न आप बढ़ायी। पाडन सोक जिंह चित्त रखथाई॥ २१९ ३ पिरम झार जिह हिरदै लागी। नींद न आव बितत निसि जागी॥ सात सरा बी बरसहिं ल्याई। पिरम आगि कैसें न बुझाई॥ १५३ दाऊद अपने सम्पूर्ण काव्यमें अत्यन्त सयत रहे हैं और किसी बातको बढ़ा चढ़ा कर कहनेकी चेष्टा नहीं की है। कहनेका तात्पर्य यह नहीं कि उन्होंने अत्युक्ति की ही नहीं है। अत्युक्ति कथन तो हिन्दी कवियोंमें स्वभाव-जन्य है और दाऊद उसका अपवाद नहीं है। यत्र तत्र अत्युक्ति दिग्दरी मिलती है पर एक स्थलको छोड़कर अन्यत्र उनकी अत्युक्तियाँ ऐसी हैं जो अस्वाभाविक नहीं लगतीं। जिस स्थलकी ओर हमारा लक्ष्य है उसमें अतिरञ्जना इतनी अधिक है कि वह कृत्रिमताकी सीमाका अतिक्रमण करता जान पड़ता है। वह स्थल है मैनाके विरह-वेदनाका सन्देश ले जाने- वाले सिरजनकी यात्रा भागका। कवि कहता है— बिरह जो पन्थ बाँध कर जाईं। धूअ बरन होई काँप पराईं॥ आँवत पंखि जरथ उड़ गय। बिरम बरन कोइला कर भय॥ धावड सिरजन होइ सँवारा। करिया हठ भाव गुनवारा॥ सायर दाह मैंच दर दहे। रह कँरचवा बनहर जहे॥ अस झार बिरह कै भयी। धरती दाह गगन कह गयी॥
३२ सरग चँदरमा मेल्हा औउर घूंस चंद मधि कार। मिरजब खंभित तुम्हारै कउरे कूद न पार ॥७१६ सूफ़ी तत्वोंका प्रभाव मौलाना दाऊदका प्रत्यक्ष सम्बन्ध सूफ़ी सम्प्रदायके साधकोंसे था। सूफ़ी साधक प्रेमके माध्यमसे परमात्माका नैकट्य प्राप्त करते हैं। उनका प्रेम निराकार ईश्वरके प्रति होता है, इस कारण उनके लिए उसका वर्णन प्रतीक द्वारा ही सम्भव हो पाता है। अतः वे अपने इस प्रेमका वर्णन लौकिक प्रेम-आख्यानक प्रतीकों द्वारा किया करते हैं। वे अपने इस आध्यात्मिक प्रेमके वर्णनमें ईश्वरको नारी रूपमें स्वीकार करते हैं और लौकिक प्रेमके वर्णनमें वे अलौकिक प्रेमकी झलक देखते हैं। दूसरे शब्दोंमें यदि हम कहना चाहें तो कह सकते हैं कि सूफ़ियों द्वारा रचित प्रेमाख्यानक काव्य अन्योक्ति अथवा रूपक (अलेगरी) हुआ करते हैं। वस्तुतः फारसीके अनेक प्रेम काव्य इश्क मजाजी रूपक कहे और माने जाते ही हैं। लैला-मजनू आदि प्रेमाख्यानोंकी गणना इसी ढंगके रूपक कथाओंमें होती है। मुसलमान कवियों द्वारा रचित हिन्दी के अनेक प्रेमाख्यान भी इसी दृष्टिसे सूफ़ियोंकी प्रेम मूलक साधना पद्धतिपर आधारित माने जाते हैं। अतः चन्दायणके सम्बन्धमें भी सहज अनुमान लगाया जा सकता है कि वह भी लौकिक प्रेमके आवरणमे अलौकिक प्रेमको व्यक्त करनेवाला इश्क अर्थात् रूपक ही होगा। इस अनुमानको काव्यके नायक नायिकाके नामसे भी बल मिल सकता है। पद्मावतमें जायसीने रतनसेनको सूरज और पद्मावतीको चाँद कहा है और दोनोंके प्रेम बिरह और मिलनकी बात कही है। चन्दायनमें दाऊदने नायक नायिकाको सीधे-सीधे 'सूरज' और 'चाँद'का नाम दिया है। लोरकका उल्लेख सात स्थान पर कविने सूरज कह कर किया है। यथा— सुरुज समेह चाँद कुँझवारी। १४७।