चन्दायन (मुल्ला दाऊद - प्राचीनतम अवधी सूफी-प्रेमाख्यान सटीक)
Chandayan of Mulla Daud with Hindi Commentary
मुल्ला दाऊद (१३७९ ई.) / डॉ. परमेश्वरीलाल गुप्त द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें५७ कथाओंकी तरह नायिका-नायकके मिलनेके पश्चात् इस कथाका अन्त नहीं होता। वरन लोरक-चाँदके मिलनेके पश्चात् कथाका विस्तार होता है। तदनन्तर उपनायिका मैनाकी विरहव्यथासे द्रवित होकर, नायिकाकी बातोंको अनसुनी कर लोरक घर लौटता है। लौटकर भी वह सुख-चैनसे नहीं बैठता। आगे भी कुछ करता है, जिसका पता ग्रन्थके खण्डित होनेके कारण हमें नहीं लगता। इस प्रकार चन्दायन किसी निश्चित शैली अथवा परिपाटीमें बँधी प्रेम-कथा नहीं है। उसका लक्ष्य केवल चाँद और लोरकके रूपाकर्षणकी चरम परिणति दिखाना नहीं है। इसमें चाँद और उसके साथ-साथ लोरकका सम्पूर्ण चरित्र उपस्थित किया गया है। इस दृष्टिसे इसे प्रेमाख्यान कहनेकी अपेक्षा चरित-काव्य कहना अधिक संगत होगा। यदि हमारी धारणाके अनुसार चन्दायन चरित-काव्य है तो चाँद और लोरक का ऐतिहासिक अस्तित्व होना चाहिये। किसी जीवन-वृत्तके कल्पना-प्रसूत होनेकी सम्भा- वना बहुत कम होती है। काव्यके रूपमें उसमें कल्पनाके मिश्रणसे अतिरंजना हो सकती है पर उससे मुख्य पात्रोंकी ऐतिहासिकतामें किसी प्रकारकी कमी नहीं आती। चाँद और लोरकके ऐतिहासिक अस्तित्वसे हमारा यह अभिप्राय यह कभी नहीं है कि उनका उल्लेख हमें ऐतिहासिक अथवा पौराणिक ग्रन्थोंमें मिलना ही चाहिये। हो सकता है चांद और लोरक ऐसे लोगोंमें हों जिनकी कहानी इतिहासकारोंको आकृष्ट नहीं कर पायी फिर भी जन-जीवनकी स्मृतियोंमें उनकी याद बनी रही। आधारभूत लोक-कथा चन्दायनकी कथा लोक-जीवनमें प्रचलित कथाका ही साहित्यिक रूप है, इस बातमें तनिक भी सन्देह नहीं रह जाता जब हम नायक लोरक नायिका चाँद और उपनायिका मैना मंजरीके ताने बानेके साथ बुनी गयी उन लोक कथाओंको देखते हैं जो पूर्वी उत्तर प्रदेश, बिहार, बंगाल और छत्तीसगढ़के प्रदेशोंमें बिखरी मिलती हैं। (इन लोक-कथाओंको हम परिशिष्ट रूपमें संकलित कर रहे हैं।) इन सभी कथाओं का बाह्यरूप एक-सा है केवल यत्र-तत्र आन्तरिक घट- नाओंके रूपमें भिन्नता है; कोई घटना किसी कथामें है किसीमें नहीं। उनके तुलनात्मक अध्ययनसे ऐसा जान पड़ता है कि इन लोक कथाओंके वे सभी तत्त्व जो आज हमें बिखरे मिलते हैं किसी समय एक सूत्र में ग्रथित रहे होंगे। समयके साथ कथाके विस्तृत क्षेत्रमें फैलनेपर कहीं पुराने तत्त्व नष्ट हो गये और कहीं नये तत्त्व आकर जुड़ गये। इस दृष्टिको रखकर जब हम इन लोक-कथाओंके साथ चन्दायनकी कथाका अध्ययन करते हैं तो हमें उसमें लोक कथाओंमें बिखरे प्रायः सभी तत्त्व एक साथ मिल जाते हैं। लोरक-चाँदकी प्रेम कथा दाऊदके समयमें सारी प्रचलित लोक कथा रही होगी इसका अनुमान इस बात से हो सकता है कि उनका उल्लेख मैथिल कवि