चन्दायन (मुल्ला दाऊद - प्राचीनतम अवधी सूफी-प्रेमाख्यान सटीक)
Chandayan of Mulla Daud with Hindi Commentary
मुल्ला दाऊद (१३७९ ई.) / डॉ. परमेश्वरीलाल गुप्त द्वारा
पृष्ठ 71, कुल 520 में से
संदर्भ में पढ़ें५४
होगी।¹ अर्थात उनकी दृष्टिमें दौलत काजीने दाऊदके चन्दायत और साधनके मैना-सतको एकमें जोड़ कर अपने काव्यकी रचना की है, समूचा काव्य साधनकी रचनाका रूपान्तर नहीं है। इस धारणाके फलस्वरूप चन्दायतकी कथाकी कल्पना बँगला लोर-चन्दानी के आधार पर की जाती रही है। परिशिष्टमें हम सति मैना व लोर-चन्दानीकी कथा दे रहे हैं। उसे देखने मात्रसे यह स्पष्ट हो जायेगा कि उक्त बँगला काव्य और चन्दायतके सूक्ष्म लोरक और चाँदाकी प्रेम-कथा होते हुए भी दोनोंके रूप और विस्तारमें इतना अन्तर है कि बँगला काव्यको चन्दायत का रूपान्तर नहीं कहा जा सकता। बँगला काव्यकी कथा चन्दायतकी तुलनामें अत्यन्त संक्षिप्त है। उसमें हरदी- पाटनके मार्गमें लोरक और चाँदाके सामने आनेवाली विपत्तियों और कठिनाइयों की कोई चर्चा नहीं है। इस कथामें लोरक द्वारा मैनाके परित्यागमें चाँदाका कोई योग नहीं है। लोरक स्वेच्छया वनमें जाकर रहने लगता है और वहाँ वह योगीके मुखसे चन्दानीकी रूप-प्रशंसा सुनता है। चन्दायतमें चाँदाकी रूप-प्रशंसा योगी राजा रूपचन्दके सम्मुख करता है जिसका बँगला ग्रन्थमें कोई उल्लेख नहीं है। बँगला कथामें लोरक योगीसे चन्दानीकी रूप-प्रशंसा सुन कर चन्दानीके पिताके राज्यमें जाता है। वहाँ चन्दानी लोरकको देखती है और लोरक चन्दानीकी छबि दर्पणमें देखता है और दोनों एक दूसरे पर आसक्त होते हैं। तदनन्तर लोरक चन्दानीके महलमें प्रवेश करता है और उसे ले भागता है। चाँदाका पति बामन लोरकसे लड़ने आता है और मारा जाता है। लोरक अपने ससुरके राज्यको जीतता है। लौटते समय चन्दानीको साँप काटता है और उसे एक योगी अच्छा करता है। पश्चात् दोनों सुख पूर्वक राज्य करते हैं। बारह वर्ष पश्चात् मैना लोरकके पास ब्राह्मण भेजती है और तब लोरक लौटता है। इन घटनाओँके वर्णनका ढंग भी चन्दायतसे बहुत भिन्न है। कथाके इस रूपसे लग सकता है कि दौलत काजीके सामने लोरक-चाँदाकी दाऊद कथित कहानी नहीं थी। बहुत सम्भव है जैसा कि दौलतकाजी ने कहा है साधनने भी लोरक-चाँदाकी प्रेम कहानी अपने ढंगपर लिखी हो और वह काव्य हमें पूरे रूपमें उपलब्ध न होकर मैना-सत के रूपमें अंशमात्र ही उपलब्ध हो। माताप्रसाद गुप्तकी धारणा है कि साधन कृत मैना-सत चन्दायतके एक प्रसंगके रूपमें कहा गया है। उनकी धारणाका भी आधार दौलतकाजीका ही बँगला काव्य है। चन्दायतकी बम्बईवाली प्रतिके साथ मैना-सतकेके चार पृष्ठ मिले थे, इस बातको उन्होंने अपने कथनका प्रमाण माना है। पर इस तथ्यको सिद्ध करनेके लिए बम्बई प्रतिका साक्ष्य ग्राह्य नहीं है। मैना-सतके ये चार पृष्ठ स्वयं रूपसे
१. भारतीय साहित्य वर्ष ३ अंक १ पृष्ठ १४४। २. भारतीय साहित्य वर्ष ४ अंक १,२ पृ० ४८।