चन्दायन (मुल्ला दाऊद - प्राचीनतम अवधी सूफी-प्रेमाख्यान सटीक)
Chandayan of Mulla Daud with Hindi Commentary
मुल्ला दाऊद (१३७९ ई.) / डॉ. परमेश्वरीलाल गुप्त द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६५ परवर्ती साहित्यपर प्रभाव हिंदीके परवर्ती मुसलमान कवियोंने चन्दायतको अपनी रचनाओंके निमित्त आदर्श रूपमें स्वीकार किया था, यह तथ्य उनकी रचनाओंको देखने मात्रसे ज्ञात होता है। उन्होंने छन्द-योजना की प्रेरणा चन्दायतसे ली। कुतुबनकी मिरगावति और मंझनकी मधुमालतीमें पाँच चउपई और एक धत्तावाला कडवक मिलता है। चन्दायतकी तरह ही उनके काव्यके आरम्भमें ईश्वर, पैगम्बर, चार-यार, गुरु, शाहेवक्त आदिकी प्रशंसा और उल्लेख पाया जाता है। तदनन्तर सभी काव्य अपना आरम्भ चन्दायतकी तरह ही नगर वर्णनसे करते हैं और तब कथा आगे बढ़ती है। सभी कथाओंमें हम पाते हैं कि नायक अथवा नायिकाके जन्मके पश्चात् ज्योतिषी आते हैं और उनके भविष्यकी घोषणा करते हैं। लोरककी तरह ही सभी काव्योंके नायक योगीका रूप धारण करते हैं। पद्मावतमें रतनसेन पद्मावतीके लिए, मधुमालतिमें मनोहर मधुमालतीके लिए, चित्रावलीमें सुजान चित्रावलीके लिए योगी बनकर निकलते हैं। मिरगावतिका नायक भी योगी होता है। सभी कवि दाऊदकी तरह ही योगी वेश भूषाका चित्रण करते हैं। जिस तरह दाऊदने चांदाके रूप सौन्दर्यको महत्त्व देनेके लिए उसके शिख नखका वर्णन किया है उसी तरह नायिकाओंका रूप वर्णन प्रायः अन्य सभी कवियों ने किया है। जायसी, मंझन, उसमान सभीने केश, मस्तक, शीश, कपाल, भ्रू, नयन, कपोल, नासिका, अधर, दाँत, रसना, कान, ग्रीवा, कण्ठ, कुच, कटि, नितम्ब, वपु, चरण आदिका विशद वर्णन किया है। जिस तरह दाऊदने चाँदाको लेकर हरदीपाटन पहुँचनेतक लोरकके मार्गमें अनेक कठिनाइयोंका उल्लेख किया है, उसी प्रकार अन्य सभी कवि अपनी प्रेयसीकी प्राप्तिके पूर्व नायकोंको अनेक प्रकारकी बाधाओंका सामना करते हुए दिखाते हैं। चाँदाके रूपपर आसक्त होकर लोरक जिस प्रकार घर आकर पड़ रहता है और कुटुम्बके लोग देखने आते हैं, वैद्य आदि बुलाये जाते हैं, उसी प्रकार अन्य काव्योंके प्रेम-दग्ध नायक अथवा नायिकाको देखनेके लिए लोग एकत्र होते और प्रेम-रोग होनेका निदान करते हैं। पद्मावत, मधुमालति, चित्रावली सभीमें यह प्रसंग प्राप्त है। चाँदाकी काम-वेदना और मैनाकी विरह वेदनाकी दीनता व्यक्त करनेके लिए दाऊदने बारहमासाका सहारा लिया है। उसी तरह अन्य कवियोंने भी बारहमासाको अपनाया है। मिरगावत, पदमावत, चित्रावली आदि सभीमें यह पाया जाता है। जिस तरह अपनी विरह व्यथा मैनाने बनजारा फिरन्तसे कहा है उसी तरह मिरगावतिमें रूपमंजरी (रुक्मिनि)ने अपनी व्यथा-गाथा संदेशा बनजारोंकी दासीपा दिया है। इसके अतिरिक्त भी चन्दायतमें प्रस्तुत कुछ अन्य आदर्श ऐसे हैं जो विविध प्रेमाख्यानक काव्योंमें देखे जा सकते हैं।