भारतकोश
संग्रह पर लौटें

चन्दायन (मुल्ला दाऊद - प्राचीनतम अवधी सूफी-प्रेमाख्यान सटीक)

Chandayan of Mulla Daud with Hindi Commentary

मुल्ला दाऊद (१३७९ ई.) / डॉ. परमेश्वरीलाल गुप्त द्वारा

DevanagariAwadhipublished520 पृष्ठ

यद्यपि कविने उन्हीं घटनाओंकी चर्चाकी है जिनका सीधा सम्बन्ध नायिका नायकके जीवनसे है तथापि उसमें युग-जीवनकी विविधता और विस्तार दोनों ही देखा जा सकता है। घटनाएँ वैयक्तिक होते हुए भी सामाजिक और धार्मिक क्षेत्रोंसे सम्बन्ध बनाये हुए हैं। कविन जिस सूक्ष्मताके साथ पारिवारिक जीवन—कन्या विवाह बाल-केलि खान पान कलह-विवाद गूरज बसन साज-सज्जाका परिचय दिया है, उसी सूक्ष्मताके साथ उसने नगर, बाजार हाट, मन्दिर-देवालय भवन प्रासाद, रीति- रिवाज, ज्योतिष शकुन राशिनक्षत्र युद्ध यात्रा जय-पराजयकी भी चर्चाकी है। सर्वत्र उन्होंने अपनी पैनी दृष्टि और सजग बुद्धिका परिचय दिया है। कहना न होगा कि दाऊदने जीवनको अत्यन्त निकटसे देखा था और मानव मनोविज्ञानका भी सूक्ष्म अध्ययन किया था। उनका ज्ञान कोरा पुस्तकीय न था। उदाहरणके लिए चांदा और लोरककी नोंक झोंक चाँद मैनाके वाग्युद्ध और डायाडावीका जैसा चित्रण उन्होंने किया है हूबहू वैसा ही दृश्य पूर्वी उत्तर प्रदेशके किसी गाँवमें आजसे तीस-पैंतीस वर्ष पूर्व नित्य चरसवाहे देखा जा सकता था। वस्तु व्यंजनाकी तरह ही दाऊद ने मानसिक दशाओंका चित्रण भी मार्मिक ढङ्गसे किया है। प्रेम वियोग, मातृ ममता यात्रा कष्ट, विपत्ति शत्रुता मित्रता वीरता आदिके चित्र स्थान स्थान पर उभरे रूपमें सामने आते हैं। किन्तु कविके काव्य प्रतिभाके दर्शन सबसे अधिक चाँदके रूप-सौन्दर्य और लोरकके विरहकी मनोदशाओं के चित्रणमें पाते हैं। वस्तुतः दाऊदने प्रेम और विरहको ही सर्वाधिक और व्यापक रूपसे चित्रित किया है। इनके चित्रणमें अनुभूतिकी गहराई, सच्चाई तीव्रता सभी कुछ निहित है। कहनेका यह तात्पर्य कभी नहीं है कि दाऊदने जो कुछ कहा है वह सर्वथा मौलिक है। चाँदके रूपका साङ्गोपाङ्ग अर्थात् शिख-नख वर्णन शास्त्रमर्यादाके रूपमें ऋतु-चर्चा आदि शास्त्रीय एवं लोक-परम्परा पर ही आश्रित हैं। उनकी उपमाएँ भी परम्परागत ही अधिक हैं। कविक ध्यान प्रकृतिकी ओर भी गया है और अपने दोथों ही बारहमासाओंमें उद्दीपनके रूपम उसने प्राकृतिक वस्तुओंका उल्लेख किया है। गोचर नगरके वर्णनमें वृक्षों और पुष्पोंकी भी चर्चा की है। पर उन्हें हम सूची मात्र ही कह सकते हैं। हाँ, कामी अलङ्कार विधानमें जहाँ उन्होंने प्रकृतिका [उपयोग किया है वहाँ हम उनके प्रकृति निरी-क्षणकी सूक्ष्मताका परिचय मिलता है। यथा— माँग चार सर सेंडुर पूरा। रंग कसा जनु लागकेतूरा ॥ ५।१ बाँभ बैन सुर बाँब बराने। जानु सँचुरी बाग सुहाने ॥ ७२।२ अन्य चार जनु मोतिहिं भरे। लै कै भौंह के तर धरे ॥ २।२ मुख क सोहाग भाल तिल संगू। पदुम कुसुम सिर बैठ भुजंगू ॥ ८५।२ बरै खंड दिसेकी बचा। और खंड पातर कर गुचा ॥ ९ ।४

६१

चन्द्रायानमें एक बात, जो विशिष्ट रूपमें देखनेमें आती है, वह यह कि दाऊद ने उसे आध्यात्मिकता और दार्शनिकताके बोझसे सर्वथा मुक्त रखा है। वे कहीं भी, परवर्ती प्रेमाख्यानकारोंकी तरह धार्मिक प्रवजकके रूपमें आत्मा-परमात्मा, साधक और साधनाकी बात करते दिखाई नहीं पड़ते। उन्होंने जो कुछ कहा है, वह लौकिक धरातल पर बैठ कर ही कहा है। वे अपने कथनमें इतने सरल हैं कि उन्हें किसी बात की व्याख्या करने अथवा किसी प्रकारका अपना मत प्रकट करनेकी आवश्यकता बहुत ही कम हुई है। समूचे काव्यमें हम ऐसे केवल तीन ही स्थल ढूँढ़ पाये। हो सकता है एक-आध स्थल और भी हों। इन स्थलों पर भी उन्होंने अपनी बात दो चार पंक्तियोंमें कहकर ही समाप्त कर दी है; और उन्हें भी वे कवि-रूपमें स्वयं अपनी ओरसे नहीं कहते। उन्हें अपने पात्रोंके द्वारा प्रसंग रूपमें ही सामने रखा है। ये पंक्तियाँ हैं— १ सतहिं तरे सायर महि भाषा। बिनु सत बूड़े बाइ न पाषा॥ जिन्हि सत होइ सो लागी तीरा। सत कह इम बूह भैंस वीरा॥ सत गुन प्रीति तीर कह काधा। सत छाड़े गुन छोरि बहाथा॥ सत सँभार तो पावहु थाहा। बिनु सत थाह होइ अवगाहा॥ २१० २ बिरह सोक भार सह लीजा। बिरहैं कहूँ जीठ गरु न कीजा॥ बिरह होइ सुप केरि उतारी। बिरह मसंनी कहा सपारी॥ बिरह सो मूँज न आप बढ़ायी। पाडन सोक जिंह चित्त रखथाई॥ २१९ ३ पिरम झार जिह हिरदै लागी। नींद न आव बितत निसि जागी॥ सात सरा बी बरसहिं ल्याई। पिरम आगि कैसें न बुझाई॥ १५३ दाऊद अपने सम्पूर्ण काव्यमें अत्यन्त सयत रहे हैं और किसी बातको बढ़ा चढ़ा कर कहनेकी चेष्टा नहीं की है। कहनेका तात्पर्य यह नहीं कि उन्होंने अत्युक्ति की ही नहीं है। अत्युक्ति कथन तो हिन्दी कवियोंमें स्वभाव-जन्य है और दाऊद उसका अपवाद नहीं है। यत्र तत्र अत्युक्ति दिग्दरी मिलती है पर एक स्थलको छोड़कर अन्यत्र उनकी अत्युक्तियाँ ऐसी हैं जो अस्वाभाविक नहीं लगतीं। जिस स्थलकी ओर हमारा लक्ष्य है उसमें अतिरञ्जना इतनी अधिक है कि वह कृत्रिमताकी सीमाका अतिक्रमण करता जान पड़ता है। वह स्थल है मैनाके विरह-वेदनाका सन्देश ले जाने- वाले सिरजनकी यात्रा भागका। कवि कहता है— बिरह जो पन्थ बाँध कर जाईं। धूअ बरन होई काँप पराईं॥ आँवत पंखि जरथ उड़ गय। बिरम बरन कोइला कर भय॥ धावड सिरजन होइ सँवारा। करिया हठ भाव गुनवारा॥ सायर दाह मैंच दर दहे। रह कँरचवा बनहर जहे॥ अस झार बिरह कै भयी। धरती दाह गगन कह गयी॥

