चन्दायन (मुल्ला दाऊद - प्राचीनतम अवधी सूफी-प्रेमाख्यान सटीक)
Chandayan of Mulla Daud with Hindi Commentary
मुल्ला दाऊद (१३७९ ई.) / डॉ. परमेश्वरीलाल गुप्त द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२९९ गयी। लोगोंके हर्षका पारावार न रहा। लोरीको अपनी स्त्रीकी उपेक्षा करने और रखैलके साथ सुखपूर्वक रहनेपर काफी फटकार सुननी पड़ी। अन्ततोगत्वा व्यवस्था ऐसी हुई कि लोरीको अपनी रखैल छोड़नी न होगी। इस बीच लोरीके भतीजेने जब अपनी चाचीके दुराचारकी बात सुनी तो वह बड़ा बिगड़ा और लोरीसे लड़नेकी तैयारी की। घरपर हुर्की और सतमैनाको न पाकर वह और भी क्रुद्ध हुआ और उसने लोरीपर आक्रमण कर दिया। बहुत देरतक लड़ाई होती रही। लोरी परास्त हो गया और अपना जीवन खोने ही वाला था कि हुर्की और सतमैना भागी हुई वहाँ पहुँचीं और वास्तविकता प्रकट की। लड़ाई तत्क्षण बन्द हो गयी। लोरी अपनी प्रजापर न्यायपूर्वक शासन करने लगा। उसने कृषिको इतना प्रोत्साहन दिया कि रसोलीके आस-पासके जंगलोंको भी उपजाऊ भूमि बना दिया। फलतः पशु-पक्षियों, कीड़े-मकोड़ोंके रहने योग्य कोई जगह ही नहीं रही। सभी पशु पक्षी और कीट-मकोड़ोंने इन्द्रसे जाकर लोरीकी शिकायत की। लोरीको अपनी प्रजापर न्यायपूर्वक शासन करते देख इन्द्रको लगा कि उसे हानि पहुँचाना उनकी शक्तिसे बाहर है। जबतक वह कोई कुकर्म न करे, उसको हानि पहुँचाना सम्भव नहीं है। अतः उन्होंने दुर्गासे सलाह की। लोरीसे पापरत करनेके लिए दुर्गाने चन्दैनका रूप धारण किया और जिस तरह चन्दैन नित्य भोजन ले जाती थी भोजन लेकर लोरीके पास पहुँचीं। लोरीको इस मायाजालका कुछ ज्ञान न था। उसने देखा कि आज तो चन्दैन नित्यसे अधिक सुन्दरी लग रही है, वह उसके सौन्दर्यपर विमोहित हो गया। भोजन छोड़कर उसे आलिंगन करने लगा। उसने शरीर छुआ ही था कि दुर्गाने उसे पथभ्रष्ट जानकर कसकर एक तमाचा दिया, जिससे उसका सिर घूम गया। दुर्गा तत्काल अन्तर्धान हो गयीं। लोरीको यह देखकर अत्यन्त लज्जा आयी और खेद हुआ। उसने काशी जाकर मरनेका निश्चय किया। उसके सारे सम्बन्धी भी मोक्षवश उसके साथ गये। वहाँ वे सभी निद्राभूत हो मणिकर्णिका घाटपर पत्थर बने पड़े हैं। • मिर्जापुरी रूप मिर्जापुर जिले (उत्तर प्रदेश) में प्रचलित लोरिक और चन्दानी कथाका रूप जे० सी० नेस्फील्डने कलकत्ता रिव्यूमें प्रकाशित किया था। उसे लखनऊके दैनिक पायोनियरने अपने १९ मार्च १८८८ के अंकमें उद्धृत किया है। उक्त अनुसार यह कथा इस प्रकार है— गंगाके दक्षिणी किनारेपर स्थित रिसोंकोट्का राजा चेरो जातिका मकरा दुर्गतराय था। गंगाके उत्तरी किनारेपर रिसोंसे २ ३ मील दूर गौरा नामक एक दूसरा कोट था। वहाँ अहीर जातिका लोरिक नामक एक वीर रहता था। दोनों परस्पर घनिष्ठ मित्र थे।