३ चाँद बिरस्पत कै पाँ परी। कान्ह सुरुज देखैंउ एक घरी ॥ १४९।४ चाँद सुचित भै बैठी सुरुज मन्दिर जिह ठाउँ । १५९।२ सुरुज बराहि बिरस्पत बाधी। १६ ।३ प्रेमी प्रेमिकाके प्रसंगमें सूरज चाँदकी सत्तामें विद्वानोंने आध्यात्मिक प्रतीक ढूँढ निकाला है। सूर्य-चन्द्रके प्रतीकात्मक रूपकी व्याख्या करते हुए वासुदेवशरण अग्रवालने लिखा है कि प्रेमकी साधना द्वारा दो पृथक तत्त्व एक-एक दूसरेसे मिलकर अद्वय स्थिति प्राप्त करते हैं। इसी सम्मिश्रणको प्राचीन सिद्धोंकी परिभाषामें युगबद्ध भाव समरस या महासुख कहा गया है। प्रेमी-प्रेमिका की नयी परिभाषामें प्राचीन शिव-शक्ति या सूर्य-चन्द्रके वर्णनाको नया रूप प्राप्त हुआ। पुरुष सूर्य स्त्री चन्द्रमा है। दोनो अद्वय तत्त्वके दो रूप हैं। सिद्ध १ लोरक शब्द लोणार का अपभ्रंश रूप (लोनन्द > लोणारक > लोरारक > लोरक) है।
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आचार्योंने सूर्य-चन्द्र या सोना-रूपा इन परिभाषाओंका बहुधा उल्लेख किया है। बौद्ध आचार्य विनयश्रीके एक गीतमें आया है— चन्दा आदित्ज समरस बोवे अर्थात् चन्द्रमा और आदित्यका समरस देखना ही सिद्धि है। चन्द्रमा और सूर्य जहाँ अपना अपना प्रकाश एकमें मिला देते हैं, अर्थात् समरस बनकर एक हो जाते हैं, वहीं उज्ज्वल प्रकाश हो जाते हैं, चन्द्र-सूर्यके प्रतीकमें सृष्टि और संसार, स्त्री और पुरुष, सोममयी उमा और कालाग्नि रुद्र, इड़ा और पिंगला आदिके प्राचीन प्रतीक पुनः प्रकट हो उठे हैं। सूरज और चाँदकी इस आध्यात्मिक व्याख्याके अनुसार लोरक और चाँद किस सीमा तक आत्मा और परमात्मा के प्रतीक हैं और उनके प्रेममें अलौकिकता कहाँतक देखी जा सकती है, इसका ऊहापोह करनेके पश्चात् ही चन्दायतके रूपक (साक) होनेका निश्चय किया जा सकता है। लौकिक कथाके रूपमें चन्दायतमें प्रेमी-प्रेमिकाके दो युग्म हैं—(१) लोरक और चाँद (२) लोरक और मैना। दोनों ही युग्मोंकी प्रेम-व्यथाकी अभिव्यक्ति दाऊदने चरम रूपमें की है। अतः दोनोंमें ही अलौकिक प्रेम देखनेकी चेष्टा की जा सकती है और दोनोंको ही परमात्मा और आत्माका प्रतीक कहा जा सकता है। पर सूफ़ी दर्शनकी दृष्टिसे विश्लेषण करनेपर दोनों युग्मोंमेंसे किसी युग्ममें आत्मा-परमात्माके अलौकिक