चन्दायन (मुल्ला दाऊद - प्राचीनतम अवधी सूफी-प्रेमाख्यान सटीक)
Chandayan of Mulla Daud with Hindi Commentary
मुल्ला दाऊद (१३७९ ई.) / डॉ. परमेश्वरीलाल गुप्त द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें५१ कि टाँड कहाँसे आ रहा है, क्या वनिज उसने लाद रखा है और कहाँ जायगा ? फिर उसका नाम-धाम कुटुम्ब-परिवारकी बात पूछी और अपनी व्यथा उसे कह सुनायी। यह सुनकर कि टाँड हरदीपाटन जायेगा, लोरिकिन खूब रोयी और मैना आकर उसके पाँवोंपर गिर पड़ी और बताया कि उसके पति लोरकको चाँद भगाकर पाटन ले गयी है। उसने अपनी सारी व्यथा कह सुनाई (कविने विरह व्यथाका वणन बारहमासाके रूपमें किया है)। मैना और लोरिकिन दोनोंने सिरजनसे लोरकके पास जाने और उससे उनकी दीन दुःखीकी अवस्था कहने और वापस आनेका आग्रह करनेका अनुरोध किया। (४१७-४१९) ४९-सिरजन मैनाका सन्देशा लेकर चला और चार मासमें हरदीपाटन जा पहुँचा। लोरकके घरका पता लगाकर वहाँ गया और अपने आनेकी सूचना भेजी। उस समय लोरक सो रहा था। द्वारपालोंने सूचना दी कि बाहर एक पण्डित आकर खड़ा है। सुनते ही लोरक बाहर आया और ब्राह्मणको प्रणाम किया। ब्राह्मणने उसे आशीर्वाद दिया और फिर बैठकर पोथी देखकर राशि आदिकी गणना की और बोला कि तुम्हारा राजपाट गोवरमें है और तुम मैनाके पति हो। छल तुमने भूमिमें डालकर चाँदको आकाशमें चढ़ा रखा है। (४२०-४२४) ५०-मैनाका नाम सुनते ही लोरकका हृदय भरराने लगा। पूछा मैनाकी बात तुमने कहाँ सुनी और चाँदकी बात तुमसे किसने कही ? तुम कहाँसे आये हो ? तुम्हें किसने हरदीपाटन भेजा ? तुम तो परदेशी नहीं, स्वदेशी जान पड़ते हो। हाँ, अगर मैनाका कुशल-क्षेम मिले तो तुम्हारे पैरोंकी धूलि अपने शीशपर लगाऊँ। तब सिरजनने उसे उसके घरकी सारी दुरवस्था कह सुनायी। मैनाकी दुरवस्था सुनकर लोरक रोने लगा और उसके लिए व्याकुल हो उठा। बात करते-करते शाम हो गयी पर ब्राह्मणकी बात समाप्त न हुई। लोरकने सिरजनको स्नान कराकर भोजन कराया और दो लाख दाम (ताँबेका एक सिक्का) और हजार नेव सामग्री भेंट की और कहा कि कल चलूँगा। तुम भी मेरे साथ चलो। (४२४-४३१) ५१-सिरजन की बात सुनकर चाँद का मुख एक दम मलीन हो उठा। उसने समझ लिया कि लोरक अब अपने घर लौट चलेगा। उसने उस रात कुछ नहीं खाया और वह उदासी ही सो रही। (४३२) ५२-दूसरे दिन लोरक पाटनके रायके बुलाने पर उनके पास गया और घरसे आया सन्देशा बताया और अपने मनकी विकलता प्रकट की। तत्काल राजाने उनके जानेकी तैयारी कर दी और साथमें कुछ सैनिक भी कर दिये जो उसे गोवर पहुँचा आयें। चाँदने हरदीसे न जानेके लिए लोरकको समझाने बुझानेकी चेष्टाकी पर लोरकने उसकी एक न सुनी। चाहाको छोड़कर वह गोवरकी ओर चल पड़ा। (४३६-४३५) ५३-जैसे शाम वह गोवर के निकट पहुँचा और वह पड़ाव लोगे लोग वह गया तो देखकर आनन्दित लोरिकने ? घर जाकर सूचना दी कि लोरई राय मैना लेकर