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चन्दायन (मुल्ला दाऊद - प्राचीनतम अवधी सूफी-प्रेमाख्यान सटीक)

चन्दायन (मुल्ला दाऊद - प्राचीनतम अवधी सूफी-प्रेमाख्यान सटीक)

Chandayan of Mulla Daud with Hindi Commentary

मुल्ला दाऊद (१३७९ ई.) / डॉ. परमेश्वरीलाल गुप्त द्वारा

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आचार्योंने सूर्य-चन्द्र या सोना-रूपा इन परिभाषाओंका बहुधा उल्लेख किया है। बौद्ध आचार्य विनयश्रीके एक गीतमें आया है— चन्दा आदित्ज समरस बोवे अर्थात् चन्द्रमा और आदित्यका समरस देखना ही सिद्धि है। चन्द्रमा और सूर्य जहाँ अपना अपना प्रकाश एकमें मिला देते हैं, अर्थात् समरस बनकर एक हो जाते हैं, वहीं उज्ज्वल प्रकाश हो जाते हैं, चन्द्र-सूर्यके प्रतीकमें सृष्टि और संसार, स्त्री और पुरुष, सोममयी उमा और कालाग्नि रुद्र, इड़ा और पिंगला आदिके प्राचीन प्रतीक पुनः प्रकट हो उठे हैं। सूरज और चाँदकी इस आध्यात्मिक व्याख्याके अनुसार लोरक और चाँद किस सीमा तक आत्मा और परमात्मा के प्रतीक हैं और उनके प्रेममें अलौकिकता कहाँतक देखी जा सकती है, इसका ऊहापोह करनेके पश्चात् ही चन्दायतके रूपक (साक) होनेका निश्चय किया जा सकता है। लौकिक कथाके रूपमें चन्दायतमें प्रेमी-प्रेमिकाके दो युग्म हैं—(१) लोरक और चाँद (२) लोरक और मैना। दोनों ही युग्मोंकी प्रेम-व्यथाकी अभिव्यक्ति दाऊदने चरम रूपमें की है। अतः दोनोंमें ही अलौकिक प्रेम देखनेकी चेष्टा की जा सकती है और दोनोंको ही परमात्मा और आत्माका प्रतीक कहा जा सकता है। पर सूफ़ी दर्शनकी दृष्टिसे विश्लेषण करनेपर दोनों युग्मोंमेंसे किसी युग्ममें आत्मा-परमात्माके अलौकिक प्रेमका रूप नहीं दिखाई पड़ता। सर्वप्रथम चाँदका परकीयत्व ही उसे परमात्माका प्रतीक माननेमें बाधक है। यदि उसकी उपेक्षा कर दी जाय तो भी चाँद और लोरकका जो प्रेम-स्वरूप काव्यमें प्रकट किया गया है उससे सूफ़ी साधकके अलौकिक प्रेमका किसी प्रकार सामंजस्य नहीं होता। परमात्मा रूपी नारी (चाँद) के प्रति साधक रूपी नर (लोरक) के प्रेमकी जो तीव्रता होनी चाहिये उसका काव्यमें सर्वथा अभाव है। काव्यके लौकिक स्वरूपको अलौकिकताके चश्मेसे देखने पर लगेगा कि नारी रूपी परमात्मा ही नररूपी आत्माके पीछे पागल हो रही है। चाँद ही लोरकके प्रति आकृष्ट होती है, वही उसको प्राप्त करनेके लिये सचेष्ट होती है। लोरक तो स्वतः निष्क्रिय यन्त्र-सा बना रहता है निस्पृहता उससे जो कुछ कहती है चुपचाप करता जाता है। सूफ़ी साधनाके अनुसार आत्मा परमात्माके मिलनेके मार्गमें नाना प्रकारकी बाधाएँ आती हैं। यहाँ लोरक और चाँदके मिलनेके पश्चात् उनके मार्गमें बाधाएँ आती हैं और लोरक अपनी प्रेमिकाके निकट होकर भी दूरीका अनुभव करता है और उसके लिए बिसूरता है। इस प्रकार आत्माके परमात्मा तक पहुँच कर फ़ना होने या बक़ाकी स्थिति प्राप्त करने जैसी अवस्था लोरक और चाँदके इस रूपमें दिखाई नहीं देती। १. पद्मावत संजीवनी व्याख्या प्रथम संस्करण प्राक्कथन पृ. १-७।

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