चन्दायन (मुल्ला दाऊद - प्राचीनतम अवधी सूफी-प्रेमाख्यान सटीक)
Chandayan of Mulla Daud with Hindi Commentary
मुल्ला दाऊद (१३७९ ई.) / डॉ. परमेश्वरीलाल गुप्त द्वारा
१८२ गोरिकने उत्तर दिया— मम्मगिंतने बात फेरकर कही है। यदि तुम उलाडोगे तो मंजरी तुम्हारी पत्नी हो जायेगी। इस प्रकार उसने सब तरहसे धर्म नष्ट करनेका षड्यन्त्र किया है। मुझ ही त्रिशूल उलाडने दो। उलटडगा तो उपजेगा नहीं उलटा तो मैं मम्मगिंतको ही मार डालूँगा। इतना कहकर गोरिकने सात पुरुखा उछलकर त्रिशूल उलाड दिया। यह देखते ही मम्मगिंत डरा और भाग निकला। गोरिकने उसका पीछा किया। मम्मगिंत रनिवासमें घुसा ही था कि गोरिकने अपनी साँड़ चलायी वह वहीं ढेर हो गया। उसके बाद वे लोग महराके घर पहुँचे। दूसरे दिन मंजरीको विदा करा के लोग घर लौट आये। ✕ ✕ ✕ जिन दिनों गोरिक अगोरियामें मंजरीसे विवाह करने गया हुआ था उन्हीं दिनों सहदेवने चन्द्राके विवाहकी तैयारी की और डिग्हट्टमें दिगम्बरके साथ तिलक चढा दिया। निश्चित समय पर बारात आयी और विवाह कराकर बारात चली गयी। वे लोग चन्द्राको छोड़ गये कि गौनेके समय ले जायेंगे। दिगम्बर महाबीर था। एक दिन उसने दूध पीकर दोना फेंक दिया। उसी रास्ते शिवजी जा रहे थे। दोनेमें दूधका फेन लगा देखकर उनका मन चञ्चल उठा और उनसे रहा न गया। उन्होंने उसे उठाकर चाट लिया। कैलाश जाकर जब वे पार्वती के साथ रमण करने लगे तो वे परेशान हो उठीं फिर भी शिवजीको सन्तोष नहीं हुआ ! पार्वती ने इसका कारण पूछा तो शिवजीने अपने दोना चाटनेकी बात कह सुनायी। जब पार्वती ने यह सुना तो सोचने लगीं—जिस पुरुषके जूठे दोनेके चाटनेके कारण मेरे पति इस प्रकार कामातुर हो उठे हैं तो वह जिस स्त्रीका पति होगा उसकी न जाने क्या गति होती होगी। यह सोचकर पार्वती ने दिगम्बरको शाप दे दिया जिससे वह काम-रहित हो गया। जब दिगम्बर चन्द्राको गौना कराकर अपने घर ले गया तो उसने देखा कि दिगम्बर कभी घर नहीं आता उसकी सास ही उसके लिए भोजन बनाकर जिस मकान में ले जाती है। उसके मनकी उमंगें मनमें ही घुटकर रह जाती थीं। अतः एक दिन उसने स्वयं भोजन ले जानेका निश्चय किया और अपने मनकी बात साससे कही। सासने भोजन ले जानेकी अनुमति सहर्ष दे दी। वह सम्पूर्ण शृंगार कर भोजन लेकर चली। जब वह मकानके निकट पहुँची तो उसकी नूपुरोंकी झंकारसे गायें बिहुँक उठीं। यह देख दिगम्बरने सोचा कि कोई बनिया हाथीको लेकर चला आ रहा है, जिसकी घंटी सुनकर गायें भड़क उठीं हैं। तभी उसकी दृष्टि चन्द्रापर पड़ी। उसे देखते ही वह अपनी असमर्थता पर अत्यन्त दुःखी हुआ। खिन्न मनसे किसी प्रकार उसने भोजन किया। भोजन कर चुकनेके बाद भी चन्द्रा दिगम्बरकी प्रतीक्षामें बैठी रही। किन्तु दिगम्बरने उससे बात तक नहीं की तब उसने दिगम्बरको
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१८४ जब चदाने बठवाको पीछा करत हुए आते देखा तो पास ही भैंस चराते वाले चरवाहेको देखकर बोली—तुम मेरे धर्म के भाई हो। चमार मेरा पीछा कर रहा है। उसे मत बताना कि यहाँसे मैं गयी हूँ। इस प्रकार रास्तेमें जितने लोग मिले सबसे विनय करती हुए वह आगे बढ़ती गयी और शीघ्र ही वह गौरा अपने महलमें जा पहुँची। बठवा भी उसका पीछा करता हुआ गाँवमे पहुँचा और गाँवके लोगोंसे कहने लगा—चदासे मेरी शादी करा दो। लेकिन किसीने उसका उत्तर न दिया। राजा सहदेव भी उसको आते देख बहुत घबराये और महलमें छिप रहे। बाहर न निकले। जब किसीने उसकी बात न सुनी तो उसने गायोंकी हड्डी इकट्ठी की और गाँवके सभी कुओंमें डाल दी। इस प्रकार कुँओंको भ्रष्ट कर उसने सब पनघटको रोक दिया केवल उस कुएँको बख्श छोड़ जिसका पानी मिता और लोरिक भरते थे। इस तरह पानीका अभाव करके बठवाने गाँवके सभी लोगोंको परेशानीमें डाल दिया। उन्हें एक बूँद पानी मिलना कठिन हो गया। जब बुढ़िया कुण्डन अपने कुएँसे पानी भरकर मकानकी ओर जाती तो गौराके स्त्री-पुरुष रास्तेमें उससे माँगकर पानी पीते। इस प्रकार बीचमें ही उसके घड़ेका पानी समाप्त हो जाता। निदान वह दुबारा पानी भरने जाती। इस तरह बार-बार पानी भरते-भरते जब वह थक गयी तो मंजरी पानी भरने आयी। जब वह पानी भरकर गाँवमें घुसी तो लोग पानीके लिए दौड़े। पानी बाँटकर वह दुबारा कुएँ पर आयी। इस बार जब वह पानी भरने लगी तो बठवाने, जो अब तक चुपचाप बैठा था मंजरीसे कहा—तुम मेरे गुरुभाई की पत्नी हो। नाहक शत्रुता मोल ले रही और मेरे काममें विघ्न डाल रही हो। मञ्जरीने पूछा—तुम्हारे किस काममे विघ्न डाल रही हूँ! मैं तुमसे कौन-सी तकरार कर रही हूँ। बठवाने उत्तर दिया—तुम गौरामें मेरा विवाह होना रोक रही हो। गाँवके लोग चदासे मेरा विवाह नहीं कराते, इसलिए सब लोगोंको मैं बिना पानीके मार डालना चाहता हूँ। लेकिन तुम पानी भरकर उनको बाँट रही हो। इस बार पानी ले जा रही हो तो ले जाओ फिर लौटकर मत आना। यह सुनकर मंजरी चुपचाप चली गयी और लोगोंको फिर पानी बाँट दिया। जब वह पुनः कुएँकी ओर लौटी तो बठवा उठ खड़ा हुआ और बोला—मैं तुम्हें पानी भरने नहीं दूँगा। यदि तुम सीधे नहीं मानोगी, तो डोरी छीन लूँगा। इतना सुनना था कि मंजरी आग बबूला हो गयी। उसने डोरी कुएँमें फेंक दी और दोनों घड़ोंको कुएँ पर पटक दिया। वह रोती हुई घर पहुँची। कुण्डनसे बोली—पतिके रहते मेरा अपमान हुआ है। मैं जहर खाकर मर जाऊँगी। बठवाने
मेरा रास्ता रोका है। यदि मुझे जीवित देखना चाहती हो तो तत्काल पुढ़ियापुर जाकर स्वामी को सूचना दो और उन्हें बुला लाओ। उसकी बात सुनते ही सुखदिन पुढ़ियापुर पहुँची। मिता और लोरिक दोनों डंड रहे थे। माँ को आते देख दोनों खड़े हो गये और अगवाइक बाहर आये। माँ से कुशल पूछने लगे। माँने सारी स्थिति कह सुनायी। सुनकर लोरिक गुस्सेसे लाल हो गया और गुरु मिताका आशीर्वाद लेकर गौराकी ओर चल पड़ा। बठवाने उस देखते ही नमस्कार किया और अपने आनेका उद्देश्य कह सुनाया और कहा कि उसने कुएँ का छोड़ रखा है जिसमें वह और मिता पानी भरते हैं। अन्तमें बोला—तुम और मिता भले ही पानी भरो लेकिन दूसरोंको मैं पानी भरने न दूँगा। यदि तुम मेरे गुरुभाइ न होते तो इसमें भी हड्डी डाल देता। अभी मैंने पानी रोका है पीछे रास्ता भी रोक दूँगा। यह सुनकर लोरिक बहुत बिगड़ा। बोला—चमार होकर तुम अहीरकी बेटीसे विवाह करना चाहते हो। पहले मुझसे हाथ मिलाओ पीछे चंदासे शादी करना। फिर क्या था। दोनों परस्पर भिड़ गये। लोरिकने बठवाके दोनों पैरोंको पकड़कर ऊपर उठा लिया और इस प्रकार पटका कि वह दूर जाकर गिरा फिर वह उसकी छातीपर सवार हो गया और कटार निकाल ली। कटार निकलते देख बठवाने दुहाइ दी—तुम मेरे गुरुभाइ हो। जीवनभर डरकर मानूँगा; मुझे छोड़ दो। लोरिकने कहा—यदि मैं तुम्हें यों ही छोड़ देता हूँ। तो तुम जाकर गवरण अपनी बड़ाई करते फिरोगे। इसलिए तुम्हें गौरा आनेकी सौगात मिलनी ही चाहिए। और उसने उसका दाहिना आधा हाथ और नाक काट ली। लोरिकने बठवाको गौरासे भगा दिया यह सूचना जब महुवरके महलोंमें पहुँची तो उसकी खुशीका कोई ठिकाना न रहा। चंदाने मन ही मन निश्चय किया कि लोरिकने मेरी हर तरह रक्षा की है मैं अपनी इच्छा उसे ही दूँगी। यदि उन्होंने मुझे अपने साथ रखना स्वीकार नहीं किया तो मैं किसी औरके साथ नहीं जाऊँगी वरन् जहर खाकर मर जाऊँगी। यह निश्चय कर वह लोरिकसे भेंट करनेका उपाय सोचने लगी। राजाको एक पत्र लिखा कि मेरी इज्जतकी रक्षा हुई है इस खुशीमें आज सारे लोग पिखालियोंको दावत दीजिए। राजाको यह बात पसन्द आयी। उसने तत्काल सबको आमंत्रित करनेकेलिए न्योतहारको भिजवा भेज दिया। दावतके दिन बड़े जोरका धूम धाम था। उन सारे दावतका प्रबन्ध लोरिकपर सौंपा गया। लोरिक निःसंकोच पैर हिला और ... ... ...
