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चन्दायन (मुल्ला दाऊद - प्राचीनतम अवधी सूफी-प्रेमाख्यान सटीक)

चन्दायन (मुल्ला दाऊद - प्राचीनतम अवधी सूफी-प्रेमाख्यान सटीक)

Chandayan of Mulla Daud with Hindi Commentary

मुल्ला दाऊद (१३७९ ई.) / डॉ. परमेश्वरीलाल गुप्त द्वारा

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पानी छिड़कने लगे। उन्होंने उससे इस प्रकार मूर्च्छित हो जानेका कारण पूछा। उसने उत्तरमें घुमा फिराकर चाँदके सौन्दर्य वर्णन और उसके प्रति अपनी आसक्तिकी बात बतायी। फिर राय महरके भयसे वह गोबर नगर छोड़कर चला गया। (६६-७०) ७—बाजिंद एक मास तक इधर उधर घूमता रहा फिर वह एक नगरमें पहुँचा। (हमारे पास उपलब्ध सामग्रीमें इस नगरका नाम नहीं है पर बीकानेर प्रतिमें कदाचित् उसका नाम राजापुर बताया गया है।) एक दिन रातको जब बाजिंद चाँदके विरहका गीत गा रहा था तब राजा रूपचन्दने उसे सुना और उसे बुलवाया। (७१-७९) ८—बाजिन्दने आकर राजा रूपचन्दसे कहा—'उज्जैन मेरा स्थान है, जहाँका राजा विक्रमादित्य बड़ा धर्मनिष्ठ है। मैं चारों भुवन घूमता हुआ गोबरक सुन्दर नगरमें पहुँचा। वहाँ मैंने चाँद नामक एक स्त्री देखी जो मेरे मनमें पत्थरकी लकीर बनकर समा गयी है। उसकी टीस मेरे मनमें दिन-दिन सवाई होती जा रही है। यह सुनकर रूपचन्दके मनमें चाँदके रूप-गन्ध विस्तारके साथ जाननेकी जिज्ञासा जागी और उसने बाजिन्दका सम्मान कर उससे चाँदका रूप विस्तारके साथ कहनेका अनुरोध किया। तब बाजिंदने चाँदकी मांग केश ललाट, भौंह नैन नासिका बाज़ू दाँत जिह्वा कान सिंग ग्रीवा भुजा कुच पेट पीठ, बाहु, पग और गति आकार, वस्त्र और आभूषन सबका विस्तारके साथ वर्णन किया। (७१-९५) —चाँदके रूप-वर्णनको सुनकर रूपचन्दने बँगको सेना तैयार करनेका आदेश दिया और सेनाने कूच किया। (कविने यहाँ रूपचन्दकी सेनाके हाथी घोड़ी आदिका कथन किया है।) मार्गमें अपशकुन हुए पर उसने उनकी तनिक भी परवाह न की और गोवर नगरको जाकर घेर लिया। (९६-१०३) ९ —रूपचन्दकी सेनाके आनेसे गोबर नगरम आतंक फैल गया। तब महर सहदेवने राजा रूपचन्दके पास दूत भेजा कि वे पता लगायें कि उसने किस कारण घेरा डाला है और उसका आदेश क्या है। दूत आकर रूपचन्दके पास उपस्थित हुए। राजाने दूतोंकी बात सुनकर कहा कि चाँदका मेरे साथ तत्काल विवाह कर दो। दूतोंने रूपचन्दको समझानेकी चेष्टा की पर वह न माना और दूतोंपर क्रुद्ध हुआ और चले जानेको कहा। दूतोंने लौटकर रूपचन्दकी माँग कह सुनायी। तब महर सहदेवने अपने साथियोंसे परामर्श किया। कुछ लोगोंने तो कहा कि चाँदको दे दीजिए। कुछको चाँदकी माँगकी बात सुनकर क्रोध आ गया। अन्ततोगत्वा रूपचन्दसे लोहा लेनेका निश्चय हुआ और युद्धकी तैयारी होने लगी। (यहाँ कविने महरके अस्त्र, अश्वारोही धनुर्धर, रथ हाथी आदिका कथन किया है)। (१०३-११६) १० —दूसरे दिन रूपचन्द दुर्गकी ओर बढ़ा और महर भी युद्धके लिए बाहर निकलकर आया। युद्ध आरम्भ हुआ। महरके प्रमुख योद्धा मारे गये। यह देखकर भटने महरसे कहा कि आपके पास ऐसे वीर नहीं हैं जो रूपचन्दके सैनिकोंको परास्त कर सकें। आप तत्काल लोरिकका बुलावा भेजिये। (११७-१२१)