प्रेमका रूप नहीं दिखाई पड़ता। सर्वप्रथम चाँदका परकीयत्व ही उसे परमात्माका प्रतीक माननेमें बाधक है। यदि उसकी उपेक्षा कर दी जाय तो भी चाँद और लोरकका जो प्रेम-स्वरूप काव्यमें प्रकट किया गया है उससे सूफ़ी साधकके अलौकिक प्रेमका किसी प्रकार सामंजस्य नहीं होता। परमात्मा रूपी नारी (चाँद) के प्रति साधक रूपी नर (लोरक) के प्रेमकी जो तीव्रता होनी चाहिये उसका काव्यमें सर्वथा अभाव है। काव्यके लौकिक स्वरूपको अलौकिकताके चश्मेसे देखने पर लगेगा कि नारी रूपी परमात्मा ही नररूपी आत्माके पीछे पागल हो रही है। चाँद ही लोरकके प्रति आकृष्ट होती है, वही उसको प्राप्त करनेके लिये सचेष्ट होती है। लोरक तो स्वतः निष्क्रिय यन्त्र-सा बना रहता है निस्पृहता उससे जो कुछ कहती है चुपचाप करता जाता है। सूफ़ी साधनाके अनुसार आत्मा परमात्माके मिलनेके मार्गमें नाना प्रकारकी बाधाएँ आती हैं। यहाँ लोरक और चाँदके मिलनेके पश्चात् उनके मार्गमें बाधाएँ आती हैं और लोरक अपनी प्रेमिकाके निकट होकर भी दूरीका अनुभव करता है और उसके लिए बिसूरता है। इस प्रकार आत्माके परमात्मा तक पहुँच कर फ़ना होने या बक़ाकी स्थिति प्राप्त करने जैसी अवस्था लोरक और चाँदके इस रूपमें दिखाई नहीं देती। १. पद्मावत संजीवनी व्याख्या प्रथम संस्करण प्राक्कथन पृ. १-७।
लोरक-चाँदाका हरदीपाटनमे सुखपूर्वक जीवन व्यतीत करना आत्मा और परमात्माका एककार हो जानेकी चरम परिणतिका रूपक कहा जा सकता है। पर उस स्थितिमे पहुँच कर भी लोरक चाँदामे अपनेको आत्मसात नहीं कर लेता। मैना और परिवारके अन्य लोगोंके लिए उसकी व्याकुलता बनी रहती है। फ़नाके पश्चात् ऐसी स्थिति सूफी अध्यात्मवादकी कल्पनातीत है। अतः सूरज और चाँद नाम होते हुए भी काव्यके नायक नायिकामें आत्मा परमात्माका सूफियाना रूप नहीं झलक सकता। लोरक मैना वाले युग्मके प्रेम-सम्बन्धमें भारतीय नारीकी पातिव्रत्य भावना निहित है। पति रूपमें लोरक उसे छोड़ कर भाग जाता है, मैना उसके लिए बिसूरंती रहती है। यहाँ भी रूपककी दृष्टिसे आत्मा (नर) का परमात्मा (नारी) के प्रति कोई आकर्षण नहीं है जो सूफी साधनाका मूल तत्व है। इस प्रकार स्पष्ट है कि दाऊदके सम्मुख काव्य रचनाके समय कोई सूफी दर्शन नहीं था लोकप्रचलित कथाको काव्य रूप में उपस्थित करना ही अभीष्ट था।
लोक-प्रियता