१८६ उसे उठाकर लोरिक ऊपर देखने लगा। चंदाको देखते ही वह खाना भूल गया और पानी पीनेके बहाने बार-बार ऊपर देखने लगा। ज्योनार समाप्त होनेके बाद वह घर आकर अपनी माँसे बोला-सहदेवके घर ज्योनार अच्छी नहीं थी। थोड़ा चबेना दो। चबेना लेकर वह घरसे बाहर निकला और गाँवके दो-चार लड़कोंको साथ लेकर जंगलमें पहुँचा। लड़कोंसे काँस- कुश कटवाकर एक बरहा (मोटी रस्सी) तैयार करवायी। उसे लेकर वह गाँवमें लौट आया और उसे उसने अपने मित्र शिवचन्द्र कान्दूके घर रख दिया। जब शाम हुई और सब लोग खा-पीकर सो गये तो लोरिक घरसे निकला और अपने मित्रके घरसे बरहा लेकर राजा सहदेवके मकानके पीछे जा पहुँचा। मकानके झरोखेके पास खड़े होकर उसने बरहा ऊपर फेंका। उसकी आवाज सुनकर चंदा चौंक उठी। उसने खिड़की खोलकर नीचे देखा। लोरिकने बरहा फिर ऊपर फेंका। चंदाने उसे पकड़ लिया। जब लोरिक उसके सहारे ऊपर चढ़ने लगा तब चंदाको घबराहट सूझी। उसने रस्सी छोड़ दी, लोरिक नीचे गिर पड़ा और गाली देने लगा। फिर कुछ रुककर दुबारा रस्सी फेंकी और बोला-यदि इस बार तुमने रस्सी छोड़ी तो फिर पछताओगी। इस बार चंदाने रस्सी लेकर खिड़कीमें बाँध दी और उसके सहारे लोरिक ऊपर पहुँच गया। रातभर दोनोंने आनन्द मनाया। सुबह होनेसे पहले ही लोरिक खिड़कीसे उतरा, रस्सी अपने मित्रके घर रखकर, घर आकर सो रहा। यह क्रम दस-पाँच दिन चलता रहा। एक दिन चन्दाकी चादरसे लोरिककी चादर बदल गयी। चन्दाकी चादर सिरपर बाँधकर लोरिक घर चला आया। सुबह जब महरी आँगन बुहारने उठी तो उसकी नजर लोरिकपर पड़ी और वह ठठाकर हँस पड़ी। सासको बुलाकर बोली- जरा बाहर आकर देखो तो। धोबीका सामान आया है। लोरिकने जब यह सुना तो चादर उठाकर देखा; फिर पीछे हटकर मित्राके घर गया। वहाँ जाकर मित्रकी पत्नीसे बोला-आज तो मेरी बेइज्जती होना चाहती है। रातमें चन्दाके घर गया था; वहाँ मेरी चादर बदल गयी। ऐसा उपाय करो जिससे कोई कलंकी बात न जानने पावे। यह सुनकर मित्रकी पत्नी खिसिया उठी। उसने चादरको ले ली। उसको बाकायदे तह कर रखी थी और फिर महरूकी ओर चल पड़ी। रातभर जागनेके कारण चन्दा अतल नींदमें सोयी थी। जब मुन्दिया दासी उसे जगाने आयी तो उसके पास उसने लोरिककी चादर पड़ी देखी। उसने चन्दाका मुँह सूजा और शृंगार बिखरा हुआ देखकर वह रानीके पास पहुँची और बोली- जान पड़ता है कि चन्दाकी किसी पुरुषसे भेंट हुई। उसकी स्थिति तो है सो है ही; उसका प्रमाण भी पलंगके पास पड़ा है। यह सुनकर चन्दाकी माँ उसके पास पहुँची और पूछा-रात कौन आया था। चन्दाने उत्तर दिया-मैंने अपनी चादर धुलानेके लिए भेजी थी। धोबिन उसे धोकर देरसे दे गयी। मैं रातभर उसे ओढ़े रही और सुबह तह कर सिरहाने रख दिया। पता नहीं कि चादर किस तरह बदल गयी।
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यह बात हो ही रही थी कि बिरजा पहुँची और खिसियाकर बोली—रात मुझसे भूल हो गयी। मैं दूसरेकी चादर तुम्हें दे गयी। अपनी चादर ले लो। इस प्रकार वह लोरिककी चादर लेकर घर आयी और लोरिकको दे दिया। चन्दाकी बातपर पर्दा पड़ गया और लोरिक उसके पास फिर उसी तरह आने-जाने लगा। इस तरह कुछ दिन बीते। जब चन्दा गर्भवती हो गयी तो सारे गाँवमें इसकी गुपचुप चर्चा होने लगी। तब चन्दाने लोरिकसे कहा कि अब यहाँ रहना कठिन है। जहाँ चार स्त्रियाँ एकत्र होती हैं वहीं हम दोनोंकी चर्चा शुरू हो जाती है। इस तरह मेरी बदनामी हो रही है चलो हम दोनों कहीं भाग चलें। लोरिकने कहा—भादों समाप्त होने दो कुँवार आनेपर मैं तुमको भगाकर ले जाऊँगा। चन्दाने उत्तर दिया—यहाँ एक दिन भी ठहरना कठिन है। शामसे सुबह होनेतक मौत भी हो ले सकती। लोरिकने तब कहा—रास्तेका कुछ खर्च एकत्र हो जाने दो। भाईसे छिपकर कुछ जमा कर लूँ तो ले चलूँगा। चन्दाने कहा—तुम्हारी बुद्धि मारी गयी है। तुम पचीस-पचास एकत्र करोगे। इतनेमें रास्तेका खर्च कैसे चलेगा। खर्चकी चिन्ता तुम मत करो। पिताका घर भरा हुआ है। मैं सोनेकी एक पिटारी चुरा लूँगी तो दैवने १२ कत्तक दुर्भिक्ष पडे तब भी हम दोनोंका पाला नहीं छूटेगा। यह सुनकर लोरिकने पूछा—किस देश चलनेका इरादा है! चन्दाने कहा—करीब ही बंगालमें हरदी देश है। वहाँका राजा महुबरी जातिका है। उसके यहाँ धन अपार है। उस नगरमें महीपचन्द नामक बनजारा रहता है। वहीं मेरा चलनेका इरादा है। वहीं हम लोगोंका गुजारा हो सकता है। वैसे जैसी तुम्हारी मर्जी। इस प्रकार जब हरदी चलनेकी बात हो गयी तो चन्दाने कहा कि हरदी चल तो रहे हैं लेकिन इस बातका वादा करो कि तुम महुबरीके राजा और महीपचन्द पर कभी हाथ न उठाओगे। लोरिकने इसका वचन दे दिया। तदनन्तर दोनोंने पलायनकी योजना बनायी। लोरिकने कहा—अगर तुम पहले घरसे निकलो तो गौराके मुख्य मार्गसे आगे बढना और रास्तेमें जहाँ-तहाँ सिन्दूरका टीका लगा देना और आगे चलकर पकड़ीके पेड़के नीचे मेरी प्रतीक्षा करना। यदि मैं पहले बाहर निकला तो जहाँ-तहाँ मैं अपनी खाँड़ेसे निशान बना दूँगा। इस प्रकार शुक्रवार या सोमवार चलनेका दिन निश्चित हुआ। लोरिक अपने घर लौट आया। दूसरे दिन सुबह जब चन्दा शौचके निमित्त बाहर निकली तो रास्तेमें मजरीसे उसकी भेंट हो गयी। मजरीने चन्दासे पूछा—तुम्हें छतारमें दृश्य कोई कुँवारा
