चन्दायन (मुल्ला दाऊद - प्राचीनतम अवधी सूफी-प्रेमाख्यान सटीक)
Chandayan of Mulla Daud with Hindi Commentary
मुल्ला दाऊद (१३७९ ई.) / डॉ. परमेश्वरीलाल गुप्त द्वारा
६५ परवर्ती साहित्यपर प्रभाव हिंदीके परवर्ती मुसलमान कवियोंने चन्दायतको अपनी रचनाओंके निमित्त आदर्श रूपमें स्वीकार किया था, यह तथ्य उनकी रचनाओंको देखने मात्रसे ज्ञात होता है। उन्होंने छन्द-योजना की प्रेरणा चन्दायतसे ली। कुतुबनकी मिरगावति और मंझनकी मधुमालतीमें पाँच चउपई और एक धत्तावाला कडवक मिलता है। चन्दायतकी तरह ही उनके काव्यके आरम्भमें ईश्वर, पैगम्बर, चार-यार, गुरु, शाहेवक्त आदिकी प्रशंसा और उल्लेख पाया जाता है। तदनन्तर सभी काव्य अपना आरम्भ चन्दायतकी तरह ही नगर वर्णनसे करते हैं और तब कथा आगे बढ़ती है। सभी कथाओंमें हम पाते हैं कि नायक अथवा नायिकाके जन्मके पश्चात् ज्योतिषी आते हैं और उनके भविष्यकी घोषणा करते हैं। लोरककी तरह ही सभी काव्योंके नायक योगीका रूप धारण करते हैं। पद्मावतमें रतनसेन पद्मावतीके लिए, मधुमालतिमें मनोहर मधुमालतीके लिए, चित्रावलीमें सुजान चित्रावलीके लिए योगी बनकर निकलते हैं। मिरगावतिका नायक भी योगी होता है। सभी कवि दाऊदकी तरह ही योगी वेश भूषाका चित्रण करते हैं। जिस तरह दाऊदने चांदाके रूप सौन्दर्यको महत्त्व देनेके लिए उसके शिख नखका वर्णन किया है उसी तरह नायिकाओंका रूप वर्णन प्रायः अन्य सभी कवियों ने किया है। जायसी, मंझन, उसमान सभीने केश, मस्तक, शीश, कपाल, भ्रू, नयन, कपोल, नासिका, अधर, दाँत, रसना, कान, ग्रीवा, कण्ठ, कुच, कटि, नितम्ब, वपु, चरण आदिका विशद वर्णन किया है। जिस तरह दाऊदने चाँदाको लेकर हरदीपाटन पहुँचनेतक लोरकके मार्गमें अनेक कठिनाइयोंका उल्लेख किया है, उसी प्रकार अन्य सभी कवि अपनी प्रेयसीकी प्राप्तिके पूर्व नायकोंको अनेक प्रकारकी बाधाओंका सामना करते हुए दिखाते हैं। चाँदाके रूपपर आसक्त होकर लोरक जिस प्रकार घर आकर पड़ रहता है और कुटुम्बके लोग देखने आते हैं, वैद्य आदि बुलाये जाते हैं, उसी प्रकार अन्य काव्योंके प्रेम-दग्ध नायक अथवा नायिकाको देखनेके लिए लोग एकत्र होते और प्रेम-रोग होनेका निदान करते हैं। पद्मावत, मधुमालति, चित्रावली सभीमें यह प्रसंग प्राप्त है। चाँदाकी काम-वेदना और मैनाकी विरह वेदनाकी दीनता व्यक्त करनेके लिए दाऊदने बारहमासाका सहारा लिया है। उसी तरह अन्य कवियोंने भी बारहमासाको अपनाया है। मिरगावत, पदमावत, चित्रावली आदि सभीमें यह पाया जाता है। जिस तरह अपनी विरह व्यथा मैनाने बनजारा फिरन्तसे कहा है उसी तरह मिरगावतिमें रूपमंजरी (रुक्मिनि)ने अपनी व्यथा-गाथा संदेशा बनजारोंकी दासीपा दिया है। इसके अतिरिक्त भी चन्दायतमें प्रस्तुत कुछ अन्य आदर्श ऐसे हैं जो विविध प्रेमाख्यानक काव्योंमें देखे जा सकते हैं।
१६ चन्दायणसे सबसे अधिक प्रभावित पदमावत है। पदमावतकी कथाका उत्तरार्ध जिसे रामचन्द्रशुक्ल एवं कुछ विद्वान् ऐतिहासिक समझते रहे हैं वस्तुतः चन्दायतकी कथाका ही पूर्वार्ध है। नामोंको बदल कर जायसीने उसे अधिकृत रूपसे आत्मसात कर लिया है। चन्दायतमें चाँदको झरोखेपर छबी देखकर बासिर मूर्च्छित होता है और वह आकर रूपचन्दसे उसके रूप सौन्दर्यकी प्रशंसा करता है। उसे सुनकर रूपचन्द गोवरपर आक्रमण करता है। ठीक यही कथा पदमावतकी भी है। इसमें बासिर, चाँद और रूपचन्दके स्थानपर क्रमशः राघव चेतन, पदमावती और अलाउद्दीनका नाम दिया गया है। जिस ढंगसे दाऊदने चाँदका रूप वर्णन किया है ठीक उसी ढंगसे जायसीने पदमावतीका किया है। आगे किस प्रकार सहदेव महर, भोजका आयोजन करते हैं और उसका किस विस्तारके साथ दाऊदने वर्णन किया है ठीक उसी प्रकार हम रतनसेनका भी पदमावतमे भोजका आयोजन करते पाते हैं और उसी विस्तारके साथ जायसीने उसका वर्णन किया है। चाँदके रूप-दर्शनके बाद लोरक बीमार बनकर खाटपर पड़ा रहता है ठीक उसी दशामें हम पदमावतमें पदमावतीके रूप श्रवणके बाद रतनसेनको पाते हैं। चाँदकी प्राप्तिके लिए लोरक योगी बनता है उसी तरह पद्मावतीकी प्राप्तिके लिये रतन सेन भी योगीका रूप धारण करता है। चाँदका लोरककी प्राप्तिके निमित्त और पद्मावतीका रतनसेनके समागमकी प्राप्तिके लिय देव-दर्शनको व्यथा एक-सी घटनाएँ हैं। चन्दायत और पदमावतकी कथाओंमें इसी तरहकी और बहुत सी कथानक सम्बन्धी समानताएँ हैं। ये अद्भुत समानताएँ यह सोचने और कहनेको विवश करती हैं कि जायसी चन्दायतसे पूर्णतः परिचित थे। वे परिचित ही नहीं थे उन्होंने अपनी काव्य रचनामें उसका मुक्त रूपसे उपयोग भी किया है। इस धारणाको इस बातसे और भी बल मिलता है कि पदे पदे पदमावतके वर्णनांश चन्दायतके साथ अत्यधिक भाव-साम्य है। उसके कुछ नमूने इन पंक्तियोंमें देखे जा सकते हैं : चन्दायत \hspace{3cm} पदमावत सिरजसि छाँह सींहु औं सूरा । १।