सूफी साधनाका रूपक न होनेपर भी चन्दायनने सूफी साधकोंको अपनी ओर आकृष्ट किया था। दिल्लीके शेख नसरुद्दीन बाबल रब्बानी अपने धार्मिक प्रवचनोंमें इस काव्यका पाठ किया करते थे। उनका मत था कि इसमें प्रेम और मर्मकी विशालताकी पूर्ति है और धार्मिक तत्व निहित है। लगता है प्रेम और विरहकी तीव्रतासे प्रभावित होकर परवर्ती सूफियोंने खींचतानकर इस काव्यम अपनी भावनाओंको किसी प्रकार आरोपितकर किया था। सामान्य जनतामें भी यह काव्य काफी लोकप्रिय था यह बात तो अबदुलकादिर बदायूनीने स्पष्ट शब्दोंमें लिख दी है। इस ग्रन्थकी अधिकांश उपलब्ध प्रतियोंका सचित्र होना भी इस बातका समर्थन करता है। चित्रकारों और उनके संरक्षकोंको इस काव्यमें अत्यधिक रस मिलता रहा होगा तभी तो उन्होंने एक-एक कडवकको चित्रित करनेका श्रम किया और अपना पैसा बहाया। विद्वानोंमें भी इस ग्रन्थका मान था। हजरत रुकनुद्दीन ने, जो अकबरकालीन सदर उस-सदर (प्रधान न्यायाधीश) शेख अबदुन्नबीके पिता थे, लताफत कुद्दूसिया नामक एक ग्रन्थ लिखा है। उसमें उन्होंने चन्दायनकी प्रशंसाकी है और लिखा है कि उनके पिता हजरत अबदुलकुद्दूस गंगोहीने उसका फारसी अनुवाद किया था किन्तु दुर्भाग्य वश वह दिल्ली सुल्तान बहलोल लोदी और जौनपुर सुल्तान हुसैनशाह शर्कीके बीच युद्धके समय नष्ट हो गया। उन्होंने अपनी स्मृतिसे ६८ वें कड़वककी तीन पंक्तियाँ और उनका अपने पिता द्वारा किया गया फारसी अनुवाद भी अपने ग्रन्थमे उद्धृत किया है।¹
१. 'लतायफे कुद्दूसिया' अथवा न-कुद्दूसई (रिआल) में मुद्रित संस्करण, पृष्ठ १६-२ ।
६५ परवर्ती साहित्यपर प्रभाव हिंदीके परवर्ती मुसलमान कवियोंने चन्दायतको अपनी रचनाओंके निमित्त आदर्श रूपमें स्वीकार किया था, यह तथ्य उनकी रचनाओंको देखने मात्रसे ज्ञात होता है। उन्होंने छन्द-योजना की प्रेरणा चन्दायतसे ली। कुतुबनकी मिरगावति और मंझनकी मधुमालतीमें पाँच चउपई और एक धत्तावाला कडवक मिलता है। चन्दायतकी तरह ही उनके काव्यके आरम्भमें ईश्वर, पैगम्बर, चार-यार, गुरु, शाहेवक्त आदिकी प्रशंसा और उल्लेख पाया जाता है। तदनन्तर सभी काव्य अपना आरम्भ चन्दायतकी तरह ही नगर वर्णनसे करते हैं और तब कथा आगे बढ़ती है। सभी कथाओंमें हम पाते हैं कि नायक अथवा नायिकाके जन्मके पश्चात् ज्योतिषी आते हैं और उनके भविष्यकी घोषणा करते हैं। लोरककी तरह ही सभी काव्योंके नायक योगीका रूप धारण करते हैं। पद्मावतमें रतनसेन पद्मावतीके लिए, मधुमालतिमें मनोहर मधुमालतीके लिए, चित्रावलीमें सुजान चित्रावलीके लिए योगी बनकर निकलते हैं। मिरगावतिका नायक भी योगी होता है। सभी कवि दाऊदकी तरह ही योगी वेश भूषाका चित्रण करते हैं। जिस तरह दाऊदने चांदाके रूप सौन्दर्यको महत्त्व देनेके लिए उसके शिख नखका वर्णन किया है उसी तरह