१८८ आदमी नहीं मिला जो तुम मेरे पीठपर अंगार डाल रही हो ? संसारमें न जाने कितने कुँवारे हैं। तिलक चढाकर ब्याह क्यों नहीं कर लेती ? तुम मेरे पतिको भुलाकर मेरी सौत क्यों बन रही हो ? अभी कल तो वह मेरा गौना कराकर लाये और आज तुम सौत बन गयीं । पन्नाका यह सुनना था कि वह मंजरीको गालियाँ देने लगी। बोली- अपने पतिको रस्सीमें बाँध क्यों नहीं रखती ? इतना सुनते ही मञ्जरीने दौडकर उसका केश पकडकर खींचा और लगी उसे पीटने । दोनोंको मारपीट करते देख भीड जमा हो गयी। लेकिन डरके मारे उन्हें छुडानेकी हिम्मत किसीको न हुई । जिस कोयरीका खेत था वह अपने खेतको रूप नाश होते देख भागा हुआ लोरिकके पास पहुँचा। सुनते ही लोरिक दौडा हुआ आया । मञ्जरीने लोरिकको देखते ही पन्नाको छोड दिया और घर चली आयी। लोरिक उसके पीछे-पीछे घर पहुँचा और मञ्जरीसे बोला-दूसरेकी बेटीका इस प्रकार उपहास क्यों करती हो ? बात क्या हुई जो इस प्रकार तुमने पन्नाका अप- मान किया ? यह सुनकर मञ्जरी बोली-तुम अपने मनकी बात सच-सच कहो। पन्ना मुझसे किस बातमें अधिक है ? मनमें, बुद्धिमें, रूपमें ? किस कारण तुम उसपर मोहित हो गये हो ? यदि तुमको उसपर ही लुभाना था तो मुझसे विवाह ही क्यों किया ! उसीसे ब्याह कर लेते । लोरिकने हँसकर कहा- सब लोग ऐसी करते हैं यह तो तुम जानती हो। अपने खेतमें अच्छा अनाज होते हुए भी लोग दूसरेके खेतसे ककडी उखाडकर खाते हैं। बस, यही तुम समझ लो। उसके साथ तो दल दिनका आमोद-प्रमोद है। तुम तो जीवन भरके लिए हो । इतना कहकर लोरिक चला गया। धीरे-धीरे सोमवारका दिन आया। शामको मञ्जरी जब सबको रिकसा पिला चुकी तब उसने अपनी साससे कहा-आज जरा होशियार रहना। घरमें आज चोरी होनेवाली है। चन्द्राको लेकर स्वामी हरजी भागने- का इरादा कर रहे हैं। यह सुनकर वृद्धशूद्रनने कही-मेरे हाथमें रुसडा (मोटा डंडा) दे दो और दरवाजेपर पाट बिछा दो। दरवाजेको बन्दकर वहीं सोऊँगी। जैसे ही पन्नाकी आवाज सुनायी देगी, वैसे ही यह रुसडा दे मारूँगी। उसका सिर फूट जायेगा। मञ्जरी अपने कमरेमें आयी और लोरिकको भोजन कराकर बाहरका दरवाजा बन्द कर दिया। फिर लोरिकसे कहा- प्रतिदिन आप बाहर जाते हैं। आज यहीं रह जाइये। इतना कहकर वह सोनेका प्रबन्ध करने लगी। लोरिक रुक गया और उसने मञ्जरीके साथ बातें करके जागते ही रात बिता दी। इधर चन्द्रा अपने पिताके भण्डारसे सोनेकी पिटारी उठाकर बाहर निकली। रास्तेमें जहाँ-जहाँ सिन्दूरका टीका लगाती गयी और पकडीके पेडके नीचे पहुँचकर लोरिककी प्रतीक्षा करने लगी। जब आधी
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रात बीती और लोरिक न आता दिखाई पड़ा तो उसने रोकर शारदा का स्मरण किया और कहा कि यदि हम सानन्द हरदी पहुँच जायेंगे तो मैं तुम्हारी पूजा करूँगी और जो पहला बालक होगा, उसकी बलि मैं तुम्हें दूँगी। इतना सुनते ही देवी चन्दाकी सहायताके लिए आ गयीं और बोलीं— तुम चुपचाप यहीं बैठो मैं लोरिकको लाने जाती हूँ। वे लोरिकके मकान पहुँचीं। वहाँ उन्होंने मंजरीकी करामात देखी। देखकर सोचने लगीं कि उसने तो बड़ा प्रपंच रच रखा है। यदि मैं उसके सामने पड़ी तो वह मुझे शाप दे देगी। फलतः वे निद्रा देवीको बुलाकर ले आयीं। निद्रा देवी मंजरी के सिरपर सवार हो गयीं। तब मंजरीने लोरिकको शपथ देकर कहा कि जानेसे पहले मुझे जगा देना, मैं भी तुम्हारे साथ हरदी चलूँगी। यह कहकर वह सो गयी। तब देवीने लोरिकको जगाया और कहा कि चन्दा पेड़के नीचे बैठकर रो रही है। इतना सुनते ही लोरिक उठकर तैयार हो गया और कपड़े पहनकर धीरेसे पीछेका दरवाजा खोलकर बाहर निकला। वहीं से अपनी पत्नीको पुकार कर उसने कहा—तुमने जो शपथ दिया था उसकी मैं याद दिला रहा हूँ। मैं हरदी जा रहा हूँ, चलना हो तो चलो। पीछे दोष मत देना। इतना कहकर वह चल पड़ा और वहाँ पहुँचा जहाँ चन्दा बैठी थी। लोरिक- को देखकर चन्दा उलाहना देने लगी—यदि तुमको अपनी ब्याही पत्नी ही प्यारी थी तो मुझे घरसे बाहर क्यों निकाला ? रात बीतनेवाली है। गौरामें की गयी चोरी गौरामें ही पकड़ी जायगी। लोरिकने बात अनसुनी कर कहा—तुम अभी चुपचाप बैठो। मैं अपने गुरुसे भेंट करके आता हूँ। चन्दाने कहा—तुम तो गुरुसे भेंट करने जा रहे हो। पर यह तो बताओ सुबह मैं अपना मुँह कैसे दिखाऊँगी ? सब लोग वहाँ मेरा उपहास करेंगे। चाहे जो हो जब तक मैं गुरुसे भेंट नहीं कर लेता नहीं जाता। यह कहकर लोरिक चल पड़ा। मिताके घर पहुँचकर दरवाजा खटखटाया। मिताने दरवाजा खोला। लोरिकने तब मिताको बाँहमें समेटते हुए कहा—मैंने एक बहुत बड़ा अनुचित कार्य किया है। चन्दाको भगाकर हरदीबाजार ले जा रहा हूँ। आपसे भेंट करनेके लिए ही आया हूँ। मिताने कहा—इसमें कोई बुराई नहीं हुई है। तुम चन्दाको लेकर गौरामें ही रहो। जैसा भी होगा वैसे मैं सहदेवको मना लूँगा। नहीं मानेगा तो मैं उससे लल- कार कर युद्ध करूँगा और हम दोनों मिलकर उसे मार डालेंगे। लोरिकने उत्तर दिया—जिसके घरसे मैंने बेटी निकाली है उनसे मैं प्रत्यक्ष कैसे युद्ध करूँगा। दस-पाँच दिनमें सहदेवका गुस्सा अपने आप शान्त हो जायेगा। तब मैं वापस आ जाऊँगा। यह सुनकर मिताने आशीर्वाद दिया। लोरिक लौटकर चन्दाके पास आया
१८८ आदमी नहीं मिला जो तुम मेरे पीठपर अंगार डाल रही हो ? संसारमें न जाने कितने कुँवारे हैं। डिक्क पड़ाकर ब्याह क्यों नहीं कर लेती ? तुम मेरे पतिको भुलाकर मेरी सौत क्यों बन रही हो ? अभी कल तो वह मेरा गौना कराकर लाये और आज तुम सौत बन गयी। पन्वाका यह सुनना था कि वह मंजरीको गालियाँ देने लगी। बोली- अपने पतिको रस्सीमें बाँध क्यों नहीं रखती ! इतना सुनते ही मञ्जरीने दौड़कर उसका केश पकड़कर लीजा और लगी उसे पीटने । दोनोंको मारपीट करते देख भीड़ जमा हो गयी । लेकिन डरके मारे उन्हें छुड़ानेकी हिम्मत किसीको न हुई । जिस कोयरीका खेत था, वह अपने खेतको लथा नाथ होते देख भागा हुआ लोरिकके पास पहुँचा। सुनते ही लोरिक दौड़ा हुआ आया । मञ्जरीने लोरिकको देखते ही पन्वाको छोड़ दिया और घर चली आयी। लोरिक उसके पीछे-पीछे घर पहुँचा और मंजरीसे बोला-दूसरेकी बेटीका इस प्रकार उपहास क्यों करती हो ? बात क्या हुई जो इस प्रकार तुमने पन्वाका अप- मान किया ? यह सुनकर मञ्जरी बोली-तुम अपने मनकी बात सच-सच कहो ! पन्वा मुझसे किस बातमें अधिक है ? धनमें बुद्धिमें, रूपमें ? किस कारण तुम उसपर मोहित हो गये हो ? यदि तुमको उसपर ही लुभाना था तो मुझसे विवाह ही क्यों किया ! उसीसे ब्याह कर लेते । लोरिकने हँसकर कहा-सब लोग खेती करते हैं यह तो तुम जानती हो। अपने खेतमें अच्छा अनाज होते हुए भी लोग दूसरेके खेतसे कचरी उखाड़कर खाते हैं। बस, वही