५ \hspace{1cm} कीन्हेसि धूप छाँह औं घामीँ । १।६ पुरुख एक सिरजसि बजियारा। \hspace{1.5cm} कीन्हेसि पुरुष एक निरमरा । नाउँ मुहम्मद जगत पियारा ॥ १।१ \hspace{1.1cm} नाउँ मुहम्मद पूजिव करा ॥ १।११ घडव सिंघ एक पँथहिं रँगाय । \hspace{1.5cm} गढव सिंह रंगहि भुइ बाहहि । भुइ पाट छुहुँ पानि पियारे ॥११।७ \hspace{0.9cm} पुहुप पानि पियाहिं भुइ बाहा ॥ १५।५ एक बाट रानी हुवई \hspace{2.5cm} एक बाट सो सिंघल दोसर रानी महारि । ४११।२ \hspace{1.7cm} दोसर कंक गंभीर ॥ १५ १८
१७ लागहून रैन बाड़ दिन लीन्हा । १४९।१ अगहन दिवस घटा निसि बाढ़ी । आगे परे धीर धीर पावहुँ । अगकहि काहिं पानि पर काँटा । पाछे रहहु सो धूर बजावहु ॥ १ ।३ पछितेहि काहिं न कोइहु बाँटा ॥ १४।७ फूले काँस डाँस सिर ढाये । सरवर सँवरि हंस चलि आये । सारस कुरकहिँ बिछुरिन आये । ४३४।२ सारस कुररहिँ खंजन देखाये ॥ ३७७।१ यही नहीं अनेक स्थानों पर तो पद्मावतमें अविकल रूपसे चन्दायराकी ही शब्दावली देखनेमें आती है । अकस्मात् सामने आये ऐसे तीन-चार उदाहरण हम यहाँ दे रहे हैं : चन्दायण पद्मावत चकवा चकवी बेरि कराई । २९।१ चकइ चउया केलि कराही । ३३।५ चाँद भौरहर ऊपर गयी । १४८।७ पदुमति भौराहर चढ़ी । २७८।१ पंडित बइ सभाव बुकाये । १६९।३ ओझा बैठ सपान बोकावे । १२ ।१ ठिकक हुआइस मशाक काढ़ा । ४२ ।२ तिलुक हुआइस मशाक दीन्हे । १ ९।३ ध्यानसे देखनेपर इस तरहकी पंक्तियाँ बड़ी मात्रामें पायी जा सकती हैं । इन सबको मात्र आकस्मिक सदृशारजन्य अथवा किसी अविच्छिन्न विचार परम्पराका परिणाम कहना किसीके लिए भी कठिन ही नहीं असम्भव होगा ।
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चन्दायण ( टिप्पणी सहित मूल पाठ )
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सम्पादन विधि
- प्रस्तुत सम्पादन कार्यमें प्रत्येक कड़वकको अङ्कबद्ध कर पाठ-क्रम निर्धारित किया गया है। जहाँ कहीं किसी कड़वकका अभाव जान पड़ा उसका अङ्क छोड़ दिया गया। जिन कड़वकोंको पूर्वापरके अभावमें क्रमबद्ध करना सम्भव न हो सका, उन्हें सम्भावित स्थानपर बिना किसी प्रक्रम-संख्याके रख दिया गया है।
- प्रत्येक कड़वक-संख्याके नीचे उस प्रति अथवा प्रतियोंका नाम और पृष्ठ दिया गया है जिससे वह कड़वक उपलब्ध है। जिस प्रतिका पाठ ग्रहण किया गया है, उस प्रतिका नाम पहले अन्य प्रतियों का बादमें रखा गया है।
- तदनन्तर अनुवाद सहित कड़वकका फारसी शीर्षक दिया गया है। शीर्षक भी उसी प्रतिसे दिया गया है, जिसका पाठ ग्रहण किया गया है। अन्य प्रतियों के शीर्षक पाठान्तरके अन्तर्गत दिये गये हैं। यदि शीर्षक कड़वकके विषयसे भिन्न अथवा भ्रामक है तो उसका संकेत टिप्पणीके अन्तर्गत कर दिया गया है।
- मुख्य-पाठ किसी एक प्रतिसे लिया गया है। जिस प्रतिसे पाठ लिया गया है उसका उल्लेख कड़वकके ऊपर पहले किया गया है। अन्य प्रतियोंके पाठान्तर नीचे दिये गये हैं।
- प्रतियोंके लिपि-दोषको ध्यानमें रखते हुए विवेकके सहारे पाठ सम्पादन किया गया है।
- पाठ सम्पादन करते समय मात्राओंके सम्बन्धमें निम्नलिखित सिद्धान्त ग्रहण किये गये हैं— (क) इ, ए और ऐ की मात्राएँ वहीं दी गयी हैं जहाँ ये (छोटी या बड़ी) रूपमें आ सका है। (ख) मात्रा-चिह्नोंके अभावमें इ और उ की मात्राओंको शब्द-रूप और प्रयोगके अनुसार अपनाया गया है। (ग) वाव को प्रसङ्गवश उ, ओ और औ की मात्राके रूपमें ग्रहण किया गया है।
- पाठोंके सम्बन्धमें निम्नलिखित तथ्य उल्लेखनीय हैं— (क) नुस्खोंके अभावमें जहाँ किसी शब्दके एकसे अधिक पाठ सम्भव हैं, वहाँ उपयुक्त अथवा अर्थ-सङ्गत पाठ ग्रहण किया गया है। जहाँ आवश्यक जान पड़ा, वहाँ अन्य सम्भव पाठोंका भी टिप्पणीके अन्तर्गत दे दिया गया है।