नायिकाओंका रूप वर्णन प्रायः अन्य सभी कवियों ने किया है। जायसी, मंझन, उसमान सभीने केश, मस्तक, शीश, कपाल, भ्रू, नयन, कपोल, नासिका, अधर, दाँत, रसना, कान, ग्रीवा, कण्ठ, कुच, कटि, नितम्ब, वपु, चरण आदिका विशद वर्णन किया है। जिस तरह दाऊदने चाँदाको लेकर हरदीपाटन पहुँचनेतक लोरकके मार्गमें अनेक कठिनाइयोंका उल्लेख किया है, उसी प्रकार अन्य सभी कवि अपनी प्रेयसीकी प्राप्तिके पूर्व नायकोंको अनेक प्रकारकी बाधाओंका सामना करते हुए दिखाते हैं। चाँदाके रूपपर आसक्त होकर लोरक जिस प्रकार घर आकर पड़ रहता है और कुटुम्बके लोग देखने आते हैं, वैद्य आदि बुलाये जाते हैं, उसी प्रकार अन्य काव्योंके प्रेम-दग्ध नायक अथवा नायिकाको देखनेके लिए लोग एकत्र होते और प्रेम-रोग होनेका निदान करते हैं। पद्मावत, मधुमालति, चित्रावली सभीमें यह प्रसंग प्राप्त है। चाँदाकी काम-वेदना और मैनाकी विरह वेदनाकी दीनता व्यक्त करनेके लिए दाऊदने बारहमासाका सहारा लिया है। उसी तरह अन्य कवियोंने भी बारहमासाको अपनाया है। मिरगावत, पदमावत, चित्रावली आदि सभीमें यह पाया जाता है। जिस तरह अपनी विरह व्यथा मैनाने बनजारा फिरन्तसे कहा है उसी तरह मिरगावतिमें रूपमंजरी (रुक्मिनि)ने अपनी व्यथा-गाथा संदेशा बनजारोंकी दासीपा दिया है। इसके अतिरिक्त भी चन्दायतमें प्रस्तुत कुछ अन्य आदर्श ऐसे हैं जो विविध प्रेमाख्यानक काव्योंमें देखे जा सकते हैं।
१६ चन्दायणसे सबसे अधिक प्रभावित पदमावत है। पदमावतकी कथाका उत्तरार्ध जिसे रामचन्द्रशुक्ल एवं कुछ विद्वान् ऐतिहासिक समझते रहे हैं वस्तुतः चन्दायतकी कथाका ही पूर्वार्ध है। नामोंको बदल कर जायसीने उसे अधिकृत रूपसे आत्मसात कर लिया है। चन्दायतमें चाँदको झरोखेपर छबी देखकर बासिर मूर्च्छित होता है और वह आकर रूपचन्दसे उसके रूप सौन्दर्यकी प्रशंसा करता है। उसे सुनकर रूपचन्द गोवरपर आक्रमण करता है। ठीक यही कथा पदमावतकी भी है। इसमें बासिर, चाँद और रूपचन्दके स्थानपर क्रमशः राघव चेतन, पदमावती और अलाउद्दीनका नाम दिया गया है। जिस ढंगसे दाऊदने चाँदका रूप वर्णन किया है ठीक उसी ढंगसे जायसीने पदमावतीका किया है। आगे किस प्रकार सहदेव महर, भोजका आयोजन करते हैं और उसका किस विस्तारके साथ दाऊदने वर्णन किया है ठीक उसी प्रकार हम रतनसेनका भी पदमावतमे भोजका आयोजन करते पाते हैं और उसी विस्तारके साथ जायसीने उसका वर्णन किया है। चाँदके रूप-दर्शनके बाद लोरक बीमार बनकर खाटपर पड़ा रहता है ठीक उसी दशामें हम पदमावतमें पदमावतीके रूप श्रवणके बाद रतनसेनको पाते हैं। चाँदकी