चन्दायन (मुल्ला दाऊद - प्राचीनतम अवधी सूफी-प्रेमाख्यान सटीक)
Chandayan of Mulla Daud with Hindi Commentary
मुल्ला दाऊद (१३७९ ई.) / डॉ. परमेश्वरीलाल गुप्त द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२८ होता है। एक भी ऐसी नागरी प्रति उपलब्ध नहीं है जो सतहवीं शतीके पूर्वकी हो और किसी ग्रन्थकी प्राचीनतम प्रति कही जा सके। चन्दायतके सम्बन्धमें तो हमें यह कहनेमें तनिक भी संकोच नहीं है कि वह मूलतः नस्त' लिपिमें लिखा गया रहा होगा। उसकी सोलहवीं शती वाली प्रतियाँ इसी लिपिमें हैं। उसकी एक मात्र हिन्दी प्रतिके मूलमें कोई अरबी फारसी लिपिकी प्रति थी यह तो उसके प्रथम वाक्य—गुजरा चन्दायन गुफ्तार मौलाना दाऊद डालमई से ही सिद्ध है। सर्वोपरि हमारे सम्मुख नस्त' लिपि लिखित जो प्रतियाँ हैं उनमेंसे किसी भी प्रतिमें ऐसी विकृति नहीं मिलती जिससे उसकी किसी पूर्वज प्रतिके नागरी लिपिमें लिखे जानेकी दुरूह कल्पना भी की जा सके। पाठोद्धार और पाठ-निर्धारण किसी भी भाषाको अरबी-फारसी लिपिमें लिखना उतना कठिन नहीं है जितना कि बिना अभ्यासके उस लिपिमें लिखी भाषाका पढ़ना। इस लिपिमें व्यंजन मुख्यतः नुक्ते (विन्दुओ) पर आश्रित हैं। अतः जबतक कोई वस्तु सावधानीसे न लिखी गयी हो उसे ठीकसे और शुद्ध पढना यदि सर्वथा असम्भव नहीं तो दुरूह अवश्य है। इसी प्रकार स्वर व्यक्त करनेके लिए इस लिपिमें केवल तीन अक्षर अलिफ ये और वाव हैं। अलिफका अ और आ दोनो पढा जा सकता है। कहीं-कहीं आको शुद्ध पढ़नेके निमित्त तशदीदका चिह्न दे दिया करते हैं। येके दो रूप हैं जो छोटी ये और बड़ी य कहकर पुकारे जाते हैं। साधारणतः छोटी ये इ और ईके लिए और बड़ी य ए और ऐके लिए काम आता है। अन्तर व्यक्त करनेके लिए जेर और जबरके चिह्न लगा देते हैं। इसी प्रकार वावका प्रयोग उ, ऊ, और ओके लिए होता है। उ युक्त व्यंजनमें वावका प्रयोग न कर ऊपर केवल पेशका चिह्न लगा देते हैं। किन्तु यह सब सिद्धान्तकी ही बातें हैं। व्यवहारमे लिखते समय जेर, जबर, पेश प्रायः लोग नहीं लगाते। अभ्यासके आधारपर ही अन्दाजसे पाठ स्वरूप समझ लिया जाता है। चन्दायतकी जो प्रतियाँ हमें उपलब्ध हैं वे सभी नस्ख (अरबी लेखन शैली का एक रूप) में हैं। इस लिपिके लेखक लिपिसौन्दर्यपर विशेष बल दिया करते थे। इस कारण वे नुक्तेको अपने स्थानपर न रखकर सौन्दर्यकी दृष्टिसे आगे-पीछे ऊपर नीचे जहाँ चाहे वहाँ रख दिया करते थे। जिसका लोप भी कोई दोष नहीं माना जाता था। इस प्रकार नुक्तेके अभाव अथवा मनमानीके कारण पाठोद्धारमें जो कठिनाई हो सकती है वह तो है ही इसमें अनेक अक्षर ऐसे जिनके उच्चारण बहु हैं। त और टके उच्चारणके लिए आज दो अक्षर ते और टे हैं। पर उस समय इसका काम केवल एक अक्षरसे ही लेते थे। इसी प्रकार क और ग भी एक ही अक्षर काफ़से लिखा जाता था। इस प्रकार कुछ अन्य अक्षर भी हैं। मात्रा-बोधक चिह्नोंका प्रयोग इन प्रतियोंमें नहींके बराबर है। ये के दोनों रूपोंका प्रयोग बिना किसी भेदके इ और ए के लिए किया गया है।