चन्दायन (मुल्ला दाऊद - प्राचीनतम अवधी सूफी-प्रेमाख्यान सटीक)
Chandayan of Mulla Daud with Hindi Commentary
मुल्ला दाऊद (१३७९ ई.) / डॉ. परमेश्वरीलाल गुप्त द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रतिमें प्राप्त हैं पर वे अधूरे हैं)- १२२ १५१; १८ १८४ २८२ २८६ २९८ ९७ १९९ १ २; ३ ३ ११ ३१ ३३०-३४२ (इनमेंसे दो कड़वक बम्बई प्रतिमें प्राप्त हैं पर अन्य कड़वकोंके अभावमें उनका स्थान निश्चित नहीं किया जा सकता) १४५ ३१२ १६३ १७८ १८८ (इनमेंसे चार कड़वक पंजाब प्रतिमें प्राप्त हैं पर वे अधूरे हैं। उनका स्थान निर्धारित नहीं किया जा सकता) ४१ और ४५०-४७३ । लिपि हिन्दीके विद्वानोंकी कुछ ऐसी धारणा बन गयी है कि मुसलमान कवियों द्वारा रचे गये सभी हिन्दी प्रेमाख्यानक काव्योंकी आदि प्रति नागरी लिपिमें लिखी गयी थी। इस कथनके समर्थनमें वे इन काव्योंकी विभिन्न प्रतियोंमें पायी जानेवाली कतिपय ऐसी विकृतियोंकी सूची प्रस्तुत किया करते हैं जो उनकी दृष्टिमें नागरी लिपिसे फारसी लिपिमें परिवर्तनसे ही आ सकती हैं। इन लोगों द्वारा उपस्थितकी जानेवाली पाठ विकृतियोंके विवेचन का यह स्थान नहीं है। यहाँ यह कहना ही पर्याप्त होगा कि यदि उन्हें ध्यानपूर्वक देखा जाय तो यह समझते देर न लगेगी कि वे विकृतियों नागरी लिपिसे फारसी लिपिमें परिवर्तन करने से नहीं आयी हैं, वरन् तत्कालीन अरबी-फारसी लिपि-शैलीकी प्रवृत्तियोंसे अपरिचित लिपिकारों द्वारा लिपिबद्ध होनेके कारण आयी हैं। यह सामान्य सूझ-बूझकी बात है कि नागरी लिपिको मुसलमानी शासनकालमें कभी प्रश्रय प्राप्त नहीं हुआ। परिणामतः सभी पढांत वर्ग पूर्णतया अभिजात कायस्थ परिवारोंका नागरी लिपिके साथ नामका भी सम्बन्ध न था। उनके घरोंमें रामायण ही नहीं दुर्गा-पाठ और भगवद्गीताका भी पाठ उर्दू-फारसीमें लिखी पोथियोंसे होता था और वे शुद्ध उच्चारणके साथ उनका पाठ किया करते थे। इङ्गलैण्ड और फ्रांस के पुस्तकालयोंमें न केवल सूरसागर आदि धार्मिक ग्रन्थों की ही वरन् हिन्दू कवियोंद्वारा रचित अनेक शृंगार काव्यों यथा केशवदासकी रसिक प्रिया बिहारी सतसई आदिकी भी फारसी लिपिमें लिखी काफी प्राचीन प्रतियाँ सुरक्षित हैं। उन्हें देखते हुए यह कल्पना करना कि प्रेमाख्यानक काव्योंके रचयिता मुसलमानों ने अपने काव्यकी आदि प्रति नागरी अक्षरोंमें लिखी होगी नितान्त हास्यास्पद है। ये कवि न केवल स्वयं मुसलमान थे वरन् उनके गुरु भी मुसलमान थे और उनके शिष्य भी मुसलमान ही थे। सूफी मतका हिन्दुओंमें प्रचार हुआ हो इसका कोई भी प्रमाण उपलब्ध नहीं है। अतः उनके ग्रन्थ अरबी-फारसीके अतिरिक्त किसी अन्य लिपिमें कदापि नहीं लिखे गये होंगे। ये काव्य मूलतः अरबी-फारसी लिपिमें ही लिखे गये थे, यह उनकी उपलब्ध प्रतियोंसे भी सिद्ध होता है। वे अधिकांशतः अरबी-फारसी लिपिमें लिखी मिलती हैं और इन लिपियोंमें लिखी प्रतियाँ ही अधिक प्रमाणित हैं। यही नहीं नागरी लिपिमें प्राप्त प्रतियोंके पूर्वज भी अरबी-फारसी प्रतियाँ ही रही हैं यह भी उनके परीक्षणसे स्पष्ट प्रकट