७२ (ग) वावका शब्दके आरम्भमें सर्वत्र व और अन्तमें आने पर उसे प्रायः उके रूपमें ग्रहण किया गया है । (घ) शब्दके आरम्भमें आये अलिफ़को अ, आ, इ और ईके रूपमें और येको यके रूपमें ग्रहण किया गया है । (ङ) शब्दके आरम्भमें अलिफ़ और येके संयुक्त प्रयोगको ए और ऐकी औचित्य अनुसार रूपमें पढ़ा गया है । (च) शब्दके आरम्भमें अलिफ़ और वावके संयुक्त प्रयोगको प्रसङ्गानुसार ऊ, ओ औ अथवा आउ पढ़ा गया है । शब्दके अन्तमें आनेपर उसे केवल आउ माना गया है । (छ) सदा आदि शब्दोंके अन्तमें वाव और येके संयुक्त प्रयोगको प्रसङ्गा- नुसार बे अथवा वे पढ़ा गया है किन्तु क्रियापदोंमें हमें वेकी अपेक्षा वह पाठ अधिक संगत और उचित जान पड़ा है । • यदि गृहीत प्रतिके पाठमें कहीं कोई छूट या अभाव है तो वह दूसरी प्रतिसे लेकर पूरा किया गया है । इस प्रकार दूसरी प्रतिसे ग्रहण किये हुए पाठको बड़े कोष्ठक—[ ] में दिया गया है । • यदि छूटे हुए पाठकी पूर्ति अनुमानसे की गयी है तो उसे बड़े कोष्ठक [ ] में रखकर ताराङ्कित कर दिया गया है । • छूटे हुए पाठकी पूर्ति यदि किसी प्रकार सम्भव नहीं हो सकी है तो वहाँ बड़े कोष्ठक [ ] के भीतर अनुल्लङ्घ्य मात्राओंके अनुसार डैश रख दिये गये हैं । यदि कहीं लिपिकने प्रमादवश किसी शब्दको दुहरा दिया है तो ऐसे शब्दको ताराङ्कित कर दिया गया है । यदि उसने कोई अनपेक्षित अतिरिक्त शब्द रख दिया है तो पाठसे उस शब्दको निकाल दिया गया है और मूल पाठ अलग संग्रह कर दिया गया है । • इसी प्रकार कोई पाठ स्पष्ट रूपसे अशुद्ध जान पड़ा तो वहाँ सम्भावित पाठ छोटे कोष्ठक ( ) में देकर मूल पाठको अलग संग्रह कर दिया गया है । • ऐसे शब्दोंको जिनका हम समुचित पाठोद्धार करनेमें असमर्थ रहे अथवा जिनके पाठके सम्बन्धमें हमें किसी प्रकारका सन्देह है पाठके अन्तर्गत भिन्न रूपमें दिया गया है । • प्रत्येक कडवकके पाठके नीचे अशुद्ध मूल पाठ अथवा पाठान्तर देकर टिप्पणी दिये गये हैं । प्रत्येक पंक्तिसे सम्बन्धित टिप्पणियाँ पंक्ति-संख्या देकर अलग- अलग दी गयी हैं । इन टिप्पणियोंके अन्तर्गत शब्दोंका अर्थ व्याख्या आवश्यक सूचना आदि दिया गया है । किन्तु यह कार्य खूब विस्तारसे नहीं किया जा सका ।
कड़बक सूची [ उपलब्ध सभी प्रतियोंमें कड़बकोंके आरम्भमें फारसी भाषामें कड़बकका सारांश अथवा शीर्षक दिया हुआ है। उन शीर्षकोंको हमने अनुवाद सहित प्रस्तुत किया है। किन्तु अनेक स्थानोंपर ये शीर्षक भ्रमात्मक अथवा निरपेक्ष हैं। अतः हम अपनी ओरसे कड़बकके शीर्षकोंकी एक स्वतन्त्र सूची यहाँ प्रस्तुत कर रहे हैं, ताकि अपेक्षित कड़बक ढूँढनेमें सुगमता हो। कथावस्तुकी रूपरेखा स्पष्ट करनेके लिए, पदमावतके अनुकरणपर विषयके अनुसार कड़बकोंको हमने यहाँ समूहोंमें एकत्र कर दिया है और अपनी ओरसे उनका नामकरण किया है। आशा है पाठकोंके लिए यह उपयोगी सिद्ध होगा।] स्तुति- १-ईशस्मरण ६-मुहम्मद ७-चार मीत ८-दिल्ली सुलतान फीरोज शाह; ९-शेख जैनुद्दीन; ११-ज्ञानजहाँ; १२-ज्ञानजहाँका व्याप १३-मालिक मुबारिककी प्रशंसा; १४-१५मऊ नगर। (यह अंश अत्यन्त त्रोटित रूपमें है और बीकानेर प्रतिके चरणामें प्रकाशित अंशपर आश्रित है।) शायर वर्णन- १८-अमरावती २०-सरोवर और मन्दिर २१-सरोवरका निर्मल जल; २२-सरोवरके जन्तु २७-नगरकी राह २५-दुर्ग २६-नगरनिवासी २७-राज्ञाधिकारी (?); २८-गन्ध और पन्सारी २ -बाजीगर आदि, ३ -राजद्वार, १०-राजमहल, १२-रानियाँ। (दी इण्टम प्रतिके आधारपर यह चयन-क्रम दिया गया है। इसमें कुछ कड़बकोंका अभाव है और वर्णन-क्रम भी पूर्णतः संगत नहीं जान पड़ता।) चाँदका जन्म और विवाह- ३३ ३४-जन्म ३५-उदीपन और डोलना; ३६-चाँदके रूपकी ख्याति; ३७-गीत (घेउ) का विवाह प्रस्ताव; ३८-रावण-नाऊका सहदेवक अनुरोध ३ -सहदेवा उत्तर; ४ -विवाहकी तैयारी ४०-गीत (घेउ) का साँइँडको सूचना; ४१-बारातका प्रस्थान ४२-विवाह ४४-दहेज। चाँद की व्यथा- ४५-४६ चाँ० का बावनको उत्तर ४६-चाँदका आगमन घर ४७-सासका
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(ग) वावको शब्दके आरम्भमें सर्वत्र व और अन्तमें आने वालेको प्रायः उके रूपमें ग्रहण किया गया है। (घ) शब्दके आरम्भमें आये अलिफ़को अ, आ, इ और उके रूपमें और येको एके रूपमें ग्रहण किया गया है। (ङ) शब्दके आरम्भमें अलिफ़ और येके संयुक्त प्रयोगको ए और ऐकी अपेक्षा अइके रूपमें पढ़ा गया है। (च) शब्दके आरम्भमें अलिफ़ और वावके संयुक्त प्रयोगको प्रसङ्गानुसार ऊ, ओ, औ अथवा आउ पढ़ा गया है। शब्दके अन्तमें आनेपर उसे केवल आउ माना गया है। (छ) वंश आदि शब्दोंके अन्तमें वाव और येके संयुक्त प्रयोगको प्रसङ्गा- नुसार वे अथवा वै पढ़ा गया है किन्तु विचारमार्गमें हमें वेकी अपेक्षा वइ पाठ अधिक संगत और उचित जान पड़ा है। ● यदि गृहीत प्रतिके पाठमें कहीं कोई छूट या अभाव है तो वह दूसरी प्रतिसे लेकर पूर्ण किया गया है। इस प्रकार दूसरी प्रतिसे