३२ सरग चँदरमा मेल्हा औउर घूंस चंद मधि कार। मिरजब खंभित तुम्हारै कउरे कूद न पार ॥७१६ सूफ़ी तत्वोंका प्रभाव मौलाना दाऊदका प्रत्यक्ष सम्बन्ध सूफ़ी सम्प्रदायके साधकोंसे था। सूफ़ी साधक प्रेमके माध्यमसे परमात्माका नैकट्य प्राप्त करते हैं। उनका प्रेम निराकार ईश्वरके प्रति होता है, इस कारण उनके लिए उसका वर्णन प्रतीक द्वारा ही सम्भव हो पाता है। अतः वे अपने इस प्रेमका वर्णन लौकिक प्रेम-आख्यानक प्रतीकों द्वारा किया करते हैं। वे अपने इस आध्यात्मिक प्रेमके वर्णनमें ईश्वरको नारी रूपमें स्वीकार करते हैं और लौकिक प्रेमके वर्णनमें वे अलौकिक प्रेमकी झलक देखते हैं। दूसरे शब्दोंमें यदि हम कहना चाहें तो कह सकते हैं कि सूफ़ियों द्वारा रचित प्रेमाख्यानक काव्य अन्योक्ति अथवा रूपक (अलेगरी) हुआ करते हैं। वस्तुतः फारसीके अनेक प्रेम काव्य इश्क मजाजी रूपक कहे और माने जाते ही हैं। लैला-मजनू आदि प्रेमाख्यानोंकी गणना इसी ढंगके रूपक कथाओंमें होती है। मुसलमान कवियों द्वारा रचित हिन्दी के अनेक प्रेमाख्यान भी इसी दृष्टिसे सूफ़ियोंकी प्रेम मूलक साधना पद्धतिपर आधारित माने जाते हैं। अतः चन्दायणके सम्बन्धमें भी सहज अनुमान लगाया जा सकता है कि वह भी लौकिक प्रेमके आवरणमे अलौकिक प्रेमको व्यक्त करनेवाला इश्क अर्थात् रूपक ही होगा। इस अनुमानको काव्यके नायक नायिकाके नामसे भी बल मिल सकता है। पद्मावतमें जायसीने रतनसेनको सूरज और पद्मावतीको चाँद कहा है और दोनोंके प्रेम बिरह और मिलनकी बात कही है। चन्दायनमें दाऊदने नायक नायिकाको सीधे-सीधे 'सूरज' और 'चाँद'का नाम दिया है। लोरकका उल्लेख सात स्थान पर कविने सूरज कह कर किया है। यथा— सुरुज समेह चाँद कुँझवारी। १४७।३ चाँद बिरस्पत कै पाँ परी। कान्ह सुरुज देखैंउ एक घरी ॥ १४९।४ चाँद सुचित भै बैठी सुरुज मन्दिर जिह ठाउँ । १५९।२ सुरुज बराहि बिरस्पत बाधी। १६ ।३ प्रेमी प्रेमिकाके प्रसंगमें सूरज चाँदकी सत्तामें विद्वानोंने आध्यात्मिक प्रतीक ढूँढ निकाला है। सूर्य-चन्द्रके प्रतीकात्मक रूपकी व्याख्या करते हुए वासुदेवशरण अग्रवालने लिखा है कि प्रेमकी साधना द्वारा दो पृथक तत्त्व एक-एक दूसरेसे मिलकर अद्वय स्थिति प्राप्त करते हैं। इसी सम्मिश्रणको प्राचीन सिद्धोंकी परिभाषामें युगबद्ध भाव समरस या महासुख कहा गया है। प्रेमी-प्रेमिका की नयी परिभाषामें प्राचीन शिव-शक्ति या सूर्य-चन्द्रके वर्णनाको नया रूप प्राप्त हुआ। पुरुष सूर्य स्त्री चन्द्रमा है। दोनो अद्वय तत्त्वके दो रूप हैं। सिद्ध १ लोरक शब्द लोणार का अपभ्रंश रूप (लोनन्द > लोणारक > लोरारक > लोरक) है।

५३

आचार्योंने सूर्य-चन्द्र या सोना-रूपा इन परिभाषाओंका बहुधा उल्लेख किया है। बौद्ध आचार्य विनयश्रीके एक गीतमें आया है— चन्दा आदित्ज समरस बोवे अर्थात् चन्द्रमा और आदित्यका समरस देखना ही सिद्धि है। चन्द्रमा और सूर्य जहाँ अपना अपना प्रकाश एकमें मिला देते हैं, अर्थात् समरस बनकर एक हो जाते हैं, वहीं उज्ज्वल प्रकाश हो जाते हैं, चन्द्र-सूर्यके प्रतीकमें सृष्टि और संसार, स्त्री और पुरुष, सोममयी उमा और कालाग्नि रुद्र, इड़ा और पिंगला आदिके प्राचीन प्रतीक पुनः प्रकट हो उठे हैं। सूरज और चाँदकी इस आध्यात्मिक व्याख्याके अनुसार लोरक और चाँद किस सीमा तक आत्मा और परमात्मा के प्रतीक हैं और उनके प्रेममें अलौकिकता कहाँतक देखी जा सकती है, इसका ऊहापोह करनेके पश्चात् ही चन्दायतके रूपक (साक) होनेका निश्चय किया जा सकता है। लौकिक कथाके रूपमें चन्दायतमें प्रेमी-प्रेमिकाके दो युग्म हैं—(१) लोरक और चाँद (२) लोरक और मैना। दोनों ही युग्मोंकी प्रेम-व्यथाकी अभिव्यक्ति दाऊदने चरम रूपमें की है। अतः दोनोंमें ही अलौकिक प्रेम देखनेकी चेष्टा की जा सकती है और दोनोंको ही परमात्मा और आत्माका प्रतीक कहा जा सकता है। पर सूफ़ी दर्शनकी दृष्टिसे विश्लेषण करनेपर दोनों युग्मोंमेंसे किसी युग्ममें आत्मा-परमात्माके अलौकिक प्रेमका रूप नहीं दिखाई पड़ता। सर्वप्रथम चाँदका परकीयत्व ही उसे परमात्माका प्रतीक माननेमें बाधक है। यदि उसकी उपेक्षा कर दी जाय तो भी चाँद और लोरकका जो प्रेम-स्वरूप काव्यमें प्रकट किया गया है उससे सूफ़ी साधकके अलौकिक प्रेमका किसी प्रकार सामंजस्य नहीं होता। परमात्मा रूपी नारी (चाँद) के प्रति साधक रूपी नर (लोरक) के प्रेमकी जो तीव्रता होनी चाहिये उसका काव्यमें सर्वथा अभाव है। काव्यके लौकिक स्वरूपको अलौकिकताके चश्मेसे देखने पर लगेगा कि नारी रूपी परमात्मा ही नररूपी आत्माके पीछे पागल हो रही है। चाँद ही लोरकके प्रति आकृष्ट होती है, वही उसको प्राप्त करनेके लिये सचेष्ट होती है। लोरक तो स्वतः निष्क्रिय यन्त्र-सा बना रहता है निस्पृहता उससे जो कुछ कहती है चुपचाप करता जाता है। सूफ़ी साधनाके अनुसार आत्मा परमात्माके मिलनेके मार्गमें नाना प्रकारकी बाधाएँ आती हैं। यहाँ लोरक और चाँदके मिलनेके पश्चात् उनके मार्गमें बाधाएँ आती हैं और लोरक अपनी प्रेमिकाके निकट होकर भी दूरीका अनुभव करता है और उसके लिए बिसूरता है। इस प्रकार आत्माके परमात्मा तक पहुँच कर फ़ना होने या बक़ाकी स्थिति प्राप्त करने जैसी अवस्था लोरक और चाँदके इस रूपमें दिखाई नहीं देती। १. पद्मावत संजीवनी व्याख्या प्रथम संस्करण प्राक्कथन पृ. १-७।