तुम समझ लो । उसके साथ तो बस चित्तका आमोद-प्रमोद है। तुम तो जीवन भरके लिए हो ! इतना कहकर लोरिक चला गया । धीरे धीरे सोमवारका दिन आया । शामको मञ्जरी सब तरहसे निश्चिन्त फिर चुकी तब उसने अपनी साससे कहा-आज जरा होशियार रहना। घरमें आज चोरी होनेवाली है। पन्वाको लेकर स्वामी हरदी भागने- का इरादा कर रहे हैं। यह सुनकर मूहकुण्डनने कही-मेरे हाथमें रुबड़ा (मोटा डंडा) दे दो और दरवाजेपर खाट बिछा दो । दरवाजेको कचकर नहीं छोड़ूँगी। जैसे ही पन्वाकी आवाज सुनायी देगी, वैसे ही यह रुबड़ा से मारूँगी। उसका सिर फूट जायेगा । मञ्जरी अपने कमरेमें आयी और लोरिकको मोचना कराकर बाहरका दरवाजा बन्द कर दिया । फिर लोरिकसे कहा-प्रतिदिन आप बाहर सोते हैं ! आज यहीं रह जावें । इतना कहकर वह सोनेका प्रबन्ध करने लगी । लोरिक थक गया और उसने मँजरीके साथ बातें करके जागते ही रात बिता दी । इधर पन्वा अपने पिताके भण्डारसे सोनेकी पिटारी उठाकर बाहर निकली। रास्तेम जहाँ-तहाँ सिन्दूरका टीका लगाती गयी और बढ़लीके पेड़के नीचे पहुँचकर लोरिककी प्रतीक्षा करने लगी। चार प्यासी
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रात बीती और लोरिक न आता दिखाई पड़ा तो उसने रोकर शारदा का स्मरण किया और कहा कि यदि हम सानन्द हरदी पहुँच जायेंगे तो मैं तुम्हारी पूजा करूँगी और जो पहला बालक होगा उसकी बलि मैं तुम्हें दूँगी। इतना सुनते ही देवी चन्दाकी सहायताके लिए आ गयीं और बोली-- तुम चुपचाप यहीं बैठो मैं लोरिकको लाने जाती हूँ। वे लोरिकके मकान पहुँचीं। वहाँ उन्होंने मंजरीकी करामात देखी। देखकर सोचने लगी कि उसने तो बड़ा प्रपंच रच रखा है। यदि मैं उसके सामने पड़ी तो वह मुझे शाप दे देगी। फलतः वे निद्रा देवीको बुलाकर ले आयीं। निद्रा देवी मंजरी के सिरपर सवार हो गयीं। तब मंजरीने लोरिकको शपथ देकर कहा कि जानेसे पहले मुझे जगा देना, मैं भी तुम्हारे साथ हरदी चलूँगी। यह कहकर वह सो गयी। तब देवीने लोरिकको जगाया और कहा कि चन्दा पेड़के नीचे बैठकर रो रही है। इतना सुनते ही लोरिक उठकर तैयार हो गया और कपड़े पहनकर धीरेसे पीछेका दरवाजा खोलकर बाहर निकला। वहीं से अपनी पत्नीकी पुकार कर उसने कहा-तुमने जो शपथ दिया था उसकी मैं याद दिला रहा हूँ। मैं हरदी जा रहा हूँ चलना हो तो चलो। पीछे दोष मत देना। इतना कहकर वह चल पड़ा और वहाँ पहुँचा जहाँ चन्दा बैठी थी। लोरिक को देखकर चन्दा उलाहना देने लगी-यदि तुमको अपनी प्यारी पत्नी ही प्यारी थी तो मुझे घरसे बाहर क्यों निकाला ? रात बीतनेवाली है। गौरामें की गयी चोरी गौरामें ही पकड़ी जायगी। लोरिकने बात अनसुनी कर कहा-तुम अभी चुपचाप बैठो ! मैं अपने गुरुसे भेंट करके आता हूँ। चन्दाने कहा-तुम तो गुरूसे भेंट करने जा रहे हो। पर यह तो बताओ सुबह मैं अपना मुँह कैसे दिखाऊँगी ? सब लोग यहाँ मेरा उपहास करेंगे। चाहे जो हो जब तक मैं गुरुसे भेंट नहीं कर लेता नहीं जाता। यह कहकर लोरिक चल पड़ा। मिझान घर पहुंचकर दरवाजा खटखटाया। मिझान दरवाजा खोला। लोरिकने तब मिझानको संक्षेपमें समेटते हुए कहा-मैंने एक बहुत बड़ा अनुचित कार्य किया है। चन्दाको भगाकर हरदीबाजार ले जा रहा हूँ। आपसे भेंट करनेके लिए ही आया हूँ। मिझान कहा--इसमें कोई बुराई नहीं हुई है। तुम चन्दाको लेकर गौरामें ही रहो। मन की डाँड़ा देने मैं महरेथको मना लूँगा। नहीं मानेगा तो मैं उसपर एक बार कर युद्ध करूंगा और हम दोनों मिलकर उसे मार डालेंगे। लोरिकने उत्तर दिया-जिनके घरसे मैंने बेटी निकाली है उनसे मैं प्रत्यक्ष कैसे युद्ध करूंगा। दस-पाँच दिनमें महरेथका गुस्सा शान्त और शान्त हो जायेगा। तब मैं वापस आ जाऊँगा। यह सुनकर मिझान आशीर्वाद दिया। लोरिक लौटकर चन्दाके पास आया
३९ ओर दोनों चल पड़े। चलते-चलते जब वे बोहाके पास पहुँचे तब लोरिकने कहा— जरा माईसे भी मिलता चलूँ ! चन्दाने कहा—तुम माईसे मिलने जाओगे तो वे तुम्हें आने न देंगे। उनकी बात छोड़ो। लोरिक बोला—यदि तुम्हें चलना है तो मेरे साथ सीधे चलो। नहीं तो अपने पिताके घर लौट जाओ। निदान चन्दा लोरिकके पीछे-पीछे चली। इतनेमें पौ फटी और सँवरू जगा। जब उसे चन्दाके नूपुरोंकी ध्वनि सुनाई दी तब उसने ननुकुवा चरवाहेसे कहा— जरा देख तो कौन बनिया बैल लादे जा रहा है जिसकी घंटी और घुँघरूकी झंकार सुनाई दे रही है। बाहर जानकर ननुकुआने देखा पर उसे कोई दिखाई नहीं दिया। इतने में उसकी नजर लोरिकपर पड़ी और उसके पीछे चन्दा आती दिखाई पड़ी। यह देखकर वह दौड़ा और सँवरूसे बोला—गौरामैं कुशल नहीं जान पड़ती है। लोरिक चन्दाको भगाकर जा रहे हैं। उसीके ये नूपुर बज रहे हैं। इतनेमें लोरिक स्वयं आ पहुँचा और सँवरूको अपने बाहोंमें कस लिया और फिर बोला—मैंने बहुत बड़ी बुराई की है। चन्दाको भगाकर मैं हरदी बाजार जा रहा हूँ। इतना सुनकर सँवरूने कहा—तुम्हें कहीं जानेकी आवश्यकता नहीं। तुम यहाँ रहो मैं गौरामें रहूँगा। लोरिकने कहा—आप मुझे केवल आशीर्वाद दें ताकि कुशलतापूर्वक हरदी बाजार जाऊँ। वहाँ सिर्फ दस दिन रहूँगा। इतना सुनकर सँवरूने उसे आशीर्वाद दिया और लोरिक चन्दाके साथ हरदी बाजारकी ओर चल पड़ा। रात समाप्त हुई और सुबह जब मंजरीकी नींद टूटी और उसे अपना पति दिखाई नहीं पड़ा तो वह रोने लगी। इस प्रकार लोरिकके भाग जानेका समाचार सारे परिवारमें फैल गया। महागिनने आकर समझाया—तुम घबड़ाओ मत! मैं अपने पतिके पास बोहा ख़बर भेजती हूँ। वह लोरिकको तुरत पकड़ मँगायेंगे। वह चन्दाके साथ हरदी नहीं जाने पायेगा और काकाको बोहा भेजा। काका जब सँवरूके पास पहुँचे तो उनकी बात सुनकर सँवरूने बताया कि जाते समय वह मुझसे मिलकर और सारी बात बता कर गया है। दस दिनमें वह लौटकर आ जायेगा। काकाने लौटकर सबको शान्त किया और धीरज बँधाया। सहदेवके महलमें जब चन्दा गायब हो जानेकी खबर फैली तो वे अपनी बदनामीके भयसे शिथिल हो उठे। लेकिन क्या करते। चलते-चलते चन्दा और लोरिकने बक्सर पहुँचकर नदी पार किया और