प्राप्तिके लिए लोरक योगी बनता है उसी तरह पद्मावतीकी प्राप्तिके लिये रतन सेन भी योगीका रूप धारण करता है। चाँदका लोरककी प्राप्तिके निमित्त और पद्मावतीका रतनसेनके समागमकी प्राप्तिके लिय देव-दर्शनको व्यथा एक-सी घटनाएँ हैं। चन्दायत और पदमावतकी कथाओंमें इसी तरहकी और बहुत सी कथानक सम्बन्धी समानताएँ हैं। ये अद्भुत समानताएँ यह सोचने और कहनेको विवश करती हैं कि जायसी चन्दायतसे पूर्णतः परिचित थे। वे परिचित ही नहीं थे उन्होंने अपनी काव्य रचनामें उसका मुक्त रूपसे उपयोग भी किया है। इस धारणाको इस बातसे और भी बल मिलता है कि पदे पदे पदमावतके वर्णनांश चन्दायतके साथ अत्यधिक भाव-साम्य है। उसके कुछ नमूने इन पंक्तियोंमें देखे जा सकते हैं : चन्दायत \hspace{3cm} पदमावत सिरजसि छाँह सींहु औं सूरा । १।५ \hspace{1cm} कीन्हेसि धूप छाँह औं घामीँ । १।६ पुरुख एक सिरजसि बजियारा। \hspace{1.5cm} कीन्हेसि पुरुष एक निरमरा । नाउँ मुहम्मद जगत पियारा ॥ १।१ \hspace{1.1cm} नाउँ मुहम्मद पूजिव करा ॥ १।११ घडव सिंघ एक पँथहिं रँगाय । \hspace{1.5cm} गढव सिंह रंगहि भुइ बाहहि । भुइ पाट छुहुँ पानि पियारे ॥११।७ \hspace{0.9cm} पुहुप पानि पियाहिं भुइ बाहा ॥ १५।५ एक बाट रानी हुवई \hspace{2.5cm} एक बाट सो सिंघल दोसर रानी महारि । ४११।२ \hspace{1.7cm} दोसर कंक गंभीर ॥ १५ १८
१७ लागहून रैन बाड़ दिन लीन्हा । १४९।१ अगहन दिवस घटा निसि बाढ़ी । आगे परे धीर धीर पावहुँ । अगकहि काहिं पानि पर काँटा । पाछे रहहु सो धूर बजावहु ॥ १ ।३ पछितेहि काहिं न कोइहु बाँटा ॥ १४।७ फूले काँस डाँस सिर ढाये । सरवर सँवरि हंस चलि आये । सारस कुरकहिँ बिछुरिन आये । ४३४।२ सारस कुररहिँ खंजन देखाये ॥ ३७७।१ यही नहीं अनेक स्थानों पर तो पद्मावतमें अविकल रूपसे चन्दायराकी ही शब्दावली देखनेमें आती है । अकस्मात् सामने आये ऐसे तीन-चार उदाहरण हम यहाँ दे रहे हैं : चन्दायण पद्मावत चकवा चकवी बेरि कराई । २९।१ चकइ चउया केलि कराही । ३३।५ चाँद भौरहर ऊपर गयी । १४८।७ पदुमति भौराहर चढ़ी । २७८।१ पंडित बइ सभाव बुकाये । १६९।३ ओझा बैठ सपान बोकावे । १२ ।१ ठिकक हुआइस मशाक काढ़ा । ४२ ।२ तिलुक हुआइस मशाक दीन्हे । १ ९।३ ध्यानसे देखनेपर इस तरहकी पंक्तियाँ बड़ी मात्रामें पायी जा सकती हैं । इन सबको मात्र आकस्मिक सदृशारजन्य अथवा किसी अविच्छिन्न विचार परम्पराका परिणाम कहना किसीके लिए भी कठिन ही नहीं असम्भव होगा ।
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चन्दायण ( टिप्पणी सहित मूल पाठ )