भारतकोश
चन्दायन (मुल्ला दाऊद - प्राचीनतम अवधी सूफी-प्रेमाख्यान सटीक)

चन्दायन (मुल्ला दाऊद - प्राचीनतम अवधी सूफी-प्रेमाख्यान सटीक)

Chandayan of Mulla Daud with Hindi Commentary

मुल्ला दाऊद (१३७९ ई.) / डॉ. परमेश्वरीलाल गुप्त द्वारा

DevanagariAwadhipublished520 पृष्ठ

पृष्ठ 406, कुल 520 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 406

३७५

टटक्कर ऊरुब्रूकी ओर भागीं। उनके भागनेसे धूल उड़कर जब ऊरुब्रूकी नाकमें घुसी तो वह छींकता हुआ उठ खड़ा हुआ। देखा भाठेका दरवाजा खुला हुआ है और सामने ओरिक खड़ा है। तत्काल वह लड़नेके लिए तैयार हो गया। दोनोंमें बात तय हुई कि पहले तीन बार ऊरुब्रू वार करेगा और उसके पीछे तीन बार ओरिक करेगा। ऊरुब्रूक तीनों बार खाली गये और ओरिकने एक ही वारमें उसका सिर काटकर नीचे गिरा दिया। ऊरुब्रूका सिर उड़कर इन्द्रके दरबारमें पहुँचा और वहाँ नाचने लगा। इन्द्रने उसे देखकर कहा—अभी तुम्हारी मौत नहीं है, तुम यहाँ कैसे आ गये ? वापस जाओ। और वह सिर पुनः आकर धड़से जुड़ गया और ऊरूब्रूक उठकर खड़ा हुआ और ओरिकसे फिर लड़ना शुरू किया। ओरिकने पुनः अपनी खड्गसे उसका सिर काट दिया और वह पुनः इन्द्रके दरबारमें पहुँचा। इन्द्रने पुनः वहाँसे खदेड़ा और वह फिर आकर अपने धड़से जुड़ गया। तीसरी बार जब ओरिक खड्ग लेकर आगे बढ़ा तो देवीने उसे संकेत किया कि यदि इस बार उसका सिर इन्द्रके दरबारमें पहुँचा तो इन्द्र उसे आशिष दे देंगे। यदि वह पुनः धड़से जुट गया तो फिर वह न कभी काटे कटेगा न मारे मरेगा, न पानीमें डूबेगा और न आगम जलेगा। उस समय उसे मार सकना असम्भव होगा। इसलिए दायें हाथसे खड्ग चलाओ और बायें हाथसे उसका सिर लपक लो ताकि उसका सिर यहीं रह जाये और वह लड़ाईके मैदानमें ही मर जाये। तदनुसार ओरिकने खड्ग मारा और जैसे ही सिर आकाशकी ओर जाने लगा उसे उसने बायें हाथसे पकड़ लिया और उसे लेकर बैंगोरिया पहुँचा। और उसे लाकर मण्डपमें टाँग दिया। स्वयं कोहबरमें आकर खूनसे सने खड्गको सेजके सिरहाने रख चादर तानकर सो रहा। ओरिकको नींद आ ही रही थी कि डढिया दरवाजेपर आ पहुँचा। स्वप्नमें देवीने मंजरीको इसकी सूचना दे दी वह तुरन्त दरवाजेपर पहुँची और दरवाजेकी साँस मेंसे देखा कि डढिया दरवाजा रोककर खड़ा है। लौटकर उसने ओरिकका हाथ हिलाकर इशारेसे बताया कि बाहर शत्रु आया हुआ है। ओरिकने उठकर जैसे ही दरवाजा खोला डढिया भाग खड़ा हुआ। ओरिकने झपटकर पकड़ लिया और उसका सिर काट डाला। सिर मुण्डको इतनी जोरसे फेंका कि वह मलयगीतके दरबारमें जा गिरा। ओरिक पुनः आकर कोहबरमें सो रहा। जब आकाशमें लाली छायी और कोयल बोलने लगी तो अनुसियाकी नींद टूटी। वह झाड़ू लेकर घर बुहारने लगी। घर बुहारकर वह आंगनमें पहुँची। आंगन बुहार चुकी तो सिर उठाया। देखा—मंडपमें एक सिर लटक रहा है। उसे देखते ही वह रोने लगी। उसका रोना सुनकर सब लोग घबड़ाकर उठे। मंडपमें आकर मुण्डको उन्होंने देखा। अनुसिया बोलकर मरण मनियारके पास पहुँची; उन्हें जगाया और रो-रोकर बताया कि मलयगीतने ओरिकको मार डाला और उसका मुण्ड मंडपमें टाँगा है।