बिहिया पहुँचे। उस समय पहर भर रात बीत चुकी थी। अत' वे एक पकड़ीके सूखे पेड़के नीचे रुक गये। लोरिकने कहा—चलते-चलते मैं थक गया हूँ जरा मैं सो लूँ। इतना कहकर वह वहीं चादर तानकर सो गया। सोते ही उसे गहरी नींद आ गयी। चन्दा भी वहीं पासमें बैठ रही और उसे भी नींद आ गयी। उस पकड़ीके पेड़के पास एक साँप रहता था। वह साँप अपनी बिलसे निकला और निकलकर उसने चन्दाको काट खाया। जब सुबह हुई और लोरिककी नींद टूटी तो वह उठा और चन्दाको जगाने लगा। लेकिन जब वह नहीं जागी तो उसने ध्यानसे देखा और पाया कि वह तो मर गयी है। वह रोने लगा। चन्दाके वियोगमें वह पागल हो उठा और खीझकर सूखी हुई पकड़ीके पेड़के चारों ओर घूम घूमकर उसे काटने लगा। आने जाने वाले लोगोंको उसकी यह अवस्था देखकर कौतूहल हुआ। वे उसके चारों ओर एकत्र हो गये और उससे इसका कारण पूछने लगे। लोरिक रो रोकर अपनी सारी बात कह सुनायी और कहा—इस लकड़ीकी चिता बनाऊँगा और अपनी पत्नीके साथ सती हो जाऊँगा। यह सुनकर लोग हँसने लगे। बोले—पागल हुए हो। स्त्रीको तो पुरुषके साथ सती होते देखा है लेकिन स्त्रीके साथ किसी पुरुषके सती होनेकी बात नहीं सुनी गयी। पेड़ पर एक साँप रहता है उसीने उसको काट लिया होगा। नगरमें बहुतसे गुनी हैं जा तुम जाकर पुकार करो। किसी गुनीके कानम आवाज पहुँचेगी तो वह साँप काटनेकी बात सुनकर दौड़ा आयेगा। लोरिकने नगरमें जाकर पुकार की। उसकी बात सुनकर गुनी लोग एकत्र हुए। उन्होंने दूध मँगाकर नादमें भरवा दिया और मन्त्र पढ़कर चिली कौड़ी फेंकी। चिली कौड़ी जाकर साँपके माथेमें चिपक गयी। साँप गुस्सेमें भरा पकड़ीसे निकलकर चन्दाके पास आया। उसे देखते ही लोरिक गरुड़ होकर मारने दौड़ा तो सांप बिलमें फिर घुस गया। गुनी लोगोंने तरह तरहके उपाय करने पर भी जब वह न निकला तब उन्होंने लोरिकसे कहा कि तुम्हारे डरसे साँप नहीं निकल रहा है। जब तक तुम यहाँ रहोगे, साँप यहाँ नहीं आयेगा। गमछा बुझाकर उन्होंने टस वहाँसे हटाया तब सांप बिलसे निकलकर चन्दाके पास गया और अपना सारा विष खींच लिया और विषका वमन छोड़कर पकड़ीके छेदमें चला गया। चन्दा रामका नाम लेती हुई उठ खड़ी हुई। लोरिकने गुनियोंके प्रति कृतज्ञता प्रकट की। लोरिक जब आगे चलनेको उद्यत हुआ तो चन्दाने कहा— इस बिहिया बाजारका राजा अन्यायी है। उसने चन्दैनिया नामक एक सुन्दर नगर छोड़ा है जो गढ़ पचनेके बराबर जान पड़ता है। इसलिए राजाका राज्य छोड़कर अन्यत्र चले जाना।
११२ बड़ी तारीफ की। अब तो हम बिदिया बाजारके बीचसे ही चलेंगे। और गली-गली घूमेंगे और राज्यकी करतूत देखेंगे। चन्दाने समझाया-मेरा कहना मानो। महँसि लौट चलो। हमला हो जायेगा तो जो कुछ पैसा पासमें है वह सब लुट जायेगा और रास्तेका खर्च भी नहीं बचेगा। लोरिकने उत्तर दिया-मेरे बंधकी परम्परा ऐसी नहीं है। अगर हम किसी बगीचेकी बात सुन लेते हैं तो उसके पास आते हैं और दुर्गन्धकी बात होती है तो हम खुद कतरा जाते हैं। लोरिकके हठको समझ कर चन्दा बोली-अगर तुम नहीं मानते हो तो देखो समझना। मैं आगे-आगे चलती हूँ तुम जरा पीछे रुककर चलना। चन्दा चली। उसके नूपुरोंकी झंकार सुनकर रजवेनियाने उसकी ओर देखा और आकर रास्ता रोक दिया। बोला-बिदियाकी कौड़ी (कर) देकर जाओ। चन्दाने कहा-मैंने कोई गाड़ी नहीं लादी है। कौड़ी दूँ तो किस बातकी ! रजवेनिया बोला-बिदियामें तुम्हारे नूपुर बजते हुए जा रहे हैं। तो तुम्हें इनके बजनेकी कौड़ी देनी होगी। इतना सुनकर चन्दाने पैरोंसे नूपुरोंको उतार कर आँचलमें बाँध लिया। बोली-लो अब तुम्हारे बिदियामें नूपुर नहीं बजेंगे। और कहकर वह आगे बढ़ी। रजवेनिया फिर स्थान रोककर खड़ा हो गया और तरह-तरहकी बातें करनेके बाद उसने चन्दासे विवाह करनेका प्रस्ताव किया। उसकी बातें सुनकर चन्दाने उसे गालियाँ सुनायीं। गालियाँ सुनकर रजवेनिया क्रुद्ध हो गया और चन्दाकी ओर झपटा। तब चन्दाने पीछे मुड़कर देखा और लोरिकको इशारा किया। इशारा पाते ही लोरिक चन्दाके पास आ पहुँचा। उसने अपनी खाँड बाहर निकाल ली और वह रजवेनियाको मारने लगा। चन्दाने रोका और कहा कि इसकी दुर्गति करके ही छोड़ देना ठीक होगा। तदनुसार लोरिकने पास ही लगे भीलव (बेल) के पेड़से फल तोड़े और रजवेनियाके लम्बे लम्बे बालोंमें गूँथ दिये और फिर उसे घुमाना शुरू किया ! पक्के बेल के फल झूलकर उसके मुँहपर चोट करने लगे। जब लोरिकने देख लिया कि उसकी पूरी मरम्मत हो चुकी तो उसे छोड़ दिया। रजवेनिया भागा हुआ राजाके पास पहुँचा और अपनी दुर्व्यथाका हाल कह सुनाया। उसकी बात सुनते ही राजाने अपनी सेनाको लोरिकको घेर लेनेका आदेश दिया। लोरिकने जब रणभेरी सुनी तो चन्दाको एक शमीके वृक्षपर बैठाकर आप उनसे जूझनेके लिए आगे बढ़ा। देखते-देखते उसने सारी सेनाको काट गिराया! सेनाका विनाश देखकर राजा अपने हाथी पर भाग चला। लोरिकने दौड़कर उसे पकड़ लिया और रस्सीसे बाँध दिया। राजा हाथ जोड़ कर प्राणदान माँगने लगा। तब लोरिकने कर उठानेका वचन देने पर उसे छोड़ा और चन्दाको लेकर आगे बढ़ा।