लोरक-चाँदाका हरदीपाटनमे सुखपूर्वक जीवन व्यतीत करना आत्मा और परमात्माका एककार हो जानेकी चरम परिणतिका रूपक कहा जा सकता है। पर उस स्थितिमे पहुँच कर भी लोरक चाँदामे अपनेको आत्मसात नहीं कर लेता। मैना और परिवारके अन्य लोगोंके लिए उसकी व्याकुलता बनी रहती है। फ़नाके पश्चात् ऐसी स्थिति सूफी अध्यात्मवादकी कल्पनातीत है। अतः सूरज और चाँद नाम होते हुए भी काव्यके नायक नायिकामें आत्मा परमात्माका सूफियाना रूप नहीं झलक सकता। लोरक मैना वाले युग्मके प्रेम-सम्बन्धमें भारतीय नारीकी पातिव्रत्य भावना निहित है। पति रूपमें लोरक उसे छोड़ कर भाग जाता है, मैना उसके लिए बिसूरंती रहती है। यहाँ भी रूपककी दृष्टिसे आत्मा (नर) का परमात्मा (नारी) के प्रति कोई आकर्षण नहीं है जो सूफी साधनाका मूल तत्व है। इस प्रकार स्पष्ट है कि दाऊदके सम्मुख काव्य रचनाके समय कोई सूफी दर्शन नहीं था लोकप्रचलित कथाको काव्य रूप में उपस्थित करना ही अभीष्ट था।

लोक-प्रियता

सूफी साधनाका रूपक न होनेपर भी चन्दायनने सूफी साधकोंको अपनी ओर आकृष्ट किया था। दिल्लीके शेख नसरुद्दीन बाबल रब्बानी अपने धार्मिक प्रवचनोंमें इस काव्यका पाठ किया करते थे। उनका मत था कि इसमें प्रेम और मर्मकी विशालताकी पूर्ति है और धार्मिक तत्व निहित है। लगता है प्रेम और विरहकी तीव्रतासे प्रभावित होकर परवर्ती सूफियोंने खींचतानकर इस काव्यम अपनी भावनाओंको किसी प्रकार आरोपितकर किया था। सामान्य जनतामें भी यह काव्य काफी लोकप्रिय था यह बात तो अबदुलकादिर बदायूनीने स्पष्ट शब्दोंमें लिख दी है। इस ग्रन्थकी अधिकांश उपलब्ध प्रतियोंका सचित्र होना भी इस बातका समर्थन करता है। चित्रकारों और उनके संरक्षकोंको इस काव्यमें अत्यधिक रस मिलता रहा होगा तभी तो उन्होंने एक-एक कडवकको चित्रित करनेका श्रम किया और अपना पैसा बहाया। विद्वानोंमें भी इस ग्रन्थका मान था। हजरत रुकनुद्दीन ने, जो अकबरकालीन सदर उस-सदर (प्रधान न्यायाधीश) शेख अबदुन्नबीके पिता थे, लताफत कुद्दूसिया नामक एक ग्रन्थ लिखा है। उसमें उन्होंने चन्दायनकी प्रशंसाकी है और लिखा है कि उनके पिता हजरत अबदुलकुद्दूस गंगोहीने उसका फारसी अनुवाद किया था किन्तु दुर्भाग्य वश वह दिल्ली सुल्तान बहलोल लोदी और जौनपुर सुल्तान हुसैनशाह शर्कीके बीच युद्धके समय नष्ट हो गया। उन्होंने अपनी स्मृतिसे ६८ वें कड़वककी तीन पंक्तियाँ और उनका अपने पिता द्वारा किया गया फारसी अनुवाद भी अपने ग्रन्थमे उद्धृत किया है।¹


