चन्दायन (मुल्ला दाऊद - प्राचीनतम अवधी सूफी-प्रेमाख्यान सटीक)
Chandayan of Mulla Daud with Hindi Commentary
मुल्ला दाऊद (१३७९ ई.) / डॉ. परमेश्वरीलाल गुप्त द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसम्बन्धमें कहा है। कुतुबनकी मिरगावतके जो अंश उपलब्ध हैं, उनसे ज्ञात होता है कि उसका भी प्रारम्भ ईश्वरकी वन्दनासे हुआ है। मंझनने भी मधु-मालतीमें हम्द, नात, रसूलके चार यारों शाहेवक्तकी स्तुति करते हुए काव्यका रचना-काल तथा अपना संक्षिप्त परिचय दिया है। मलिक मुहम्मद जायसी आदि परवर्ती कवियोंने भी इसी परम्पराको ग्रहण किया है। अरबी-फारसीके मसनवियों और हिन्दी प्रेमाख्यानक काव्योंकी ये समानताएँ रामचन्द्र शुक्लके कथनको पुष्ट करती हुई यह कहनेको विवश करती हैं कि मुसल- मान कवियोंने अपने काव्योंमें इस परम्पराको अरबी-फारसी मसनवियोंको देखकर ही अपनाया होगा। पर साथ ही इस बातकी भी उपेक्षा नहीं की जा सकती कि ये बातें केवल अरबी-फारसी मसनवियोंकी परम्परामें सीमित नहीं हैं। भारतीय काव्य-परम्परा भी इन बातोंसे भली प्रकार परिचित रहा है। अरबी-फारसी मसनवियों और हिन्दी प्रेमाख्यानक काव्योंकी लगभग वे सभी बातें जैन अपभ्रंश-काव्यमें पायी जाती हैं। प्रायः सभी जैन अपभ्रंश काव्योंका आरम्भ 'जिन'की वन्दनासे होता है। किसी- किसीम जिन-वन्दनाके बाद सरस्वतीकी भी वन्दना पायी जाती है। तदनन्तर उनमें समकालिक शासकका उल्लेख, कविका आत्म-परिचय और आश्रयदाताकी चर्चा है और रचनाका कारण बताया गया है। उदाहरण स्वरूप पुष्पदन्त कृत महापुराण, स्वयंभू कृत पउमचरित और श्रीधर कृत पासनाहचरिउ देखा जा सकता है। हिन्दी प्रेमाख्यानक काव्योंके सम्बन्धमें फारसी मसनवियोंकी जिस दूसरी विशेषताकी ओर लोगोंका ध्यान गया है, वह है उनमें पायी जानेवाली प्रस्तोरी सूक्तियों। निजामी, अमीर खुसरो, जामी, फैजी सभीने अपनी मसनवियोंमें प्रसङ्ग के अनुकूल शीर्षक दिये हैं। ठीक उसी ढंगके शीर्षक चन्दायमकी सभी फारसी प्रतियोंमें प्रत्येक कड़वकके ऊपर दिये गये हैं और अन्य काव्योंकी प्रतियोंमें भी पाये जाते हैं। अतः इसमें भी इन कवियोंका फारसी मसनवियोंका अनुकरण परिलक्षित होता है। पर इसी ढंगके शीर्षक अपभ्रंश काव्योंमें भी पाये जाते हैं। संस्कृत साहित्य शास्त्रके अनुसार किसी महाकाव्यमें कमसे कम आठ सर्ग होने चाहिए जो न तो बहुत छोटे हों और न बहुत बड़े। इस प्रकारका सर्गबन्ध हिन्दी प्रेमाख्यानक काव्योंमें न होनेसे यह मान लिया गया है कि ये फारसी मसनवियोंके अनुकरणपर रचे गये हैं, जहाँ सर्ग जैसा कोई विभाजन नहीं मिलता। किन्तु इस धारणामें भी कोई विशेष बल नहीं है। यह बात न भूलनी चाहिए कि अपभ्रंशमें सर्गहीन काव्योंकी कमी नहीं है। हिन्दी प्रेमाख्यानक काव्योंका रूप उन काव्योंसे किसी भी रूपमें भिन्न नहीं है। हिन्दी प्रेमाख्यानक काव्योंके कथा-वस्तु सचमुच भारतीय हैं और वे भारतीय कथानक रूढ़ियोंपर ही आधारित हैं। उनमें कहीं भी अरबी या फारसी प्रभाव नहीं मिलता। ऐसी स्थितिमें यह समझना कठिन है कि इन कवियोंने अपने काव्यके बाह्य रूपके लिए भारतीय काव्योंसे इतर कहींसे प्रेरणा प्राप्तकी।