ग्रहण किये हुए पाठको बड़े कोष्ठक--[ ] में दिया गया है। ● यदि छूटे हुए पाठकी पूर्ति अनुमानसे की गयी है तो उसे बड़े कोष्ठक [ ] में रखकर तारांकित कर दिया गया है। ● छूटे हुए पाठकी पूर्ति यदि किसी प्रकार सम्भव नहीं हो सका है तो वहाँ बड़े कोष्ठक [ ] के भीतर अनुस्वार-मात्राओंके अनुसार डैश रख दिये गये हैं। यदि कहीं लिपिकने प्रमादवश किसी शब्दको दुहरा दिया है तो ऐसे शब्दको तारांकित कर दिया गया है। यदि उसने कोई अनपेक्षित अतिरिक्त शब्द रख दिया है तो पाठसे उस शब्दको निकाल दिया गया है और मूल पाठ अलग संग्रह कर दिया गया है। ● इसी प्रकार जहाँ पाठ स्पष्ट रूपसे अशुद्ध जान पड़ा तो वहाँ सम्भावित पाठ छोटे कोष्ठक ( ) में देकर मूल पाठको अलग संग्रह कर दिया गया है। ● ऐसे शब्दोंको जिनका हम समुचित पाठोद्धार करनेमें असमर्थ रहे अथवा जिनपर शब्द-सम्बन्धमें हमें किसी प्रकारका सन्देह है पाठके अन्तर्गत भिन्न टाइपमें दिया गया है। ● प्रसंग बदलकर पाठके नीचे अशुद्ध मूल पाठ अथवा पाठान्तर देकर टिप्पणी दिये गये हैं। प्रत्येक पंक्तिसे सम्बन्धित टिप्पणियाँ पंक्ति-संख्या देकर अलग अलग की गयी हैं। इन टिप्पणियोंके अन्तर्गत शब्दोंका अर्थ, व्याख्या, आवश्यक सूचना आदि दिया गया है। किन्तु यह कार्य खूब विस्तारसे नहीं किया जा सका।
७५ ११०-दूतोंका लौटना और चाँदाका मारा जाना १११-सिगार-बाँठा युद्ध; ११२-मददातोंका मारा जाना; ११३-घरमूँका युद्ध करना; ११४-रूपचन्दका युद्ध करना; ११५-मैदानमें सेना सहित बाँठाका आना; ११६-बाँठाके मुक़ाबले लोरकका आना ११७-लोरक-बाँठा युद्ध ११८-रूपचन्दका बाँठासे परामर्श ११९-बाँठाका उत्तर; १२०-लोरक-रूपचन्द युद्ध १२१-बाँठाका मारा जाना १२२-लोरकका रूपचन्दकी सेनाको खदेड़ना १२३-युद्धके मैदानम मुर्दाखोर पशुपक्षी। चाँदाका लोरकपर मुग्ध होना— १२४-विषयोल्लास और लोरकका दुःख; १२५-चाँदाका दुःख देखना १२६-लोरकका रूप-वर्णन १२७-लोरकको देखकर चाँदाका मूच्छित होना १२८-बिरहस्तका चाँदाको समझाना १२९-बिरहस्तका लोरकको घर बुलानेका उपाय बताना १५ -चाँदाका पितासे जेवनारके आयोजनका अनुरोध। ज्यानार— १३१-ज्यानारका आयोजन; १३२-अहेरियाका अहेर करना १३४-पक्षियोंका पकड़ कर लाया जाना; १३५-भोजनकी व्यवस्था; १३६-तरकारी वर्णन; १३७- पकवानका वर्णन; १३८-पावसौंका वर्णन १३९-रोटीका वर्णन १६ -पान पत्रका वर्णन १४१-निमंत्रितोंका बैठना १४२-व्यंजनोंका परोसा जाना। चाँदाके प्रति लोरकका आकर्षण— १४३-गेंदके समय लोरकका चांदको देखना; १४४-लोरकका घर आकर खाटपर पड़ रहना; १४५-लोरककी माँका विलाप १४६-बिरहस्तका लोरकके घर आना १४७-बिरहस्तका लोरकको देखना १४८-लोरकका बिरहस्तसे चाँद-रहनकी बात करना १५१-बिरहस्तका लोरकको समझाना १७ - लोरकका बिरहस्तक पाँव पकड़कर अनुनय करना १७१-बिरहस्तका उपाय बताना; १७२-बिरहस्तका लौटना १७३-बिरहस्तका चान्दके पास जाना। लोरकका योगी रूप धारण— १७४-लोरकका योगी होना; १७५-चाँदका मन्दिरमें आना १७६-चाँदका मुक्ताहार टूटना; १७७-चाँदका योगीकी सूचना मिलना; १७८-चाँदका योगीको प्रणाम करना और योगीका मूच्छित होना १७ -चाँदका मन्दिरसे घर लौटना, १८२-लोरकका पश्चात्ताप १८३-देवताका उत्तर। चाँद और लोरककी व्याकुलता— १८४-चाँदका बिरहस्तसे इसके प्रति निराशा; १८५-बिरहस्तका उत्तर; १८६- चाँदका बिरहस्तपर क्रोध १८७-बिरहस्तका चाँदस लोरकक मोहित होनेकी बात कहना; १८८-चाँदका कष्ट प्रकट करना; १८ -बिरहस्तको लोरकके पास
७४ समझाना ४८-चाँद का उत्तर; ४९-साहस क्रोध ५०-सहदेव को सूचना; ५१-चाँद का मैके भेजना; ५२-सहेलियों से भेंट। व्यथा-वर्णन- ५३-५४-माघ मास; ५५-फागुन मास ५६-चैत मास। (यह अंश बारहमासा के रूप में है। अतः उसमें कम से कम १२ कड़वक रहे होंगे। किन्तु तीन ही मास सम्बन्धी कड़वक उपलब्ध हैं। उपलब्ध कड़वक भी अधूरे हैं जो पंजाब प्रति से प्राप्त हुए हैं।) बाजिर का चाँद-दर्शन- ६६-बाजिर का चाँद को देखकर मूर्च्छित होना ६७-जनता का बाजिर से मूर्च्छा का कारण पूछना; ६८ ६९-बाजिर का उत्तर, ७०-बाजिर का नगर छोड़ कर जाना ७१-दूसरे नगर में पहुँचकर बाजिर का गाना; ७२-राजा रूपचन्द का बाजिर को बुलाना; ७३-बाजिर का चाँद दर्शन की बात कहना; ७४-चाँद के प्रति राजा की जिज्ञासा। चाँद की रूप-चर्चा- ७५-माँग ७६-केश; ७७-ललाट; ७८-भौंह; ७९-नेत्र; ८०-नासिका ८१- अधर ८२-दाँत; ८३-रसना; ८४-कपोल; ८५-तिल; ८६-ग्रीवा ८७-भुजाएँ; ८८-कुच; ८९-पेट ९०-पीठ ९१-जानु ९२ पग और