१. 'लतायफे कुद्दूसिया' अथवा न-कुद्दूसई (रिआल) में मुद्रित संस्करण, पृष्ठ १६-२ ।

६५ परवर्ती साहित्यपर प्रभाव हिंदीके परवर्ती मुसलमान कवियोंने चन्दायतको अपनी रचनाओंके निमित्त आदर्श रूपमें स्वीकार किया था, यह तथ्य उनकी रचनाओंको देखने मात्रसे ज्ञात होता है। उन्होंने छन्द-योजना की प्रेरणा चन्दायतसे ली। कुतुबनकी मिरगावति और मंझनकी मधुमालतीमें पाँच चउपई और एक धत्तावाला कडवक मिलता है। चन्दायतकी तरह ही उनके काव्यके आरम्भमें ईश्वर, पैगम्बर, चार-यार, गुरु, शाहेवक्त आदिकी प्रशंसा और उल्लेख पाया जाता है। तदनन्तर सभी काव्य अपना आरम्भ चन्दायतकी तरह ही नगर वर्णनसे करते हैं और तब कथा आगे बढ़ती है। सभी कथाओंमें हम पाते हैं कि नायक अथवा नायिकाके जन्मके पश्चात् ज्योतिषी आते हैं और उनके भविष्यकी घोषणा करते हैं। लोरककी तरह ही सभी काव्योंके नायक योगीका रूप धारण करते हैं। पद्मावतमें रतनसेन पद्मावतीके लिए, मधुमालतिमें मनोहर मधुमालतीके लिए, चित्रावलीमें सुजान चित्रावलीके लिए योगी बनकर निकलते हैं। मिरगावतिका नायक भी योगी होता है। सभी कवि दाऊदकी तरह ही योगी वेश भूषाका चित्रण करते हैं। जिस तरह दाऊदने चांदाके रूप सौन्दर्यको महत्त्व देनेके लिए उसके शिख नखका वर्णन किया है उसी तरह नायिकाओंका रूप वर्णन प्रायः अन्य सभी कवियों ने किया है। जायसी, मंझन, उसमान सभीने केश, मस्तक, शीश, कपाल, भ्रू, नयन, कपोल, नासिका, अधर, दाँत, रसना, कान, ग्रीवा, कण्ठ, कुच, कटि, नितम्ब, वपु, चरण आदिका विशद वर्णन किया है। जिस तरह दाऊदने चाँदाको लेकर हरदीपाटन पहुँचनेतक लोरकके मार्गमें अनेक कठिनाइयोंका उल्लेख किया है, उसी प्रकार अन्य सभी कवि अपनी प्रेयसीकी प्राप्तिके पूर्व नायकोंको अनेक प्रकारकी बाधाओंका सामना करते हुए दिखाते हैं। चाँदाके रूपपर आसक्त होकर लोरक जिस प्रकार घर आकर पड़ रहता है और कुटुम्बके लोग देखने आते हैं, वैद्य आदि बुलाये जाते हैं, उसी प्रकार अन्य काव्योंके प्रेम-दग्ध नायक अथवा नायिकाको देखनेके लिए लोग एकत्र होते और प्रेम-रोग होनेका निदान करते हैं। पद्मावत, मधुमालति, चित्रावली सभीमें यह प्रसंग प्राप्त है। चाँदाकी काम-वेदना और मैनाकी विरह वेदनाकी दीनता व्यक्त करनेके लिए दाऊदने बारहमासाका सहारा लिया है। उसी तरह अन्य कवियोंने भी बारहमासाको अपनाया है। मिरगावत, पदमावत, चित्रावली आदि सभीमें यह पाया जाता है। जिस तरह अपनी विरह व्यथा मैनाने बनजारा फिरन्तसे कहा है उसी तरह मिरगावतिमें रूपमंजरी (रुक्मिनि)ने अपनी व्यथा-गाथा संदेशा बनजारोंकी दासीपा दिया है। इसके अतिरिक्त भी चन्दायतमें प्रस्तुत कुछ अन्य आदर्श ऐसे हैं जो विविध प्रेमाख्यानक काव्योंमें देखे जा सकते हैं।

१६ चन्दायणसे सबसे अधिक प्रभावित पदमावत है। पदमावतकी कथाका उत्तरार्ध जिसे रामचन्द्रशुक्ल एवं कुछ विद्वान् ऐतिहासिक समझते रहे हैं वस्तुतः चन्दायतकी कथाका ही पूर्वार्ध है। नामोंको बदल कर जायसीने उसे अधिकृत रूपसे आत्मसात कर लिया है। चन्दायतमें चाँदको झरोखेपर छबी देखकर बासिर मूर्च्छित होता है और वह आकर रूपचन्दसे उसके रूप सौन्दर्यकी प्रशंसा करता है। उसे सुनकर रूपचन्द गोवरपर आक्रमण करता है। ठीक यही कथा पदमावतकी भी है। इसमें बासिर, चाँद और रूपचन्दके स्थानपर क्रमशः राघव चेतन, पदमावती और अलाउद्दीनका नाम दिया गया है। जिस ढंगसे दाऊदने चाँदका रूप वर्णन किया है ठीक उसी ढंगसे जायसीने पदमावतीका किया है। आगे किस प्रकार सहदेव महर, भोजका आयोजन करते हैं और उसका किस विस्तारके साथ दाऊदने वर्णन किया है ठीक उसी प्रकार हम रतनसेनका भी पदमावतमे भोजका आयोजन करते पाते हैं और उसी विस्तारके साथ जायसीने उसका वर्णन किया है। चाँदके रूप-दर्शनके बाद लोरक बीमार बनकर खाटपर पड़ा रहता है ठीक उसी दशामें हम पदमावतमें पदमावतीके रूप श्रवणके बाद रतनसेनको पाते हैं। चाँदकी प्राप्तिके लिए लोरक योगी बनता है उसी तरह पद्मावतीकी प्राप्तिके लिये रतन सेन भी योगीका रूप धारण करता है। चाँदका लोरककी प्राप्तिके निमित्त और पद्मावतीका रतनसेनके समागमकी प्राप्तिके लिय देव-दर्शनको व्यथा एक-सी घटनाएँ हैं। चन्दायत और पदमावतकी कथाओंमें इसी तरहकी और बहुत सी कथानक सम्बन्धी समानताएँ हैं। ये अद्भुत समानताएँ यह सोचने और कहनेको विवश करती हैं कि जायसी चन्दायतसे पूर्णतः परिचित थे। वे परिचित ही नहीं थे उन्होंने अपनी काव्य रचनामें उसका मुक्त रूपसे उपयोग भी किया है। इस धारणाको इस बातसे और भी बल मिलता है कि पदे पदे पदमावतके वर्णनांश चन्दायतके साथ अत्यधिक भाव-साम्य है। उसके कुछ नमूने इन पंक्तियोंमें देखे जा सकते हैं : चन्दायत \hspace{3cm} पदमावत सिरजसि छाँह सींहु औं सूरा । १।५ \hspace{1cm} कीन्हेसि धूप छाँह औं घामीँ । १।६ पुरुख एक सिरजसि बजियारा। \hspace{1.5cm} कीन्हेसि पुरुष एक निरमरा । नाउँ मुहम्मद जगत पियारा ॥ १।१ \hspace{1.1cm} नाउँ मुहम्मद पूजिव करा ॥ १।११ घडव सिंघ एक पँथहिं रँगाय । \hspace{1.5cm} गढव सिंह रंगहि भुइ बाहहि । भुइ पाट छुहुँ पानि पियारे ॥११।७ \hspace{0.9cm} पुहुप पानि पियाहिं भुइ बाहा ॥ १५।५ एक बाट रानी हुवई \hspace{2.5cm} एक बाट सो सिंघल दोसर रानी महारि । ४११।२ \hspace{1.7cm} दोसर कंक गंभीर ॥ १५ १८

१७ लागहून रैन बाड़ दिन लीन्हा । १४९।१ अगहन दिवस घटा निसि बाढ़ी । आगे परे धीर धीर पावहुँ । अगकहि काहिं पानि पर काँटा । पाछे रहहु सो धूर बजावहु ॥ १ ।३ पछितेहि काहिं न कोइहु बाँटा ॥ १४।७ फूले काँस डाँस सिर ढाये । सरवर सँवरि हंस चलि आये । सारस कुरकहिँ बिछुरिन आये । ४३४।२ सारस कुररहिँ खंजन देखाये ॥ ३७७।१ यही नहीं अनेक स्थानों पर तो पद्मावतमें अविकल रूपसे चन्दायराकी ही शब्दावली देखनेमें आती है । अकस्मात् सामने आये ऐसे तीन-चार उदाहरण हम यहाँ दे रहे हैं : चन्दायण पद्मावत चकवा चकवी बेरि कराई । २९।१ चकइ चउया केलि कराही । ३३।५ चाँद भौरहर ऊपर गयी । १४८।७ पदुमति भौराहर चढ़ी । २७८।१ पंडित बइ सभाव बुकाये । १६९।३ ओझा बैठ सपान बोकावे । १२ ।१ ठिकक हुआइस मशाक काढ़ा । ४२ ।२ तिलुक हुआइस मशाक दीन्हे । १ ९।३ ध्यानसे देखनेपर इस तरहकी पंक्तियाँ बड़ी मात्रामें पायी जा सकती हैं । इन सबको मात्र आकस्मिक सदृशारजन्य अथवा किसी अविच्छिन्न विचार परम्पराका परिणाम कहना किसीके लिए भी कठिन ही नहीं असम्भव होगा ।

The provided image is completely blank and contains no text to transcribe.