१९३ आगे बढ़नेपर चन्दाने कहा—सड़कका रास्ता छोड़कर लोटौके रास्ते चलो । आगे सारंगपुर गाँव है, वहाँ महीपति नामक जुआरी रहता है, जिसके साथ तीन सौ साठ और जुआरी हैं । अगर उस रास्ते चलोगे तो वह तुम्हारा सारा धन जीत लेगा फिर हमारे पास रास्तेके खर्चका अभाव हो जायेगा । चन्दाकी बात सुनकर लोरिकने कहा—तुमने महीपति जुआरीका बखान किया । अब तो मैं जरूर उसका करतब देखूँगा । और वह महीपति जुआरीके घरके पास पहुँचा । जुआरियोंने उसे देखते ही घेर लिया और बोले—इस रास्ते जो भी आता है उसे एक दाव जुआ खेलना पड़ता है । अतः जुआ खेलकर ही आगे जा सकते हो । इतना सुनना था कि लोरिकने चन्दाको तो एक पेड़के नीचे बैठा दिया और स्वयं महीपतिके संग जुआ खेलने बैठ गया । खेलते खेलते लोरिक अपना सारा धन वस्त्र, हथियार सब कुछ हार गया । अन्तमें उसने चन्दाको ही दांवपर लगा दिया और उसे भी हार गया । तब महीपतिने पासेको एक ओर रखकर लोरिकसे कहा—अब मुँह क्या देखते हो । अपन रास्ते जाओ । और अपने आदमियोंसे कहा कि चन्दाको महलमें पहुँचा दो । जब महीपतिके आदमी चन्दाके पास पहुँचे और उससे लोरिकके हार जानेकी बात कही तो वह महीपतिके पास जाकर बोली—अभी एक दाव खेलनेके उपयुक्त मेरे गहने बचे हुए हैं । अतः तुम पहले मेरे साथ एक दाव खेलो । वह खेलने बैठ गयी । खेलते-खेलते उसने लोरिककी हारी हुई सभी चीज जीत ली और फिर महीपतिक्रा सब कुछ जीतकर सारंगपुर गाव भी जीत लिया । फिर लोरिकसे बोली—तुम्हारी इज्जत बच गयी । अब तत्काल हरदीके लिए चल दो । दोनों चल पड़े । उन्हें जाते देख महीपतिने अपने जुआरियोंको ललकारा कि जीती हुई स्त्री लिये जा रहा है । उसे मारकर छीन लो । यह सुनना था कि जुआरी लोरिकपर टूट पड़े । लोरिक भी उनसे गुथ गया और थोड़ी देरमें उन्हें मारकर समाप्त कर दिया । जुआरियोंको मारकर लोरिक चन्दाको लेकर आगे बढ़ा । चन्दाने आगे आनेवाले गांव कनकपुरको बतलाकर दूसरे रास्ते चलनेको कहा पर लोरिकने उसकी बातपर ध्यान नहीं दिया और चलता ही गया । जिस समय वे दोनों कनकपुरके निकट तालाबपर पहुँचे वे प्याससे व्याकुल हो रहे थे । वे तालाबमें घुसकर पानी पीने लगे । इतनेमें तालाबके पहरेदारोंने उन्हें देखा और तालाबको जूठा करनेके कारण उन्हें गाली देने लगे । गाली सुनकर लोरिकको गुस्सा आया और वह पहरेदारोंको मारने लगा । पहरेदार भागकर राजाके पास पहुँचे । राजाने लोरिकको परास्त करनेके लिए सेना भेजी । मगर लोरिकने सेनाको ही परास्त कर दिया । राजाने भागकर अपने घर में शरण ली ।
११४ लोरिक अपने रास्ते चल पड़ा और हरदी पहुँचकर महीचन्दका पता लगाया। महीचन्दने उन दोनोंका बड़े प्रेमसे बेटी-दामादकी तरह स्वागत किया। चम्बाने लोरिकको दो अशर्फी देकर कहा कि रास्तेमें तुम्हें बहुत बहना पड़ा; बहुत थक गये हो। जाकर शराब पी आओ, सारी थकान मिट जायेगी। तब तक मैं भोजन तैयार करती हूँ। लोरिक अशर्फियाँ लेकर निकला। भट्ठियोंमें जाकर शराबका नमूना चखने लगा। पर उसे अपने मनके अनुकूल कहीं शराब न मिली। अन्तमें जमुनी कलवारिनके भट्ठीपर पहुँचा। जमुनी लोरिकको देखते ही उसके रूपपर मोहित हो गयी और उसके लिए विशेष रूपसे शराब तैयारकर चखनेको दिया। उसे चखते ही लोरिक प्रसन्न हो उठा। देखते-देखते वह बारह बोतल शराब पी गया। तब उसने जमुनीपर दृष्टि डाली। दोनोंकी आँखें चार हुईं और वह वहीं जमुनीके संग सो रहा। आधी रातको यकायक लोरिकके कानमें ताल ठोकनेकी आवाज सुनाई पड़ी। सुनकर उसने जमुनीसे उसके सम्बन्धमें पूछा। पहले तो जमुनीने बात टालनेकी चेष्टा की। पर जब लोरिक न माना तो उसने बताया कि हरदीमें एक बुढ़िया रहती है। उसके एक लड़का है। एक दिन जब राजा महुअर्री अपने हाथीपर बाजारमें घूम रहे थे तो उस लड़केने उनके हाथीकी पूँछ पकड़ ली और पीछेकी ओर खींचने लगा। पीलवान कितना भी अंकुश लगाता हाथी पीछे ही हटता जाता। यह देखकर राजाने उस लड़केको अपने हाथीपर चढ़ा लिया और उसका नाम गजभीमक रखा। उन्होंने उसके लिए खाने-पीनेकी पूरी व्यवस्था कर दी है और मासिक वेतन निश्चित कर दिया है। उसे उन्होंने गेड़ुआपुर अखाड़ेका सरदार बनाकर भेज दिया है। वहाँ वह रोज सौ पहलवानोंको पछाड़ता है। उसीने गेड़ुआपुर अखाड़ेमें सलामी दी है, उसीकी यह आवाज थी। यह सुनकर लोरिक बोला—यह भीमक कैसा वीर है जिसकी हरदीमें प्रशंसा होती है। जिस समय मैं अगोरीदामें विवाह करने गया था उस समय मैंने तीन सौ साठ हाथियोंकी सूँड़ फाड़ डाली; मगर किसीने मेरा नाम नहीं बदला। मुझे लोग बाप-दादे रखे नामसे लोरिक ही पुकारते रहे। और इसने हाथीकी पूँछ पकड़कर पछीह भर दिया तो उसका नाम 'गज भीमक' हो गया। सुबह हुई तो लोरिक महीचन्दके घर लौटा। चम्बा लोरिकको देखते ही सभ्रम हो गयी—ससुरकी सिंदूरकी उपेक्षा कर, सुलारमें जाकर मैं इन्हें यहाँ ले आयी और यहाँ आते ही हरदीमें मेरी सौत पैदा हो गयी। यह सोचते हुए उसने लोरिकका स्वागत किया। लोरिक मुँह-हाथ धोकर जलपान कर सो रहा। नगरमें जिस किसीने भी लोरिकको देखा वह स्तब्ध हो उठा। लोग जाकर राजा महुअरके कान भरने लगे कि महीचन्दने किसी शत्रुको अपने यहाँ लाकर रख छोड़ा है। राजाने तत्काल महीचन्दके पास टिके परदेशीको बुला लानेके लिए सिपाही भेजे। सिपाहियोंने आकर यह बात महीचन्दसे कही। लोरिकने जब यह बात सुनी तो
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वह तत्काल चलनेको तैयार हो गया। जब जाने लगा तो चम्पाने कहा—राजा जातिको तेली है उसको कभी सलाम मत करना; और भूलकर भी उसके बायें मत बैठना। यदि इनमेंसे एक बात भी भूले तो तुम्हारे सात पुरखे नरकमें पड़ेंगे। तदनुसार लोरिक जाकर राजाके दरबारमें चुपचाप खड़ा हो गया और फिर आसन उठाकर राजाके दाहिने जा बैठा। यह देखकर दरबारके सभी लोग स्तब्ध हो गये। ये सब आपसमें कानाफूसी करने लगे कि इसने सारे दरबारका घोर अपमान किया। मगर किसीको खुलकर कुछ कहनेका साहस न हुआ। अन्तमें मन्त्रीने लोरिकसे गाँव-घर पूछा। लोरिकने अपने गाँव-घरका पता बताते हुए कहा—वहाँ दुर्भिक्ष पड़ा है। इसलिए यह सुनकर कि हरदीका राजा बड़ा धर्मात्मा है, वहाँ कोई भूखों नहीं मरता जो भी आदमी हरदीमें आता है, उसके उपयुक्त वह काम दिया करता है; मैं यहाँ आया हूँ। राजाने यह सुना तो मन्त्रीको लोरिकने उपयुक्त काम देनेका आदेश दिया। मन्त्रीने कहा—इसके उपयुक्त तो यहाँ काफी काम है। यहाँ छत्तीस वर्णके लोग रहते हैं। सभीके घर गाय-भैंसे हैं। उनकी चरवाही यह कर ले। नगरके दक्षिण जो परती भूमि पड़ी है उसीमें वह अपना छप्पर डाल ले और भैंसोंके लिए रथन बना ले। कोई इसे सत्तू और कोई आटा दे देगा। बस इसका दोनों वक्तका गुजारा हो जायेगा। प्रति वर्ष गोवर्धनकी पूजा होती है। उस अवसरपर कोई गमछा और कोई पुरानी धोती दे देगा। उन्हें जोड़-जाड़कर वह अपने पहनने लायक कपड़ा बना