चन्दायन (मुल्ला दाऊद - प्राचीनतम अवधी सूफी-प्रेमाख्यान सटीक)
Chandayan of Mulla Daud with Hindi Commentary
मुल्ला दाऊद (१३७९ ई.) / डॉ. परमेश्वरीलाल गुप्त द्वारा
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बम्बईवाली प्रतिमें चन्दायनेके पृष्ठोंसे अलग अन्तमें थे। किसी एक जिल्दमें दो ग्रन्थोंके खण्डित पृष्ठोंका एक साथ होना कोई नवीन बात नहीं है। मैना-सतकी कथा जिसे हम परिशिष्टमें दे रहे हैं, अपने आपमें इतनी पूर्ण और इस ढंगकी है कि उसे किसी प्रकार चन्दायनेम जोड़ा नहीं जा सकता। जिस परिस्थितिमें साधनने मैना-सतमें बारहमासा दिया है, उसी परिस्थितिमें चन्दायनेमें पहलेसे एक बारहमासा मौजूद है। मैना-सतकी मैना अपने घरमें एकाकी है जिसके कारण वह दूतीको, विश्वास कर अपने पास रख लेती है। चन्दायनेकी मैनाके पास उसकी सास जोखिन मौजूद है। उसके रहते दूतीका मैनाको बहका सकना सम्भव नहीं है। मैना-सत किसी भी प्रकार चन्दायनेमें खप नहीं सकता। अतः यह कहना कि मैना-सत चन्दायनेके प्रसंग रूपमें रचाया गया था गलत है। साथ ही इस प्रसंगमें यह बात भी ध्यान देनेकी है कि मैना-सतके प्रत्येक कड़वकमें साधनके नामकी छाप है। किसी पूर्व रचनामें समावेश करनेके लिए रची गयी सामग्रीमें कोई कवि अपना नाम नहीं देता। यह बात पद्मावतके उन अंशोंको देखनेसे स्पष्ट हो जाती है जिन्हें माताप्रसाद गुप्तने प्रक्षिप्त माना है। दूसरी बात यह है कि मैना सतके प्रत्येक कडवकके आरम्भमें एक सोरठा है, जिसका चन्दायनेमें सर्वथा अभाव है। यदि चन्दायनेमें सम्मिलित करनेके लिए मैना-सतकी रचना हुई होती तो उसमें सोरठोंका कदापि प्रयोग न होता। अतः साधन कृत मैना-सत और दोउल काजी कृत सति मैना व लोर चन्दानीके आधारपर चन्दायनेकी कथा आदिके सम्बन्धमें किसी प्रकारकी कल्पना करना भ्रम उत्पन्न करना मात्र है। कथा-स्वरूप की विशिष्टता चन्दायनेकी कथा अपने किसी भी रूपमें भारतीय कथा-साहित्य—संस्कृत या अपभ्रंश—में नहीं पायी जाती। वह अपने आपमें अनूठी है। इसका सबसे बड़ा अनोखापन इस बातमें है कि यह कथा नायक प्रधान न होकर नायिका-प्रधान है। कथाका आरम्भ नायिकाके जन्मसे आरम्भ होता है और उसके जीवनकी घटनाओंको लेकर ही कथा आगे बढ़ती है। उसके सारे पात्र नायिका चाँदाको केन्द्र बनाकर सामने आते हैं। लोरक जिस इस काव्यका नायक कहा जा सकता है, कहीं भी मुख्य पात्रकी तरह उभरा हुआ प्रतीत नहीं होता। कथामें वह हमारे सामने सहदेव-रूपचन्द युद्धके समय पहली बार सहदेवके सहायक वीरके रूपमें आता है। युद्ध-समाप्तिके पश्चात् यदि चाँद उसकी ओर आकृष्ट न होती तो उसका कोई महत्त्व न होता। सामान्यतः नायक ही नायिकाकी प्राप्तिकी चेष्टा किया करते हैं; किन्तु इस प्रकारकी कोई भी चेष्टा लोरककी ओरसे आरम्भ नहीं होती। नायिका चाँद ही सामान्य नायिकाओंके सामान्य स्वभावके सर्वथा प्रतिकूल लोरकको प्राप्त करनेकी ओर सचेष्ट होती है और युक्तिपूर्वक उसको अपनी ओर आकृष्ट करनेका यत्न करती