चन्दायन (मुल्ला दाऊद - प्राचीनतम अवधी सूफी-प्रेमाख्यान सटीक)
Chandayan of Mulla Daud with Hindi Commentary
मुल्ला दाऊद (१३७९ ई.) / डॉ. परमेश्वरीलाल गुप्त द्वारा
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अपहृत कर ले जाती हुई अंकित की गयी है। वर्तमान काव्यम हम चाँडको त्याग करनेके लिए लोरकको प्रेरित करते पाते हैं। (३) रूप-गुण-जन्य आकर्षण—भारतीय प्रेमाख्यानोंम पूर्वानुराग एक मुख्य अभिप्राय है। कथासरित्सागरमें नरवाहनदत्त सखीके मुखसे कपूरसम्भव देशकी राजकुमारी कर्पूरिकाका रूप-गुण सुनकर उसकी ओर आकृष्ट होता है। इसी प्रकार प्रतिष्ठानका राजा पृथ्वीराज बौद्ध भिक्षुके मुखसे मुक्तिपुर द्वीपकी रूपलता नामक कन्या का सौन्दर्य सुनकर उसपर मुग्ध हो जाता है। विक्रमाङ्कदेव चरितम विल्हण चन्द्रलेखाकी प्रशंसा सुन विरह-व्यथासे व्याकुल हो उठता है। ठीक उसी प्रकार इस काव्यम बाजिरके मुखसे चाँदकी रूप-प्रशंसा सुनकर रूपचन्द व्याकुल हो उठता है और उसे प्राप्त करनेकी चेष्टा करता है। (४) अकेले पाकर नायिकाका अपहरण—नायिकाको अकेली छोड़कर किसी कार्यसे नायकके चले जानेपर किसी अन्य व्यक्ति द्वारा उसका अपहरण अनेक भारतीय कथाओंमें पाया जाता है। रामायणमें रामके मृगके पीछे जानेपर रावण द्वारा सीताका अपहरण एक प्रसिद्ध घटना है। प्रस्तुत काव्यमें लोरकके बाजार चले जानेपर मन्दिरमें अकेला पाकर टूँटा द्वारा सम्मोहनकर चन्दाका अपहरण ऐसी ही घटना है। (५) जुएमें पत्नीको दाँवपर लगा देना—जुएमें पत्नीको दाँवपर लगा देना भी भारतीय साहित्यका एक जाना पहिचाना अभिप्राय है। पाण्डवों द्वारा द्रौपदीको दाँवपर हार जानेकी कथा इसका एक प्रसिद्ध उदाहरण है। चन्द्रायानके शेख कयामुद्द नसमें लोरक द्वारा चन्दाको जुएम हारजानेका स्पष्ट उल्लेख है। सम्भवतः दाऊदने भी इसका उल्लेख अपने काव्यमें किया है पर तत्सम्बन्धी अंश अनुपलब्ध होनेसे निश्चय पूर्वक कुछ नहीं कहा जा सकता। (६) पत्नीके सतीत्वकी परीक्षा—पतिसे विलग रही पत्नीके सतीत्वकी परीक्षा रामायणकी एक प्रमुख घटना है। इस काव्यमें भी लोरक हरदीपाटनसे लौटकर मैनाके सतीत्वके परखनेकी चेष्टा करता है। (७) प्रवासी पतिके विरहमें पत्नीका झूरना—प्रवासी पतिके विरहमें दग्ध पत्नियोंकी कथाए अपभ्रंश साहित्यम प्रचुर मात्राम मिलती हैं। यथा—नेमिनाथ फगु, सन्देशरासक, बीसलदेव रास। मैनाका लोरकके वियोगम बिसूरना उसी कोटिका अभिप्राय है। वर्णनात्मकता मौलाना दाऊदने चाँद और लोरकके जीवनमें घटित घटनाओंका जिस रूपमें वर्णन किया है उससे लगता है कि उनका उद्देश्य चाँद और लोरकके चरितके माध्यमसे अपने समयके सामन्तवादी जीवनका यथार्थ चित्रण करना ही रहा है। गोबरसे हरदीपाटन तक विस्तृत पार्श्वमें लोक और जीवनका जो चित्र उन्होंने उपस्थित किया उसमें कहीं भी आदर्शकी झलक दिखाइ नहीं पड़ती।