लियाकरे। यह सुनकर लोरिकको हँसी आ गयी। बमुस्कले हँसी रोककर गम्भीरताके साथ बोला—मन्त्रीजी, आपने सोच-समझकर ही मेरे उपयुक्त काम निश्चित किया है। किन्तु मेरी पत्नी धूप और हवा लगने मात्रसे कुम्हला जाती है। अतः आप अपनी बेटी या बहिनको सुबह-शाम भेज दिया करें वह आकर गायोंको दुहा किया करे। लेकिन अगर किसी भी गायका दूध बछड़ा पी गया तो मैं उसे मार बिना न रहूँगा। अगर यह बात मन्जूर हो तो आजसे ही मैं हरदीकी चरवाहीका भार उठाता हूँ। इतना कहकर लोरिक उठ खड़ा हुआ और चल आया। लोरिकके चले जानेपर राजा मन्त्रीपर बहुत बिगड़े—तुम्हारी वजहसे हम सबको गाली सुननी पड़ी। उसके बगलमें टंगे हथियारकी ओर ध्यान न देकर तुम उसकी जातिपर गये। उसे हम अपना चोबदीदार बनाकर रखते। जब कभी समर आ पड़ता उस समय वह हमारे काम आता। खैर, उसे बुलाकर तुम गोकुलपुर भेज दो जहाँ वह राजमहिन्सके साथ अखाड़ेमें रोझ करेगा। दूसरे दिन लोरिक स्वयं भीमलके अखाड़ेकी ओर चल पड़ा। रास्तेमें नदी पड़ी तो उसे उसने कूद कर पार किया। अखाड़ेपर पहुँच कर उसने अपनी साँड़ अखाड़ेके बाहर ही रख दी और भीतर जाकर अखाड़ेमे खेलनेकी इच्छा प्रकट की। भीमलके शिष्य रज्जूने कहा—पहले गुरू-पूजाकी व्यवस्था करो तब पाँव रोझना।
१९६ लोरिकने कहा—उसकी व्यवस्था मैं कल कर दूंगा। आज खेल लेने दो। यह सुनकर मीमरुने रजईसे कहा—न जाने कहाँका मूर्ख आकर मजाक कर रहा है। उसे धक्का देकर निकाल बाहर करो। यह सुनकर रजई लोरिकके पास आया और उससे भिड़ गया। पर वह लोरिकका कुछ न बिगाड़ सका। तब दूसरे मल्लाखिये भी आ जुटे पर लोरिकने उनको झटक दिया। अन्तमें मीमरु स्वयं लोरिकसे आ भिड़ा। उसे भी लोरिकने देखते-देखते परास्त कर दिया। यह देखकर जो लोग वहाँ थे वे भागकर हरदी पहुँचे और जाकर सारा हाल राजासे कहा। राजाने यह सुनकर अपनी सारा सेनाको तत्काल तैयार होनेका आदेश दिया। जब चन्दाने राजाको सेना लेकर आते देखा तो स्वयं भी अपनी सखियोंके साथ नदी के किनारे पहुँची और राजाको न मारनेका जो वचन लोरिकने दिया था उसे दिला- कर पीछे वापस ले जानेको प्रेरित किया और साथ ही लोरिकके क्रोधको भी शान्त किया। उस समय तो राजा वापस लौट आया। मगर लोरिकका हरदीमें रहना अपने लिए खतरेसे खाली न देख मन्त्रीसे कोई ऐसा उपाय करनेको कहा जिससे यह शत्रु सहज ही ढक जाय। यह सुनकर मन्त्रीने कहा—इसका सीधा उपाय है। हर साल नेठरपुरका हरेश भुताहा हरदी आता है और कई मासकी एकत्र की गयी सामग्री एक ही दिनमें समाप्त कर देता है और उससे सारे हरदीवासी परेशान हो उठते हैं। अतः इसे उसीके पास भेज देना चाहिए। उससे कहा जाय कि हरेशने नेठरपुरमें म्नेह राजकुमारको बन्दी कर रखा है। उसे छुड़ा लाओ। इस योजनाके अनुसार लोरिकसे नेठरपुर जानेको कहा गया। लोरिक घोड़ेपर सवार होकर नेठरपुर पहुँचा। आगेकी कथा उपलब्ध न हो सकी। जे डी बेगलरने अपने १८७१-१८७३ ई के पुरातत्त्वान्वेषण यात्राके विवरणमें बड़ागाँव (जिला शाहाबाद बिहार) के प्रसंगमें लोरिक-चन्दाकी कथा संक्षिप्त रूपमें दी है।१ उसमें आरम्भिक कथाओं यथा—लोरिकका जन्म, मंजरीके विवाह आदिकी कथा नहीं है। उन्होंने केवल लोरिक चन्दाके प्रेमकी कथा दी है। उसमें नेठरपुरवाली कथा भी नहीं है; फिर भी उससे कथाके अन्तका कुछ आभास मिलता है। बेगलरवाले रूपको डब्ल्यू. क्रूकने अपनी पुस्तक पापुलर रेलिजन एण्ड फोक लोर आफ नार्थनं इण्डियामें२ और वेरियर एलविनने फोकलोर आफ छत्तीसगढ़ में३ लगभग अविकल रूपमें उद्धृत किया है। वहींसे यह हिन्दीके कतिपय ग्रन्थोंमें भी उद्धृत हुई है। उसके अनुसार कथा इस प्रकार है :— १ आर्कोलाजिकल सर्वे रिपोर्ट १. ८-७ पृष्ठ ८ पृ. ७९-८ । २ खण्ड १,पृ ११७-१६१ ३ पृ ३१ ।
किसी समय शिवभर नामक एक व्यक्ति रहता था जिसे पार्वती ने नपुंसक हो जानेका शाप दे दिया था। शाप देनेके कारणको बेगलरने बताना उचित न समझकर नहीं दिया है। पार्वतीका शाप पानेसे पूर्व बचपनमें ही उसका विवाह हो गया था। यथा समय जब उसकी पत्नी चन्दन युवती हुई तो उसका गोना हुआ और शिवभर अपनी पत्नीको अपने घर लिवा लाया। शिवभरके नपुंसक्त्वके कारण उसकी पत्नी उससे असन्तुष्ट रहने लगी। उसने अपने गाँवके ही एक व्यक्ति चोरीसे सम्बन्ध स्थापित कर लिया और उसके साथ घरसे भाग निकली। शिवभरने उसका पीछा किया और उन्हें जा पकड़ा। लेकिन उसकी पत्नीने उपहास करते हुए लौटनेसे इन- कार कर दिया। बोली—जब मैं तुम्हारे घर थी तब तो तुमने परवाह न की और अब मेरे पीछे बेकार भाग रहे हो। लेकिन शिवभरने उसकी एक न सुनी। फलतः शिवभर और चोरी दोनोम घोर युद्ध हुआ और शिवभर हार गया। चोरी और चन्दन आगे चले। बड़गाँवके निकट जहाँ एक मुण्डहीन मूर्ति पड़ी है गङ्गापतिया नामक जुआरियोंके सरदारसे उनकी भेंट हुई। वह जुआगार गाँवका रहनेवाला था। चोरीने उसके साथ जुआ खेलनेकी इच्छा प्रकट की और दोनों खेलने बैठ गये। जुएमें चोरीके पास जो कुछ था वह तो हार ही गया साथ ही चन्दनको भी हार गया। जब गङ्गापतिया चन्दनको पकड़ने बढा तो चन्दन बोली—मानती हूँ कि मैं दाँवपर लगायी गयी थी और मैं हारी गयी हूँ किन्तु मेरे तनपर जो आभूषण हैं, वे दाँवपर नहीं लगाये गये थे। अतः उन आभूषणोंके साथ अभी एक दाँव और खेलो। जुआरी खेलने बैठ गया। चन्दन अपने प्रेमी चोरीके पीछे और जुआरीके सामने जुआ देखनेके बहाने जा खड़ी हुई। खेल देखनेमें लीन होनेका बहाना करते हुए उसने अपनेको इस ढंगसे विवस्त्र कर दिया मानों वह अनजाने अकस्मात् हो गया हो। जुआरी उसके रूप सौन्दर्यपर इस प्रकार मुग्ध हुआ कि उसकी ओरसे उसकी आँख हटती ही न थीं। फलतः वह हारने लगा। चोरीने न केवल अपना सब हारा हुआ धन जीत लिया वरन् उसके पास और जो कुछ भी था वह भी ले लिया। अन्तमें हार मानकर जुआरीने खेलना बन्द कर दिया। तब चन्दनने सामने आकर चोरीसे अपनी कारवाई कह सुनाइ और बताया कि जिस तरह वह उसे कञ्जाई औरतोंसे खेल रहा था। अन्तमें बोली कि इस दुष्टको मार डालो ताकि वह डींग न हाँक सके कि उसने मुझे विवस्त्र देखा है। चोरी बड़ा बली था। उसकी तलवार दो मनकी थी और उसका नाम था विज्ञाधर। एक ही झटकेमें उसने जुआरीका सर अलग कर दिया जो जुआगारमें जा गिरा और धड़ जहाँ वह बैठा था वहीं पाषाणयी हो गया। तबसे वहीं उसके शरीरके दोनों भाग पत्थर बने पड़े हैं। चोरी कुर्यरकटई नामक आकेरा नटका था। उसका विवाह भगोरी गाँव की जिसे अब रजोकी कहते हैं और वह हजारीबागसे बिहार जानेवाली सड़कपर स्थित
