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चन्दायन (मुल्ला दाऊद - प्राचीनतम अवधी सूफी-प्रेमाख्यान सटीक)

चन्दायन (मुल्ला दाऊद - प्राचीनतम अवधी सूफी-प्रेमाख्यान सटीक)

Chandayan of Mulla Daud with Hindi Commentary

मुल्ला दाऊद (१३७९ ई.) / डॉ. परमेश्वरीलाल गुप्त द्वारा

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१८ जे लगि पड़े सो अमरंपरी जायी (जायेगा) परनइँ माँउ मँगर तिहूँ खायी (खायेंगे) जो जन जान कहहु संवारी (कहना) भविष्यत् कालकी सर्वनाम क्रियाका रूप उक्ति-व्यक्ति-प्रकरणमें एइव अथवा 'अवइ' मिलता है। यथा—पइब, करब, करव घरब। चन्दायनेमें इन रूपका प्रयोग हुआ है। यथा— जो तुम पर बहु बनिक चलाउब भैंसा बह मैं गोहन आउब कउव बार हम हारब पुम मैं पठउब भविष्यत् कालकी विधि क्रियाका रूप उक्ति-व्यक्ति-प्रकरणमें करेसु, पढेसु है। चन्दायनेम इस क्रियाका रूप है— पार्ये राग कें सिरजन माँ कैंप आपि सुनायहु होव देव उठान वीर बूझा मिस घर धायहु सिरजब भक हिय समायहु पाटम देस हूँ झोर न जायसि । उपर्युक्त उदाहरणोंसे स्पष्ट है कि चन्दायनेकी भाषा उक्ति-व्यक्ति-प्रकरणकी भाषासे सर्वथा भिन्न है। यदि उक्ति-व्यक्ति-प्रकरणकी भाषा अवधी है तो चन्दायने की भाषा अवधी नहीं है। चन्दायनेकी भाषाके प्रसङ्गमे श्याम मनोहर पाण्डेयने एक अन्य काव्य रोडा कृत राउल वेलकी चर्चा की है। यह खंडित काव्य एक शिलाफलकपर अंकित और प्रिंस आव वेल्स म्यूजियम बम्बईमें सुरक्षित है। इसका एक पाठ माताप्रसाद गुप्तने हिन्दी अनुशीलनमे प्रकाशित किया है और उसे ग्यारहवीं शताब्दीकी रचना बताया है और उसकी भाषाको दक्षिण कोसली कहा है।¹ श्याममनोहर पाण्डेयने इस आधारपर यह मत प्रकट किया है कि 'अब हम सरलतापूर्वक कह सकते हैं कि दक्षिण कोसलीमें जो अवधीका एक रूप है ग्यारहवीं शताब्दीमें काव्य- रचना हो रही थी।' हमें खेदके साथ कहना पडता है कि दोनों ही विद्वानोंके ये मत नितान्त निराधार हैं। राउल वेलको ग्यारहवीं शताब्दीकी रचना माननेका कोई आधार नहीं है। यह तेरहवीं शताब्दीके आसपासकी रचना है। उसकी भाषा दक्षिण कोसली है इसके लिए माताप्रसाद गुप्तने कोई प्रमाण उपस्थित नहीं किये हैं। इस काव्यमें विभिन्न प्रदेशोंकी स्त्रियोंका रूप वर्णन है और जिस प्रदेशकी स्त्रीका जिस रूपमे वर्णन है उसमें १ हिन्दी अनुशीलन वर्ष ११ अंक १-२ १९५ पृ. १२। २ मध्ययुगीन प्रेमाख्यान पृ. २६ ।