चन्दायन (मुल्ला दाऊद - प्राचीनतम अवधी सूफी-प्रेमाख्यान सटीक)
Chandayan of Mulla Daud with Hindi Commentary
मुल्ला दाऊद (१३७९ ई.) / डॉ. परमेश्वरीलाल गुप्त द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३२ सरग चँदरमा मेल्हा औउर घूंस चंद मधि कार। मिरजब खंभित तुम्हारै कउरे कूद न पार ॥७१६ सूफ़ी तत्वोंका प्रभाव मौलाना दाऊदका प्रत्यक्ष सम्बन्ध सूफ़ी सम्प्रदायके साधकोंसे था। सूफ़ी साधक प्रेमके माध्यमसे परमात्माका नैकट्य प्राप्त करते हैं। उनका प्रेम निराकार ईश्वरके प्रति होता है, इस कारण उनके लिए उसका वर्णन प्रतीक द्वारा ही सम्भव हो पाता है। अतः वे अपने इस प्रेमका वर्णन लौकिक प्रेम-आख्यानक प्रतीकों द्वारा किया करते हैं। वे अपने इस आध्यात्मिक प्रेमके वर्णनमें ईश्वरको नारी रूपमें स्वीकार करते हैं और लौकिक प्रेमके वर्णनमें वे अलौकिक प्रेमकी झलक देखते हैं। दूसरे शब्दोंमें यदि हम कहना चाहें तो कह सकते हैं कि सूफ़ियों द्वारा रचित प्रेमाख्यानक काव्य अन्योक्ति अथवा रूपक (अलेगरी) हुआ करते हैं। वस्तुतः फारसीके अनेक प्रेम काव्य इश्क मजाजी रूपक कहे और माने जाते ही हैं। लैला-मजनू आदि प्रेमाख्यानोंकी गणना इसी ढंगके रूपक कथाओंमें होती है। मुसलमान कवियों द्वारा रचित हिन्दी के अनेक प्रेमाख्यान भी इसी दृष्टिसे सूफ़ियोंकी प्रेम मूलक साधना पद्धतिपर आधारित माने जाते हैं। अतः चन्दायणके सम्बन्धमें भी सहज अनुमान लगाया जा सकता है कि वह भी लौकिक प्रेमके आवरणमे अलौकिक प्रेमको व्यक्त करनेवाला इश्क अर्थात् रूपक ही होगा। इस अनुमानको काव्यके नायक नायिकाके नामसे भी बल मिल सकता है। पद्मावतमें जायसीने रतनसेनको सूरज और पद्मावतीको चाँद कहा है और दोनोंके प्रेम बिरह और मिलनकी बात कही है। चन्दायनमें दाऊदने नायक नायिकाको सीधे-सीधे 'सूरज' और 'चाँद'का नाम दिया है। लोरकका उल्लेख सात स्थान पर कविने सूरज कह कर किया है। यथा— सुरुज समेह चाँद कुँझवारी। १४७।३ चाँद बिरस्पत कै पाँ परी। कान्ह सुरुज देखैंउ एक घरी ॥ १४९।४ चाँद सुचित भै बैठी सुरुज मन्दिर जिह ठाउँ । १५९।२ सुरुज बराहि बिरस्पत बाधी। १६ ।३ प्रेमी प्रेमिकाके प्रसंगमें सूरज चाँदकी सत्तामें विद्वानोंने आध्यात्मिक प्रतीक ढूँढ निकाला है। सूर्य-चन्द्रके प्रतीकात्मक रूपकी व्याख्या करते हुए वासुदेवशरण अग्रवालने लिखा है कि प्रेमकी साधना द्वारा दो पृथक तत्त्व एक-एक दूसरेसे मिलकर अद्वय स्थिति प्राप्त करते हैं। इसी सम्मिश्रणको प्राचीन सिद्धोंकी परिभाषामें युगबद्ध भाव समरस या महासुख कहा गया है। प्रेमी-प्रेमिका की नयी परिभाषामें प्राचीन शिव-शक्ति या सूर्य-चन्द्रके वर्णनाको नया रूप प्राप्त हुआ। पुरुष सूर्य स्त्री चन्द्रमा है। दोनो अद्वय तत्त्वके दो रूप हैं। सिद्ध १ लोरक शब्द लोणार का अपभ्रंश रूप (लोनन्द > लोणारक > लोरारक > लोरक) है।