चन्दायण ( टिप्पणी सहित मूल पाठ )

The provided image is completely blank and contains no readable text or content.

सम्पादन विधि

  • प्रस्तुत सम्पादन कार्यमें प्रत्येक कड़वकको अङ्कबद्ध कर पाठ-क्रम निर्धारित किया गया है। जहाँ कहीं किसी कड़वकका अभाव जान पड़ा उसका अङ्क छोड़ दिया गया। जिन कड़वकोंको पूर्वापरके अभावमें क्रमबद्ध करना सम्भव न हो सका, उन्हें सम्भावित स्थानपर बिना किसी प्रक्रम-संख्याके रख दिया गया है।
  • प्रत्येक कड़वक-संख्याके नीचे उस प्रति अथवा प्रतियोंका नाम और पृष्ठ दिया गया है जिससे वह कड़वक उपलब्ध है। जिस प्रतिका पाठ ग्रहण किया गया है, उस प्रतिका नाम पहले अन्य प्रतियों का बादमें रखा गया है।
  • तदनन्तर अनुवाद सहित कड़वकका फारसी शीर्षक दिया गया है। शीर्षक भी उसी प्रतिसे दिया गया है, जिसका पाठ ग्रहण किया गया है। अन्य प्रतियों के शीर्षक पाठान्तरके अन्तर्गत दिये गये हैं। यदि शीर्षक कड़वकके विषयसे भिन्न अथवा भ्रामक है तो उसका संकेत टिप्पणीके अन्तर्गत कर दिया गया है।
  • मुख्य-पाठ किसी एक प्रतिसे लिया गया है। जिस प्रतिसे पाठ लिया गया है उसका उल्लेख कड़वकके ऊपर पहले किया गया है। अन्य प्रतियोंके पाठान्तर नीचे दिये गये हैं।
  • प्रतियोंके लिपि-दोषको ध्यानमें रखते हुए विवेकके सहारे पाठ सम्पादन किया गया है।
  • पाठ सम्पादन करते समय मात्राओंके सम्बन्धमें निम्नलिखित सिद्धान्त ग्रहण किये गये हैं— (क) इ, ए और ऐ की मात्राएँ वहीं दी गयी हैं जहाँ ये (छोटी या बड़ी) रूपमें आ सका है। (ख) मात्रा-चिह्नोंके अभावमें इ और उ की मात्राओंको शब्द-रूप और प्रयोगके अनुसार अपनाया गया है। (ग) वाव को प्रसङ्गवश उ, ओ और औ की मात्राके रूपमें ग्रहण किया गया है।
  • पाठोंके सम्बन्धमें निम्नलिखित तथ्य उल्लेखनीय हैं— (क) नुस्खोंके अभावमें जहाँ किसी शब्दके एकसे अधिक पाठ सम्भव हैं, वहाँ उपयुक्त अथवा अर्थ-सङ्गत पाठ ग्रहण किया गया है। जहाँ आवश्यक जान पड़ा, वहाँ अन्य सम्भव पाठोंका भी टिप्पणीके अन्तर्गत दे दिया गया है।

७२ (ग) वावका शब्दके आरम्भमें सर्वत्र व और अन्तमें आने पर उसे प्रायः उके रूपमें ग्रहण किया गया है । (घ) शब्दके आरम्भमें आये अलिफ़को अ, आ, इ और ईके रूपमें और येको यके रूपमें ग्रहण किया गया है । (ङ) शब्दके आरम्भमें अलिफ़ और येके संयुक्त प्रयोगको ए और ऐकी औचित्य अनुसार रूपमें पढ़ा गया है । (च) शब्दके आरम्भमें अलिफ़ और वावके संयुक्त प्रयोगको प्रसङ्गानुसार ऊ, ओ औ अथवा आउ पढ़ा गया है । शब्दके अन्तमें आनेपर उसे केवल आउ माना गया है । (छ) सदा आदि शब्दोंके अन्तमें वाव और येके संयुक्त प्रयोगको प्रसङ्गा- नुसार बे अथवा वे पढ़ा गया है किन्तु क्रियापदोंमें हमें वेकी अपेक्षा वह पाठ अधिक संगत और उचित जान पड़ा है । • यदि गृहीत प्रतिके पाठमें कहीं कोई छूट या अभाव है तो वह दूसरी प्रतिसे लेकर पूरा किया गया है । इस प्रकार दूसरी प्रतिसे ग्रहण किये हुए पाठको बड़े कोष्ठक—[ ] में दिया गया है । • यदि छूटे हुए पाठकी पूर्ति अनुमानसे की गयी है तो उसे बड़े कोष्ठक [ ] में रखकर ताराङ्कित कर दिया गया है । • छूटे हुए पाठकी पूर्ति यदि किसी प्रकार सम्भव नहीं हो सकी है तो वहाँ बड़े कोष्ठक [ ] के भीतर अनुल्लङ्घ्य मात्राओंके अनुसार डैश रख दिये गये हैं । यदि कहीं लिपिकने प्रमादवश किसी शब्दको दुहरा दिया है तो ऐसे शब्दको ताराङ्कित कर दिया गया है । यदि उसने कोई अनपेक्षित अतिरिक्त शब्द रख दिया है तो पाठसे उस शब्दको निकाल दिया गया है और मूल पाठ अलग संग्रह कर दिया गया है । • इसी प्रकार कोई पाठ स्पष्ट रूपसे अशुद्ध जान पड़ा तो वहाँ सम्भावित पाठ छोटे कोष्ठक ( ) में देकर मूल पाठको अलग संग्रह कर दिया गया है । • ऐसे शब्दोंको जिनका हम समुचित पाठोद्धार करनेमें असमर्थ रहे अथवा जिनके पाठके सम्बन्धमें हमें किसी प्रकारका सन्देह है पाठके अन्तर्गत भिन्न रूपमें दिया गया है । • प्रत्येक कडवकके पाठके नीचे अशुद्ध मूल पाठ अथवा पाठान्तर देकर टिप्पणी दिये गये हैं । प्रत्येक पंक्तिसे सम्बन्धित टिप्पणियाँ पंक्ति-संख्या देकर अलग- अलग दी गयी हैं । इन टिप्पणियोंके अन्तर्गत शब्दोंका अर्थ व्याख्या आवश्यक सूचना आदि दिया गया है । किन्तु यह कार्य खूब विस्तारसे नहीं किया जा सका ।

