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चन्दायन (मुल्ला दाऊद - प्राचीनतम अवधी सूफी-प्रेमाख्यान सटीक)

चन्दायन (मुल्ला दाऊद - प्राचीनतम अवधी सूफी-प्रेमाख्यान सटीक)

Chandayan of Mulla Daud with Hindi Commentary

मुल्ला दाऊद (१३७९ ई.) / डॉ. परमेश्वरीलाल गुप्त द्वारा

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४ लोरक-चाँदसे सम्बद्ध लोक-कथाएँ लोरक-चाँदकी कथा पूर्वी उत्तर प्रदेश बिहार और मध्य प्रदेशके पूर्वी अंचलके विभिन्न प्रदेशोंके लोक जीवनमें काफी प्रसिद्ध है। किन्तु उसके रूपमें पर्याप्त विविधता पायी जाती है। हम यहाँ भोजपुरी प्रदेश मिजापुर, भागलपुर, मिथिला छत्तीसगढ़ तथा रानाङ परगनामें प्रचलित लोक-कथाओंको एकत्रितकर रहे हैं। हमारा विचार अवधमें प्रचलित कथा रूप भी देनेका था किन्तु प्रयत्न करनेपर भी हमें वह प्राप्त न हो सका। इन लोक कथाओंके साथ चन्दायनकी कथाका तुलनात्मक अध्ययन उपयोगी और मनोरंजक होगा। भोजपुरी रूप लोरक-चाँदकी लोक प्रचलित कथाका जो भोजपुरी प्रदेशमें लोरिकी चनैनी, लोरिकायन आदि नामोंसे प्रचलित है और पवांरेके रूपमें विशेष रूपसे अहीरोंमें गायी जाती है अब तक कोई इसका प्रमाणित रूप प्रकाशमें नही आया है। आरा निवासी महादेवसिंहने इस पवांरेके एक बहुत बड़े अंशको अपने साँचेमें ढालकर प्रकाशित किया है। इसका पूर्व अंश उन्होंने तीन खण्डोंमें लोरिकायन नामसे प्रस्तुत किया है जो दूबनाथ पुस्तकालय कलकत्तासे प्रकाशित हुआ है। तीसरे खण्डके अतमें उन्होंने सूचना दी है कि आगेका बयान जांनबाका उद्धार मगाकर देखें। जांनबाका उद्धार लोरिकायनकी कथाके ही क्रममें है और वह माधव पुस्तकालय वाराणसीसे प्रकाशित हुइ है। इस खण्डके अन्तमें आगेका हाल नेउरपुरकी लड़ाईमें देखनेको कहा गया है। किन्तु यह खण्ड सम्भवतः प्रकाशित नही हुआ है। अतः कथाका अन्तिम अंश अनुपलब्ध है। इस सूत्रसे लोरक-चाँदकी कथाका जो भी अंश प्राप्त है, वह विस्तृत है। संक्षेपमें वह इस प्रकार है— बारह कोसमें विस्तृत गौरा नामक एक नगर था। वहाँ एक अहीर दम्पति रहता था। पतिको नाम बुद्धूवे और पत्नीका नाम हुइहुन्दन था। उनके कोई संतान न थी। उसी नगरमें तसरु और शिवचरन नामक दो अनाथ अहीर बालक थे। उनकी दयनीय अवस्थासे द्रवित होकर बुद्धूने तसरुको अपने घर ले आया और शिवचरनको पिपरीपुरका राज्य माली गवरा जो ख्यातिका गुलाम' या अपने यहाँ के अक्सर वही जानेवाली इस जाति की सुअर पालनेका काम करती है।