चन्दायन (मुल्ला दाऊद - प्राचीनतम अवधी सूफी-प्रेमाख्यान सटीक)
Chandayan of Mulla Daud with Hindi Commentary
मुल्ला दाऊद (१३७९ ई.) / डॉ. परमेश्वरीलाल गुप्त द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१८२ गोरिकने उत्तर दिया— मम्मगिंतने बात फेरकर कही है। यदि तुम उलाडोगे तो मंजरी तुम्हारी पत्नी हो जायेगी। इस प्रकार उसने सब तरहसे धर्म नष्ट करनेका षड्यन्त्र किया है। मुझ ही त्रिशूल उलाडने दो। उलटडगा तो उपजेगा नहीं उलटा तो मैं मम्मगिंतको ही मार डालूँगा। इतना कहकर गोरिकने सात पुरुखा उछलकर त्रिशूल उलाड दिया। यह देखते ही मम्मगिंत डरा और भाग निकला। गोरिकने उसका पीछा किया। मम्मगिंत रनिवासमें घुसा ही था कि गोरिकने अपनी साँड़ चलायी वह वहीं ढेर हो गया। उसके बाद वे लोग महराके घर पहुँचे। दूसरे दिन मंजरीको विदा करा के लोग घर लौट आये। ✕ ✕ ✕ जिन दिनों गोरिक अगोरियामें मंजरीसे विवाह करने गया हुआ था उन्हीं दिनों सहदेवने चन्द्राके विवाहकी तैयारी की और डिग्हट्टमें दिगम्बरके साथ तिलक चढा दिया। निश्चित समय पर बारात आयी और विवाह कराकर बारात चली गयी। वे लोग चन्द्राको छोड़ गये कि गौनेके समय ले जायेंगे। दिगम्बर महाबीर था। एक दिन उसने दूध पीकर दोना फेंक दिया। उसी रास्ते शिवजी जा रहे थे। दोनेमें दूधका फेन लगा देखकर उनका मन चञ्चल उठा और उनसे रहा न गया। उन्होंने उसे उठाकर चाट लिया। कैलाश जाकर जब वे पार्वती के साथ रमण करने लगे तो वे परेशान हो उठीं फिर भी शिवजीको सन्तोष नहीं हुआ ! पार्वती ने इसका कारण पूछा तो शिवजीने अपने दोना चाटनेकी बात कह सुनायी। जब पार्वती ने यह सुना तो सोचने लगीं—जिस पुरुषके जूठे दोनेके चाटनेके कारण मेरे पति इस प्रकार कामातुर हो उठे हैं तो वह जिस स्त्रीका पति होगा उसकी न जाने क्या गति होती होगी। यह सोचकर पार्वती ने दिगम्बरको शाप दे दिया जिससे वह काम-रहित हो गया। जब दिगम्बर चन्द्राको गौना कराकर अपने घर ले गया तो उसने देखा कि दिगम्बर कभी घर नहीं आता उसकी सास ही उसके लिए भोजन बनाकर जिस मकान में ले जाती है। उसके मनकी उमंगें मनमें ही घुटकर रह जाती थीं। अतः एक दिन उसने स्वयं भोजन ले जानेका निश्चय किया और अपने मनकी बात साससे कही। सासने भोजन ले जानेकी अनुमति सहर्ष दे दी। वह सम्पूर्ण शृंगार कर भोजन लेकर चली। जब वह मकानके निकट पहुँची तो उसकी नूपुरोंकी झंकारसे गायें बिहुँक उठीं। यह देख दिगम्बरने सोचा कि कोई बनिया हाथीको लेकर चला आ रहा है, जिसकी घंटी सुनकर गायें भड़क उठीं हैं। तभी उसकी दृष्टि चन्द्रापर पड़ी। उसे देखते ही वह अपनी असमर्थता पर अत्यन्त दुःखी हुआ। खिन्न मनसे किसी प्रकार उसने भोजन किया। भोजन कर चुकनेके बाद भी चन्द्रा दिगम्बरकी प्रतीक्षामें बैठी रही। किन्तु दिगम्बरने उससे बात तक नहीं की तब उसने दिगम्बरको