कड़बक सूची [ उपलब्ध सभी प्रतियोंमें कड़बकोंके आरम्भमें फारसी भाषामें कड़बकका सारांश अथवा शीर्षक दिया हुआ है। उन शीर्षकोंको हमने अनुवाद सहित प्रस्तुत किया है। किन्तु अनेक स्थानोंपर ये शीर्षक भ्रमात्मक अथवा निरपेक्ष हैं। अतः हम अपनी ओरसे कड़बकके शीर्षकोंकी एक स्वतन्त्र सूची यहाँ प्रस्तुत कर रहे हैं, ताकि अपेक्षित कड़बक ढूँढनेमें सुगमता हो। कथावस्तुकी रूपरेखा स्पष्ट करनेके लिए, पदमावतके अनुकरणपर विषयके अनुसार कड़बकोंको हमने यहाँ समूहोंमें एकत्र कर दिया है और अपनी ओरसे उनका नामकरण किया है। आशा है पाठकोंके लिए यह उपयोगी सिद्ध होगा।] स्तुति- १-ईशस्मरण ६-मुहम्मद ७-चार मीत ८-दिल्ली सुलतान फीरोज शाह; ९-शेख जैनुद्दीन; ११-ज्ञानजहाँ; १२-ज्ञानजहाँका व्याप १३-मालिक मुबारिककी प्रशंसा; १४-१५मऊ नगर। (यह अंश अत्यन्त त्रोटित रूपमें है और बीकानेर प्रतिके चरणामें प्रकाशित अंशपर आश्रित है।) शायर वर्णन- १८-अमरावती २०-सरोवर और मन्दिर २१-सरोवरका निर्मल जल; २२-सरोवरके जन्तु २७-नगरकी राह २५-दुर्ग २६-नगरनिवासी २७-राज्ञाधिकारी (?); २८-गन्ध और पन्सारी २ -बाजीगर आदि, ३ -राजद्वार, १०-राजमहल, १२-रानियाँ। (दी इण्टम प्रतिके आधारपर यह चयन-क्रम दिया गया है। इसमें कुछ कड़बकोंका अभाव है और वर्णन-क्रम भी पूर्णतः संगत नहीं जान पड़ता।) चाँदका जन्म और विवाह- ३३ ३४-जन्म ३५-उदीपन और डोलना; ३६-चाँदके रूपकी ख्याति; ३७-गीत (घेउ) का विवाह प्रस्ताव; ३८-रावण-नाऊका सहदेवक अनुरोध ३ -सहदेवा उत्तर; ४ -विवाहकी तैयारी ४०-गीत (घेउ) का साँइँडको सूचना; ४१-बारातका प्रस्थान ४२-विवाह ४४-दहेज। चाँद की व्यथा- ४५-४६ चाँ० का बावनको उत्तर ४६-चाँदका आगमन घर ४७-सासका

७२

(ग) वावको शब्दके आरम्भमें सर्वत्र व और अन्तमें आने वालेको प्रायः उके रूपमें ग्रहण किया गया है। (घ) शब्दके आरम्भमें आये अलिफ़को अ, आ, इ और उके रूपमें और येको एके रूपमें ग्रहण किया गया है। (ङ) शब्दके आरम्भमें अलिफ़ और येके संयुक्त प्रयोगको ए और ऐकी अपेक्षा अइके रूपमें पढ़ा गया है। (च) शब्दके आरम्भमें अलिफ़ और वावके संयुक्त प्रयोगको प्रसङ्गानुसार ऊ, ओ, औ अथवा आउ पढ़ा गया है। शब्दके अन्तमें आनेपर उसे केवल आउ माना गया है। (छ) वंश आदि शब्दोंके अन्तमें वाव और येके संयुक्त प्रयोगको प्रसङ्गा- नुसार वे अथवा वै पढ़ा गया है किन्तु विचारमार्गमें हमें वेकी अपेक्षा वइ पाठ अधिक संगत और उचित जान पड़ा है। ● यदि गृहीत प्रतिके पाठमें कहीं कोई छूट या अभाव है तो वह दूसरी प्रतिसे लेकर पूर्ण किया गया है। इस प्रकार दूसरी प्रतिसे ग्रहण किये हुए पाठको बड़े कोष्ठक--[ ] में दिया गया है। ● यदि छूटे हुए पाठकी पूर्ति अनुमानसे की गयी है तो उसे बड़े कोष्ठक [ ] में रखकर तारांकित कर दिया गया है। ● छूटे हुए पाठकी पूर्ति यदि किसी प्रकार सम्भव नहीं हो सका है तो वहाँ बड़े कोष्ठक [ ] के भीतर अनुस्वार-मात्राओंके अनुसार डैश रख दिये गये हैं। यदि कहीं लिपिकने प्रमादवश किसी शब्दको दुहरा दिया है तो ऐसे शब्दको तारांकित कर दिया गया है। यदि उसने कोई अनपेक्षित अतिरिक्त शब्द रख दिया है तो पाठसे उस शब्दको निकाल दिया गया है और मूल पाठ अलग संग्रह कर दिया गया है। ● इसी प्रकार जहाँ पाठ स्पष्ट रूपसे अशुद्ध जान पड़ा तो वहाँ सम्भावित पाठ छोटे कोष्ठक ( ) में देकर मूल पाठको अलग संग्रह कर दिया गया है। ● ऐसे शब्दोंको जिनका हम समुचित पाठोद्धार करनेमें असमर्थ रहे अथवा जिनपर शब्द-सम्बन्धमें हमें किसी प्रकारका सन्देह है पाठके अन्तर्गत भिन्न टाइपमें दिया गया है। ● प्रसंग बदलकर पाठके नीचे अशुद्ध मूल पाठ अथवा पाठान्तर देकर टिप्पणी दिये गये हैं। प्रत्येक पंक्तिसे सम्बन्धित टिप्पणियाँ पंक्ति-संख्या देकर अलग अलग की गयी हैं। इन टिप्पणियोंके अन्तर्गत शब्दोंका अर्थ, व्याख्या, आवश्यक सूचना आदि दिया गया है। किन्तु यह कार्य खूब विस्तारसे नहीं किया जा सका।

७५ ११०-दूतोंका लौटना और चाँदाका मारा जाना १११-सिगार-बाँठा युद्ध; ११२-मददातोंका मारा जाना; ११३-घरमूँका युद्ध करना; ११४-रूपचन्दका युद्ध करना; ११५-मैदानमें सेना सहित बाँठाका आना; ११६-बाँठाके मुक़ाबले लोरकका आना ११७-लोरक-बाँठा युद्ध ११८-रूपचन्दका बाँठासे परामर्श ११९-बाँठाका उत्तर; १२०-लोरक-रूपचन्द युद्ध १२१-बाँठाका मारा जाना १२२-लोरकका रूपचन्दकी सेनाको खदेड़ना १२३-युद्धके मैदानम मुर्दाखोर पशुपक्षी। चाँदाका लोरकपर मुग्ध होना— १२४-विषयोल्लास और लोरकका दुःख; १२५-चाँदाका दुःख देखना १२६-लोरकका रूप-वर्णन १२७-लोरकको देखकर चाँदाका मूच्छित होना १२८-बिरहस्तका चाँदाको समझाना १२९-बिरहस्तका लोरकको घर बुलानेका उपाय बताना १५ -चाँदाका पितासे जेवनारके आयोजनका अनुरोध। ज्यानार— १३१-ज्यानारका आयोजन; १३२-अहेरियाका अहेर करना १३४-पक्षियोंका पकड़ कर लाया जाना; १३५-भोजनकी व्यवस्था; १३६-तरकारी वर्णन; १३७- पकवानका वर्णन; १३८-पावसौंका वर्णन १३९-रोटीका वर्णन १६ -पान पत्रका वर्णन १४१-निमंत्रितोंका बैठना १४२-व्यंजनोंका परोसा जाना। चाँदाके प्रति लोरकका आकर्षण— १४३-गेंदके समय लोरकका चांदको देखना; १४४-लोरकका घर आकर खाटपर पड़ रहना; १४५-लोरककी माँका विलाप १४६-बिरहस्तका लोरकके घर आना १४७-बिरहस्तका लोरकको देखना १४८-लोरकका बिरहस्तसे चाँद-रहनकी बात करना १५१-बिरहस्तका लोरकको समझाना १७ - लोरकका बिरहस्तक पाँव पकड़कर अनुनय करना १७१-बिरहस्तका उपाय बताना; १७२-बिरहस्तका लौटना १७३-बिरहस्तका चान्दके पास जाना। लोरकका योगी रूप धारण— १७४-लोरकका योगी होना; १७५-चाँदका मन्दिरमें आना १७६-चाँदका मुक्ताहार टूटना; १७७-चाँदका योगीकी सूचना मिलना; १७८-चाँदका योगीको प्रणाम करना और योगीका मूच्छित होना १७ -चाँदका मन्दिरसे घर लौटना, १८२-लोरकका पश्चात्ताप १८३-देवताका उत्तर। चाँद और लोरककी व्याकुलता— १८४-चाँदका बिरहस्तसे इसके प्रति निराशा; १८५-बिरहस्तका उत्तर; १८६- चाँदका बिरहस्तपर क्रोध १८७-बिरहस्तका चाँदस लोरकक मोहित होनेकी बात कहना; १८८-चाँदका कष्ट प्रकट करना; १८ -बिरहस्तको लोरकके पास

