चन्दायन (मुल्ला दाऊद - प्राचीनतम अवधी सूफी-प्रेमाख्यान सटीक)
Chandayan of Mulla Daud with Hindi Commentary
मुल्ला दाऊद (१३७९ ई.) / डॉ. परमेश्वरीलाल गुप्त द्वारा
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है। लोरक चांदा द्वारा आकृष्ट किये जानेके बाद ही उसकी ओर आकृष्ट होता है। वह चांदाके वियोगमें तड़पता अवश्य है पर उसको प्राप्त करनेके निमित्त स्वयं कोई यत्न नहीं करता। चांदा ही अपनी दासी बिरसतके माध्यमसे उसे अपने निकट बुलानेका उपक्रम करती है और उसे अपने पास बुलाती है। चांदा ही लोरकको साथ लेकर भाग चलनेको प्रेरित करती है। चांदाकी प्रेरणासे ही वह गोवर छोड़कर हरदीकी ओर प्रस्थान करता है। मार्गमें जब बामन उससे लड़ने आता है तो चांदा ही उसे उससे बचनेका उपाय बताती है। मार्गकी कठिनाइयोंमें भी चांदा ही प्रधानता लिये दिखायी पड़ती है। लोरक तो उसका सहायक मात्र लगता है। कहनेका तात्पर्य यह है लोरकका सारा कार्य यन्त्रवत है। उसके कार्योंकी सूत्रधार चांदा है। लोरकसे अधिक निश्चय हुआ रूप मैनाका है उसे हम सरलतासे उप- नायिका या सहनायिका कह सकते हैं। यों तो मैना भी लोरककी तरह ही चांदाके माध्यमसे काव्यमें उभार पाती है; पर उभरनेके पश्चात् वह अपना स्वतंत्र अस्तित्व लेकर काव्यके उत्तरार्धपर छा जाती है। वहाँ भी पुरुष पात्रके रूपमें लोरकका किसी प्रकारका निखरा रूप सामने नहीं आता। चन्दायनमें दूसरी उल्लेखनीय बात यह है कि इसके नायक नायिका और उपनायिका तीनों ही विवाहित हैं। नायिका चांदाका विवाह बावनसे हुआ है जिसका स्थान समूचे काव्यमें नगण्य है। उपनायिका मैना मौर्य नायक लोरककी पत्नी है। भारतीय प्रेमकथाओंमें अधिकांशत: हम नायक-नायिकाके रूपमें अविवाहित युवक युवतियोंको ही पाते हैं। उनके प्रेमकथनकी परिणति विवाहमें होती है और कथा समाप्त हो जाती है। कुछ प्रेम-कथाएँ ऐसी अवश्य हैं जिनमें नायक विवाहित होते हुए भी किसी सुन्दरीके प्रति आकृष्ट होता है और उसे प्राप्त करनेकी चेष्टा करता है। पुरुरवा उर्वशी और दुष्यन्त शकुन्तलाकी कथाएँ इसी ढंगकी हैं। पर भारतीय साहित्यमें ऐसी कोई कहानी नहीं मिलती जिसमें कोई नायिका विवाहित होकर किसी पुरुषके प्रति आकृष्ट हुई हो और उसे प्राप्त करनेकी चेष्टाकी हो। हाँ फारसी प्रेमाख्यानों यथा- लैला मजनूँ, शीरीं-फरहाद आदिकी नायिकाएँ विवाहित पायी जाती हैं; किन्तु उनकी भी कोई नायिका स्वतः किसी पुरुषकी ओर आकृष्ट नहीं होती। पुरुष ही अपनी प्रेमकी तीव्रतासे उसे अपनी ओर खींचनेकी चेष्टा करता है। इन तथ्योंपर ध्यान देनेपर कथाका यह अनोखापन अपने आपमें उभर उठता है। चन्दायनकी कथाका एक अनोखापन यह भी है कि नायिका चांदाको नायक लोरकके मिलने तक ही प्रेम-व्यथा सहन करना पड़ता है। उसके पश्चात् जब नायक लोरक उसके निकट आ जाता है तो उसे अपनी प्रेमिकाके अत्यन्त निकट रहते हुए भी वियोगका दुःख भुगतना पड़ता है। उसकी प्रेमिका बार-बार रूठकर अथवा गांठकर उसे दुःखी बनाती रहती है। इस कथामें विरहका वास्तविक भार तो उपनायिका मैनाको सहना पड़ता है। वह लोरकके विरहमें दिन रात झुरती रहती है। इस कथामें यह भी असाधारण बात देखनेको मिलती है कि सामान्य प्रेम