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चन्दायन (मुल्ला दाऊद - प्राचीनतम अवधी सूफी-प्रेमाख्यान सटीक)

चन्दायन (मुल्ला दाऊद - प्राचीनतम अवधी सूफी-प्रेमाख्यान सटीक)

Chandayan of Mulla Daud with Hindi Commentary

मुल्ला दाऊद (१३७९ ई.) / डॉ. परमेश्वरीलाल गुप्त द्वारा

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२ —चाँदको देखकर मूच्छित होनेके पश्चात् होशमें आनेपर लोरक विलाप और अपनी स्थितिपर खेद प्रकट करने लगा। तब मन्दिरके देवताने बताया कि अप्सराओं का एक समूह आया था। उन्हींमेंसे एकको देखकर तुम मूच्छित हो गये। (१८२ १८४) २१—उधर चाँदने बिरहपतको बुलाकर अपनी व्याकुलता दूर करनेको कहा। तब बिरहपतने मन्दिरमें बैठे जोगीकी ओर संकेत किया। चाँदने उसे मजाक समझा। बोली—जिस दिनसे लोरकको देखा है, वह मेरे मन बस गया है। मैं उसकी हूँ और वही मेरा पति है। तब बिरहपतने बताया कि वही लोरक तो तेरा भिखारी है और तेरे दर्शनके निमित्त ही तो वह योगी बना बैठा है और तुझे देखते ही मूच्छित हो गया था। तब चाँद बिरहपतसे बोली—तूने नहीं बताया कि मन्दिरम लोरक है। नहीं तो उसके योग्य मैं भक्ति-मुक्ति करती। उसके फूल भरे बचन सुनती। खैर, तुम जाकर कहो कि अब वह अपना मरम और कन्था उतार दे। बिरहपत पान-मिठाइ लेकर मन्दिरमें गयी और लोरकसे जोगीका वेश त्यागकर घर जानेको कहा। लोरक बागी वेश त्यागकर अपने घर गया और बिरहपतने आकर यह सूचना चाँदको दी। (१८४-१९१) २२—घर आकर लोरक चाँदके विरहमें स्थिर न रह सका और बार-बार मन्दिर की ओर जाता और चाँदके लिए रोता रहता। सारे दिन वह बन नगरम घूमता रहता और रातको गोवरमें आता—कदाचित् एक क्षणके लिए चाँद दिखाइ दे जाय। उधर चाँद भी लोरकके वियोगमें छटपटाती रहती। उसकी समझमें ही नहीं आता कि लोरक से किस प्रकार मिलाप हो। अन्तमें उसने एक दिन बिरहपतको लोरकके पास भेजा। बिरहस्त लोरकको साथ लाकर चाँदके चौखरका मार्ग दिखा गयी। (१९२ १९८) २३—लोरकने बाजार जाकर पाट खरीदा और उसका तीस हाथ लम्बा एक बरहा (मोटा रस्सा) तैयार किया। उसमें बीच-बीचमें गाँठें लगायी और ऊपर एक अँकुरा बाँधा। उसे देखकर मैनाने पूछा कि यह बरहा क्या होगा तो लोरकने कहा कि एक भैंस बिगडैल हो गयी है उसे बाँधूँगा ! (१९९) २४—भादोंकी घोर अँधेरी रातमें लोरक बरहा लेकर चला। मगर अँधेरेमें उसे कुछ पता ही नहीं चलता था कि चाँदका आवास किधर है। इतनेमें बिजली कौंधी और लोरकने उसे पहचान कर बरहेको जोरौसे ऊपर फेंका। बरहा जब ऊपर पहुँचा तो उसकी आवाजसे चाँद जागी और अँकुरीको बीरममैसे लगा देखा। उसने नीचे झाक कर देखा तो लोरकको खडा पाया। उल्हास उसने अँकुरी निकालकर बरहेका नीचे गिरा दिया। लोरक बार-बार बरहा ऊपर फेंकता और हर बार चाँद हँसकर उसे नीचे गिरा देती। जब उसने अनुभव किया कि लोरक परेशान हो गया है और अब यदि कुछ करती हूँ तो वह नाराज होकर चला जायगा और फिर कभी न आयेगा तो वह अपने कियेपर पछताने लगी। जब फिर बरहा ऊपर आया तो दौड़कर उसने उसे पकड लिया और उसे खींचकर खम्भेत्तक लायी। जब लोरकको रस्सीके सहारे ऊपर आते देखा तो वह चुपचाप चारपाईपर जाकर लेट गयी। लोरकने ऊपर आकर चाँदका