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चन्दायन (मुल्ला दाऊद - प्राचीनतम अवधी सूफी-प्रेमाख्यान सटीक)

चन्दायन (मुल्ला दाऊद - प्राचीनतम अवधी सूफी-प्रेमाख्यान सटीक)

Chandayan of Mulla Daud with Hindi Commentary

मुल्ला दाऊद (१३७९ ई.) / डॉ. परमेश्वरीलाल गुप्त द्वारा

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यद्यपि कविने उन्हीं घटनाओंकी चर्चाकी है जिनका सीधा सम्बन्ध नायिका नायकके जीवनसे है तथापि उसमें युग-जीवनकी विविधता और विस्तार दोनों ही देखा जा सकता है। घटनाएँ वैयक्तिक होते हुए भी सामाजिक और धार्मिक क्षेत्रोंसे सम्बन्ध बनाये हुए हैं। कविन जिस सूक्ष्मताके साथ पारिवारिक जीवन—कन्या विवाह बाल-केलि खान पान कलह-विवाद गूरज बसन साज-सज्जाका परिचय दिया है, उसी सूक्ष्मताके साथ उसने नगर, बाजार हाट, मन्दिर-देवालय भवन प्रासाद, रीति- रिवाज, ज्योतिष शकुन राशिनक्षत्र युद्ध यात्रा जय-पराजयकी भी चर्चाकी है। सर्वत्र उन्होंने अपनी पैनी दृष्टि और सजग बुद्धिका परिचय दिया है। कहना न होगा कि दाऊदने जीवनको अत्यन्त निकटसे देखा था और मानव मनोविज्ञानका भी सूक्ष्म अध्ययन किया था। उनका ज्ञान कोरा पुस्तकीय न था। उदाहरणके लिए चांदा और लोरककी नोंक झोंक चाँद मैनाके वाग्युद्ध और डायाडावीका जैसा चित्रण उन्होंने किया है हूबहू वैसा ही दृश्य पूर्वी उत्तर प्रदेशके किसी गाँवमें आजसे तीस-पैंतीस वर्ष पूर्व नित्य चरसवाहे देखा जा सकता था। वस्तु व्यंजनाकी तरह ही दाऊद ने मानसिक दशाओंका चित्रण भी मार्मिक ढङ्गसे किया है। प्रेम वियोग, मातृ ममता यात्रा कष्ट, विपत्ति शत्रुता मित्रता वीरता आदिके चित्र स्थान स्थान पर उभरे रूपमें सामने आते हैं। किन्तु कविके काव्य प्रतिभाके दर्शन सबसे अधिक चाँदके रूप-सौन्दर्य और लोरकके विरहकी मनोदशाओं के चित्रणमें पाते हैं। वस्तुतः दाऊदने प्रेम और विरहको ही सर्वाधिक और व्यापक रूपसे चित्रित किया है। इनके चित्रणमें अनुभूतिकी गहराई, सच्चाई तीव्रता सभी कुछ निहित है। कहनेका यह तात्पर्य कभी नहीं है कि दाऊदने जो कुछ कहा है वह सर्वथा मौलिक है। चाँदके रूपका साङ्गोपाङ्ग अर्थात् शिख-नख वर्णन शास्त्रमर्यादाके रूपमें ऋतु-चर्चा आदि शास्त्रीय एवं लोक-परम्परा पर ही आश्रित हैं। उनकी उपमाएँ भी परम्परागत ही अधिक हैं। कविक ध्यान प्रकृतिकी ओर भी गया है और अपने दोथों ही बारहमासाओंमें उद्दीपनके रूपम उसने प्राकृतिक वस्तुओंका उल्लेख किया है। गोचर नगरके वर्णनमें वृक्षों और पुष्पोंकी भी चर्चा की है। पर उन्हें हम सूची मात्र ही कह सकते हैं। हाँ, कामी अलङ्कार विधानमें जहाँ उन्होंने प्रकृतिका [उपयोग किया है वहाँ हम उनके प्रकृति निरी-क्षणकी सूक्ष्मताका परिचय मिलता है। यथा— माँग चार सर सेंडुर पूरा। रंग कसा जनु लागकेतूरा ॥ ५।१ बाँभ बैन सुर बाँब बराने। जानु सँचुरी बाग सुहाने ॥ ७२।२ अन्य चार जनु मोतिहिं भरे। लै कै भौंह के तर धरे ॥ २।२ मुख क सोहाग भाल तिल संगू। पदुम कुसुम सिर बैठ भुजंगू ॥ ८५।२ बरै खंड दिसेकी बचा। और खंड पातर कर गुचा ॥ ९ ।४