चन्दायन (मुल्ला दाऊद - प्राचीनतम अवधी सूफी-प्रेमाख्यान सटीक)
Chandayan of Mulla Daud with Hindi Commentary
मुल्ला दाऊद (१३७९ ई.) / डॉ. परमेश्वरीलाल गुप्त द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंलोरक-चाँदाका हरदीपाटनमे सुखपूर्वक जीवन व्यतीत करना आत्मा और परमात्माका एककार हो जानेकी चरम परिणतिका रूपक कहा जा सकता है। पर उस स्थितिमे पहुँच कर भी लोरक चाँदामे अपनेको आत्मसात नहीं कर लेता। मैना और परिवारके अन्य लोगोंके लिए उसकी व्याकुलता बनी रहती है। फ़नाके पश्चात् ऐसी स्थिति सूफी अध्यात्मवादकी कल्पनातीत है। अतः सूरज और चाँद नाम होते हुए भी काव्यके नायक नायिकामें आत्मा परमात्माका सूफियाना रूप नहीं झलक सकता। लोरक मैना वाले युग्मके प्रेम-सम्बन्धमें भारतीय नारीकी पातिव्रत्य भावना निहित है। पति रूपमें लोरक उसे छोड़ कर भाग जाता है, मैना उसके लिए बिसूरंती रहती है। यहाँ भी रूपककी दृष्टिसे आत्मा (नर) का परमात्मा (नारी) के प्रति कोई आकर्षण नहीं है जो सूफी साधनाका मूल तत्व है। इस प्रकार स्पष्ट है कि दाऊदके सम्मुख काव्य रचनाके समय कोई सूफी दर्शन नहीं था लोकप्रचलित कथाको काव्य रूप में उपस्थित करना ही अभीष्ट था।
लोक-प्रियता
सूफी साधनाका रूपक न होनेपर भी चन्दायनने सूफी साधकोंको अपनी ओर आकृष्ट किया था। दिल्लीके शेख नसरुद्दीन बाबल रब्बानी अपने धार्मिक प्रवचनोंमें इस काव्यका पाठ किया करते थे। उनका मत था कि इसमें प्रेम और मर्मकी विशालताकी पूर्ति है और धार्मिक तत्व निहित है। लगता है प्रेम और विरहकी तीव्रतासे प्रभावित होकर परवर्ती सूफियोंने खींचतानकर इस काव्यम अपनी भावनाओंको किसी प्रकार आरोपितकर किया था। सामान्य जनतामें भी यह काव्य काफी लोकप्रिय था यह बात तो अबदुलकादिर बदायूनीने स्पष्ट शब्दोंमें लिख दी है। इस ग्रन्थकी अधिकांश उपलब्ध प्रतियोंका सचित्र होना भी इस बातका समर्थन करता है। चित्रकारों और उनके संरक्षकोंको इस काव्यमें अत्यधिक रस मिलता रहा होगा तभी तो उन्होंने एक-एक कडवकको चित्रित करनेका श्रम किया और अपना पैसा बहाया। विद्वानोंमें भी इस ग्रन्थका मान था। हजरत रुकनुद्दीन ने, जो अकबरकालीन सदर उस-सदर (प्रधान न्यायाधीश) शेख अबदुन्नबीके पिता थे, लताफत कुद्दूसिया नामक एक ग्रन्थ लिखा है। उसमें उन्होंने चन्दायनकी प्रशंसाकी है और लिखा है कि उनके पिता हजरत अबदुलकुद्दूस गंगोहीने उसका फारसी अनुवाद किया था किन्तु दुर्भाग्य वश वह दिल्ली सुल्तान बहलोल लोदी और जौनपुर सुल्तान हुसैनशाह शर्कीके बीच युद्धके समय नष्ट हो गया। उन्होंने अपनी स्मृतिसे ६८ वें कड़वककी तीन पंक्तियाँ और उनका अपने पिता द्वारा किया गया फारसी अनुवाद भी अपने ग्रन्थमे उद्धृत किया है।¹
१. 'लतायफे कुद्दूसिया' अथवा न-कुद्दूसई (रिआल) में मुद्रित संस्करण, पृष्ठ १६-२ ।