७४ समझाना ४८-चाँद का उत्तर; ४९-साहस क्रोध ५०-सहदेव को सूचना; ५१-चाँद का मैके भेजना; ५२-सहेलियों से भेंट। व्यथा-वर्णन- ५३-५४-माघ मास; ५५-फागुन मास ५६-चैत मास। (यह अंश बारहमासा के रूप में है। अतः उसमें कम से कम १२ कड़वक रहे होंगे। किन्तु तीन ही मास सम्बन्धी कड़वक उपलब्ध हैं। उपलब्ध कड़वक भी अधूरे हैं जो पंजाब प्रति से प्राप्त हुए हैं।) बाजिर का चाँद-दर्शन- ६६-बाजिर का चाँद को देखकर मूर्च्छित होना ६७-जनता का बाजिर से मूर्च्छा का कारण पूछना; ६८ ६९-बाजिर का उत्तर, ७०-बाजिर का नगर छोड़ कर जाना ७१-दूसरे नगर में पहुँचकर बाजिर का गाना; ७२-राजा रूपचन्द का बाजिर को बुलाना; ७३-बाजिर का चाँद दर्शन की बात कहना; ७४-चाँद के प्रति राजा की जिज्ञासा। चाँद की रूप-चर्चा- ७५-माँग ७६-केश; ७७-ललाट; ७८-भौंह; ७९-नेत्र; ८०-नासिका ८१- अधर ८२-दाँत; ८३-रसना; ८४-कपोल; ८५-तिल; ८६-ग्रीवा ८७-भुजाएँ; ८८-कुच; ८९-पेट ९०-पीठ ९१-जानु ९२ पग और गति; ९३-आचार; ९४-वस्त्र; ९५-आभूषण। रूपचन्द का सहदेव पर आक्रमण- ९६ ९७-कूच की तैयारी; ९८-रूपचन्द के अस्त्र ९९-दलक हाथी; १००-सेना की कूच; १०१-मार्ग में अपशकुन; १०२-गोबर नगर पर घेरा १०३-नगर में आतंक; १०४-सहदेव का रूपचन्द के पास दूत भेजना १०५-दूतों को रूपचन्द का उत्तर; १०६-दूतों का समझाना; १०७-दूतों पर रूपचन्द का क्रोध १०८-दूतों को मारने का आदेश १०९-रूपचन्द का चाँद की माँग करना; ११०-दूतों का लौटना; १११ सहदेव का अपने सेनानायकों से परामर्श ११२-सहदेव के अस्त्र; ११३- उसके अश्वारोही ११४-धनुर्धर ११५-रथ ११६-हस्ति। रूपचन्द-सहदेव युद्ध- ११७-सेनाओं का युद्धक्षेत्र में आना; ११८-नेबक साँढा का युद्ध; ११९-रूपचन्द की सेना में विखलभल मच जाना १२०-गोरक के पास भाट का जाना; १२१-गोरक का युद्ध के लिये तैयार होना १२२-मैना का गोरक को युद्ध में जाने से रोकना; १२४- गोरक का जलकी के घर जाना १२५-अम्भी का युद्ध-कौतुक बतलाना; १२६- गोरक का महर के पास पहुँचना १२७-गोरक का युद्ध के मैदान में आना; १२८- गोरक की सेना १२९-उसे देखकर रूपचन्द का स्तम्भित होना और दूत भेजना;

१३०-दूतोंका लौटना और सीहका मारा जाना; १३१-सिंगार-बाँठा युद्ध १३२-ब्रह्मदत्तका मारा जाना; १३३-घमूँछा युद्ध करना १३४-रुपपतिको युद्ध करना; १३५-मैदानमें सैन्य सहित बाँठाका आना; १३६-बाँठाके मुकाबिले लोरकका आना १३७-लोरक-बाँठा युद्ध १३८-रूपचन्दका मातासे परामर्श १३९-बाँठाका उत्तर; १४०-लोरक-रूपचन्द युद्ध १४१-बाँठाका मारा जाना; १४२-लोरकका रूपचन्दकी सेनाको खदेड़ना १४३-युद्धके मैदानमें मुदामोर फगुण्डी। चाँदका लोरकपर मुग्ध होना— १४४-विश्वमोहमन्त्र और लोरकका हुस्न १४५-चाँदका दुग्ध देखना १४६-लोरकका रूप-वर्णन १४७-लोरकको देखकर चाँदका मूर्छित होना; १४८-बिरहपतका चाँदको समझाना १४९-बिरहपतका लोरकको घर बुलानेका उपाय बताना; १५०-चाँदका पितासे जेवनारके आयोजनका अनुरोध। ज्योनार— १५१-ज्योनारका आयोजन १५२-अहेरियाँका अहेर जाना १५४-पक्षियोंका पकड़ कर लाया जाना; १५५-भोजनकी व्यवस्था; १५६-तरकारी वर्णन १५७- पकवानका वर्णन; १५८-पापड़ोंका वर्णन १५९-रोटीका वर्णन १६०-कन पत्रका वर्णन १६१-निमंत्रितोंका बैठना १६२-व्यंजनोंका परसा जाना। चाँदके प्रति लोरकका आकर्षण— १६३-मेजके समय लोरकका चाँदको देखना; १६४-लोरकका घर आकर खाटपर पड़ रहना; १६५-लोरककी माँका विलाप; १६६-बिरहपतका लोरकके घर आना १६७-बिरहपतका लोरकको देखना १६८-लोरकका विरहस्तसे चाँद-स्थानकी बात कहना १६९-बिरहपतका लोरकको समझाना; १७०- लोरकका बिरहपतके पाँव पकड़कर अनुनय करना; १७१-बिरहपतका उपाय बताना १७२-हिरहस्तका लौटना १७३-विरहस्तका चाँदके पास आना। लोरकका योगी रूप-धारण— १७४-लोरकका योगी होना; १७५-चाँदका मन्दिरमें आना १७६-चाँदका मुखाहार टूटना; १७७-चाँदको पागीकी सूचना मिलना; १७८-चाँदका योगीको प्रणाम करना और योगीका मूर्छित होना १७९-चाँदका मन्दिरसे घर लौटना, १८१-लोरकका पश्चाताप; १८२-देवताका उत्तर। चाँद और लोरककी व्याकुलता— १८४-चाँदका बिरहपतसे प्रेमके प्रति निराशा; १८५-बिरहपतका उत्तर; १८६- चाँदका बिरहस्तसे क्षोभ; १८७-बिरहस्तका चाँदसे लोरकके मोहित होनेकी बात कहना १८८-चाँदका खेद प्रकट करना; १८९-बिरहस्तको लोरकके पास

