चन्दायन (मुल्ला दाऊद - प्राचीनतम अवधी सूफी-प्रेमाख्यान सटीक)
Chandayan of Mulla Daud with Hindi Commentary
मुल्ला दाऊद (१३७९ ई.) / डॉ. परमेश्वरीलाल गुप्त द्वारा
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लिपि स्वरूपकी इन कठिनाइयोंके साथ-साथ सबसे बड़ी कठिनाइ जो हमारे सम्मुख रही है, वह थी चन्द्रायान की पृष्ठभूमिका अभाव । हमारे पास कोई ऐसी वस्तु नहीं थी, जिससे पाठके अनुमानके लिए कोई सहाय मिल सके । एक ही शब्द पुरूस, बिरिस, बरस कुछ भी पढ़ा जा सकता है । यह तो प्रसंग से ही निश्चय किया जा सकता है कि वास्तविक पाठ क्या है । जब प्रसंग ही ज्ञात न हो तो किया क्या जाय ! प्रसंग ज्ञात होनेपर भी कभी कभी यह कठिनाई बनी रहती है । शब्दके पठित दो या अधिक रूपोंमेंसे कोई भी सार्थक हो सकता है । यथा—नत गावईं जहाँ और नित गावईं जहाँ । ऐसे स्थलोंपर दोमेंसे कौन-सा पाठ ठीक है निश्चित करना सहज नहीं होता । चन्द्रायानके पाठोद्धार करनेमें ऐसी ही तथा अन्य अनेक प्रकारकी कठिनाइयाँ हमारे सामने रही हैं । एक-एक शब्दको समझने और उसका रूप निर्धारण करनेमें घण्टों माथापच्ची करनी पड़ी है । कभी कभी तो एक पंक्तिक पढ़नेमें दो-दो तीन तीन दिन लग गये हैं । हमारी कठिनाइयोंका अनुमान वे ही लोग कर सकते हैं जिन्होंने बिना किसी नागरी प्रतिकी सहायताके इस प्रकारका पाठ-सम्पादन किया होगा । अपने सारे श्रमके बावजूद हम दृढता पूर्वक नहीं कह सकते कि हम ग्रन्थका पाठोद्धार करनेमें पूर्ण सफल हुए हैं । कितने ही ऐसे शब्द हैं जिनके शुद्ध पढ़ पानेके सम्बन्धमें स्वयं हमें सन्देह है । उनमेंसे कुछ तो विकृत पाठ हो सकते हैं; जिनका निराकरण तो कुछ और प्रतियोंके प्रकाशमें आनेपर ही सम्भव है । कुछ ऐसे भी हो सकते हैं, जिन्हें हमने पढ़ा तो ठीक हो पर अर्थ ज्ञानके अभावमें हम उन्हें सन्दिग्ध समझते हों । ऐसे शब्दोंकी भी कमी न होगी जिन्हें हम शुद्ध पढ़ ही न सके हों । इस प्रकारके अप-पाठके मूलमें बिन्दुओंका अभाव ही मुख्य होगा । उन्हें मूल शब्दकी कल्पनाके सहारे सुधारा सकता है ।
प्रति-परम्परा, पाठ-सम्बन्ध और संशुद्ध पाठ
प्राचीन ग्रन्थोंके सम्पादनकी आधुनिक प्रणालीके अनुसार विभिन्न प्रतियोंमें जो विभिन्न पाठ मिलते हैं उनमेंसे कौन-सा पाठ गुरु अथवा मूलके निकट है इसे जाननेके निमित्त प्रति-परम्परा और पाठ-सम्बन्धका शोध किया जाता है और तदनन्तर संशुद्ध पाठ (क्रिटिकल टेक्स्ट) प्रस्तुत किया जाता है । प्रस्तुत काव्यका इस प्रकारका कोई संशुद्ध पाठ (क्रिटिकल टेक्स्ट) उपस्थित करनेका प्रयास हमने नहीं किया है । यह बात नहीं कि हम उसके महत्त्वसे परिचित न हों और उसकी आवश्यकता न समझते हों । इस दिशामें हमारी कठिनाई यह है कि काव्यके उपलब्ध ३९२ कड़वकोंमें- से २९२ कड़वक ऐसे हैं जो किसी एक ही प्रतिमें मुख्यतः रीजेण्ड्स प्रतिमें प्राप्त हैं । उनके प्रति-पाठके अभावमें किसी प्रकारके संशुद्ध पाठ उपस्थित करनेका प्रश्न ही नहीं उठता । शेष ? कड़वकोंमेंसे निम्नलिखित ८८ कड़वक ऐसे हैं जो रीजेण्ड्स प्रतिके अतिरिक्त अन्य किसी एक प्रतिमें हैं —