चन्दायन (मुल्ला दाऊद - प्राचीनतम अवधी सूफी-प्रेमाख्यान सटीक)
Chandayan of Mulla Daud with Hindi Commentary
मुल्ला दाऊद (१३७९ ई.) / डॉ. परमेश्वरीलाल गुप्त द्वारा
पृष्ठ 428, कुल 520 में से
संदर्भ में पढ़ें२१५
वह तत्काल चलनेको तैयार हो गया। जब जाने लगा तो चम्पाने कहा—राजा जातिको तेली है उसको कभी सलाम मत करना; और भूलकर भी उसके बायें मत बैठना। यदि इनमेंसे एक बात भी भूले तो तुम्हारे सात पुरखे नरकमें पड़ेंगे। तदनुसार लोरिक जाकर राजाके दरबारमें चुपचाप खड़ा हो गया और फिर आसन उठाकर राजाके दाहिने जा बैठा। यह देखकर दरबारके सभी लोग स्तब्ध हो गये। ये सब आपसमें कानाफूसी करने लगे कि इसने सारे दरबारका घोर अपमान किया। मगर किसीको खुलकर कुछ कहनेका साहस न हुआ। अन्तमें मन्त्रीने लोरिकसे गाँव-घर पूछा। लोरिकने अपने गाँव-घरका पता बताते हुए कहा—वहाँ दुर्भिक्ष पड़ा है। इसलिए यह सुनकर कि हरदीका राजा बड़ा धर्मात्मा है, वहाँ कोई भूखों नहीं मरता जो भी आदमी हरदीमें आता है, उसके उपयुक्त वह काम दिया करता है; मैं यहाँ आया हूँ। राजाने यह सुना तो मन्त्रीको लोरिकने उपयुक्त काम देनेका आदेश दिया। मन्त्रीने कहा—इसके उपयुक्त तो यहाँ काफी काम है। यहाँ छत्तीस वर्णके लोग रहते हैं। सभीके घर गाय-भैंसे हैं। उनकी चरवाही यह कर ले। नगरके दक्षिण जो परती भूमि पड़ी है उसीमें वह अपना छप्पर डाल ले और भैंसोंके लिए रथन बना ले। कोई इसे सत्तू और कोई आटा दे देगा। बस इसका दोनों वक्तका गुजारा हो जायेगा। प्रति वर्ष गोवर्धनकी पूजा होती है। उस अवसरपर कोई गमछा और कोई पुरानी धोती दे देगा। उन्हें जोड़-जाड़कर वह अपने पहनने लायक कपड़ा बना लियाकरे। यह सुनकर लोरिकको हँसी आ गयी। बमुस्कले हँसी रोककर गम्भीरताके साथ बोला—मन्त्रीजी, आपने सोच-समझकर ही मेरे उपयुक्त काम निश्चित किया है। किन्तु मेरी पत्नी धूप और हवा लगने मात्रसे कुम्हला जाती है। अतः आप अपनी बेटी या बहिनको सुबह-शाम भेज दिया करें वह आकर गायोंको दुहा किया करे। लेकिन अगर किसी भी गायका दूध बछड़ा पी गया तो मैं उसे मार बिना न रहूँगा। अगर यह बात मन्जूर हो तो आजसे ही मैं हरदीकी चरवाहीका भार उठाता हूँ। इतना कहकर लोरिक उठ खड़ा हुआ और चल आया। लोरिकके चले जानेपर राजा मन्त्रीपर बहुत बिगड़े—तुम्हारी वजहसे हम सबको गाली सुननी पड़ी। उसके बगलमें टंगे हथियारकी ओर ध्यान न देकर तुम उसकी जातिपर गये। उसे हम अपना चोबदीदार बनाकर रखते। जब कभी समर आ पड़ता उस समय वह हमारे काम आता। खैर, उसे बुलाकर तुम गोकुलपुर भेज दो जहाँ वह राजमहिन्सके साथ अखाड़ेमें रोझ करेगा। दूसरे दिन लोरिक स्वयं भीमलके अखाड़ेकी ओर चल पड़ा। रास्तेमें नदी पड़ी तो उसे उसने कूद कर पार किया। अखाड़ेपर पहुँच कर उसने अपनी साँड़ अखाड़ेके बाहर ही रख दी और भीतर जाकर अखाड़ेमे खेलनेकी इच्छा प्रकट की। भीमलके शिष्य रज्जूने कहा—पहले गुरू-पूजाकी व्यवस्था करो तब पाँव रोझना।