चन्दायन (मुल्ला दाऊद - प्राचीनतम अवधी सूफी-प्रेमाख्यान सटीक)
Chandayan of Mulla Daud with Hindi Commentary
मुल्ला दाऊद (१३७९ ई.) / डॉ. परमेश्वरीलाल गुप्त द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंउस प्रदेशकी भाषाके कुछ शब्द-रूपों और क्रियाओका प्रयोग कविने किया है। इस प्रकार इस काव्यमं किसी एक भाषाका स्वरूप नहीं है। यदि इसी तथ्यको स्वीकार करें कि काव्यकी भाषा किसी एक प्रदेशकी भाषा है तो भी यह नहीं कहा जा सकता कि उसकी भाषा दक्षिण कोसली है। यह शिलालेख मध्य प्रदेश—धारसे प्राप्त हुआ है दक्षिण कोसलसे उसका किसी प्रकार कोई सम्बन्ध नहीं है। श्याममनोहर पाण्डेयकी यह धारणा कि दक्षिण कोसली अवधीका एक पूर्व रूप है, भाषा विज्ञान और इतिहास दोनों दृष्टिसे अन्धताका परिचायक और हास्या- स्पद है। प्राचीन इतिहासमें दक्षिण कोसल उस प्रदेशका नाम है जो आजकल छत्तीस- गढ़के नामसे अभिहित किया जाता है। छत्तीसगढ़ी भाषाका अवधीके साथ किसी प्रकारका नैकट्य है, यह कहना कठिन है। चन्दायनेकी भाषाको अवधी सिद्ध करनेके लिए राउल वेलकी भाषाको अवधीके पूर्व रूपका नमूना नहीं माना जा सकता। साथ ही यह तथ्य भी भुलाया नहीं जा सकता कि राउल वेलकी भाषाका चन्दायनेकी भाषाके साथ एक दृढ़का सादृश्य है। राउल वेलकी वर्तमान कालिक क्रियाएँ—भावइ, छड़ीवइ आदि चन्दायनेकी वर्तमानकालिक क्रिया आवइ, भावइ, सुहावइक अत्यन्त निकट हैं। यह इस बातका द्योतक है कि राउल वेल और चन्दायनेकी भाषाका निकट सम्बन्ध है और उनकी भाषा प्रादेशिक न होकर देशके विस्तृत भागमें प्रचलित भाषाका रूप है। चन्दायनेकी भाषाके व्याकरणकी गहराईसे अध्ययन किये जानेकी आवश्यकता है। तभी भाषाके सम्बन्धमें कुछ निश्चयपूर्वक कहा जा सकता है। पर यह कार्य ग्रन्थके शुद्ध पाठ उपस्थित किये जानेपर ही सम्भव है। सामान्य रूपेण जो कुछ हम देख और समझ सके हैं उसके आधारपर हमारी धारणा है कि दाउदने अपने काव्यके लिए ऐसी भाषाको अपनाया था जो अपभ्रंश साहित्यकी शब्द-परम्परासे विकसित होकर व्यापक रूपसे देशके विस्तृत भू-भागम प्रचलित थी। यदि वह काव्य विस्तृत क्षेत्रमें बोली नहीं तो समझी अवश्य जाती थी। चन्दायनेमं संस्कृत शब्दोंका प्रयोग बहुत ही कम है उसमें प्राकृत आर अपभ्रंशसे देशज रूपमे ढले शब्दोंका ही बाहुल्य है। सुम्मरन विचक्खन आदि शब्दोंका प्रयोग इस काव्यमें अपभ्रंश परम्पराके अवशेषाके रूपमें देखा जा सकता है। चन्दायनेके शब्दोंका हिन्दीके अनेक प्राचीन काव्योंके साथ तुलनात्मक अध्ययनसे ऐसा ज्ञात होता है कि इस काव्यका उनके साथ निकट का सम्बन्ध है। इसका अथ यह नहीं कि कवि अरबी फारसीके प्रभावसे अछूता है। उसने इन भाषाओँ से भी शब्द लिये हैं पर वे ऐसे हैं जो सम्भवतः भारत-भूमिकी बोलचालकी भाषामें पूर्णतः खप गये थे। फिर भी कहीं-कहीं इन शब्दोंका प्रयोग विचित्र अथवा बेमेल प्रतीत होता है। यथा— मैना उत्तर सो पीर सुनावा ४१।१ (ब्राह्मणके लिए पीरका प्रयोग)। विहँसे साहम राज बराबर ४२१।१ (तीतरके लिए साहम [शोभन])।