भेजना; १९ -विरहमठका गोरखको योगी-वेष त्यागनेको कहना; १९१-गोरखका योगी वेश त्यागना; १ २-गोरखका घर छोड़ना १९३-चाँदके लिए गोरखकी विरहव्यथा १९४ १९५-गोरखके लिए चाँदकी विरहावस्था; १९६-चाँदका विरहमठ को वारंवार पाठ भेजना; १९७-विरहमठ और गोरखकी बातचीत; १९८-विरहमठ का गोरखको चाँदके आवासका रास्ता दिखाना। गोरखका चौगङ्गाडहर-प्रवेश- १ - गोरखका पाठ खरीदकर कमन्द बनाना; २ -अन्धेरी रातमें गोरखका चाँदके घरकी ओर जाना २ १-गोरखका चाँदका आवास पहचानना; ३ २- चाँदका कमन्द गिरानेका भेद; २ ३-गोरखका चाँदके आवासमें प्रवेश। चाँदका आवास- २ ४-गोरखका चाँदका शयनागार देखना १ ५-चित्रकारीका वर्णन; २ ६- सुगन्धका वर्णन २ ७-शय्याका वर्णन २४८-गोरखका चाँदको जगाना २ ९-जागकर चाँदका किकना २१०-गोरखका चाँदसे कहना; २११-चाँद का उत्तर २१२-गोरखका कथन २१३-चाँदका प्रश्न २१४-गोरखका उत्तर; २१५-चाँदका गोरखका उपहास करना; २१६-गोरखका उत्तर; २१७-चाँदका प्रेम प्रश्न २१८-गोरखका उत्तर, २१९-चाँदका अपने प्रेमके प्रति विश्वास; ३२ -गोरखका उत्तर, २२१-चाँदका मैनाकी प्रशंसा करना २२२-गोरखका उत्तर २२३-चाँदका अपना प्रेम प्रकट करना; २२४-वात-परीक्षामे रात बीतना २२ -गोरख-चाँद प्रश्न २२६-प्रातःकाल खाटके नीचे गोरखका छिपना; २२७-दासियों और सहेलियोंका आना; २२८-चाँदका बहाना बनाना; २२९-विरहमठका चाँदकी माँको सूचना देना; २३०-चाँदके माता-पिताका आना २३१-चाँदका गोरखको विदा करना २३२-गोरखको द्वारपालका देख लेना २३३-चाँदका कमरेमें लौटकर भविष्य गुनना। खारफ-मैनामें कहा-सुनी- २३४-मैनाका गोरखसे रातको गायब रहनेकी बात पूछना; २३५-महलमें पर पुरुष आनेकी बात फैलना २३६-जोगिनका मैनासे मलिनाताका कारण पूछना; २३७-जोगिनका गोरखके सम्बन्धमें अपनी अनभिज्ञता प्रकट करना २३८- मैनाका कहना २३९-जोगिनका समझाना २४ -२४१-मैनाका गोभितमें रहना २४२-गोरखका समझ जाना कि मैना बात जान गयी; २४३-मैनाका गोरखपर क्रुद्ध होकर बोलना २४४-गोरखका मैनाको धमकाना २४५-जोगिन का आकर गोरख मैनामें सुलह कराना; २४६-गोरख-मैनामें सुलह; २४७- गोरखका मैनाकी प्रशंसा करना; २४८-मैनाका उत्तर; २४९-गोरख मैनाकी प्रसन्नता।

७७ चाँद और मैनाका मन्दिर-गमन— २५०—पण्डितका चाँदसे देव-पूजा करनेको कहना २५१—देव पूजाके किये नाना जातिकी स्त्रियोंका आना २५२—सहेलियोंके साथ चाँदका मन्दिर जाना २५३— चाँदका मन्दिर प्रवेश २५४—चाँदका पूजा करना और मनौती मानना २५५— मैनाका सहेलियोंके साथ मन्दिरम आना और पूजा करना । चाँद-मैना संग्राम— २५६—चाँदका मैनासे उदासीका कारण पूछना; २५७—मैनाका छोभ मय उत्तर देना २५८—चाँदका प्रत्युत्तर २५९—मैनाका चाँदको उत्तर, २६०—चाँदका मैनाको गाली २६१—मैनाका चाँदके अभिसारकी बात प्रकट करना २६२— चाँदका उत्तर, २६३—मैनाका प्रत्युत्तर २६४—चाँदका उत्तर, २६५—मैनाका प्रत्युत्तर २६६—चाँद मैनाम हाथापायी २६७—चाँद मैनामे गुत्थमगुत्थी २६८—दोनोंका रक्तरंजित होना २६९—युद्धसे मन्दिरके देवताकी परेशानी २७०—लोरकका आना और स्थितिसे परिचित होना २७१—लोरकका मैना चाँदका अलग करना । महरिसे चाँदकी शिकायत— २७२—चाँदका मन्दिरसे घर लौटना २७३—मैनाका मन्दिरसे घर आना २७४— धोबिनका मैनासे मन्दिरकी घटना पूछना २७५—मैनाका मालिनको बुला कर महरिके पास शिकायत भेजना २७६—मालिनका महरिके पास जाना २७७— मालिनका महरिसे चाँदकी शिकायत करना २७८—चाँदकी नादानी पर महरिका शम्कित होना । लोरक-चाँदका गोवर छोड़नेकी तैयारी— ७ —चादका बिरस्पतको लोरकके पास भेजना; २८ —बिरस्पतका लोरकसे चादका सन्देश कहना; २८१—बिरस्पतका लोरकको समझाना; २८७—बिरस्पतका चाँदके पास वापस आना २८८—लोरक चाँदका साथ चलनेका निश्चय करना; २८९—लोरकका यात्राका मुहूर्त पूछना २९ —ब्राह्मणका मुहूर्त बताना २९१— चाँदका महलसे निकलना २९२—चांद लोरकका गोवरसे प्रस्थान २९३—उनस काले वस्त्र पहन आगे बढ़ना २९४—मैनाका सुधनी होना । कुँवरस भेंट— २९५—कुँवरका मागमे लोरकको पहचानना २९६—चाँदका कुँवरस अपने प्रेम की बात कहना २९७—कुँवरका चाँदकी भर्त्सना करना २९८—लोरकका कुँवरसे मिलकर आगे बढ़ना । लोरक-चाँदका गंगा पार करना— २९९—शामकाल लोरक चाँदका वृक्षके नीचे सोना ३०४—दोनोका गंगा तट