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है, एक लड़कीसे हुआ था। किन्तु उसकी पत्नी छठमैना अभी बच्ची थी और उसका गौना नहीं हुआ था। उसके एक बहन थी, जिसका नाम छुरी था। गोरीके एक भाई था जिसका नाम सेमरू था। अनाथ होनेके कारण उसे गोरीके पिताने अपने बेटेकी तरह पाला था। वह अगोरीके पास ही पाली नामक गाँवमें रहता था। गोरी और चन्देन दोनों हरहुंग पहुँचे। मुँगेरसे उत्तर वह जो बिजुकी मस्जिदपर स्थित था। उन्होंने वहाँके राजाको हराकर देश जीत लिए। हारे हुए राजाने कलिंगके राजासे सहायता ली और गोरीको गिरफ्तारकर एक कोठरीमें बन्द कर दिया। वहाँ उसे बिठाकर उसके हाथ-पैरोंमें कील ठोंक दिये गये और उसके छातीपर भारी सील रख दिया गया। इस तरह वहाँ वह बहुत दिनोंतक पड़ा रहा। अन्तमे आराधना करनेपर दुर्गा प्रसन्न हुईं और उसे छुटकारा मिला। छूटनेके बाद उसने राजासे फिर लड़ाई की और हरहुंगको जीत लिया और चन्देनसे उसका मिलन हुआ। वहाँ उनके एक पुत्र उत्पन्न हुआ और वे वहाँ बहुत दिनोंतक रहते रहे। एक दिन उनके मनमें स्वदेश लौटनेकी इच्छा जाग्रत हुई और वे बहुत सा धन लेकर पाली लौट आये। इस बीच उसके पोष्य भ्राता सेमरूको लोगोंने मारकर उसकी गायें और धन- दौलत लूट लिया था। उसके एक लड़का था। उसका परिवार बड़े कष्टसे जीवन बिता रहा था। गोरीकी पत्नी भी सयानी होकर सुन्दर युवती हो गयी थी और अपने मायकेमें ही कष्टके जीवन बिता रही थी। गोरीने पहुँचकर प्रचार किया कि दूर देशका एक राजा आया है। रूप इतना बदल गया था कि कोई उसे पहचान न सका। इस प्रकार अपनेको छिपाकर उसने अपनी पत्नीके सतीत्वकी परीक्षा लेनेका निश्चय किया। फलतः यह जानकर कि उसके शिविरमें दूध बेचने आनेवाली स्त्रियोंमें उसकी पत्नी भी है और उसे पहचानकर (उसकी पत्नीने उसे नहीं पहचाना) उसने अपने शिविर आनेके मार्गमें एक धोती फैला दी ताकि कोई भी उसे रौंदे बिना न आ सके। दूसरे दिन प्रातःकाल, जब औरतें दूध बेचने आयीं तो उसने अपनी पत्नी (चन्देन) से कहा कि उनसे लपककर आनेको कहे। छठमैना चन्देनके कहनेपर थोड़ीतक तो तेजीसे आयी मगर वहाँ आकर वह रुक गयी। दूसरी औरतें उसपर चलती चली गयीं। छठमैनाने धोतीको रौंदकर आनेके सिवा कोई रास्ता न देखकर धोती हटा देनेके लिए कहा। यह देखकर गोरी बहुत प्रसन्न हुआ। जब वह दूध बेच चुकी और दाम माँगने लगी तो गोरीने उसकी टोकरीम जवाहरात रखकर चावलसे ढक दिया। बिना किसी प्रकार सन्देह किये वह लेकर चली गयी। घरपर उसकी बहनने टोकरी खाली करते हुए उन जवाहरातोंको देखा और अनुमान किया कि उसने उन्हें दुराचार द्वारा प्राप्त किया है। तदनुसार वह छठमैनापर आरोप करने लगी। छठमैनाने जवाहरातोंके प्रति अपनी अनभिज्ञता प्रकट की। अन्तमें दोनोंने सन्देह दूर करनेके लिए एक साथ जानेका निश्चय किया। दूसरे दिन वे दोनों साथ गयीं। छुरीने गोरीको पहचान लिया और तब वास्तविकता प्रकट हो
२९९ गयी। लोगोंके हर्षका पारावार न रहा। लोरीको अपनी स्त्रीकी उपेक्षा करने और रखैलके साथ सुखपूर्वक रहनेपर काफी फटकार सुननी पड़ी। अन्ततोगत्वा व्यवस्था ऐसी हुई कि लोरीको अपनी रखैल छोड़नी न होगी। इस बीच लोरीके भतीजेने जब अपनी चाचीके दुराचारकी बात सुनी तो वह बड़ा बिगड़ा और लोरीसे लड़नेकी तैयारी की। घरपर हुर्की और सतमैनाको न पाकर वह और भी क्रुद्ध हुआ और उसने लोरीपर आक्रमण कर दिया। बहुत देरतक लड़ाई होती रही। लोरी परास्त हो गया और अपना जीवन खोने ही वाला था कि हुर्की और सतमैना भागी हुई वहाँ पहुँचीं और वास्तविकता प्रकट की। लड़ाई तत्क्षण बन्द हो गयी। लोरी अपनी प्रजापर न्यायपूर्वक शासन करने लगा। उसने कृषिको इतना प्रोत्साहन दिया कि रसोलीके आस-पासके जंगलोंको भी उपजाऊ भूमि बना दिया। फलतः पशु-पक्षियों, कीड़े-मकोड़ोंके रहने योग्य कोई जगह ही नहीं रही। सभी पशु पक्षी और कीट-मकोड़ोंने इन्द्रसे जाकर लोरीकी शिकायत की। लोरीको अपनी प्रजापर न्यायपूर्वक शासन करते देख इन्द्रको लगा कि उसे हानि पहुँचाना उनकी शक्तिसे बाहर है। जबतक वह कोई कुकर्म न करे, उसको हानि पहुँचाना सम्भव नहीं है। अतः उन्होंने दुर्गासे सलाह की। लोरीसे पापरत करनेके लिए दुर्गाने चन्दैनका रूप धारण किया और जिस तरह चन्दैन नित्य भोजन ले जाती थी भोजन लेकर लोरीके पास पहुँचीं। लोरीको इस मायाजालका कुछ ज्ञान न था। उसने देखा कि आज तो चन्दैन नित्यसे अधिक सुन्दरी लग रही है, वह उसके सौन्दर्यपर विमोहित हो गया। भोजन छोड़कर उसे आलिंगन करने लगा। उसने शरीर छुआ ही था कि दुर्गाने उसे पथभ्रष्ट जानकर कसकर एक तमाचा दिया, जिससे उसका सिर घूम गया। दुर्गा तत्काल अन्तर्धान हो गयीं। लोरीको यह देखकर अत्यन्त लज्जा आयी और खेद हुआ। उसने काशी जाकर मरनेका निश्चय किया। उसके सारे सम्बन्धी भी मोक्षवश उसके साथ गये। वहाँ वे सभी निद्राभूत हो मणिकर्णिका घाटपर पत्थर बने पड़े हैं। • मिर्जापुरी रूप मिर्जापुर जिले (उत्तर प्रदेश) में प्रचलित लोरिक और चन्दानी कथाका रूप जे० सी० नेस्फील्डने कलकत्ता रिव्यूमें प्रकाशित किया था। उसे लखनऊके दैनिक पायोनियरने अपने १९ मार्च १८८८ के अंकमें उद्धृत किया है। उक्त अनुसार यह कथा इस प्रकार है— गंगाके दक्षिणी किनारेपर स्थित रिसोंकोट्का राजा चेरो जातिका मकरा दुर्गतराय था। गंगाके उत्तरी किनारेपर रिसोंसे २ ३ मील दूर गौरा नामक एक दूसरा कोट था। वहाँ अहीर जातिका लोरिक नामक एक वीर रहता था। दोनों परस्पर घनिष्ठ मित्र थे।