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चन्दायन (मुल्ला दाऊद - प्राचीनतम अवधी सूफी-प्रेमाख्यान सटीक)

चन्दायन (मुल्ला दाऊद - प्राचीनतम अवधी सूफी-प्रेमाख्यान सटीक)

Chandayan of Mulla Daud with Hindi Commentary

मुल्ला दाऊद (१३७९ ई.) / डॉ. परमेश्वरीलाल गुप्त द्वारा

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१९ ईश्वर गोविन्द चन्द्रावत (कड़ाके लिये पारसी मिया गोविन्द) छन्द योजना सूफी कवियोंके हिन्दी प्रेमाख्यानक काव्योंके सम्बन्धमें हिन्दीके विद्वानोंका एक मत है कि उनकी रचना दोहे और चौपाइयोंमें हुई है। यही मत वासुदेवशरण अग्रवालने पदमावतके सम्बन्धमें व्यक्त किया है, किन्तु उनका ध्यान इस तथ्यकी ओर भी गया है कि जहाँ पदमावतकी चौपाई-छन्द मात्रा और तुक दोनों दृष्टियोंसे नियमित है, वहीं दोहोंके विषयमें यह बात खरी नहीं उतरती। दोहा एक मात्रिक छन्द है, जिसकी गणना अर्ध-सम जातिके छन्दोंमें की जाती है। इसके पहले और तीसरे चरणोंमें तेरह-तेरह मात्राएँ और दूसरे और चौथे चरणमें ग्यारह-ग्यारह मात्राएँ होती हैं। पहले और तीसरे पादकी तुक नहीं मिलती। दूसरे और चौथे चरणोंकी तुक मिलती है। किन्तु जायसीके सैकड़ों ऐसे दोहे हैं, जिनके पहले और तीसरे चरणोंमें यह नियम खरा नहीं उतरता। उनमें तेरहकी जगह सोलह मात्राएँ पायी जाती हैं। इसका उन्होंने यह कहकर समाधान कर लिया है कि दोहेके अनेक भेदोंमेंसे यह भी एक मान्य भेद हिन्दी काव्यमें उस समय स्वीकृत था जिसकी परम्परा मुल्ला दाऊदके समयसे जायसीके कालतक अवश्य विद्यमान थी।१ वस्तुतः यह बात नहीं है। हमारे साहित्यकारोंका ध्यान इस तथ्यकी ओर नहीं जा सका है कि सूफी कवियोंने अपनी रचना पद्धति अपभ्रंश काव्योंसे प्राप्त की है और उन्होंने अपने काव्योंका संयोजन कड़वकोंके रूपमें किया है। स्वयंभूने अपने स्वयम्भू छन्दसम्में कड़वककी जो परिभाषा दी है उसके अनुसार प्रत्येक कड़वकके शरीरमें आठ वमक और अन्तमें एक धत्ता होता है जिसे हुवा दुवई अथवा बडनिका कहते हैं। प्रत्येक वमकमें १६-१६ मात्राओंवाले दो पद होते हैं। हेमचन्द्रने अपने छन्दोनुशासनमें इसी तथ्यको तनिक भिन्न ढंगसे कहा है। उनके मतानुसार कड़वकके शरीरमें ४-४ पंक्तियोंके चार रुन्ध अर्थात् पंक्तियाँ होती हैं। सोलह मात्राओं वाले पदोंकी बात केवल सिद्धान्त रूप है; कवियोंने सोलह मात्राओं वाले पदोंके अतिरिक्त पन्द्रह मात्रा वाले पदोंका भी व्यवहार प्रचुर मात्रामें किया है। अतः कड़वकमें प्रयुक्त होने वाले पद साधारणतया तीन रूपमें पाये जाते हैं:— १. पध्दिका—सोलह मात्राओंका पद। इसमें अन्तिम चार मात्राओंका रूप लघु गुरु लघु (जगण) होता है। २. मदनक—सोलह मात्राओंका पद। इसमें चार मात्राएँ गुरु, लघु, लघु (भगण) होती हैं। कहीं-कहीं इसका दो गुरु रूप भी पाये जाते हैं। १. पदमावत, सं०सं०, पृ. २-३९, प्राक्कथन पृ० १२।