गति; ९३-आचार; ९४-वस्त्र; ९५-आभूषण। रूपचन्द का सहदेव पर आक्रमण- ९६ ९७-कूच की तैयारी; ९८-रूपचन्द के अस्त्र ९९-दलक हाथी; १००-सेना की कूच; १०१-मार्ग में अपशकुन; १०२-गोबर नगर पर घेरा १०३-नगर में आतंक; १०४-सहदेव का रूपचन्द के पास दूत भेजना १०५-दूतों को रूपचन्द का उत्तर; १०६-दूतों का समझाना; १०७-दूतों पर रूपचन्द का क्रोध १०८-दूतों को मारने का आदेश १०९-रूपचन्द का चाँद की माँग करना; ११०-दूतों का लौटना; १११ सहदेव का अपने सेनानायकों से परामर्श ११२-सहदेव के अस्त्र; ११३- उसके अश्वारोही ११४-धनुर्धर ११५-रथ ११६-हस्ति। रूपचन्द-सहदेव युद्ध- ११७-सेनाओं का युद्धक्षेत्र में आना; ११८-नेबक साँढा का युद्ध; ११९-रूपचन्द की सेना में विखलभल मच जाना १२०-गोरक के पास भाट का जाना; १२१-गोरक का युद्ध के लिये तैयार होना १२२-मैना का गोरक को युद्ध में जाने से रोकना; १२४- गोरक का जलकी के घर जाना १२५-अम्भी का युद्ध-कौतुक बतलाना; १२६- गोरक का महर के पास पहुँचना १२७-गोरक का युद्ध के मैदान में आना; १२८- गोरक की सेना १२९-उसे देखकर रूपचन्द का स्तम्भित होना और दूत भेजना;
१३०-दूतोंका लौटना और सीहका मारा जाना; १३१-सिंगार-बाँठा युद्ध १३२-ब्रह्मदत्तका मारा जाना; १३३-घमूँछा युद्ध करना १३४-रुपपतिको युद्ध करना; १३५-मैदानमें सैन्य सहित बाँठाका आना; १३६-बाँठाके मुकाबिले लोरकका आना १३७-लोरक-बाँठा युद्ध १३८-रूपचन्दका मातासे परामर्श १३९-बाँठाका उत्तर; १४०-लोरक-रूपचन्द युद्ध १४१-बाँठाका मारा जाना; १४२-लोरकका रूपचन्दकी सेनाको खदेड़ना १४३-युद्धके मैदानमें मुदामोर फगुण्डी। चाँदका लोरकपर मुग्ध होना— १४४-विश्वमोहमन्त्र और लोरकका हुस्न १४५-चाँदका दुग्ध देखना १४६-लोरकका रूप-वर्णन १४७-लोरकको देखकर चाँदका मूर्छित होना; १४८-बिरहपतका चाँदको समझाना १४९-बिरहपतका लोरकको घर बुलानेका उपाय बताना; १५०-चाँदका पितासे जेवनारके आयोजनका अनुरोध। ज्योनार— १५१-ज्योनारका आयोजन १५२-अहेरियाँका अहेर जाना १५४-पक्षियोंका पकड़ कर लाया जाना; १५५-भोजनकी व्यवस्था; १५६-तरकारी वर्णन १५७- पकवानका वर्णन; १५८-पापड़ोंका वर्णन १५९-रोटीका वर्णन १६०-कन पत्रका वर्णन १६१-निमंत्रितोंका बैठना १६२-व्यंजनोंका परसा जाना। चाँदके प्रति लोरकका आकर्षण— १६३-मेजके समय लोरकका चाँदको देखना; १६४-लोरकका घर आकर खाटपर पड़ रहना; १६५-लोरककी माँका विलाप; १६६-बिरहपतका लोरकके घर आना १६७-बिरहपतका लोरकको देखना १६८-लोरकका विरहस्तसे चाँद-स्थानकी बात कहना १६९-बिरहपतका लोरकको समझाना; १७०- लोरकका बिरहपतके पाँव पकड़कर अनुनय करना; १७१-बिरहपतका उपाय बताना १७२-हिरहस्तका लौटना १७३-विरहस्तका चाँदके पास आना। लोरकका योगी रूप-धारण— १७४-लोरकका योगी होना; १७५-चाँदका मन्दिरमें आना १७६-चाँदका मुखाहार टूटना; १७७-चाँदको पागीकी सूचना मिलना; १७८-चाँदका योगीको प्रणाम करना और योगीका मूर्छित होना १७९-चाँदका मन्दिरसे घर लौटना, १८१-लोरकका पश्चाताप; १८२-देवताका उत्तर। चाँद और लोरककी व्याकुलता— १८४-चाँदका बिरहपतसे प्रेमके प्रति निराशा; १८५-बिरहपतका उत्तर; १८६- चाँदका बिरहस्तसे क्षोभ; १८७-बिरहस्तका चाँदसे लोरकके मोहित होनेकी बात कहना १८८-चाँदका खेद प्रकट करना; १८९-बिरहस्तको लोरकके पास
भेजना; १९ -विरहमठका गोरखको योगी-वेष त्यागनेको कहना; १९१-गोरखका योगी वेश त्यागना; १ २-गोरखका घर छोड़ना १९३-चाँदके लिए गोरखकी विरहव्यथा १९४ १९५-गोरखके लिए चाँदकी विरहावस्था; १९६-चाँदका विरहमठ को वारंवार पाठ भेजना; १९७-विरहमठ और गोरखकी बातचीत; १९८-विरहमठ का गोरखको चाँदके आवासका रास्ता दिखाना। गोरखका चौगङ्गाडहर-प्रवेश- १ - गोरखका पाठ खरीदकर कमन्द बनाना; २ -अन्धेरी रातमें गोरखका चाँदके घरकी ओर जाना २ १-गोरखका चाँदका आवास पहचानना; ३ २- चाँदका कमन्द गिरानेका भेद; २ ३-गोरखका चाँदके आवासमें प्रवेश। चाँदका आवास- २ ४-गोरखका चाँदका शयनागार देखना १ ५-चित्रकारीका वर्णन; २ ६- सुगन्धका वर्णन २ ७-शय्याका वर्णन २४८-गोरखका चाँदको जगाना २ ९-जागकर चाँदका किकना २१०-गोरखका चाँदसे कहना; २११-चाँद का उत्तर २१२-गोरखका कथन २१३-चाँदका प्रश्न २१४-गोरखका उत्तर; २१५-चाँदका गोरखका उपहास करना; २१६-गोरखका उत्तर; २१७-चाँदका प्रेम प्रश्न २१८-गोरखका उत्तर, २१९-चाँदका अपने प्रेमके प्रति विश्वास; ३२ -गोरखका उत्तर, २२१-चाँदका मैनाकी प्रशंसा करना २२२-गोरखका उत्तर २२३-चाँदका अपना प्रेम प्रकट करना; २२४-वात-परीक्षामे रात बीतना २२ -गोरख-चाँद प्रश्न २२६-प्रातःकाल खाटके नीचे गोरखका छिपना; २२७-दासियों और सहेलियोंका आना; २२८-चाँदका बहाना बनाना; २२९-विरहमठका चाँदकी माँको सूचना देना; २३०-चाँदके माता-पिताका आना २३१-चाँदका गोरखको विदा करना २३२-गोरखको द्वारपालका देख लेना २३३-चाँदका कमरेमें लौटकर भविष्य गुनना। खारफ-मैनामें कहा-सुनी- २३४-मैनाका गोरखसे रातको गायब रहनेकी बात पूछना; २३५-महलमें पर पुरुष आनेकी बात फैलना २३६-जोगिनका मैनासे मलिनाताका कारण पूछना; २३७-जोगिनका गोरखके सम्बन्धमें अपनी अनभिज्ञता प्रकट करना २३८- मैनाका कहना २३९-जोगिनका समझाना २४ -२४१-मैनाका गोभितमें रहना २४२-गोरखका समझ जाना कि मैना बात जान गयी; २४३-मैनाका गोरखपर क्रुद्ध होकर बोलना २४४-गोरखका मैनाको धमकाना २४५-जोगिन का आकर गोरख मैनामें सुलह कराना; २४६-गोरख-मैनामें सुलह; २४७- गोरखका मैनाकी प्रशंसा करना; २४८-मैनाका उत्तर; २४९-गोरख मैनाकी प्रसन्नता।
७७ चाँद और मैनाका मन्दिर-गमन— २५०—पण्डितका चाँदसे देव-पूजा करनेको कहना २५१—देव पूजाके किये नाना जातिकी स्त्रियोंका आना २५२—सहेलियोंके साथ चाँदका मन्दिर जाना २५३— चाँदका मन्दिर प्रवेश २५४—चाँदका पूजा करना और मनौती मानना २५५— मैनाका सहेलियोंके साथ मन्दिरम आना और पूजा करना । चाँद-मैना संग्राम— २५६—चाँदका मैनासे उदासीका कारण पूछना; २५७—मैनाका छोभ मय उत्तर देना २५८—चाँदका प्रत्युत्तर २५९—मैनाका चाँदको उत्तर, २६०—चाँदका मैनाको गाली २६१—मैनाका चाँदके अभिसारकी बात प्रकट करना २६२— चाँदका उत्तर, २६३—मैनाका प्रत्युत्तर २६४—चाँदका उत्तर, २६५—मैनाका प्रत्युत्तर २६६—चाँद मैनाम हाथापायी २६७—चाँद मैनामे गुत्थमगुत्थी २६८—दोनोंका रक्तरंजित होना २६९—युद्धसे मन्दिरके देवताकी परेशानी २७०—लोरकका आना और स्थितिसे परिचित होना २७१—लोरकका मैना चाँदका अलग करना । महरिसे चाँदकी शिकायत— २७२—चाँदका मन्दिरसे घर लौटना २७३—मैनाका मन्दिरसे घर आना २७४— धोबिनका मैनासे मन्दिरकी घटना पूछना २७५—मैनाका मालिनको बुला कर महरिके पास शिकायत भेजना २७६—मालिनका महरिके पास जाना २७७— मालिनका महरिसे चाँदकी शिकायत करना २७८—चाँदकी नादानी पर महरिका शम्कित होना । लोरक-चाँदका गोवर छोड़नेकी तैयारी— ७ —चादका बिरस्पतको लोरकके पास भेजना; २८ —बिरस्पतका लोरकसे चादका सन्देश कहना; २८१—बिरस्पतका लोरकको समझाना; २८७—बिरस्पतका चाँदके पास वापस आना २८८—लोरक चाँदका साथ चलनेका निश्चय करना; २८९—लोरकका यात्राका मुहूर्त पूछना २९ —ब्राह्मणका मुहूर्त बताना २९१— चाँदका महलसे निकलना २९२—चांद लोरकका गोवरसे प्रस्थान २९३—उनस काले वस्त्र पहन आगे बढ़ना २९४—मैनाका सुधनी होना । कुँवरस भेंट— २९५—कुँवरका मागमे लोरकको पहचानना २९६—चाँदका कुँवरस अपने प्रेम की बात कहना २९७—कुँवरका चाँदकी भर्त्सना करना २९८—लोरकका कुँवरसे मिलकर आगे बढ़ना । लोरक-चाँदका गंगा पार करना— २९९—शामकाल लोरक चाँदका वृक्षके नीचे सोना ३०४—दोनोका गंगा तट
७६ भेजना १९०-विरहस्तका लोरकसे योगी-वेष त्यागनेको कहना १९१-लोरकका योगी वेश त्यागना; १९२-लोरकका घर लौटना १९३-चाँदके लिए लोरककी विकलता; १९४ १९७-लोरकके लिए चाँदकी विकलता; १९६-चाँदका विरहस्त- को लोरकके पास भेजना १९७-विरहस्त और लोरककी बातचीत १९८-विरहस्त का लोरकको चाँदके आवासका रास्ता दिखाना । लोरकका धौराहर-प्रवेश- १९९- लोरकका पाट खरीदकर कमन्द बनाना; २ ०-अन्धेरी रातमें लोरकका चाँदके घरकी ओर जाना; २ १-लोरकका चाँदका आवास पहचानना २ २- चाँदका कमन्द गिरानेपर खेद २ ३-लोरकका चाँदके आवासम प्रवेश । चाँदका आवास- २ ४-लोरकका चाँदका शयनागार देखना; २ ५-चित्रकारीका वर्णन; २ ६- सुगन्धका वर्णन २ ७-शय्याका वर्णन २ ८-लोरकका चाँदको जगाना २ ९-जागकर चाँदका खिसकना; २१०-लोरकरा चाँदसे कहना; २११-चाँद का उत्तर; २१२-लोरकका कथन; २१३-चाँदका प्रश्न २१४-लोरकका उत्तर; २१५-चाँदका लोरकका उपहास करना २१६-लोरकका उत्तर, २१७-चाँदका प्रेम प्रश्न २१८-लोरकका उत्तर, २१९-चाँदका अपने प्रेमके प्रति जिज्ञासा २२०-लोरकका उत्तर, २२१-चाँदका मैनाकी प्रशंसा करना २२२-लोरकका उत्तर; २२३-चाँदका अपना प्रेम प्रकट करना; २२४-हास-परिहासमें रात बीतना २२ -लोरर चाँद प्रलाप; २२६-प्रातःकाल खाटके नीचे लोरकको छिपाना २२७-दासियों और सहेलियोंका आना २२८-चाँदका बहाना बनाना; २२९-विरहस्तका चाँदकी माँको सूचना देना २३ -चाँदके माता पिताका आना २३१-चाँदका लोरकको विदा करना २३२-लोरकको हारयष्टिका बैल देना २३३-चाँदका कमरेमें लोरकर भविष्य गुनना । लोरक-मैनामें कहा-सुनी- २३४-मैनाका लोरकसे रातको गायब रहनेकी बात पूछना; २३५-महकने पर पुरुष आनेकी बात फैलना २३६-धोबिनरा मैनासे मलिनताका कारण पूछना २३७-धोबिनका लोरकके सम्बन्धमें अपनी अनभिज्ञता प्रकट करना; २३८- मैनाका कहना; २३९-धोबिनका समझाना २४ -२४१ मैनाका धोबिनसे कहना २ २-लोरकका समझ जाना कि मैना बात जान गयी २४३-मैनाका लोरकसे तुष्ट होकर बोलना २४४-लोरकका मैनाको धमकाना; २४५-धोबिन का जाकर लोरक मैनामें सुलह कराना २४६-लोरक मैनामें सुलह; २४७- लोरकका मैनाकी प्रशंसा करना २४८-मैनाका उत्तर; २४९-लोरक मैनाकी प्रसन्नता ।
