चन्दायन (मुल्ला दाऊद - प्राचीनतम अवधी सूफी-प्रेमाख्यान सटीक)
Chandayan of Mulla Daud with Hindi Commentary
मुल्ला दाऊद (१३७९ ई.) / डॉ. परमेश्वरीलाल गुप्त द्वारा
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चन्द्रायानमें एक बात, जो विशिष्ट रूपमें देखनेमें आती है, वह यह कि दाऊद ने उसे आध्यात्मिकता और दार्शनिकताके बोझसे सर्वथा मुक्त रखा है। वे कहीं भी, परवर्ती प्रेमाख्यानकारोंकी तरह धार्मिक प्रवजकके रूपमें आत्मा-परमात्मा, साधक और साधनाकी बात करते दिखाई नहीं पड़ते। उन्होंने जो कुछ कहा है, वह लौकिक धरातल पर बैठ कर ही कहा है। वे अपने कथनमें इतने सरल हैं कि उन्हें किसी बात की व्याख्या करने अथवा किसी प्रकारका अपना मत प्रकट करनेकी आवश्यकता बहुत ही कम हुई है। समूचे काव्यमें हम ऐसे केवल तीन ही स्थल ढूँढ़ पाये। हो सकता है एक-आध स्थल और भी हों। इन स्थलों पर भी उन्होंने अपनी बात दो चार पंक्तियोंमें कहकर ही समाप्त कर दी है; और उन्हें भी वे कवि-रूपमें स्वयं अपनी ओरसे नहीं कहते। उन्हें अपने पात्रोंके द्वारा प्रसंग रूपमें ही सामने रखा है। ये पंक्तियाँ हैं— १ सतहिं तरे सायर महि भाषा। बिनु सत बूड़े बाइ न पाषा॥ जिन्हि सत होइ सो लागी तीरा। सत कह इम बूह भैंस वीरा॥ सत गुन प्रीति तीर कह काधा। सत छाड़े गुन छोरि बहाथा॥ सत सँभार तो पावहु थाहा। बिनु सत थाह होइ अवगाहा॥ २१० २ बिरह सोक भार सह लीजा। बिरहैं कहूँ जीठ गरु न कीजा॥ बिरह होइ सुप केरि उतारी। बिरह मसंनी कहा सपारी॥ बिरह सो मूँज न आप बढ़ायी। पाडन सोक जिंह चित्त रखथाई॥ २१९ ३ पिरम झार जिह हिरदै लागी। नींद न आव बितत निसि जागी॥ सात सरा बी बरसहिं ल्याई। पिरम आगि कैसें न बुझाई॥ १५३ दाऊद अपने सम्पूर्ण काव्यमें अत्यन्त सयत रहे हैं और किसी बातको बढ़ा चढ़ा कर कहनेकी चेष्टा नहीं की है। कहनेका तात्पर्य यह नहीं कि उन्होंने अत्युक्ति की ही नहीं है। अत्युक्ति कथन तो हिन्दी कवियोंमें स्वभाव-जन्य है और दाऊद उसका अपवाद नहीं है। यत्र तत्र अत्युक्ति दिग्दरी मिलती है पर एक स्थलको छोड़कर अन्यत्र उनकी अत्युक्तियाँ ऐसी हैं जो अस्वाभाविक नहीं लगतीं। जिस स्थलकी ओर हमारा लक्ष्य है उसमें अतिरञ्जना इतनी अधिक है कि वह कृत्रिमताकी सीमाका अतिक्रमण करता जान पड़ता है। वह स्थल है मैनाके विरह-वेदनाका सन्देश ले जाने- वाले सिरजनकी यात्रा भागका। कवि कहता है— बिरह जो पन्थ बाँध कर जाईं। धूअ बरन होई काँप पराईं॥ आँवत पंखि जरथ उड़ गय। बिरम बरन कोइला कर भय॥ धावड सिरजन होइ सँवारा। करिया हठ भाव गुनवारा॥ सायर दाह मैंच दर दहे। रह कँरचवा बनहर जहे॥ अस झार बिरह कै भयी। धरती दाह गगन कह गयी॥