चन्दायन (मुल्ला दाऊद - प्राचीनतम अवधी सूफी-प्रेमाख्यान सटीक)
Chandayan of Mulla Daud with Hindi Commentary
मुल्ला दाऊद (१३७९ ई.) / डॉ. परमेश्वरीलाल गुप्त द्वारा
पृष्ठ 43, कुल 520 में से
संदर्भ में पढ़ें२६ उन प्रतियोंसे केवल ४३ कड़वक ऐसे प्राप्त हुए हैं जो रीडेण्ड्स प्रतिमें नहीं हैं। ये कड़वक इस प्रकार हैं — मनेरशरीफ प्रतिमें १९ बम्बई प्रतिमें ५, पंजाब प्रतिमें ७ डाक्टर प्रतिमें १ रामपुर प्रतिमें १। इस प्रकार हमें चान्दायणके कुल ३९२ कड़वक उपलब्ध हैं। यदि आकारके सम्बन्धमें हमारा उपर्युक्त अनुमान ठीक है तो अभी ८१ कड़वक अज्ञात हैं। यदि बीकानेर प्रति प्रकाशमें आ जाय तो उससे अनुपलब्ध क- डवकोंमें ६०-६१ कड़वक प्राप्त हो जानेकी सम्भावना है और तब केवल अन्तके २०-२१ कड़वक मिलना शेष रह जायेंगे। उपलब्ध प्रतियोंके खण्डित होनेके कारण काव्यको शृंखलाबद्ध रूप देनेमें पर्याप्त कठिनाइ रही है। उसे शृंखलाबद्ध करनेमें रीडेण्ड्स प्रति अत्यधिक सहायक सिद्ध हुई। यद्यपि वह प्रति आदि अन्तसे खण्डित है और बीच के भी कुछ पृष्ठ गायब हैं, तथापि वह अपने आपमें क्रमबद्ध है। कुछ ही स्थल ऐसे हैं जहाँ किसी प्रकारका व्यतिक्रम है। खण्डित होनेके पश्चात् किसी अन्यकारने उन्हें क्रमबद्ध कर पृष्ठांकित किया है। इन पृष्ठांकोंको आधार मानकर बीकानेर प्रतिके प्रकाशमें आये अंशोंके सहारे हमने ग्रन्थको सूत्रबद्ध करनेका प्रयत्न किया है। बीकानेर प्रतिकी प्रकाशित सामग्रीसे ज्ञात हुआ कि रीडेण्ड्स प्रतिका पाँचवाँ कड़वक काव्यका चौबीसवाँ कड़वक रहा होगा। अतः हमने उसे आरम्भके कड़वकोंकी गणनाका आधार बनाया। इसी प्रकार बीकानेर प्रतिके अन्तिम कड़वककी संख्या ४३८ मानकर हमने आगे पीछेके कड़वकोंकी संख्या निर्धारित की है। ऐसा करनेपर हमें ज्ञात हुआ कि रीडेण्ड्स प्रतिमें ४३८ वें कड़वकके आगेके १४ कड़वक ऐसे हैं जो बीकानेर प्रतिमें नहीं हैं। सूत्रबद्ध करनेमें मनेर शरीफ प्रति भी सहायक सिद्ध हुई है। उसमें लिपिकारने जो पृष्ठ-संख्या दी है उससे हमने रीडेण्ड्स प्रतिके पृष्ठोंका तारतम्य स्थापित किया है रीडेण्ड्स प्रतिके पृष्ठ २२६ और मनेर शरीफ प्रतिके पृष्ठ १४७ख पर अंकित कड़वक एक हैं। अतः हमने उक्त कड़वककी संख्या मनेरशरीफ प्रतिके अनुसार १८९ स्वीकार किया है। इस प्रकार काव्यके आदि अन्त और मध्यके कड़वकोंकी संख्या निर्धारित कर प्रसंगके अनुसार विभिन्न प्रतियोंसे प्राप्त नये कड़वकोंको यथास्थान रखनेकी चेष्टा की गयी है। काव्यका इस प्रकार ग्रथित जो रूप प्रस्तुत किया जा रहा है वह मूल ग्रन्थके कितने निकट है यह तो भविष्य ही बतायेगा जब काव्यकी कोई पूरी प्रति प्रकाशमें आयेगी। अभी तो हम यह आशा ही प्रकट कर सकते हैं कि वह मूलसे बहुत दूर नहीं है। प्रस्तुत रूपके देखनेसे ज्ञात होता है कि इसमें निम्नलिखित कड़वकोंका अभाव है— १-१९ (इनमें दो कड़वक डाक्टर और बम्बई प्रतिमें उपलब्ध हैं पर उनका निश्चित स्थान बताना कठिन है)- २३ ३४; ५४-६५ (इनमेंसे १ कड़वक पंजाब