चन्दायन (मुल्ला दाऊद - प्राचीनतम अवधी सूफी-प्रेमाख्यान सटीक)
Chandayan of Mulla Daud with Hindi Commentary
मुल्ला दाऊद (१३७९ ई.) / डॉ. परमेश्वरीलाल गुप्त द्वारा
पृष्ठ 56, कुल 520 में से
संदर्भ में पढ़ें[Page 19]
१२, ११ मात्रावाले पद्योका जिसे दोहा भी कहा जा सकता है बहुत ही कम प्रयोग हुआ है। उसमें १२, ११ और १६ ११ मात्रावाले पद्य प्रमुख हैं और अधिक मात्रामे मिलते हैं। रचना-व्यवस्था मुसलमान कवियों द्वारा रचित हिन्दी प्रेम-गाथा काव्योंके सम्बन्धमें रामचन्द्र शुक्लने इस बातकी ओर ध्यान आकृष्ट किया है कि इनकी रचना बिल्कुल भारतीय चरितकाव्योंकी सर्ग-बद्ध शैलीपर न होकर फारसी मसनवियोंके ढंगपर हुई है, जिनमें कथा सर्गों या अध्यायोंमें विस्तारके हिसाबसे विभक्त नहीं होती, बराबर चली जाती है, केवल स्थान-स्थानपर घटनाओं या प्रसंगोंका उल्लेख शीर्षक रूपमें रहता है। मसनवीके लिए साहित्यिक नियम तो केवल इतना ही समझा जाता है कि सारा काव्य एक ही मसनवी छन्दमें हो पर परम्परा के अनुसार उसमें कथारम्भके पहले ईश्वर स्तुति पैगम्बरकी वन्दना और उस समयके राजा (शाहेवक्त) की प्रशंसा होनी चाहिए। ये बातें पद्मावत, इन्द्रावत, मिरगावती इत्यादि सबमें पायी जाती है। तुर्की मसनवियोंके सम्बन्धमें गिब्बका कथन है कि मसनवीका आरम्भ अल्लाहकी वन्दनासे होता है। तदनन्तर उसमें रसूलकी वन्दना होती है और उनके मेराजका उल्लेख रहता है। पश्चात् समसामयिक शासक अथवा किसी अन्य महान व्यक्तिकी स्तुति की जाती है। और फिर पुस्तकके लिखनेके कारणपर भी प्रकाश डाला जाता है। लगभग यही बातें पारसी मसनवियोंमें भी पायी जाती हैं। निजामीने अपने लैला मजनूँमें हम्द शीर्षकसे ईश्वरका गुणगान किया है और फिर नातके अन्तर्गत रसूलकी प्रशंसा है और उनके मेराजका उल्लेख है। तदनन्तर कविने पुस्तक लिखनेके कारणपर प्रकाश डाला है और अपने पीरकी चर्चाकी है। अन्तमें अपने पुत्रको नसीहत दी है। खुसरो-शीरींमें भी निजामीने क्रमशः ईश्वरकी प्रशंसा रसूलकी नात शाहेवक्तको दुआ और पुस्तक लिखनेका कारण दिया है। इसी प्रकार अमीर खुसरोने भी खुदाकी तारीफ रसूलकी नात मेराजके बयान शेख निजामुद्दीनके गुणगान शाहेवक्त—अलाउद्दीन खिलजीकी प्रशंसा कर तथा पुस्तक लिखनेका कारण बताकर अपनी पुस्तक मजनूँ-लैलाका आरम्भ किया है। खुसरोके शीरीं फरहादमें भी यही बातें पायी जाती है। जामीने यूसुफ जुलेखा और फैजीने नल-दमनका भी आरम्भ इसी प्रकार किया है। फिरदौसीके शाहनामेंमें भी ये सभी बातें उपलब्ध हैं। मुसलमान कवियों द्वारा रचित हिन्दी प्रेमाख्यानक काव्योंका भी प्रारम्भ उपर्युक्त मसनवियोंके समान ही हुआ है। दाउदने चन्दायनमें ईश्वर और पैगम्बर की वन्दनाकर चार यारोंका उल्लेख किया है, फिर शाहेवक्त—फीरोजशाह तुगलककी प्रशंसाकर अपने गुरुकी वन्दनाकी है और अपने आश्रयदाताका वर्णनकर ग्रन्थ रचनाक