चाँदा और मैनाका मन्दिर-गमन— २५६-पण्डितका चाँदासे देव पूजा करनेको कहना २५७-देव-पूजाके लिये नाना जातिकी स्त्रियोंका जाना २५८-सहेलियोंके साथ चाँदाका मन्दिर जाना २५९- चाँदाका मन्दिर प्रवेश २६४-चाँदाका पूजा करना और मनौती मानना २६५- मैनाका सहेलियोंके साथ मन्दिरमें आना और पूजा करना । चाँदा मैना संग्राम— २६६-चाँदाका मैनासे उदासीका कारण पूछना; २६७-मैनाका क्षोभ भरा उत्तर देना २६८-चाँदाका प्रत्युत्तर २६९-मैनाका चाँदाको उत्तर १६०-चाँदाका मैनाको गाली २६१-मैनाका चाँदाके अभिसारकी बात प्रकट करना २६२- चाँदाका उत्तर; २६३-मैनाका प्रत्युत्तर २६४-चाँदाका उत्तर, २६५-मैनाका प्रत्युत्तर २६६-चाँदा मैनामें हाथापायी; २६७-चाँदा-मैनामें गुथमगुत्थी; २६८-दोनोंका रक्तरंजित होना २६९-युद्धसे मन्दिरके देवताकी परेशानी; २७०-लोररुका आना और स्थितिसे परिचित होना २७१-लोररुका मैना चाँदाको अलग करना । महरिसे चाँदाकी शिकायत— २७२-चाँदाका मन्दिरसे घर लौटना २७३-मैनाका मन्दिरसे घर आना; २७४- सोभिनका मैनासे मन्दिरकी घटना पूछना; २७५-मैनाका माखिनको बुला कर महरिके पास शिकायत भेजना २७६-माखिनका महरिके पास आना; २७७- माखिनका महरिसे चाँदाकी शिकायत करना २७८-चाँदाकी नादानी पर महरिका शंकित होना । लोरक-चाँदाका गोयर छोड़नेकी तैयारी— २७९-चाँदाका बिरसतको लोरकके पास भेजना २८०-बिरसतका लोरकसे चाँदाका सन्देश कहना; २८१-बिरसतका लोरकको समझाना २८७-बिरसतका चाँदाके पास वापस आना; २८८-लोरक चाँदाका भाग चलनेका निश्चय करना २८९-लोररुका यात्राका मुहूर्त पूछना २९०-ब्राह्मणका मुहूर्त बताना २९१- चाँदाका महलसे निकलना; २९२-चाँद-लोररुका गोयरसे प्रस्थान; २९३-उनका काले वस्त्र पहन आगे बढ़ना; २९४-मैनाका दुःखी होना । कुँवरूसे भेंट— १९५-कुँवरूका मार्गमें लोरकको पहचानना २९६-चाँदाका कुँवरूसे अपने प्रेम- की बात कहना २९७-कुँवरूका चाँदाकी भर्त्सना करना २९८-लोररुका कुंवरूसे मिलकर आगे बढ़ना । लोरक-चाँदाका गंगा पार करना— २९९-सायंकाल लोरक चाँदाका नन्दके नीचे सोना; ३०४-दोनोंका गंगा तट
७८ पर पहुँचना ३५-चाँद रूप पर मल्लाहका मोहित होना; ३६-मल्लाहका चाँदसे परिचय पूछना ३७-सोरठका मल्लाहको गिरा कर नाव पार ले जाना। (इस अंशमें कुछ कडवकों का अभाव जान पडता है। गंगा तट तक पहुँचने और मल्लाह के साथ होनेवाली घटनाका स्वरूप अस्पष्ट है।) बाबन-सोरठ युद्ध— ३८-गंगा तटपर बाबनका आना ३९-बाबनका गंगामें कूदकर सोरठका पीछा करना; १११-चाँदका बाबनके आ पहुँचनेकी सूचना सोरठको देना ११०-चाँदका बाबनसे अपने उपेक्षिता होनेकी बात कहना १११-बाबनका उत्तर और सोरठपर बाण छोड़ना ११४-चाँदका सोरठको सचेत करना और बाबनका पुन' बाण मारना; ११५-बाबनका हार मानना; ११६-बाबनका खेद प्रकट करना। सोरठ और विद्याका (?) संघर्ष— ११७-मार्गमें सोरठ-चाँदसे विद्या (?) का भेंट; ११८-किसीका रूप (?) से चाँदकी प्रशंसा; ११९-राय गागेवका सोरठके पास आना (?) १२०-सोरठका विद्याबलीस युद्ध; १२१-सोरठका विद्याका हाथ काटना; १२१-विद्याका रायसे परिवाद करना; १२४-रायका विद्यासे हाल पूछना और विद्याका कहना (यह अश अपूर्ण है। उपलब्ध कडवकोंसे कथा क्रमका पता नहीं चलता। कडवकोंका क्रम भी अनिश्चित है। उनके व्यतिक्रम होनेकी सम्भावना अधिक है।) राय बरिया और सोरठ— १२५-राय बरियाका मत्रियोंसे परामर्श १२६-रायका सोरठको बुलानेके लिए ब्राह्मण भेजना; १२७-सोरठसे ब्राह्मणोंका निवेदन करना; १२८-सोरठका रायके पास जाना १२९-सोरठका रायसे बातचीत; १३०-रायका सोरठका सम्मान करना; १३१-सोरठको भेंट देकर रायका विदा करना। चाँदको साँपका डसना— १३२-सोरठ चाँदका मादाम के घर ठहरना और रात में चाँदको साँपका डसना; १३३-चाँदका मूर्च्छित होना; १३४-चाँदके वियोगमें सोरठका रोना; १३५- सोरठका विलाप १३६-गारुड़ीका आकर मन्त्र पढ़ना; १३७-चाँदका जीवित हो उठना। सोरठका अहीरों-गदहियासे युद्ध— (कडवक १३८-१४३ अप्राप्य हैं। इनके बीचका केवल एक कडवक उपलब्ध है जिससे इस घटनाका अनुमान मात्र होता है ) चाँदका दुबारा सांप काटना— १४४-सोरठ-चाँदका बनभ्रमण करना और चाँदका सांप काटना; १४५ १४७ चाँदका मूर्च्छित होना और सोरठका विलाप करना १४८-सोरठका गारुडके
