चन्दायन (मुल्ला दाऊद - प्राचीनतम अवधी सूफी-प्रेमाख्यान सटीक)
Chandayan of Mulla Daud with Hindi Commentary
मुल्ला दाऊद (१३७९ ई.) / डॉ. परमेश्वरीलाल गुप्त द्वारा
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(कविने यहाँ शिकारियों द्वारा लाये पशु-पक्षियों तथा भोजन-सामग्री तरकारी, पकवान, चावल, रोटी आदिका विस्तारपूर्वक वर्णन किया है।) (१४९-१६०) १७—नागरिक लोग महरके घर आये और ज्योनारपर बैठे। तब चाँद शृंगार कर भौंहरपर आकर खड़ी हुई। उसे देखकर लोरक खाना भूल गया। उसके लिए भोजन विषवत हो गया। पर लोटते ही वह चारपाईपर पड़ गया। यह देखकर उसकी माँ लोरिकिन विलाप करने लगी। कुटुम्बी जन आदि एकत्र हुए, पण्डित, वैद्य सयाने बुलाये गये। सभीने कहा कि उसे कोई रोग नहीं है। वह काम-विद्ध है। (१६१-१६५) १८—बिरहपत बाजार गयी तो उसके कानोंमें लोरिकिनका करुण विलाप पड़ा। वह उसके घर पहुँची और रोनेका कारण पूछा। लोरिकिनने लोरककी दुरवस्था कह सुनायी। सुनकर बिरहपतने पूछा कि तुम्हारा रोगी कहाँ है, मैं उनके रोगकी औषधि जानती हूँ। लोरिकिन उसे लोरकके पास ले गयी। बिरहपतने उनके अंग-अंगको देखा फिर बोली—मैं महरके भण्डारकी भण्डारी और चाँदकी धाय हूँ। मैं बुलानेपर आयी हूँ; आँख खोलकर अपनी बात कहो। चाँदका नाम सुनते ही लोरक चैतन्य हो गया और बोला कि लज्जाके कारण अपनी व्यथा नहीं कह सकता। यह सुनकर लोरिकिन अलग जा खड़ी हुई और तब लोरकने अपने मनकी व्यथा बिरहपतसे कह सुनायी। बिरहपतने इस बातको भूल जाने को कहा। लोरक उसके पाँव पकड़कर चाँदसे मिलन करा देनेका अनुरोध करने लगा। बिरहपत द्रवित हो उठी और बोली कि तुम शरीरमें भस्म लगाकर जोगी बन कर मन्दिरमें चलकर बैठो। वहाँ दर्शनके लिए चाँद आवेगी तुम सचेष्ठान देखते रहना। यह कहकर बिरहपत बाहर निकली। निकलते ही लोरिकिनने उसके पैर पकड़ लिये। बिरहपत ने कहा कि तुम्हारा रोगी अच्छा हो गया है। नहा-धोकर पूजा करो और लोरकको नहला-धुलाकर उसपर कुछ धन न्योछावर कर उसे शहर भेज दो। यह कहकर वह चाँदके पास लौट गयी। (१६६-१७३) १९—बिरहपतके कथनानुसार लोरक जोगी बनकर मन्दिरमें जा बैठा। वह एक वर्षतक मन्दिरकी सेवा और चाँदके प्रेमकी कामना करता रहा। कार्तिकमें जब दीवाली का पर्व आया तब चाँद अपनी सखियोंको लेकर दीवाली खेलने जाने लगी। रास्तेमें उसका हार टूट गया और मोती बिखर गये। तब बिरहपतने चाँदसे कहा कि तुम मन्दिरमें चलकर आराम करो। ये सखियाँ हार हीरोकर लायेंगी। यह सुनकर चाँद मन्दिरके भीतर चली गयी। धाय (बिरहपत)ने मन्दिरके भीतर झाँककर कहा कि इस मन्दिरमें एक महात्मा आये हुए हैं, उनके देखते ही सारे पाप भाग जाते हैं। चाँदने उस महात्माके पास जाकर शीश नवाया। जोगी चाँदको देखते ही मूर्छित हो गया। चाँद मन्दिरसे बाहर निकल आयी और बिरहपतके पूछनेपर जोगीकी स्थिति कह सुनायी। इतनेमें सहेलियोंने हार पिरोकर दिया और चाँदने उसे गलेमें पहन लिया। तब बिरहपत बोली कि शाम हो रही है अभी घर चलो घरपर महरि बाट देख रही होंगी। (१७४-१८१)