चन्दायन (मुल्ला दाऊद - प्राचीनतम अवधी सूफी-प्रेमाख्यान सटीक)
Chandayan of Mulla Daud with Hindi Commentary
मुल्ला दाऊद (१३७९ ई.) / डॉ. परमेश्वरीलाल गुप्त द्वारा
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उसने मैनाको मनाया और विश्वास दिलाया कि मैं तुम्हें चाँदसे अधिक प्रेम करता हूँ। उसने चाँद के साथ मिलकर रहनेका उससे अनुरोध किया । ( ४४६ ४४८ ) ५६-गोबरमें यह बात फैल गयी कि मैना आगन्तुकके साथ मैत्री रखती है । साम्बिनने यह बात जाकर अजबीसे कहा और गुहार लगायी । अजबी तत्काल घोड़े पर सवार होकर आया और लोरक भी लड़नेके लिए निकल पड़ा । अजबीने दौड़कर गाँड़ा जगया । लेकिन वह बीचमें ही टूट गया । तब लोरकको उसने पहचाना और दोनों एक दूसरेके गले मिले । अजबीने लोरकसे कहा कि इस तरह छिपे क्यों हो; अपने घर चलो । तत्काल लोरक अपने घर आया और माँके पाँव पड़ा । सोखिनने दोनों बहुओं (चाँद और मैना) को बुलाया । दोनों पाँव पड़कर गले मिलीं और तीनों सुखसे रहने लगीं । सारे गोबरमें प्रसन्नता छा गयी । ( ४४९-४५० ) ५७-लोरकने अपनी माँसे पूछा कि मैना कैसे रही कैसे माह रहे । तब साम्बिनने बताया कि तुम्हारे पीछे बावन आया था । उसने मैनाको गालियाँ दीं । अजबीने आकर मैनाको बचाया । तुम्हारे पीछे महरने नाइ भेजकर मौरुकका कहराया कि लोरक देश छोड़कर हरदीपाटन भाग गया है । मौरु अपनी सेना लेकर आया । कँवरने अकेले उसका सामना किया पर वह अकेला क्या करता मारा गया । एक तो तुम्हारा दुख था दूसरा यह दुख लग गया । दिन भर रोती और रात भर जागती रही हूँ । ( ४५१-४५२ ) (इसके आगेका अंश उपलब्ध नहीं है जिससे कथाके अन्तके सम्बन्धमें कुछ नहीं कहा जा सकता । पर अनुमान होता है कि अपनी माँ की कष्ट-कथा सुनकर लोरक अपने शत्रुओँके विनाशमें रत हुआ होगा; पश्चात् अपनी दोनों प्रेयसियोंके साथ सुख पूर्वक जीवन बिताकर स्वर्ग सिधारा होगा ।)
कथा सम्बन्धी भ्रान्त धारणाएँ
चन्दायनकी कथाका उपयुक्त स्वरूप सामने न रहनेके कारण दो अन्य ग्रन्थोंके आधारपर विद्वानोंने कथाके सम्बन्धमें कुछ अद्भुत कल्पनाएँ प्रस्तुत की हैं। कुछ आगे करनेसे पहले उनका निराकरणकर देना उचित होगा । बगला भाषामें सति मैना उ लोर-चन्दानी नामक एक काव्य ग्रन्थ है जिसकी रचना सत्रहवीं शताब्दी में दौलत काजी और अलाओल नामक कवियोंने की थी । प्रकाशकों के कथनानुसार उनका यह काव्य साधन नामक कविकी गोहारी भाषामें किए काव्यका बँगला रूप है। साधन कविके मैना-सत नामक काव्यकी नागरी और फारसी लिपिमें लिखी अनेक प्रतियाँ मिली हैं। साधन कृत मैना-सत और उपयुक्त प्रस्तुत काव्यके वृत्तान्तमें बहुत साम्य है; अतः कहा जा सकता है कि बगला काव्यका आधार मैना-सत ही रहा होगा । पर उभय पुस्तकोंका तुलनाके लिए दोनों के ई सामग्री प्राप्त नहीं जिसे साधार कुछ कहा जा सके । उभय अध्यायोंमे वासुदेव शरण अग्रवालको स्मरण हुई कि यह योग शायद इस चन्दायण पर आश्रित