१४७को कोचना १४९-लोररुका साँपको कोचना १५ १५५ लोरकका कोचना और विलाप करना १५६-गारुडीका आना और लोरकका उसके पाँव पडना १ ७-लोरकका अपना सबस्व देनेका वादा करना १५८-गारुडीका मन्त्र पढना और चाँदका जीवित होना १५९-लोरकका गारुडीको सारे आभूषण देना १६०-कविकी उक्ति । सारंगपुरमें लोरक— महीपतिके साथ जुआ— महिपतिके साथ युद्ध— महसिया द्वारा लोरकका सम्मान (?)— मधुकरके साथ युद्ध (?)— चाँदको तीसरी बार साँप काटना— ( उपर्युक्त घटनाओंस सम्बध रखनेवाला अंश अनुपलब्ध है। इनका वर्णन कितने कड़बकौमें किया गया है, बताना कठिन है। हमने इनका वर्णन कड़बक १६१ १७२में होनेका अनुम्यन किया है। कड़बक १६१से लोरकके धारगपुर पहुँचनेका अनुमान होता है। इसके अतिरिक्त चार खण्डित कड़बक और उपलब्ध हैं जिनसे अन्य घटनाओका आभास मात्र होता है।) चाँदका स्वप्न वर्णन— १७१-चाँदका होशमें आना और स्वप्न देखनेकी बात कहना; १७४-स्वप्नमें विधाता लोरकको आदेश । दूँदू द्वारा चाँदका अपहरण— १७५-चादको मन्दिरमें बैठाकर लोरकका जाना और दूँदा (योगी) का आना; १७६-दूँदा (योगी) का जादू करना और चाँदका विस्मृत होना १७७-लोरक का लौटकर आना और चादाको न पाना १७८—दूँदा (योगी) का पता लगाना १७९-दूँदा और लोरक दोनोंका चाँदको अपनी पत्नी बताना १८ -सिद्धका उन्हें समासे झगड़ेका फैसला करानेकी सलाह देना; १८१-सभासे लोरककी फरियाद; १८२-सभाका लोरकसे प्रश्न; १८३-लोरकका उत्तर; १८४- योगीका चाँदको अपनी पत्नी बताना ( इस अंशके आगेके कुछ कड़बक अप्राप्य हैं ।) हरदोईमें लोरक और चाँद— १८९-लोरक-चाँदका हरदोईकी सीमापर पहुँचना; १९ -शिकारको जाते हुए राय सेतमका लोरकको देखना १९१-लोरकके सम्बन्धमें मार्गका जानकारी प्राप्त करना; १९२-लोरकका परिचय बताना; १९३-राय सेतमको लोरकका परिचय मिलना; १९४-लोरकका रायके पास जाना १९५-रायका लोरकका सम्मान करना १९६-रायका लोरकके पर पारिवारिक उपयोगकी सामग्री भेजना १९७-लोरक का नाच आदिको दान देना ।
७८ पर पहुँचना; १७—चाँदके रूप पर मल्लाहका मोहित होना; १८—मल्लाहका चाँदसे परिचय पूछना; १८-लोरकका मल्लाहको गिरा कर नाव पार ले जाना। (इस अंशमें कुछ कड़बकों का अभाव जान पड़ता है। गङ्गा तट तक पहुँचन और मल्लाह के साथ होनेवाली घटनाका स्वरूप अस्पष्ट है।) बाभन-लोरक युद्ध— १८-गङ्गा तटपर बाभनका आना; १ ९-बाभनका गंगा में कूदकर लोरकका पीछा करना; १११-चाँदका बाभनके आ पहुँचनेकी सूचना लोरकको देना; ११०-चाँदका बाभनसे अपने उपेक्षिता होनेकी बात कहना; १११-बाभनका उत्तर और लोरकपर बाण छोड़ना; ११४-चांदका लोरकको सचेत करना और बाभनका पुन' बाण मारना; १२५-बाभनका हार मानना; ११६-बाभनका खेद प्रकट करना। लोरक और वियाछा (?) संघर्ष— ११७-मार्गमें लोरक-चाँदसे बिया (?) का भेंट; ११८- किसीका राय (?) से चाँदकी प्रशंसा; ११९-राय गमोउका लोरकके पास आना (?) १२०-लोरकका वियाछानीसे युद्ध; १२१-लोरकका बियाछा हाथ काटना; १२२-वियाछा रायसे परिवाद करना १२४-रायका वियाछे हाल पूछना और वियाछा बताना (यह अंश अपूर्ण है। उपलब्ध कड़बकोंसे कथा-क्रमका पता नहीं चलता। कड़बकोंका क्रम भी अनिश्चित है। उनके व्यतिक्रम होनेकी सम्भावना अधिक है।) राय करिंगा और लोरक— १२५-राय करिंगाका मन्त्रियोंसे परामर्श; १२६-रायका लोरकको बुलानेके लिए ब्राह्मण भेजना; १२७-लोरकसे ब्राह्मणोंका निवेदन करना; १२८-लोरकका रायके पास आना १२९-लोरकका रायसे बातचीत; १३०-रायका लोरकका सम्मान करना; १३१-लोरकको भेंट देकर रायका विदा करना। चाँदको साँपका डसना— १३२-लोरक-चाँदका ब्राह्मण के घर ठहरना और रात में चाँदको साँपका डसना १३३-चाँदका मूर्छित होना १३४-चाँदके वियोगमें लोरकका रोना; १३५- लोरकका विलाप; १३६-गारुड़ीका आकर मन्त्र पढ़ना १३७-चाँदका जीवित हो उठना। लोरकका महीटौ-बहेलियोंसे युद्ध— (कड़बक १३८-१४३ अप्राप्य हैं। इनके बीचका केवल एक कड़बक उपलब्ध है जिससे इस घटनाका अनुमान मात्र होता है) चाँदको दुबारा साँप काटना— १४४-लोरक-चाँदका बनखण्डमें रुकना और चाँदको साँप काटना; १४५ १४७ चाँदका मूर्च्छित होना और लोरकका विलाप करना;; १४८-लोरकका चमकके